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सिनेमा

हिंदी फिल्मों में गीत संगीत का बदलता चेहरा

शरद दत्त


पिछले वर्ष से भारतीय सिनेमा का शताब्दी वर्ष देश भर में मनाया जा रहा है। इस अवसर पर भारत की पहली मूक फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' जिसका पहला सार्वजनिक प्रदर्शन मई 1913 में बंबई में, कोरोनेशन थिएटर में हुआ था, जिसके निर्माता, निर्देशक, पटकथाकार, संपादक धुंडिराज गोविंद फाल्के को भी याद किया गया। फाल्के ने अपने जीवनकाल में सोचा भी ना होगा कि उनका यह प्रयास एक उद्योग का रूप धारण कर लेगा। कालांतर में इस उद्योग में से एक और महाउद्योग बना, फिल्मों का गीत संगीत। शताब्दी समारोह के अवसर पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कई आयोजन भी किए।

सबसे पहले मंत्रालय ने गणतंत्र दिवस 2013 पर एक झाँकी निकाली, जिसमें भारतीय सिनेमा के गौरवशाली सौ वर्षों की झलकियाँ दिखाई गई थी। फिल्म समारोह निदेशालय ने घोषणा की कि फिल्म पुरस्कारों का वितरण हर वर्ष 3 मई को किया जाएगा क्योंकि 3 मई 1913 को 'राजा हरिश्चंद्र' का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ था। (वास्तव में फिल्म 13 मई 1913 को प्रदर्शित हुई थी)। इस वर्ष अप्रैल के अंतिम सप्ताह में मंत्रालय ने राजधानी के सिटी कोर्ट में पिछले 100 वर्षों में सिनेमा की विकास यात्रा पर एक प्रदर्शनी भी लगाई। एक सप्ताह तक चुनी हुई फिल्मों के साथ साथ 'राजा हरिश्चंद्र' की चंद रीलें भी दिखाईं गई। यह रीलें मूल फिल्म से ना थी। इनको दादा साहब फाल्के द्वारा 1917 में 'राजा हरिश्चंद्र' को दोबारा छायांकित किया गया था। इन रीलों को राष्ट्रीय फिल्मागार के पहले निदेशक पी.के.नायर ने नासिक में फाल्के परिवार के घर से ढूँढ निकाला था। इस अवसर पर कई परिचर्चाओं का भी आयोजन किया गया। इन परिचर्चाओं में फिल्मों के कई विषयों को छुआ गया और कुछ एक विषय जो अनछुए रह गए उनमें फिल्मों का संगीत भी था। कुछ संगीत प्रेमियों ने इस पर सवाल भी उठाए कि संगीतकारों, गीतकारों, गायक, और गायिकाओं को क्यूँ दरकिनार कर दिया गया। आयोजकों के पास इसका कोई संतोषजनक उत्तर ना था। हिंदी सिने संगीत को इसलिए महाउद्योग की संज्ञा दी जाती है कि कई बार ऐसा भी हुआ है कि फिल्म ने व्यावसायिक तौर पर निर्माताओं को निराश किया, लेकिन फिल्म के गीतों व संगीत ने उससे कई गुणा अधिक कमाई की।

फिल्मों में संगीत तो मूक फिल्मों के युग से ही अभिन्न अंग था। मूक फिल्मों के प्रदर्शन में संगीत सजीव रूप में प्रस्तुत किया जाता था। कुछेक साजिंदे परदे के सामने एक पिट में बैठ जाते और फिल्म की विषयवस्तु के अनुसार अनुकूल संगीत बजाते रहते। लगभग 20 वर्षों तक यह सिलसिला जारी रहा।

14 मार्च 1931 में 'आलम आरा' के प्रदर्शन से देश में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। 'आलम आरा' भारत की पहली सवाक फिल्म थी, जिसके निर्माता निर्देशक थे खान बहादुर आर्देशिर ईरानी। इसी के साथ शुरू हुआ फिल्मों में गीतों और नृत्य का सिलसिला। इस फिल्म का पहला गीत वजीर मोहम्मद खान, जिन्होंने फिल्म में एक फकीर की भूमिका भी, निभाई थी के स्वर में था। गीत के बोल थे 'दे दे खुदा के नाम पे प्यारे, ताकत हो गर देने की, कुछ चाहे अगर तो माँग ले, मुझसे हिम्मत हो गर लेने की'। इस प्रकार यह गीत हिंदी फिल्म संगीत का पहला गीत बना और इस तरह वजीर मोहम्मद खान बने फिल्मों के पहले गायक। फिल्म में सात गाने और भी थे। दुर्भाग्यवश आज फिल्म का प्रिंट तक उपलब्ध नहीं है। 'आलम आरा' के गाने रिकॉर्डों पर भी नहीं आए। गाने के रिकॉर्डों का चलन 1932 में फिल्म माधुरी से हुआ। यूँ तो इस फिल्म में कई गीत थे, लेकिन सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक प. विनायक राव पटवर्धन ने, जिन्होंने माधुरी में प्रमुख भूमिका भी निभाई थी के स्वर में गाए दो रिकॉर्ड बाजार में आए जिनमें रिकॉर्ड के दोनों ओर चार गीत थे। आज भी दुर्लभ रिकॉर्डों के संग्रहकर्ताओं के पास यह रिकॉर्ड उपलब्ध है। एक बार गीतों की रिकॉर्डिंग का जो सिलसिला चला वह आज तक जारी है।

पार्श्व गायन की सुविधा आने से पहले अभिनेता या अभिनेत्री को अपने स्वर में गाना पड़ता था जब इन गीतों का फिल्मांकन किया जाता था। गानों के फिल्मांकन के समय साजिंदे कैमरे की पहुँच से बाहर होते थे।

फिल्मों के शुरुआती दौर में दादा साहब फाल्के, आर.जी.तोरणे, हीरा लाल सेन ने जो बुनियाद रखी थी उस नींव को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया महाराष्ट्र, कलकत्ता और बंबई के फिल्म उद्योग से जुड़े बाबू राव पेंटर वी. शांता राम, बी.एन. सरकार, हिमांशु राय, जे.ऍफ. मदन, आर. मुदलियार तथा आर. प्रकाश ने। इन लोगों ने निजी प्रयासों से समर्पित कलाकारों और तकनीशियन की टीम जुटाकर स्टूडियो सिस्टम की शुरुआत की।

उन दिनों फिल्म निर्माण के मुख्य केंद्र थे कलकत्ता, बंबई, पुणे और मद्रास। न्यू थिएटर्स, प्रभात फिल्म्स, और बांबे टॉकीज ने इनमें अहम भूमिका निभाई और जनता को सार्थक व साफ सुथरी फिल्में देकर उनका भरपूर मनोरंजन किया। इन फिल्मों का सबसे सशक्त पक्ष था संगीत। संगीत विभाग इन स्टूडियोज का प्रमुख विभाग होता था। न्यू थिएटर्स के संगीतकार थे राय चंद बोराल, पंकज मल्लिक और तिमिर बरन। संगीत के इन विशारदों ने अमर संगीत की रचना की। बांबे टॉकीज की संगीत निर्देशिका थी सरस्वती देवी (खुर्शीद मिनोचर होमजी) सागर मूवीटोन और नेशनल स्टूडियोज में संगीत देने के बाद अनिल विश्वास भी बांबे टॉकीज से जुड़ गए थे। प्रभात फिल्म कंपनी में थे गोवर्द्धनदास टेंबे तथा केशवराव भोले और मास्टर कृष्णराव जैसे दिग्गज।

इन स्टूडियोज की फिल्म निर्माण प्रक्रिया भी बहुत रुचिकर थी। न्यू थिएटर्स एक ओर रवींद्रनाथ ठाकुर, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय और बंकिमचंद्र बंद्योपाध्याय की साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बना रहा था, तो दूसरी ओर भक्त कवियों चंडीदास और विद्यापति के जीवन पर भी। प्रभात फिल्म कंपनी ने 'अयोध्या का राजा', 'अमृत मंथन' जैसी फिल्में बनाने के पश्चात 'संत तुकाराम' फिल्म का निर्माण किया। बांबे टॉकीज सामाजिक विषयों पर फिल्में बनाने में सक्रिय था। 'जीवन नैया', 'अछूत कन्या', 'झूला', 'बंधन' और 'कंगन' जैसी फिल्मों का निर्माण भी इस संस्था ने किया था जो आज भी अपने गीतों के लिए याद की जाती हैं।

फिल्मों के शुरुआती दौर में इन फिल्मों में भक्ति संगीत और नाट्य संगीत का पुट सुनने को मिलता था। बाद में जैसे-जैसे फिल्म संगीत की रिकॉर्डिंग में सुधार होते गए, इसमें महत्वपूर्ण बदलाव आते गए।

न्यू थिएटर्स के संगीत विभाग में सबसे प्रभावशाली भूमिका निभाई रायचंद बोराल ने, उन्होंने न्यू थिएटर्स की शरत बाबू की 'देना पावना' में (बांग्ला) संगीत दिया था। कुंदन लाल सहगल की पहली तीन फिल्मों 'मोहब्बत का आँसू', 'सुबह का सितारा' और 'जिंदा लाश' में उनका संगीत और सहगल की आवाज दर्शकों को ज्यादा आकर्षित नहीं कर पाए लेकिन देवकी कुमार बोस द्वारा निर्देशित 'पूरण भगत' में आर. सी. बोराल ने के.एल.सहगल की आवाज में चार जन रिकॉर्ड किए 'राधे रानी दे डारो ना बाँसुरी मेरी', 'दिन नीके बीतत जात है', 'अवसर बीतो जाए' और 'भजू मैं तो भाव से' गिरधारी ने पूरे देश में बोराल और सहगल को स्थापित कर दिया। ये भजन पूरे देश में सुने जाते थे और संगीत प्रेमियों की जुबान पर थे। देवकी बोस द्वारा बांग्ला में निर्देशित 'चंडीदास' के हिंदी संस्करण में सहगल ने 'चंडीदास' की मुख्य भूमिका निभाई। 'तड़पत बीते दिन रैन' और सहगल और उमा शशि का युगल गीत 'प्रेम नगर में बसाऊंगी', 'तज कर सब संसार' बहुत लोकप्रिय हुए। कुंदनलाल सहगल की 11 फिल्मों में राय चंद बोराल ने संगीत दिया था। स्ट्रीट सिंगर में गाया 'बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए' और प्रेसिडेंट में 'इक बांग्ला बने न्यारा' और 'इक राजा का बेटा लेकर उड़ने वाला घोड़ा' और जिंदगी में सहगल की गाई लोरी 'सोजा राजकुमारी सोजा' रायचंद बोराल के कालजयी गीत हैं।

रायचंद बोराल ने अपने संगीत में आर्गन, बाँसुरी, वायलिन, और हारमोनियम जैसे वाद्यों का प्रयोग कर उसे फिल्मी स्टाइल में पेश किया। उन्होंने न्यू थिएटर्स की 66 फिल्मों, 33 हिंदी और 33 बांग्ला फिल्मों में संगीत दिया।

न्यू थिएटर्स के दूसरे स्तंभ थे पंकज मल्लिक 'डॉक्टर', 'नर्तकी', 'मुक्ति', 'माई सिस्टर' में 'आई बहार आई बहार' 'ये कौन आज आया सवेरे सवेरे', 'चलें पवन की चाल', 'ऐ कातिबे तकदीर मुझे इतना बता दे' जैसे गीतों को पंकज मल्लिक ने ही संगीतबद्ध किया था। पंकज बाबू का सबसे बड़ा योगदान फिल्मों में रवींद्र संगीत को लोकप्रिय करना रहा है। फिल्म 'मुक्ति' में 'कौन देश है जाना बाबू' और अन्य गानों में रवींद्र संगीत को खूबसूरती से पेश किया।

तिमिर बरन ने न्यू थिएटर्स की कुछ फिल्मों में संगीत दिया था लेकिन उनके संगीतबद्ध किए, फिल्म 'देवदास' में सहगल गाए, 'बालम आए बसो मेरे मन में' और 'दुःख के दिन बीतत नाही' आज 78 वर्षों बाद भी दर पीढ़ी गुनगुनाए जाते हैं।

कृष्ण चंद्र डे, पहाड़ी सान्याल और उमा शशि और कानन देवी जैसे गायक, गायिकाओं का श्रेय भी न्यू थिएटर्स को जाता है। फिल्म संगीत में योगदान के लिए न्यू थिएटर्स के पंकज मल्लिक आर.सी. बोराल और कानन देवी को दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया था। पार्श्व गायन की प्रथा 1935 में न्यू थिएटर्स ने शुरू की फिल्म 'धूप छाँव' से। हिंदी फिल्मों में पार्श्व गायन की शुरुआत संगीत निर्देशक रामचंद्र बोराल के निरीक्षण में पारुल घोष (अनिल विश्वास की बहन) के स्वर से हुई। रिकार्डिंग की तकनीक में सुधार से गायन शैली में भी सुधार हुआ। फिल्म संगीत के पहले चरण में पारसी शैली के नाटकों और कोठे और मुजरे की झलक साफ देखी जा सकती थी।

बांबे टॉकीज को भारत की प्रथम महिला संगीतकार को फिल्मों में लाने का श्रेय जाता है। खुर्शीद मिनोचर होमजी नामक पारसी महिला ने पारसी समाज की आलोचना के कारण फिल्मों में सरस्वती देवी नाम से संगीत दिया। बांबे टॉकीज की पहली फिल्म 'जवानी की हवा' से लेकर 'नया संसार' तक सरस्वती देवी ने बांबे टॉकीज की 19 फिल्मों में संगीत दिया। सरस्वती देवी की कला से 'मैं बन की चिड़िया बन के वन वन डोलूं रे (अछूत कन्या), 'चल-चल रे नौजवान ('बंधन')', 'ना जाने किधर आज मेरी नाव चली रे' ('झूला')', 'मैं तो दिल्ली से दुल्हन लाया रे ('झूला')', 'एक नया संसार बसा ले' ('नया संसार') आदि फिल्मों का संगीत कालजयी बन गया।

प्रभात फिल्म कंपनी के प्रमुख संगीतकार थे गोविंद राव टेंबे, केशव राव भोले और मास्टर कृष्ण राव महाराष्ट्र के जनमानस पर नाट्य संगीत का सर्वाधिक प्रभाव था। गोविंद राव टेंबे ने प्रभात की फिल्मों में पहली बार शास्त्रीय ढंग पर संगीत रचा। 1932 में प्रभात की फिल्म 'अयोध्या का राजा', (हिंदी), और 'अयोध्या चे राजा' (मराठी में भी प्रदर्शित हुई)। इस फिल्म को गोविंद राव टेंबे ने ही संगीत से संवारा था। उन्होंने फिल्म में मुख्य भूमिका भी निभाई थी। उन्होंने 'अग्नि के कण', 'माया मच्छिंदर', 'सिंहगढ़' और 'सैरंध्री' में भी संगीत प्रदान किया। प्रभात के संगीत ने धीरे-धीरे मोड़ लिया और इसमें अहम भूमिका निभाई केशवराव भोले और मास्टर कृष्णा राव ने। इनके संगीत में विविधता थी। 'संत तुकाराम', 'संत ज्ञानेश्वर', 'राम शास्त्री' और 'आदमी' में केशव राव भोले ने प्रभावशाली संगीत दिया। कृष्णराव का संगीत भी मनोरंजन प्रधान था।

संगीतकार अनिल विश्वास ने महबूब खान की शुरुआती फिल्मों में संगीत दिया था। जिसमें 'औरत' और 'रोटी' दो ऐसी फिल्में थी, जिसका संगीत सुपरहिट साबित हुआ। बाद में अनिल विश्वास बांबे टाकीज से जुड़े और सन 1943 में बनी फिल्म 'किस्मत' में उनका संगीत काफी चर्चित रहा। खासकर देशभक्ति गीत 'दूर हटो ऐ दुनियावालों' ने तहलका मचा दिया था और 'धीरे धीरे आ रे बादल' एवं 'घर-घर' में दिवाली है' कालजयी गीत साबित हुए। मुकेश और तलत महमूद जैसे गायकों को स्थापित करने वाले भी अनिल विश्वास ही थे। चालीस के दशक में फिल्म संगीत में फ्यूजन दिखाई देना शुरू हो गया था। पहली बार मास्टर गुलाम हैदर ने ढोलक का इस्तेमाल करके पंजाबी लोक संगीत प्रस्तुत किया। मास्टर गुलाम हैदर ने शमशाद बेगम को हिंदी फिल्म संगीत से जोड़ा और फिल्म 'खजांची' के लिए 'सावन के नजारे हैं अहा-अहा' गाने का अवसर दिया। सन 1942 में खानदान फिल्म में नूरजहां को गाने का मौका मिला। 1948 में फिल्म 'मजबूर' में मास्टर गुलाम हैदर के संगीत निर्देशन में लता मंगेशकर ने पहला हिट गीत गाया। 'दिल मेरा तोड़ा कहीं का ना छोड़ा'। पंडित अमरनाथ (पंडित हुस्नलाल-भगतराम के बड़े भाई) ने फिल्म 'दासी' के लिए यादगार संगीत दिया। खेमचंद प्रकाश ने के एल सहगल और खुर्शीद आलम अभिनीत फिल्म 'तानसेन' में शास्त्रीय रंग में सराबोर संगीत दिया। 'भतृहरि' में इनका संगीत खासकर गीत 'चंदा देस पिया के जा' जिसे अमीरबाई कर्नाटकी ने गाया और दूसरा युगल गीत 'भिक्षा दे दे भैया पिंगला' जिसे सुरेंद्रनाथ के साथ गाया। 1950 के दशक का चार्ट बस्टर गीत बना, 'आएगा आने वाला। खेमचंद प्रकाश के संगीत निर्देशन में 'महल' के इस नए गीत ने पूरे देश को रोमांचित कर दिया था। यह गीत लता के लिए ट्रेडमार्क ही बन गया। खेमचंद प्रकाश ने ही पहली बार किशोर कुमार से फिल्म 'जिद्दी' के लिए पार्श्व गायन कराया, गाना था 'मरने की दुआएं क्यों मांगू'। इस फिल्म का दूसरा हिट गीत 'चंदा जा रे जा' लता मंगेशकर ने गाया था। फिल्म जगत में आते ही नौशाद ने अपने संगीत का लोहा मनवा लिया। नौशाद ने पहली बार संगीत निर्देशन किया सन 1940 में फिल्म 'प्रेमनगर' के लिए। 1944 में इनके संगीत निर्देशन में फिल्म 'रतन' जिसके गाने घर-घर में सुने जाते थे। इस फिल्म का जोहराबाई अंबालेवाली के स्वर में गाया गीत 'अंखियाँ मिला के' कभी न भुलाया जाने वाला गीत बन गया। नौशाद साहब ने पहली बार उत्तर प्रदेश के लोक संगीत पर आधारित धुनों को 'रतन' में इस्तेमाल किया था। अनमोल घड़ी' 'दर्द', 'मेला', 'अंदाज' आदि फिल्मों में नौशाद ने यादगार संगीत दिया। नौशाद का सर्वश्रेष्ठ संगीत आया (1952) में और फिल्म थी 'बैजू बावरा'। नौशाद को इस फिल्म के संगीत निर्देशन के लिए पहली बार फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित किया गया।

फिल्म 'शबाब और 'मुगल-ए-आजम' (1960) नौशाद के अमर संगीत के लिए याद की जाती हैं। मोहम्मद रफी, सुरैया, श्याम कुमार और उमा देवी (टुनटुन) को फिल्म संगीत से परिचय करने का श्रेय भी नौशाद साहब को जाता है। नौशाद को कुंदन लाल सहगल के साथ एक ही फिल्म 'शाहजहां' करने का मौका मिला लेकिन इस फिल्म के गीत 'जब दिल ही टूट गया', 'गम दिए मुस्तकिल', और 'रूबी-रूबी दिल में' तीनों गीत कालजयी गीत साबित हुए। 1940 के दशक के आखिरी सालों में एस.डी. बर्मन, सी. रामचंद्र और शंकर जयकिशन जैसे संगीतकारों का उदय हुआ। इनके साथ मजरूह सुल्तानपुरी, साहिर लुधियानवी, राजिंदर कृष्णा, हसरत जयपुरी और शैलेंद्र जैसे गीतकार हिंदी फिल्म संगीत से जुड़े। इन गीतकारों ने फिल्म संगीत को लोकप्रियता के साथ-साथ साहित्यिक आयाम भी दिए। भारतीय हिंदी सिनेमा में पश्चिमी संगीत का समावेश करने का श्रेय सी. रामचंद्र को जाता है। 'शहनाई' का गीत 'आना मेरी जान संडे के संडे', 'पतंगा' का 'मेरे पिया गए रंगून', 'गोरे ओरे ओ बांके छोरे' किशोर और आशा का गाया गीत 'ईना-मीना-डीका'-सी रामचंद्र की संगीत की विविधता को दर्शाते हैं। संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन ने शुरुआत की राजकपूर की फिल्म 'बरसात' से। शंकर-जयकिशन और राजकपूर की जोड़ी काफी लंबी चली और इस जोड़ी ने सुपरहिट संगीत दिया। राजकपूर के अलावा शंकर-जयकिशन ने दिलीप कुमार की 1952 में बनी फिल्म 'दाग' के लिए बेहतरीन संगीत रचा, जिसमें तलत महमूद द्वारा गया गीत 'ए मेरे दिल कहीं और चल' आज भी लोगों की जुबाँ पर है।

शंकर जयकिशन ने देव आनंद की फिल्म 'पतिता' में भी अपना जौहर दिखाया। तलत महमूद द्वारा गाए गीत 'अंधे जहान के अंधे रास्ते' और 'है सबसे मधुर वो गीत' काफी लोकप्रिय हुए। संगीतकार मदन मोहन के आने से पहले गजल हिंदी फिल्म संगीत से दूर ही थी। फिल्म 'अदालत' (1958) में 'उनको ये शिकायत है कि' और 'ये हसरतों के दाग' जिसे लता ने गाया था, मदन मोहन के संगीत में गजल का कभी ना भूलनेवाला आयाम बना। इन्हीं के संगीत निर्देशन में 1957 में फिल्म 'देख कबीरा रोए' में तलत महमूद द्वारा गाई गजल 'हमसे आया न गया' गजल का उत्तम नमूना बना। मदन मोहन ने 'माई री कासे कहूं', 'हम हैं मता-ए-कूचा ओ बाजार की तरह' और 'बैयाँ ना धरो' आदि ऐसे क्लासिक हैं जो मदन मोहन ने फिल्म 'दस्तक' में दिए और जिन्हें लता ने आवाज दी थी। इस फिल्म के संगीत के लिए मदन मोहन को राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया। संगीत निर्देशक खय्याम की शुरुआत सन 1952 में फिल्म 'फुटपाथ' के गीत 'शामे गम की कसम' से धमाके के साथ हुई। 'फिर सुबह होगी' में भी खय्याम ने शानदार संगीत दिया था लेकिन फिल्म 'शोला और शबनम' और 'शगुन' के बाद वह कहीं खो गए। दोबारा उनकी वापसी यश चोपड़ा की फिल्म कभी-कभी से हुई। उसके बाद उन्होंने 'उमराव जान' और 'रजिया सुल्तान' का संगीत निर्देशन किया और इन फिल्मों का संगीत मील का पत्थर साबित हुआ। 1950 के दशक में रोशन ने केदार शर्मा की फिल्म बावरे नैन का संगीत निर्देशन किया जो हिट रहा। रोशन ने इस फिल्म में हरियाणवी लोक संगीत का प्रयोग किया, 'सुन बैरी बालम सच बोल इब क्या होगा' हर एक की जुबाँ पर आ गया। इन्हीं की कंपोजिशन 'मुझे सच सच बता दो क्या' जिसे मुकेश और गीता राय ने आवाज दी थी और 'तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं' जिसे मुकेश ने गाया था, आज भी संगीत प्रेमियों की पसंद बने हुए हैं। इन गीतों के रचयिता निर्माता-निर्देशक केदार शर्मा स्वयं थे। 'बरसात की रात' की कव्वालियाँ, 'ताजमहल', 'चित्रलेखा' और 'ममता' के मधुर गीतों के लिए रोशन आज भी याद किए जाते हैं। शंकर-जयकिशन का गहरा जुड़ाव राजकपूर के साथ था, एस.डी. बर्मन और बाद में आर.डी. बर्मन अंत तक देव आनंद के साथ जुड़े रहे।

सचिन देव वर्मन ने बिमल राय की फिल्मों 'देवदास', 'सुजाता' और 'बंदिनी' के लिए यादगार संगीत दिया। सचिन देव बर्मन ने गुरुदत्त की फिल्म 'प्यासा' और 'कागज के फूल' का भी संगीत निर्देशन किया था, जो आज भी संगीत प्रेमियों के दिल में बसा हुआ है। रिदम किंग संगीत निर्देशक ओ.पी. नैय्यर की संगीत यात्रा कठिन जरूर रही लेकिन उन्हें शानदार संगीत के लिए याद किया जाता है। सन 1952 में फिल्म 'आसमान' के लिए उन्हें पहला ब्रेक मिला। गुरुदत्त ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अपने साथ जोड़ लिया। ओ.पी. नैय्यर ने गुरुदत्त की लगातार तीन फिल्मों में सुपरहिट संगीत दिया। फिल्में थी 'आर-पार', 'मिस्टर एंड मिसेज 55' 'सीआईडी' और गीता राय दत्त ने अपना सर्वश्रेष्ठ गायन ओ.पी. नैय्यर के संगीत निर्देशन में ही दिया। 'बाबूजी धीरे चलना', 'लो मैं हारी पिया' और मोहम्मद रफी के साथ 'सुन-सुन जालिमा', 'इधर तुम हसीं हो', जैसे गीतों को कौन भुला सकता है। नैय्यर को नया दौर के लिए एकमात्र फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला, जिसमें उन्होंने पंजाबी लोक संगीत का भरपूर प्रयोग किया था। 'उड़े जब-जब जुल्फें तेरी' और 'रेशमी सलवार कुरता जाली का' इस फिल्म के अमर गीत है। सलिल चौधरी के संगीत में पूरब और पश्चिम का फ्यूजन साफ दिखाई देता है। 'दो बीघा जमीन', 'नौकरी', 'मधुमती', 'परख' आदि का संगीत कालजयी साबित हुआ। ये सारी फिल्में बिमल राय की थीं। पचास के मध्य दशक में जयदेव संगीतकार बनकर उभरे। 'मुझे जीने दो', 'हम दोनों', 'रेशमा और शेरा' जयदेव के शानदार संगीत की गवाह हैं। पचास और साठ के दशक को फिल्म संगीत का स्वर्णकाल कहा जा सकता है। उस दौर के सभी संगीतकारों के संगीत को आज भी उनके हस्ताक्षर से जाना जाता है। संगीत की शुद्धता, उसकी मधुरता और आत्मा की गहराई तक उतरने का गुण पचास के दशक के संगीत में ही था और इसका श्रेय उस दशक के निर्माताओं और निर्देशकों को भी जाता है जो फिल्म संगीत को फिल्म की आत्मा मानते थे और संगीतकारों के साथ हर कदम मिलाकर फिल्म का निर्माण करते थे। पचास के दशक के फिल्म संगीत फिल्मों के लिए उतना ही महत्वपूर्ण था जितना कि कहानी और किरदार। सच बात तो ये है कि कहानी और किरदार के सृजन को ध्यान में रखकर ही संगीत का सृजन किया जाता था। 'लेकर पहला-पहला प्यार' और 'आँखों ही आँखों में इशारा हो गया' जैसे गीतों को आज की पीढ़ी भी यूँ ही नहीं गुनगुनाती। सच पचास और साठ का दशक फिल्म संगीत का स्वर्णकाल था कहना अतिश्योक्ति ना होगी।

सत्तर के दशक का संगीत अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्षरत लगता है। इस दशक में लक्ष्मीकांत प्यारे लाल, कल्याणजी, आनंदजी और राहुल देव बर्मन ने अलग-थलग संगीत शैली को विकसित किया और अपनी-अपनी शैली बनाने में सफल भी रहे। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी एल.पी. के नाम से भी जानी जाती है। इस जोड़ी ने सबसे अधिक फिल्मों में संगीत दिया। शंकर जयकिशन और कल्याणजी, आनंदजी के सहायक के रूप में काम करने के बाद उन्होंने स्वतंत्र पहचान पहली ही फिल्म 'पारसमणि' से बनाई। दोस्ती के संगीत के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार से भी नवाजा गया। राहुल देव बर्मन ने हिंदी फिल्मों में एक नया ट्रेंड शुरू किया। इलेक्ट्रॉनिक वाद्यों के साथ किशोर दा और आशा भोंसले की आवाजों ने फिल्म संगीत का परिदृश्य ही बदल दिया। 'शोले', 'पड़ोसन', 'हरे रामा हरे कृष्णा', 'तीसरी मंजिल', 'यादों की बारात', 'हम किसी से कम नहीं' के संगीत के विपरीत 'परिचय', 'आँधी', 'किनारा', 'अमर प्रेम और' 'घर' जैसी फिल्मों में अपनी भरपूर रेंज को साबित किया। '1942 ए लव स्टोरी' का संगीत सुपरहिट हुआ पर वे इस सफलता का आनंद उठाने से ही पहले दुनिया को अलविदा कह गए।

बीसवीं सदी के अंत तक आते-आते जिस संगीतकार का संगीत ताजी हवा का झोंका बनकर आया वह थे अल्लारक्खा खान। ए.आर, रहमान ने कम उम्र में ही सफलता का स्वाद चख लिया। चौदह फिल्मफेयर अवार्ड, चार राष्ट्रीय पुरस्कार बाफ्टा से लेकर गोल्डन ग्लोब, ग्रैमी और ऑस्कर तक प्रतिष्ठित पुरस्कार विजेता रहमान ने अपने करिअर की शुरुआत की थी 'रोजा' से, फिर उन्होंने 'रंगीला', 'बॉम्बे', 'रंगीला', 'ताल', 'लगान', 'रंग दे बसंती', 'जोधा अकबर' से लेकर 'स्लमडॉग मिलिनेयर', 'जाने तू या जाने ना' में विविधता का परिचय दिया है। शास्त्रीय संगीत, सूफी संगीत, कर्नाटक संगीत और कव्वाली तक पर उनका पूरा-पूरा अधिकार है। इस समय के सबसे वे सफलतम संगीतकार है।

संगीतकार जोड़ियों से आगे जाने वाली तिकड़ी है शंकर एहसान लॉय की। रहमान के बाद उन्होंने 'मिशन कश्मीर', 'दिल चाहता है', 'कभी अलविदा न कहना', 'माई नेम इज खान', 'तारे जमीं पर' में अत्यंत कर्णप्रिय संगीत दिया। फिल्म डॉन के दो गीतों - 'खाई के पान बनारस वाला' और 'ए मेरा दिल प्यार का दीवाना' को वक्त के मिजाज और संगीत के बदलते ट्रेंड को ध्यान में रखते हुए उन्होंने ताजगी के साथ पेश किया।

विशाल भारद्वाज ने अपनी अलग पहचान बनाई और अपनी फिल्मों में संगीत भी दिया तो दूसरी ओर गुलजार द्वारा निर्मित, 'माचिस' कमल हासन की 'चाची 420', रामगोपाल वर्मा की 'सत्या' में अपनी मौलिकता का परिचय दिया।

विशाल शेखर की जोड़ी भी अपने संगीत को लेकर चर्चा में है। 'ओम शांति ओम', 'सलाम नमस्ते', 'टशन' और 'दोस्ताना' के संगीत ने साबित कर दिया कि उनमे असीम संभावनाएं हैं। आज युवाओं की पहली पसंद हैं विशाल शेखर। दूसरी कुछ जोड़ियाँ भी इधर चर्चा में आईं हैं। सलीम सुलेमान को 'डोर', 'चक दे इंडिया', 'रब ने बना दी जोड़ी' और कुर्बान के संगीत ने लोकप्रियता के शिखर पर खड़ा कर दिया। शांतनु मित्र, प्रीतम और मोंटी शर्मा आदि ने भी अपनी आमद दर्ज की।

जद्दनबाई, सरस्वती देवी और ऊषा खन्ना जैसी महिला संगीतकारों के बाद स्नेहा खानवलकर ने 'ओए लकी लकी ओए' और 'लव सेक्स और धोखा' में अच्छा संगीत देकर पुरुष संगीतकारों के वर्चस्व को चुनौती दे डाली। अमित त्रिवेदी ने 'देव डी' में 'ए तेरा इमोशनल अत्याचार' और 'वेक अप सिड' में 'इक तारा' जैसे गीत बनाकर अपना एक दर्शक वर्ग पैदा कर लिया।

सरगम का यह सफर अनवरत जारी है। पिछले 2 दशकों का संगीत कर्णप्रिय तो है इसके बावजूद कालजयी नहीं। आज भी साठ साल से पहले के संगीत निर्देशकों के गाने और उनकी धुनों को संगीत प्रेमी गुनगुनाते हैं जबकि दो दशकों में आई धुनें लोकप्रिय व कर्णप्रिय तो थीं, लेकिन संगीत प्रेमियों के दिल में समाने और उनके दिलों दिमाग पर छाने में असमर्थ रहीं।

फिल्म संगीत के पुरोधा अनिल विश्वास ने इस लेखक से एक भेंटवार्ता में कहा था कि 'शरद फिल्म संगीत में पिछले 70 वर्षों में बहुत बदलाव आए। तकनीक, आधुनिक उपकरण और सुव्यवस्थित साउंड स्टूडियो आदि-आदि। हमारे जमाने में एकमात्र माइक्रोफोन पर, गाना और कोरस रिकॉर्ड किए जाते थे। हम तो चार पाँच साजों पर ही धुन रिकॉर्ड कर लेते थे। आज तो 100 से ऊपर तक के साज इस्तेमाल किए जाते हैं। आज के संगीत के बारे में यही कहा जा सकता है कि एक बड़े जिस्म में आत्मा नाम की चीज नहीं है। आत्मा रही नहीं मर गई, और आत्मा के बिना जिस्म तो मात्र लाश हो जाता है।'

सिने संगीत के भविष्य को लेकर उनकी कही गई यह टिप्पणी आज भी सटीक बैठती है।

(लेखक वरिष्ठ संगीत विश्लेषक हैं)


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हिंदी समय में शरद दत्त की रचनाएँ