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सिनेमा

हिंदी फिल्मी गीत : साहित्य, स्वर, संगीत
पुष्पेश पंत


हिंदी फिल्मों के गीत इस देश में आरंभ से ही दर्शक (आम आदमी) के सुख-दुःख के साथी रहे हैं, जिनकी तुलना दो पीढी पहले के लोकगीतों से की जा सकती है। इस देश की अद्भुत विविधता को एकता के सूत्र में बाँधने में हिंदी फिल्मों का योगदान सभी स्वीकार करते हैं। जो काम राजभाषा विभाग नहीं कर पाया वह जोरदार डायलॉग लिखने वालों ने कर दिखाया। बहरहाल यहाँ हमारा विषय सीमित है हिंदी फिल्मी गीतों तक अतः इन गीतों में साहित्य और शास्त्रीय तथा लोक संगीत की उपस्थिति पर ही यह संक्षिप्त टिप्पणी सीमित रहेगी।

भारत में फिल्म निर्माण के सौ वर्ष के इतिहास में सवाक फिल्मों का इतिहास पैंसठ साल का है। इसमें पार्श्व गायन का हिस्सा लगभग छह दशक है। इस कालखंड में रचे-फिल्माए हजारों गीतों में से यादगार/लगभग कालजयी गीतों की संख्या भी सैकड़ों में पहुँचती है। सभी को छोड़िए इनके एक प्रतिनिधि अंश को प्रस्तुत करने की चेष्टा सिर्फ सूची निर्माण ही हो सकती है।

बात आगे बढाने के पहले एक बात रेखांकित करना आवश्यक है। किसी भी फिल्मी गीत का प्रभाव शब्द (साहित्य), स्वर(गायक की वाणी), संगीत (शास्त्रीय अथवा लोक) के साथ-साथ जिस अभिनेता पर यह फिल्माया गया है और कथानक के भावविह्वल करने वाले मोड़ (सिचुएशन) के सन्निपात पर निर्भर करता है। संगीत निर्देशक, निर्देशक की भूमिका को गायक या गीतकार/कवि/शायर से कमतर नहीं आँका जा सकता। श्रोता के लिए किसी भी गीत को अपनाने के लिए इनमें से प्रत्येक के संदर्भ में व्यक्तिगत पसंद या नापसंद महत्वपूर्ण कसौटी होती है। यही कारण है कि कुछ जुगलबंदियाँ या जोड़ियाँ सफलता के शिखर चूमने और लंबे समय तक लोकप्रिय बने रहने में सफल होती हैं।

'शैलेंद्र-मुकेश-शंकर-जयकिशन-राजकपूर' की पंचायत इस संदर्भ में अनायास याद आती है। 'आह' से लेकर 'तीसरी कसम' तक आप इनकी किसी भी फिल्म को लें - वह हिट हो या फ्लॉप-उसके कुछ गीत निश्चय ही कालजयी परीक्षा में खरे उतरते पाएंगे। शंकर-जयकिशन, शैलेंद्र और मुकेश की त्रिवेणी ने 'तीसरी कसम' में लोकसंगीत के चाहने वालों को घर बैठे 'संगम स्नान' का सुख पहुँचा दिया। 'सजनवा बैरी हो गए हमार', 'पिंजरे वाली मुनिया', 'दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई', 'सजन रे झूठ मत बोलो', 'पान खाय सैंया हमार!' इन गीतों में प्रमुख हैं।

फिल्म संगीत की दुनिया में भारत रत्न लता मंगेशकर की अद्वितीय प्रतिष्ठा है। उनकी छह दशक के विस्तार वाली सक्रियता की तुलना किसी अन्य गायक से नहीं की जा सकती। जितने संगीत निर्देशकों, निर्देशकों, गीतकारों के साथ उन्होंने काम किया है या जितने कलाकारों को वाणी दी है उनकी संख्या का मुकाबला भी संभवतः दिवंगत मुहम्मद रफी को छोड़ किसी के साथ नहीं किया जा सकता। पर क्या यह बात स्वतः प्रमाणित स्वयं सिद्ध है कि उनके मीठे गले या असाधारण स्वर साधना के कारण ही उनका गाया हर गाना हमेशा हिट होता रहा है गीतकार के मर्मस्पर्शी शब्दों का कितना बड़ा योगदान उनकी सुरीली आवाज का जादू जगाने में रहा है विचारणीय है। शब्दों को उपयुक्त संगीत से सजाने वाले संगीत निर्देशक का योगदान भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। लता की अधिकृत जीवनियों में यह जानकारी दर्ज है कि कैसे और किन कारणों से कुछ गायकों या संगीत निर्देशकों के साथ काम करने से उन्होंने इनकार किया।

यहाँ व्यक्तिगत संबंधों के अनावरण की आवश्यकता नहीं पर यह सुझाना तर्कसंगत है कि तकाजा व्यावसायिक सफलता का रहा हो, सैद्धांतिक या गुणवत्ता के मामले में समझौता ना करने का हठी आग्रह इस कारण श्रोता अनिर्वचनीय रसानुभूति से वंचित रह गए। सी. रामचंद्र एवं अनिल बिश्वास लता मंगेशकर के करिअर के पहले चरण में निर्णायक दिग्दर्शक प्रभाव थे। बाद के वर्षों में इनकी जरूरत लता को नहीं रही। जितने प्रकार के, विविध विधाओं के गीत लता ने गाए हैं वह चकित करने वाली उपलब्धि ही है पर यह जोड़ना ईमानदारी का तकाजा है कि उनकी प्रतिभा के स्वभाव तथा संस्कार के अनुकूल रचना-शब्द संयोजन- संगीत का सृजन गीतकार तथा संगीत निर्देशक के लिए कम बड़ी चुनौती नहीं रहा होगा।

यह गाने जन-जन के गीत इसी कारण बन सके क्योंकि इनमें राजनीति के उतार-चढ़ाव की अनुगूंजों के साथ देहाती-कस्बाती और नए बने शहरी का घराती जीवन दर्शन भी आत्मसात किया जाता रहा था। भारत की जिस समन्वयात्मक संस्कृति का महिमामंडन बहुधा होता है उस सहज आदान-प्रदान की मिसाल भी कालजयी गीतों में मिलती है। आजादी की लड़ाई के दौरान लिखे प्रदीप के गीत हों या स्वाधीनता प्राप्ति के बाद विभाजन की रक्त रंजित विभीषिका से मुक्त हो नए राष्ट्र निर्माण का आशावादी सपना 'इप्टा' के साथ कामरेड पीसी जोशी की प्रेरणा से जुड़े गीतकारों की भूमिका अविस्मरणीय है। शैलेंद्र इसी क्यारी की पौध थे।

इस संसार में हिंदी-उर्दू का 'झगड़ा' कभी पनप नहीं सका। प्रदीप एवं नीरज की गिनती हिंदी कवियों में की जाती है, इंदीवर तथा शैलेंद्र के साथ-साथ। साहिर, कैफी, मजरूह की पहचान है शायरों के रूप में। आनंद बख्शी को आप किस जमात में बैठाएंगे साहिर ने 'चित्रलेखा' के लिए जो गीत रचा उसकी तत्सम शब्दावली उल्लेखनीय है। 'कहां हैं कहां हैं मुहाफिज खुदी के जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां हैं लिखने वाले ने ही 'संसार से भागे फिरते हो भगवान को तुम क्या पाओगे! ये भोग भी एक तपस्या है तुम प्यार के मारे क्या जानोगे अपमान रचयिता का होगा रचना को अगर ठुकराओगे!' जैसी पंक्तियाँ रची हैं। या तो आप यह अफवाह सच मान लें कि मुखड़ा लिखने के बाद साहिर बाकी काम सहायक अनुचरों पर छोड़ देते थे या फिर इसे कबूल करें कि इस शायर का अद्भुत अधिकार हिंदी शब्द संपदा पर भी था। परवर्तियों में गुलजार संभवतः अकेले ऐसे गीतकार/निर्देशक हैं जिन्होंने उर्दू, हिंदी, पंजाबी, राजस्थानी या पुरबिया बोलियों में मन को मोह लेने वाले गीतों की रचना की है। बंदिनी के 'मोरा गोरा अंग लइले, मोहे 'श्याम रंग दइदे' से लेकर 'यारा सिली सिली रात का ढलना' अथवा' चप्पा चप्पा चरखा चले' तक।

उमराव जान तथा गमन में शहरयार की रचनाओं का अलग से उल्लेख जरूरी है। मुजफ्फर अली ने निश्चय ही उनकी प्रतिभा का बेहतरीन फिल्मी उपयोग किया। 'दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए' तथा 'ये क्या जगह है दोस्तों' की पकड़ और पहुँच तीन दशक बाद भी जस की तस बरकरार है।

संगीत निर्देशकों ने भी जाने कितनी विधाओं से प्रेरणा ही नहीं बहुत कुछ और भी सामग्री निसंकोच ग्रहण की है - पंजाबी हीर, राजस्थानी माँड, उत्तर प्रदेश-बिहार के फाग या बिदेसिया, गुजरात का गरबा, लखनऊ- पटियाला, बनारस की ठुमरी-दादरा, ने अनगिनत हिंदी फिल्मी गीतों की पाषाण प्रतिमाओं में प्राण प्रतिष्ठा की है। गजल की सही अदायगी या कव्वाली से समाँ बाँधने की अपनी क्षमता के कारण कुछ संगीत निर्देशक 'अमरत्व' प्राप्त कर सके हैं। खैयाम, मदन मोहन, रोशन के नाम सबसे पहले याद आते हैं। अनिल बिश्वास सभी विधाओं में समान रूप से निष्णात तो जयदेव शास्त्रीय एवं सलिल चौधरी लोकसंगीत के प्रति रुझान वाले संगीतकार समझे जाते हैं।

बंगाल की लोक संगीत संपदा से हिंदी फिल्म संगीत को समृद्ध करने में अग्रणी सचिन देव बर्मन हैं जिन्होंने अपनी फिल्मों में भटियाली और बाउल का अद्भुत प्रयोग किया है - 'ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना!' 'मेरे माँझी, ले चल पार'। उनकी जीनियस मात्र अपनी माटी में ही नहीं पल्लवित हुई। बंदिनी के 'अब के बरस भेज भइया को बाबुल दीजो संदेसो भिजाय रे!' या गाइड का 'अल्ला मेघ, दे पानी दे!' अथवा काबुलीवाला का 'गंगा आए कहां से, गंगा जाए कहां रे!' तथा मधुमती का 'लग गयो पापी बिछुवा!' इस बात का प्रमाण हैं कि अनेक क्षेत्रों की लोकधुनों पर उनकी पकड़ अनूठी थी। बिमल राय की 'दो बीघा जमीन' को बेहद मार्मिक बनाने में सलिल चौधरी का योगदान किसी अन्य तत्व से कम नहीं था - 'अपनी कहानी छोड़ जा कुछ तो निशानी छोड़ जा मौसम बीता जाय' सुनते हुए आज भी गला रुंध जाता है।

नौशाद का रचना संसार और सुदीर्घ कार्यकाल अतुलनीय है। जमाने के साथ बदलने की जरूरत उन्होंने कभी महसूस नहीं की। न ही गायक या गायिका के बारे में कोई पूर्वाग्रह उनके चयन में दिखलाई देता है। अपनी सांगीतिक कल्पना के पंख कतरे बिना उन्होंने निर्माता-निर्देशक के आग्रह को पूरा करने का प्रयास जारी रखा। जहाँ लोक की जरूरत लगी वहाँ लोक तो जहाँ शास्त्रीय की दरकार थी वहाँ पक्का गायन ही पेश किया। 'मुगले आजम' इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। 'मोहे पनघट पर नंदलाल छेड़ गयो' से ले कर 'खुदा निगाहबान हो तुम्हारा' तक का रेंज एक ही फिल्म में किसी ने इस तरह छुआ हो। इसी अमर प्रेम कथा का जरा पुराना फिल्मी संस्करण 'अनारकली' भी अपने मनमोहक हृदय द्रावक गीतों के लिए याद किया जाता है। 'जिंदगी प्यार की दो चार घड़ी होती है', 'मुहब्बत ऐसी धड़कन है जो समझाई नहीं जाती', 'ये जिंदगी उसी की है जो किसी का हो गया, प्यार में ही खो गया!' 'जैसे गानों के कारण ही यह फिल्म आज तक भुलाई नहीं जा सकी है।

गीतों के फिल्मांकन के क्षेत्र में विजय आनंद को अद्वितीय माना जाता है। 'हकीकत' और 'गाइड' के यादगार सदाबहार गीत 'दिन ढल जाए पर रात ना आऐ' 'काँटों से छोड़ के ये दामन' 'सैंया बेईमान!' वास्तव में अविस्मरणीय हैं तो निर्देशक, संगीतकार, गायक के सोने में सुहागा जैसे स्वर तथा फिल्म की सिचुएशन के अनुकूल प्रभावशाली मनोभाव सिरजने वाले उपयुक्त शब्दों के कारण ही। निर्माता देव आनंद का योगदान भी उल्लेखनीय है जिन्होंने इस 'टीम' के काम में हस्तक्षेप का लोभ संवरण किया।

गुरुदत्त को इस मामले में गोल्डी से कतई उन्नीस नहीं माना जा सकता है। 'बाजी', 'प्यासा', 'कागज के फूल', 'साहिब, बीबी गुलाम' शायद ही उनकी कोई फिल्म हो जिसका कोई भी गीत या उसकी धुन कथानक की परिस्थिति, पात्र-चरित्र की मनोदशा के लेशमात्र भी प्रतिकूल हो। 'किस्मत पर भरोसा है तो एक दांव लगा ले' से ले कर 'आज सजन मोहे अंग लगा ले जनम सफल हो जाए', 'वक्त ने लिया क्या हसीं सितम' जैसे अनमोल रत्नों की सूची बहुत लंबी है। इस स्वर्णिम संगीत सर्जक साझेदारी में गुरुदत्त का साथ दिया उनकी पत्नी गीता दत्त ने तथा सहचरी अभिनेत्री वहीदा रहमान ने। गीतकार-कवि, शायरों-संगीत निर्देशकों का चुनाव फिल्म विशेष की जरूरतों के अनुसार करने की मानो जन्मजात प्रतिभा गुरुदत्त में थी। सहयोगी सहायक अबरार अल्वी की संगीत की समझ, रुचि इसी मिजाज को प्रतिबिंबित करती दिखती है।

यह कहा जा सकता है कि इस आलेख में कई ऐसी विभूतियों के साथ न्याय नहीं हुआ है जिनकी 'हस्ती' और यहाँ वर्णित कलाकारों से कम नहीं। अपने जमाने में सुरैया, शमशाद बेगम का कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था। संगीत निर्देशकों में खेमचंद्र प्रकाश, गुलाम हैदर, चितलकर रामचंद्र, अनिल बिश्वास कभी लता, तलत, मुकेश के प्रेरक-प्रोत्साहक थे। बाद में विविध कारणों से यह पृष्ठभूमि में चले गए। इनके सहायक/अरेंजर या वाद्यवृंद के वादक स्वयं समर्थ संगीत निर्देशक बन गए। गुरु विस्मृत होते चले गए। जो लोग व्यावसायिक का संतुलन व्यक्तिगत जीवन की प्राथमिकता के साथ बनाए रख सके वही मैदान में बचे रहे। काल के प्रवाह के साथ जन रुचि में परिवर्तन स्वाभाविक है पर विदेशी धुनों की नकल कर उन्हें देसी साँचे में ढाल 'मौलिक' रचना का दावा करने वालों को तवज्जो देना तर्कसंगत नहीं लगता। बप्पी लाहिड़ी के प्रशंसक एक दौर में कम नहीं रहे। (लताजी का 'वरदहस्त' उन पर रहा है जिसका कारण समझ पाना कठिन है)। हां, ओपी नैयर का अलग से मूल्यांकन करने की जरूरत है। इसी तरह आरडी बर्मन 'पंचम' की प्रयोगधर्मिता और उनका साथ मिलने के बाद आशा भोंसले का 'पुर्नजन्म' भी ऐसी घटना है जिसने हिंदी फिल्म संगीत को नयी दिशा दी। शास्त्रीय से ले कर पॉप तक का गायन आशा ने सफलतापूर्वक बिना किसी हिचक के किया है। हरफनमौला, बेहद सनकी और अति संवेदनशील किशोर कुमार यहाँ भी हमेशा एक अबूझ पहेली, रोचक अपवाद बन चुनौती पेश करते हैं।

निर्माता-निर्देशक की अपनी पसंद एक युग में यह तय करती थी कि कौन संगीत निर्देशक लिया जाएगा और किस गायक-गायिका का चयन उसकी राय से किया जाएगा। जाहिर है कि कुछ स्टार अभिनेता-अभिनेत्रियों की पर्दे पर आवाज का पर्याय एक पार्श्व गायक विशेष बन जाने के बाद उसे नजरंदाज करना कठिन हो जाता था। लता जैसी हस्ती यह फैसला कर सकती थी कि किस संगीतकार या निर्देशक के लिए वह काम नहीं करेंगी। उभरती, उदीयमान प्रतिभाओं के लिए जो भी बड़ा हाथ पीठ पर 'वरदहस्त रख दे' उसका अनुसरण करना अनिवार्यता थी। आज स्थिति काफी बदल चुकी है पर 'खेमे' या टीमें आज भी साफ और असरदार नजर आते हैं। 'प्रसून जोशी-रहमान-आमिरखान' का उदाहरण उल्लेखनीय है। प्रसून जोशी गीतकार भी हैं, पटकथा लेखक भी। पेशे से वह विज्ञापन उद्योग से जुड़े हैं। सर्जक-विपणन, प्रबंधक एक साथ। ग्राहक (श्रोता) की नब्ज वह अच्छी तरह पहचानते हैं। नई पीढ़ी के सुनने वाले की पसंद के माफिक उनकी रचनाएं मौलिक लगती हैं। ताजगी भरी भी। 'तारे जमीन पर' हो या 'थ्री ईडियट्स' अथवा 'रंग दे बसंती' इनकी अभूतपूर्व सफलता की कल्पना प्रसून के योगदान के अभाव में असंभव है। विज्ञापन वाली दिलकश जिंगल की तरह वह दिलो दिमाग पे काबिज होने लगती है। गायक कौन है इससे फर्क नहीं पड़ता। न ही लोक की धुंधलाती याद या शास्त्रीय का जादुई पुट उसे मर्मस्पर्शी बनाते हैं। हम धीरे-धीरे उसके आदी होते जाते हैं। तनाव घटाने वाले उपचारक संगीत की तरह।

जावेद के बारे में भी यह कहा जा सकता है कि उनकी शोहरत, हर मौके पर रंग कोकाकोला के संग' जैसी काबिलियत से फैली है। राजनैतिक समझदारी, सामाजिक प्रतिबद्धता दर्शाने वाली मुखरता, प्रगतिशील-धर्म निरपेक्ष तेवर और पुराने जोड़ीदार सलीम के साथ वाले दिनों की कमाई के साथ-साथ, खानदानी विरासत और ससुराल का यश भी उनकी छवि के महिमामंडन में सहायक रहा है। निश्चय ही उनकी शायरी ने हिंदी फिल्मी गीतों का स्तर ऊपर उठाया है, संकीर्ण भाषाई सांप्रदायिकता को दूर करने की पुरजोर कोशिश की है, गीतकार के स्वत्वाधिकार के लिए सार्थक संघर्ष किया है पर कुल मिलाकर किसी पेशेवर रचनाकार की प्रायोजित जिंगल की अनुगूंजें ही अधिकतर सुनाई देती हैं। कैफी साहब के हकीकत के लिए लिखे गीतों से अथवा मजरूह या शकील बदायूंनी की मर्मस्पर्शी कविता/शायरी से तुलना कम से कम इन पंक्तियों के लेखक को उचित नहीं जान पड़ती।

यह सोच पाना कठिन है कि आधी सदी तो दूर की बात है एक दशक तक भी यह सुने जा रहे होंगे। कभी अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त शास्त्रीय संगीतकारों ने हिंदी फिल्मों में संगीत दिया है उनमें रविशंकर, अली अकबर खान, बिस्मिल्ला खान एवं पंडित शिव शर्मा जैसे नाम प्रमुख हैं। नौशाद जैसे संगीत निर्देशकों का रुझान भी शास्त्रीय संगीत के रागों पर आधारित धुनें बनाने का रहा है। इनकी अदायगी के लिए मन्ना डे जैसे गायकों को आमंत्रित किया जाता था। लता, मुहम्मद रफी, येशुदास आदि ने भी बखूबी यह जिम्मेदारी निभाई है। आज शास्त्रीय के नाम पर पश्चिमी सिंफोनी के आराधक रहमान की यांत्रिक तूती बोलती है इस नक्कारखाने में। सम्राट निर्वसन हैं कहने वाला बच्चा भी नजर नहीं आ रहा। लोक का हाल कुछ बेहतर नहीं। पिपली लाइव का 'साजन तो खूबै कमात हैं मंहगाई डाइन खाय जात है' लोक से प्रेरित सटीक वागर्थ संपृक्ति का ताजा उदाहरण है जो याद दिलाता है कि जो राह आज के सफल गीतकारों-संगीतकारों ने तज दी है वह कितनी दूर और देर तक हमारा साथ दे कैसा सुख पहुँचा सकती थी। आइटम नंबर के ही काम 'जियरा से बीड़ी जलै ले पिया' या इसी वजन का कोई 'लोकगीत' भुनाया जाता है। पता नहीं यह स्थिति कब तक चलेगी!

(लेखक प्रख्यात वरिष्ठ स्तंभकार हैं)


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