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कविता

पवित्र
अरुण कमल


मैं उसकी बात मान लेता
अगर वह भी कभी मेरी सुने होता
लेकिन वह तो मुझे तट पर लावारिस छोड़
चला गया था यूथ के साथ उस वसंत की रात

फिर भी मैं उसकी मान लेता
अगर वह मेरे घर के आगे से निकल न गया होता
शरद की उस शाम
मेरे दुश्‍मनों की बाँहों में बाँहें डाले

फिर भी मान जाता
अगर वह यूँ ही टहलते टहलते चादर डाले एक सुबह
चला आता मेरे घर ओस से भीगे तलुवे लिए
और बोलता चाय मिलेगी एक प्‍याली
शिशिर की चाय

जैसे जैसे प्रेम कम होता है
अविश्‍वास बढ़ता जाता है
पवित्र एक मैं ही नहीं पवित्र है वह भी
जिसने बस सुना है गंगा का नाम देखा नहीं

 


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