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सिनेमा

फिक्रे फिरकापरस्ती उर्फ दंगे का शोक-गीत
प्रेम भारद्वाज


आनंद पटवर्धन की डाक्यूमेंट्री फिल्म 'राम के नाम' में एक मुस्लिम व्यक्ति कहता है, 'हमें हर साँस के साथ यह खौफ बना रहता है कि कहीं वह आखिरी न साबित हो जाए।' यह खौफ विभाजन के बाद भारत में रह रहे मुसलमानों के एक बड़े तबके का स्थायी भाव है लेकिन यह अभिव्यक्त बहुत कम ही होता है, खासकर हिंदी सिनेमा में। हिंदी सिनेमा में यथार्थ से टकराने और उन्हें ईमानदारी से दिखाने का साहस कम रहा है। सांप्रदायिकता एक बेहद नाजुक और संवेदनशील मुद्दा है जो सियासत को कटघरे में खड़ा करता है, इसलिए फिल्मकारों ने इससे बचकर गुजरना ही बेहतर माना। फिर हिंदी सिनेमा का मूल चरित्र भी यथार्थवादी नहीं है। लिहाजा यहाँ टिपिकल मुस्लिम पात्र गढ़े गए - दाढ़ी, टोपी और चारखाने की लुंगी या पठानी पहनावे वाले। वह कभी हिंदू बनेगा या मुसलमान बनेगा' गीत तो कभी 'यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी' गाकर दोस्ताना पैगाम देता है। वह कभी 'दीवार' का करीम चाचा बनता है तो कभी 'शोले' का रहीम चाचा जो गाँव की हिफाजत के लिए बेटे की मौत को शहादत में बदल देता है। एम.एस. सथ्यू की 'गरम हवा' और गोविंद निहलानी की 'तमस' (टेलीफिल्म) में जरूर विभाजन और सांप्रदायिकता को दिखाने में ईमानदारी बरती गई है। इसके अलावा अधिकतर फिल्मों में मुस्लिम जन को गुडी-गुडी दिखाया गया है। 90 के दशक में एक निर्णायक मोड़ जरूर आया, जब 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस और गुजरात दंगों के बाद फिल्म बनाने का फैशन सा चल पड़ा। इस सिलसिले में कुछ बेतहरीन फिल्में भी आईं खासकर राकेश शर्मा की 'फाइनल सल्यूशन' जो है तो डाक्यूमेंट्री मगर फीचर फिल्म से ज्यादा प्रभाव छोड़ती है।

आनंद पटवर्धन की 'श्राम के नाम' में जहाँ आडवाणी की रथ-यात्रा से उपजे उन्माद को दिखाया गया है, वहीं 'फाइनल सल्यूशन' में गुजरात दंगे को एक बच्चे के नजरिए से देखने की कोशिश है। जिसके माँ-बाप को उसके सामने ही दंगे में हलाक कर दिया जाता है। बच्चा मानसिक रूप से असंतुलित हो जाता है।

बाबरी मस्जिद और गुजरात की घटना की तरह 9/11 के बाद हिंदी में आतंकवाद पर मुस्लिमों को केंद्र में रखकर फिल्में बनने लगीं। पहले 'न्यूयार्क' फिर 'कुर्बान' फिर 'माई नेम इज खान'। इन तीनों फिल्मों का विषय है- आतंकवाद। पृष्ठभूमि में है दुनिया का दारोगा कहा जाने वाला अमेरिका। गुलजार की फिल्म 'माचिस' में ओमपुरी ने एक सवाल किया था, 'क्या आतंकवादी खेतों में उगते हैं।' उस सवाल के जवाब के तौर पर ही जैसे आतंकवादी पृष्ठभूमि पर फिल्में बनने का सिलसिला शुरू हुआ, जो अब तक जारी है। बेशक आतंकवादी खेतों में नहीं उगते लेकिन वे गरीबी की कोख से भी नहीं जन्मते, इसे बॉलीवुड ने साबित किया है। फिल्मों में आतंकवादी का चेहरा बदला है। अब वह ट्रेडिशनल इस्लामी दाढ़ी में नहीं दिखता। 'कुर्बान' के यंग स्मार्ट सैफ अली खान की तरह अल्ट्रा मॉड हो गया है। विषय के रूप में बॉलीवुड के खेत में आतंकवाद की फसल लहलहा रही है। फसल काटने के लिए फिल्मकारों में होड़-सी मच गई है। दुःखद यह है कि एक गंभीर मसाला ब्रांड बन गया है। उस ब्रांड पर 'मेड इन इंडिया' लिखा जा रहा है और उसे अमेरिकी पृष्ठभूमि की चाशनी में डुबोया जा रहा है।

9/11 के बाद आतंकवाद पर बनी दो दर्जन हॉलीवुड की फिल्में सफल रही हैं। बॉलीवुड में भी यह संख्या बहुत कम नहीं है। अधिकतर फिल्मों में अमेरिका है, अमेरिकी लोगों की दहशत है। यहीं एक सवाल खड़ा होता है कि क्या इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी जुल्मों पर इतनी बड़ी तादाद में फिल्में बन रही हैं। क्यों सहानुभूति अमेरिका से ही है। उस इराक और अफगानिस्तान से नहीं जो अमेरिकी जुल्म-ओ-सितम का शिकार हुआ है। ये चंद सवाल सोचने-समझने वालों को विचलित करते हैं लेकिन ये बातें मुनाफे की गणित पर चलने वाले बॉलीवुड के फिल्मकारों के भीतर किसी किस्म की कोई जुंबिश पैदा नहीं करतीं। वे विचलित होंगे, ऐसी उम्मीद भी उनसे नहीं की जानी चाहिए। फार्मूलेबाजी के चक्कर में ही आतंकवाद पर अच्छी और सार्थक फिल्में अब तक नहीं बनी हैं। आतंकवादियों की विचार-प्रक्रिया, कार्यप्रणाली और आंतरिक प्रशासन पर रोशनी डालने वाली कोई फिल्म यहाँ नहीं बनी, न ही किसी ने उनके आर्थिक संसाधनों या वैचारिक द्वंद्व पर फोकस किया है।

'न्यूयार्क' या 'कुर्बान' देखकर सहज ही यह विचार आता है कि आतंक माने क्या। आतंक का एक ही पहलू दिखता है कि मुसलमानों ने जिहाद के नाम पर हथियार उठा लिए और वे हिंसा की राह पर चल पड़े। वे हथियार उठाते क्यों हैं क्या जिन्हें हम आतंकवादी कहते हैं वे बड़े आतंकवादी के गर्भ से पैदा नहीं होते, जो सत्ता का कोई भी रूप या नाम हो सकता है - अमेरिका, ब्रिटेन, रूस या भारत ही क्यों नहीं जिस आतंक की कोख से मुसलमान आतंकवादी जन्म ले रहे हैं, उस पर फिल्में शिद्दत और तल्खी से क्यों नहीं फोकस करती हैं अमेरिका-ब्रिटेन में नस्लीय दंगे होते हैं, बॉलीवुड में उनपर फिल्में नहीं बनीं। आतंकवादी गतिविधियों, छत्तीसगढ़-झारखंड में नक्सली आंदोलन से हमारा जीवन प्रभावित हो रहा है। यह एक अहम मसला भी है लेकिन हमारे बॉलीवुड के फिल्मकारों को अमेरिका ही दिखता है, स्विटजरलैंड और मॉरीशस की हसीन वादियाँ ही नजर आती हैं। क्या यही अच्छा होता कि 'कुर्बान' के एहसान और अवंतिका भारत में होते! इससे शायद आतंकवाद को हम भारतीय नजरिए से देख-समझ पाते लेकिन सारा खेल व्यावसायिक सफलता और मुनाफे का है।

यह एक अजीब विडंबना है कि जितने साल हमारी राजनीतिक आजादी को हुए, उतने ही बरस सांप्रदायिक यंत्रणा को भी। आजादी की खुशी और सांप्रदायिकता के खंजरनुमा विभाजन की चुभन हमें एक साथ मिली। दोनों के रंग बीतते वक्त के साथ बदलते गए। एक आशंकाओं में घिर कर सवालों की सूली पर टंगा तो दूसरे का रंग साल-दर-साल गहरा होता गया। आज हम यह कहने की स्थिति में हैं कि आजादी के झंडे में बेमानीपन का रंग चढ़ गया है लेकिन दूसरी ओर सांप्रदायिकता का जहर चुपचाप हमारी रगों और देश समाज की धमनियों में पूरी रवानगी के साथ दौड़ता रहता है। राजनीति के दबाववश जब कभी भी नसें फटती हैं तो दंगों की शक्ल में लहू घरों, गलियों और सड़कों पर बहता है, जिसे मुआवजे या जाँच आयोग की छाँव से ढँकने की नाकाम कोशिश होती है। हम जख्मों का इलाज करने के बजाए उसे छिपाना जानते हैं। इससे जख्म नासूर में तब्दील होता जाता है। दो साल पहले प्रदर्शित फिल्म 'फिराक' उस जख्म को, जिसका नाम सांप्रदायिकता है, दिखाने की एक कोशिश है। नंदिता दास निर्देशित इस फिल्म की शुरुआत ही कब्रिस्तान से होती है जहाँ लाशों को दफनाया जा रहा है। लाशें दफन जरूर होती हैं, लेकिन घृणा के भाव पूरी त्वरा के साथ बाहर निकलते हैं। लाशों की भीड़ में एक हिंदू लाश आ जाती है। मुसलमान उस हिंदू लाश को देखकर भावुक हो जाता है, उसकी आँखों में नफरत का जैसे ज्वार-भाटा आ जाता है। इसे नफरत और विषाक्त माहौल की पराकाष्ठा कहा जाएगा कि आदमी लाशों में भी हिंदू-मुसलमान देखता है और उससे मोह या नफरत करता है। 'फिराक' 24 घंटे के दौरान घटी घटनाओं और पाँच अलग-अलग कहानियों का कोलाज है। गुजरात दंगे पर बनी इस फिल्म के बारे में नंदिता दास का दावा है कि यह हजारों सच्ची कहानियों पर आधारित है। मुंबई बम-ब्लास्ट के बाद गुजरात दंगा फिल्मकारों का नया प्रिय विषय बन गया है। 'फिराक', 'परजानिया', 'फाइनल सल्यूशन' (डाक्यूमेंट्री) और 'काई पो चे' गुजरात दंगों पर बनी कुछ बेहतरीन फिल्में है। सवाल उठता है कि जब इस विषय पर पहले से ही अच्छी फिल्में थीं तो नंदिता ने एक और फिल्म 'फिराक' क्यों बनाई नंदिता 'फिराक' को न फीचर, न डाक्यूमेंट्री और न ही स्टेज का क्राफ्ट दे पाईं। अगर इन तीनों का फ्यूजन हो तो अलग बात है। नंदिता की अपनी सीमा हो सकती है और जोखिम उठाने की हद भी। बावजूद इसके उन्होंने फिल्म में कई मार्मिक पहलुओं और सवालों को उठाया है। ये सवाल, सवालों की शक्ल में नहीं, टीस के रूप में हैं।

दर्द का कतरा संवेदना की धरती पर मिटकर सवाल का वट-वृक्ष कैसे बनता है, यह इस फिल्म को देखकर समझा जा सकता है। कोई भी मसला महज व्यक्तिगत या भावनात्मक नहीं होता। उसके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संदर्भ भी होते हैं। उसे इन संदर्भों से विलगाकर देखना समुचित दृष्टिकोण नहीं। फिराक के बारे में नंदिता दास ने स्पष्टीकरणनुमा यह बयान दिया, 'मैंने फिराक' में राजनीतिक कारणों की खोज नहीं की है। अलबत्ता मानवीय पहलुओं को उभारने की कोशिश की है।' यह नंदिता की दृष्टि और हिम्मत की हदबंदी है। सांप्रदायिकता एक राजनीतिक समस्या है। दंगों की वजहों की जड़ें व्यक्ति या समाज से ज्यादा राजनीति से जुड़ी हुई हैं। चोट वहीं करनी होगी। टकराना उसी से होगा लेकिन राजनीतिक सवालों से टकराने के कुछ खतरे भी हुआ करते हैं। लगता है उस जोखिम को उठाना नंदिता ने मुनासिब नहीं समझा। प्रेम व्यक्तिगत होता है, दंगा सामूहिक। दंगा सड़कों पर या गलियों में बेशक घटित होता है लेकिन इसकी पूरी पटकथा सियासी गलियारों में सियासतदाँ लिखते हैं, पूरी तरह से 'घोस्ट राइटिंग' का मामला होता है। लिखने वाले का नाम छिपाया जाता है।

जो भी हो पर 'फिराक' ऐसी भी फिल्म नहीं है कि उसे पूरी तरह खारिज कर दिया जाए, जैसा कि कर दिया गया। 'ब्लैक फ्राइडे' जैसे सांप्रदायिक विषय पर बेहतरीन फिल्म बनाने वाले अनुराग कश्यप अफसोस जताते हैं, 'यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि 'फिराक' जैसी फिल्म मैंने खाली सिनेमा हॉल में देखी।' अनुराग की चिंता अपनी जगह जायज है मगर नए जमाने का सच और उसका मन-मिजाज भी बदला है। अब फिल्म मतलब मनोरंजन, 'फुल्ली इंज्वाय' और मस्ती है। उनकी भी 'देव डी' इसलिए चली कि उसमें युवाओं के लिए 'मस्ती-मजाक' की मसालानुमा चीजें थीं। 'फिराक' में न थ्रिल, न रोमांच। यहाँ तक कि दंगों पर आधारित फिल्म होने के बावजूद उसमें हिंसक दृश्य नहीं के बराबर हैं - बल्कि हैं ही नहीं। हिंसा भी लोगों का मनोरंजन करती है- बॉलीवुड में लंबे समय तक फिल्में हिंसा की बदौलत सफलता की सीढ़ियाँ तय करती रही हैं। यानी मसाले के नाम पर 'फिराक' में कुछ नहीं है। सिर्फ संवेदना है - वह भी बिना सियासत में लिपटी अब तक इस दौर में जब संवेदनशीलता ही लुप्तीकरण की ओर है तो उसके दर्शक कहाँ मिलेंगे। कोई क्यों बनेगा संवेदना का खरीददार दरसअल, संवेदना भी सौदा करने की चीज बन गई है। नंदिता कलाकार हैं। शीर्ष कलाकार की बेटी हैं। कला उनके खून में है लेकिन संवेदना का सौदा करने की कला वे नहीं सीख पाईं, नहीं बन पाईं संवेदना की सौदागर।

'फिराक' पाँच कथाओं का कोलाज है। एक गुजराती परिवार है, जिसमें परेश रावल हैं, उनकी पत्नी दीप्ति नवल हैं। दीप्ति नवल ने एक ऐसी बेचैन औरत (आरती) का किरदार निभाया है जो कट्टरवादियों के बीच उदारवादी-संवेदनशील है। यही उसका अपराध बन जाता है। दंगे का दर्द उसके भीतर किसी नहर की भांति प्रवाहित होता रहता है। एक नामालूम दंगा पीड़ित औरत अक्सर सामने आकर गुहार लगाती है, 'दरवाजा खोलो, मुझे बचा लो... वे काट डालेंगे मेरे को।' दीप्ति को लगता है वह उस औरत की मदद नहीं कर पाई। जरूर दंगाइयों ने उसे मार डाला होगा। वह प्रायश्चित की आग में जलती अपने जिस्म को जलाती है। उसके हाथ में कई फफोले उभर आए हैं। यहाँ ठहरकर चीजों को सूक्ष्म ढँग से समझने की जरूरत है। अजनबी औरत की करुण पुकार किसी एक की न होकर तमाम दंगाग्रस्त इलाकों में मदद के लिए छटपटाते लोगों की है। आम आदमी उस पुकार को सुनकर भी अनसुनी कर देता है। न खिड़की खोलता है, न दरवाजा। अपने बंद घरों में खुद को महफूज समझता है, दुनिया जलती है तो जले। उसको क्या दुनिया भर के लोगों की मदद का उसने ठेका थोड़े ही न ले रखा है। यह नए जमाने के सुविधाभोगी लोगों की सोच है, जिसका तेजी से विस्तार हो रहा है। दीप्ति के जिस्म पर उभरे फफोले असल में व्यवस्था और इंसानियत के जिस्म के फफोले हैं। दीप्ति एक दंगा पीड़ित बच्चे को घर ले आती है, मदद के लिए। वह अपने कट्टरवादी हिंदू परिवार के कोप से बचाने की खातिर उसका नाम मोहसिन से बदलकर मोहन कर देती है। मोहसिन दंगे में अपने परिवार को खो चुका है। बच्चा मासूमियत भरे अंदाज में दंगे की क्रूरता बयान करता है, 'उन्होंने औरत के कपड़े खोले, मर्दों के नहीं फिर उन्हें मार डाला'। जिस बचपन की नींव इस भयावहता में पड़ रही हो उसके हौलनाक भविष्य का सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है। बच्चा जहर भरे माहौल में खुद को जिंदा बचाने का तरीका सीख जाता है। वह रसोई में दीप्ति के सामने मोहसिन है, बाहर मोहन। एक बार हिंदू उपद्रवियों के बीच घिर जाने पर वह अपना नाम 'मोहन' बताकर खुद की जान बचा पाने में कामयाब हो जाता है। कोई सिखाता नहीं लेकिन बच्चा जान गया है कि जीने के लिए झूठ जरूरी है जो बातें स्कूल नहीं सिखा पाते, हालात सीखा देते हैं। आठ-दस साल का बच्चा हिंदू-मुसलमान के खेल को समझ गया है। ये वे हालात हैं जो एक बच्चे से उसकी मासूमियत नोंच लेते हैं। बच्चा ज्यादा दिनों तक दीप्ति के यहाँ टिक नहीं पाता है। एक दिन मोहसिन दीप्ति को उसके पति के हाथों पिटते देखता है। उदारवादी चेहरे को कट्टरता के हाथों बुरी तरह पिटते देखकर वह भाग खड़ा होता है, क्योंकि उसे यकीन हो जाता है कि यहाँ भी वह सुरक्षित नहीं है। फिर से शरणार्थी शिविर लौट जाता है, लाशों और लाश बने चेहरे की भीड़ में अपने लिए पनाह ढूँढ़ता हुआ। यह लाशों के इंसानों से ज्यादा अहम होने और उनके दरमियान मिटते फर्क का संकेत है और असुरक्षित बचपन का भी। फिल्म में एक कहानी मुनीरा की भी है जो दंगे के बाद जब अपने घर लौटती है तो पाती है कि उसके घर को दंगाइयों ने जला डाला है। वह अपने पति से झगड़ती है। उसका शक पड़ोसी हिंदू सहेली पर जाता है। मुनीर की गोद में एक मासूम शिशु है। वह शिशु को एक पल भी खुद से अलग नहीं करती। कंगारू की तरह छाती से चिपकाए रहती है। भय, असुरक्षा और आशंका की गहरी धुँध। ये चीखें आदमी को कैसे मुर्दा जिस्म में तब्दील कर देती हैं इसकी मिसाल है मुनीरा। समीर के रूप में संजय सूरी और टिस्का चोपड़ा की एक अलग कहानी चलती है। वे प्रेमी युगल हैं। वे अब गुजरात से दिल्ली शिफ्ट होने की सोचते हैं। वे भी दंगे में मारे जाने के भय में हर क्षण सिहर रहे होते हैं।

फिल्म की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में नसीरूद्दीन शाह हैं जिन्होंने संगीतकार खान साहब की भूमिका निभाई है। और खूब निभाई है। उनके सहयोगी है - रघुबीर यादव। खान साहब हिंदू इलाके में रहते हैं, शास्त्रीय संगीत सीखते हैं। वे नहीं समझ पाते फिरकापरस्ती के फंडे को। उनका सहयोगी रघुबीर यादव एक आम मुसलमान है जो आशंकित रहता है एक खतरे से। वह उन्हें आगाह करता है, 'खान साहब, यह टाइम केवल सुनते रहने का ही नहीं है, जागिए, आपका एक भी शागिर्द मुसलमान नहीं है।' संगीत की रूहानी दुनिया में डूबे रहने वाले खान साहब दुनियावी तल्खियों और खतरनाक सांचे में ढलते वक्त से बेखबर रहते हैं। संगीत की खालिस दुनिया में बाकी व्यर्थ चीजों के लिए जगह बचती ही कहाँ है उनकी अलहदा सोच के चलते जो प्रगतिशीलता के दायरे में है, आम मुसलमान बिरादरी से उन्हें 'अलग' समझता है। हिंदू होने के वजह से दंगे के माहौल से दूरी बनाने लगता है। हिंदू को शक की नजरों से देखता है। मुसलमान है बेगाना। यह बानगी है कि इंसानियत की राह पर चलने वाला शख्स किस तरह अलग-थलग कर दिया जाता है। खान साहब को पहला झटका तब लगता है जब शहर से गुजरते हुए वे पाते हैं कि 'वली दकनी की मजार' अपनी जगह नहीं है। उन्हें घर पहुँचकर पता चलता है कि उस मजार को दंगाइयों ने नष्ट कर दिया। दर्द और लाचारी शब्दों के रूप में ढलती है, 'सात सुरों में इतनी काबिलियत कहाँ जो ऐसी नफरत का सामना कर सकें।' यह लाचारी संगीत की नहीं उस आदमी की भी है जो दंगों में हर खून के कतरे को अपनी जिस्म का लहू मानकर कराह उठता है। 'फिराक' में कोई गाना नहीं है। जहाँ धर्म की हत्यारी लपटों में जिंदा लोगों को भस्म किया जाता हो, मनुष्यता की जगह जहाँ कब्र में हो। वहाँ गीत-संगीत के लिए जगह ही कहाँ बचती है। दर्दनाक चीखें, करुण पुकार, रूहों को चीरती सिसकियाँ एक ऐसा नाद रचती हैं जिससे शोक-गीत का जन्म होता है। 'फिराक' भी दंगे का एक शोक-गीत है जो शब्दों के बजाए भावों में व्यक्त हुआ है।

अब बात हिंदी फिल्मों में फिरकापरस्ती या सांप्रदायिकता की। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत-पाक विभाजन और सांप्रदायिक दंगे हमारे समाज के ऐसे जलते सच हैं जिनकी तपिश कम-ज्यादा तो होती रहती है, लेकिन कभी खत्म नहीं होती। कभी न खत्म होने वाली जख्मी हकीकत है यह। फिर ऐसा क्यों हुआ कि आजादी के बाद विभाजन के बाद भी विभाजन या सांप्रदायिकता पर ऐसी कोई उल्लेखनीय फिल्म नहीं बनी, जिसे लीजेंड का दर्जा दिया जाए। इस बेहद तल्ख सच्चाई से सिनेमा दूर रहा। समाज में लगातार सांप्रदायिक दंगों का सिलसिला जारी रहा, लेकिन हमारी हिंदी फिल्में हसीन वादियों में मोहब्बत के तराने दिखाती रहीं। यहाँ एक ऐसे एंग्रीमैन नायक का उदय हुआ जो अकेले दर्जनों लोगों को ढिसुम-ढिसुम कर ठिकाने लगा देता था। हकीकत में ऐसा नायक कहीं था नहीं। कायर होता समाज फिल्मी हीरो के इस दुस्साहस को देखकर गदगद था। वर्ष 1941 में वी. शांताराम की 'पड़ोसी' फिल्म आई थी जिसमें सांप्रदायिकता पहली बार अपने प्रभावशाली ढँग से अभिव्यक्त हुई थी। फिर 1953 में फिल्मिस्तान की 'नास्तिक' आई जिसे आई.एस. जौहर ने बनाया था। फिल्म में विभाजन की नृशंसता देखकर नायक अजित नास्तिक हो जाता है। इसके बाद लंबा अंतराल। सांप्रदायिकता विरोधी फिल्म 1963 में 'धर्मपुत्र' प्रदर्शित हुई। इसके एक दृश्य में मनमोहन कृष्ण नायक शशि कपूर से कहते हैं, 'धर्म के नाम पर खून-खराबा और मार-काट इसलिए होती है कि धर्म को मानने वाले ऐसे लोग पैदा हो गए हैं जैसा कि तू है। तूने धर्म को दहकती हुई भट्टी बना दिया है।... तू वो है जो मजहबों की सूरत बिगाड़ देता है... आज तू हमारे बेटे के रूप में सामने आया है, तुझे मैं अपने हाथ से गोली मारता हूँ।'

सांप्रदायिक उन्माद से विनष्ट जीवन को केंद्र में रखकर बनी एम.एस. सथ्यू की 'गर्म हवा' एक बेहतरीन फिल्म थी। यह 1973 में प्रदर्शित हुई। आगरा के एक मुस्लिम परिवार के छोटे से संसार के इर्द-गिर्द घूमती यह फिल्म एक बड़ी घटना के मानवीय पक्ष को उजागर करने का प्रयास करती है। यह फिल्म हिंसा का चित्रण किए बिना ही हिंसा को अपना विषय बनाती है। एक जाति विशेष के व्यक्तिगत आक्रोश को विश्वसनीय और शिद्दत के साथ अभिव्यक्त करने में सथ्यू सफल रहे। बलराज साहनी की इस अंतिम फिल्म के विषय में कहा गया, 'गर्म हवा' का त्रासद कथ्य इतिहास की अमानवीय घटनाओं के विरुद्ध मानवीय गरिमा का अनोखा दस्तावेज है।' इसके ढाई दशक के बाद माणिरत्नम की 'बांबे' आई जो 'मुंबई बम ब्लास्ट' से प्रेरित थी। फिल्म में दो अलग धर्मों के प्रेमी युगल के बीच धर्म किस तरह तनता है यह फिल्म देखकर पता चलता है। यही वह प्रस्थान बिंदु था जिसके बाद कई फिल्में बननी शुरू हो गईं जिसका विषय विभाजन या सांप्रदायिकता था। सईद अख्तर मिर्जा की 'नसीम', महेश भट्ट की बतौर निर्देशक अंतिम फिल्म 'जख्म', अपनी अतिशयता के लिए चर्चित 'गदर', चंद्रप्रकाश द्विवेदी की 'पिंजर', प्रियंवद की कहानी पर आधारित 'अनवर', अनुराग कश्यप की 'ब्लैक फ्राइडे', राहुल ढोलकिया की 'परजानिया', अपर्णा सेन की 'मिस्टर एंड मिसेज अय्यर', सुभाष घई की 'ब्लैक एंड व्हाइट', आमिर खान अभिनीत 'फना' और नंदिता दास की 'फिराक'। सिमित अमीन की 'चक दे इंडिया' खेल पर केंद्रित फिल्म होने/माने जाने के बावजूद उसके नायक कबीर खान (शाहरुख खान) का दर्द भारतीय समाज में एक मुसलमान होने का दंश है।

कहा तो यहाँ तक जाता है कि भारत-विभाजन पिछली शताब्दी ही नहीं, पाँच हजार सालों के इतिहास की भयावह घटना है। किसी कौम ने जानबूझकर अपने देश को दो भागों में बांट दिया हो, इसका कोई और दृष्टांत नहीं मिलता। विभाजन से उपजी सांप्रदायिकता की जहर वाली नदी सूखने के बजाए विभिन्न प्रांतों में बहती रही है। बीच-बीच में वह कभी भागलपुर दंगा, मेरठ दंगा, गुजरात दंगे के रूप में तबाही मचाती रही है।

ऐसा भी नहीं है कि 50 और 60 के दशक में यथार्थपूर्ण फिल्में नहीं बनीं। कई ख्याति प्राप्त फिल्मकार पुरस्कारों और सफलता की धूप तो सेंकते रहे लेकिन सांप्रदायिक विषयों पर फिल्म बनाने से हिचकते रहे। उन्होंने समाज के दूसरे यथार्थ को उठाया। मसलन सामंती शोषण के कारण किसानों के भूमिहीन में बदलकर शहर की ओर भागने की समस्या की गंभीर विवेचना करने वाली विमल राय की 'दो बीघा जमीन', असम के चाय मजदूरों के जीवन संघर्ष को व्यक्त करने वाली ख्वाजा अहमद अब्बास की 'राही', बाल-शोषण पर राजकपूर की 'बूट पालिश', पूँजीवादी भ्रष्टाचार को बेनकाब करती राजकपूर की ही 'श्री 420', 'और जागते रहो', सामाजिक अन्याय से असंतुलित लड़की की कहानी 'सीमा', मशीन और आदमी के बीच के संघर्ष-गाथा 'नया दौर', वेश्या समस्या को विश्लेषित करने वाली 'साधना', अछूत समस्या पर विमल राय की 'सुजाता', पूँजीवादी के दौर में सामंतवाद पर फोकस करने वाली 'साहब बीवी और गुलाम', डाकू समस्या पर 'गंगा जमुना', जिस देश में गंगा बहती है', 'मुझे जीने दो', 'गोवा मुक्ति' विषय ख्वाजा अहमद अब्बास की 'सात हिंदुस्तानी' उल्लेखनीय फिल्में रही हैं।

दरअसल, विभाजन और सांप्रदायिकता को दिखाने के अपने जोखिम थे। यह जोखिम फिल्मकार उठाना नहीं चाहते थे। बेहद संवेदनशील मामला होता है, धर्म को राजनीति से जोड़कर फिल्में बनाना। तलवार की धार पर चलने सरीखा संतुलन बिगड़ा नहीं कि गिरे धड़ाम से। फिल्म विवादों में फँसी। फिल्म निर्माण में लगे लाखों-करोड़ रुपए के डूबने के गहरे आसार। अनुराग कश्यप की फिल्म 'ब्लैक फ्राइडे' को मिसाल के तौर पर देखा जा सकता है जो काफी जद्दोजहद के बाद प्रदर्शित हो पाई। 'परजानिया' को प्रदर्शित कराने के लिए राहुल ढोलकिया को भी काफी मशक्कत करनी पड़ी। संभवतः यही वजह है कि अधिकतर फिल्मकारों ने शार्टकट रास्ता अख्तियार किया। सांप्रदायिक सद्भाव के नाम पर उन्होंने अभिनेता को चारखाने की तहमद और सिर पर गोल टोपी पहनाकर नमाज पढ़ते दिखाया या हिंदू-मुस्लिम एकता का गीत गाते, तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इनसान बनेगा। सच तो यह है कि सांप्रदायिकता महज सामाजिक मसला न होकर राजनीतिक मसला ज्यादा है। आम जनता दंगा नहीं चाहती। यह वोट का खेल है। सत्ता तक पहुँचने का वह शार्टकट जो दंगों में गिरी लाशों से गुजरता है। सियासत हिंदू-मुसलमान के बीच फांक करती है। उसमें लहू भरती है। क्या इन सवालों से टकराए और इनकी पड़ताल किए बिना सांप्रदायिक या विभाजन पर अविस्मरणीय भला कैसे बन सकती थी।

अब भी इंतजार है एक ऐसी फिल्म का जो विभाजन की पीड़ा, सांप्रदायिकता की असली जड़ों और इनसे जुड़े तमाम सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक पहुलओं पर रोशनी डालते हुए मार्मिकता के लैस से अनूठी तस्वीर पेश करे।

(लेखक चर्चित कथाकार और 'पाखी' के संपादक हैं)


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