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कविता

वृत्तांत
अरुण कमल


(1)

कोई भी इंतजार इतना ज्‍यादा नहीं होता
कि और इंतजार हो न सके
कभी भी जगह इतनी कम नहीं होती
कि और कुछ अँट न सके
कोई भी इतना थका नहीं होता
कि और कुछ थक न सके
हालत कभी इतनी खराब नहीं होती
कि और खराब हो न सके


(2)

चाँदनी रात में खुलती है आँख
और लगता है गाड़ी
बचपन के पुराने स्‍टेशन पर खड़ी है

लोग एक दो उतरे हैं संदूक लिए
अपनी छाइयों पर चलते
एक पिता अपने बच्‍चे की कलाई पकड़े
बच्‍चे के पाँवों में अभी भी नींद
पहिए घूमते हैं
छूटते हैं खंभे

गुजरा एक झलक में वो कच्‍चा रास्‍ता
आगे पक्‍की सड़क से मिलता


(3)

अकेला जगा घूम आता हूँ
एक दरवाजे से दूसरा दरवाजा
सोया है जैसे तैसे सारा डब्‍बा
भरे हैं सारे पटरे
फर्श पर भी लोग गठरियों की तरह
चाँदनी रात और मैदान चारों ओर
दूर में पहाड़ियाँ कभी-कभी चाँद
पेड़ों के भीतर अँधेरा

दौड़ती है ट्रेन धृष्‍ट वेग से पुल पर
कट कर गिरता है चाँद एक फाँक
जल में

फिर वे ही मैदान परसरते जाते ढलते


(4)

जब थोड़ी चल ली गाड़ी
और देह को हवा लगी
तो एक एक कर सामान मिलाया -
हवाई वेग सूटकेस पानी का फ्लास्‍क थैला किताबों का बंडल
कुल अदद छे
ठीक है सब चढ़ गया इस भीड़ में
थैले में काँच का सामान था वह भी बच गया

लेकिन एक तो छूट गया -
चलते समय गाँव की बूढ़ी ने दिया था
जूट का झोला
बोली थी दिल्‍ली पहुँचते जरूर भिजवा दीजिएगा ददन को
नया चूड़ा और गुड़ की भेली है

और वह छूट गया


(5)

सामने बैठे यात्री ने लौंग बढ़ाई
तो हाथ मेरा एक बार हिचका
ऐसे ही तो खिला पिला लूटते हैं

एक बार उसे गौर से देखा
उसका चश्‍मा घड़ी और चप्‍पल जिसका नथुना टूटा था
और शुक्रिया कह कर ले ली लौंग
पर इतना पूछ लिया - कहाँ जाएँगे? किस
मोहल्‍ले?
उसके बाद भी देर तक करता रहा इंतजारबेहोशी का


(6)

अकेले सफर करते ऐसा क्‍यों लगता है
कि अचानक तबीयत बिगड़ जाए तो क्‍या होगा
अनजान मुसाफिरों के बीच आधी रात
अनजान स्‍टेशन पर?

जेब में डायरी है
पूरा पता काम भर पैसे
और रास्‍ते के एक स्‍टेशन के परिचित का नंबर

फिर भी जब गाड़ी खुलने खुलने को होती है
अचानक यह डर कौंधता है मन में
रोशनी कहीं भी न ठहरती आँख मूँद एक जगह


(7)

ऐसे में अचानक लुटेरे घुस आएँ
और पिस्‍तौल भिड़ा दें - कहाँ है माल
तो क्‍या करूँगा यही सोचता बैठा हूँ अकेले
पुराना बेग कस कर दबाए
कोई जंजीर बाँध रहा है
कोई जमा रहा है बक्‍स माथे के नीचे
कोई जेब टटोलता होता है निश्चिंत
कोई पत्‍नी से कहता है उतार लो झुमका
अपने जानते कितनी चतुराई कितने उपाय करता है हर कोई
पर सबकी आँख बचा
वह आएगा अकस्‍मात
इतना भी वक्‍त नहीं होगा कि तुम
बेग से निकाल सको अपनी प्रिय किताब
और बोलो, ले जाओ बेग।


(8)

देर क्यों हो रही है
गाड़ी बार बार दे रही है सीटी करुण स्वर में

माथे पर रूमाल बाँधे
सींकचे पकड़े
आधी देह बाहर झुलाता
सबसे पिछले डिब्बे की ओर आँख गड़ाए है
ड्राइवर
हरी रोशनी की खोज में।

 


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