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वैचारिकी

मेरे सपनों का भारत
मोहनदास करमचंद गांधी


आजकल हड़तालों का दौर-दौरा है। वे वर्तमान असंतोष की निशानी हैं। तरह-तरह के अनिश्चित विचार हवा में फैल रहे हैं। सबक दिलों में एक धुधली-सी आशा बंधी हुई है। और यदि वह आशा निश्चित रूप धारण नहीं करेगी, तो लोगों को बड़ी निराशा होगी। और देशों की तरह भारत में भी मजदूर-जगत उन लोगों की दया पर निर्भर है, जो सलाहकार और पथदर्शक बन जाते हैं। ये लोग सदा सिद्धांत-पालक नहीं होते और सिद्धांत-पालक होते भी हैं तो हमेशा बुद्धिमान नहीं होते। मजदूरों को अपनी हालत पर असंतोष है। असंतोष के लिए उनके पास पूरे कारण हैं। उन्‍हें यह सिखाया जा रहा है, और ठीक‍ सिखाया जा रहा है, कि अपने मालिकों को धनवान बनाने का मुख्‍य साधन वे ही हैं। राजनीतिक स्थिति भी भारत के मजदूरों को प्रभावित करने लगी है। और ऐसे मजदूर-नेताओं का अभाव नहीं है, जो समझते हैं कि राजनीतिक हेतुओं के लिए हड़ताल कराई जा सकती हैं।

मेरी राय में ऐसे हेतु के लिए मजदूर-हड़तालों का उपयोग करना अत्‍यंत गंभीर भूल होगी। मैं इससे इनकार नहीं करता कि ऐसी हड़तालों से राजनीतिक गरज पूरी की जा सकती है। परंतु वे अहिंसक असहयोग की योजना में नहीं आती। यह समझने के लिए बुद्धि पर बहुत जोर डालने की जरूरत नहीं है कि जब तक मजदूर देश की राजनीतिक स्थिति को समझ न लें और सबकी भलाई के लिए काम करने को तैयार न हों, तब तक मजदूरों का राजनीतिक उपयोग करना बहुत ही खतरनाक बात होगी। इस व्‍यवहार की उनसे अचानक आशा रखना कठिन है। यह आशा उस वक्‍त तक नहीं रखी जा सकती, जब तक वे अपनी खुद की हालत इतनी अच्‍छी न बना लें कि शरीर और आत्‍मा की जरूरतें पूरी करके सभ्‍य और शिष्‍ट जीवन व्‍यतीत कर सकें।

इसलिए सबसे बड़ी राजनीतिक सहायता मजदूर यह कर सकते हैं कि वह अपनी स्थिति सुधार लें, अधिक जानकार हो जाएँ, अपने अधिकारों का आग्रह रखें और जिस माल के तैयार करने में उनका इतना महत्‍त्‍वर्पूण हाथ होता है उसके उचित उपयोग भी मालिकों से माँग करें। इसलिए मजदूरों के लिए सही विकास यही होगा कि वे अपना बढ़ाएँ और आंशिक मालिक का दरजा प्राप्‍त करें।

अत: अभी तो हड़तालें मजदूरों हालत के सीधे सुधार के लिए ही होनी चाहिए और जब उनमें देश-भक्ति की भावना पैदा हो जाए, तब अपने तैयार किए हुए माल की कीमतों के नियंत्रण के लिए भी हड़ताल की जा सकती है।

सफल हड़तालों की शर्तें सीधी-सादी हैं, और जब वे पूरी हो जाती हैं तो हड़तालें कभी असफल सिद्ध होनी ही नहीं चाहिए :

1. हड़ताल का कारण न्‍यायपूर्ण होना चाहिए।

2. हड़तालियों में व्‍यावहारिक एकमत होना चाहिए।

3. हड़ताल न करने वालों के विरुद्ध हिंसा काम में नहीं लेनी चाहिए।

4. हड़तालियों में या शक्ति होनी चाहिए कि संघ के कोष का आश्रय लिए बिना वे हड़ताल के दिनों में पालन-पोषण कर सकें। इसके लिए उन्‍हें किसी उपयोगों और उत्‍पादक अस्‍थायी धंधे में लगना चाहिए।

5. जब हड़तालियों की जगजह लेने के लिए मजदूर काफी हों, तब हड़ताल का उपाय बेकार साबित होता है। उस सूरत में अन्‍यायपूर्ण व्‍यवहार हो, नाकाफी मजदूरी मिले या ऐसा ही और कोई कारण हो, तो त्‍यागपत्र ही उसका एकमात्र उपाय है।

6. उपरोक्‍त सारी शर्तें पूरी न होने पर भी सफल हड़तालें हुई हैं। परंतु इससे तो इतना ही सिद्ध होता है कि मालिक कमजोर थे और उनका अंत:कारण अपराधी था।

जाहिर है कि बिना वजनदार कारण के हड़ताल होनी ही न चाहिए। नाजायज हड़ताल को न तो कामयाबी हासिल होनी चाहिए और न ही किसी हालत में उसे आम जनता की हमदर्दी मिलनी चाहिए। आमतौर पर लोगों को यह मालूम ही नहीं हो सकता कि हड़ताल जायज है या नाजायज सिवा इसके कि हड़ताल का समर्थन कोई ऐसे लोग करें, जो निष्‍पक्ष हों और जिन पर आम लोगों का पूरा विश्‍वास हो। हड़ताली खुद अपने मामले में राय देने के हकदार नहीं। इसलिए या तो मामला ऐसे पंच को सुपुर्द करना चाहिए, जो दोनों तरफ के लोगों को मंजूर हो, या उसे अदालती फैसले पर छोड़ना चाहिए। ....

जब इस तरीके से काम किया जाता है, तो आम तौर पर जनता के सामने हड़ताल का मामला पेश करने की नौबत ही नहीं आती। अलबत्‍ता, कभी-कभी यह जरूर होता है कि मगरूर मालिक पंच के या अदालत के फैसले को ठुकरा देते हैं, या गुमराह मजदूर अपनी ताकत के बल पर मालिक से जबरदस्‍ती और भी रियायतें पाने के लिए फैसले को मंजूर करने से इनकार कर देते है। ऐसी हालत में मामला आम जनता के सामने आता है।

जब हड़ताल माली हालत की बेहतरी के लिए की जाती है, उसमें कभी अंतिम ध्‍येय के तौर पर राजनीतिक मकसद की मिलावट नहीं होनी चाहिए ऐसा करनेसे राजनीति तरक्‍की कभी नहीं हो सकती। बल्कि होता यह है कि अक्‍सर हड़तालियों को ही इसका नतीजा भुगतना पड़ता है, चाहे उन हड़तालों का असर आम लोगों की जिंदगी पर पड़े या न पड़े। सरकार के सामने कुछ दिक्‍कतें जरूर खड़ी हो सकती हैं, लेकिन उनकी वजह से हुकूमत का काम रुक नहीं सकता। अमीर लोग रुपया खर्च करके अपनी डाक का बंदोबस्‍त खुद कर लेंगे, लेकिन असल मुसीबत तो गरीबों को झेलनी पड़ती है। ऐसी हड़तालें तो तभी करना चाहिए, जब इंसाफ कराने के दूसरे सब उचित साधन असफल साबित हो चुके हो। ...

ऊपर की इन बातों से यह जाहिर है कि राजनीतिक हड़तालों की अपनी अलग जगह है और उनकी आर्थिक हड़तालों के साथ न तो मिलाना चाहिए और न दोनों का आपस में वैसा कोई रिश्‍ता जाना चाहिए। अहिंसक लड़ाई राजनीतिक हड़तालों की अपनी एक खास जगह होती है। वे चाहे जब और चाहे जैसे ढँग से नहीं की जानी चाहिए। ऐसी हड़तालें बिलकुल खुली होनी चाहिए और उनमें गुण्‍डाशाही की कोई गुजाइश नहीं रहनी चाहिए। उनकी वजह से कहीं किसी तरह की हिंसा नहीं होनी चाहिए।


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