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कविता

मगर मैं मुक्त कहाँ स्मृतियों से ?
राजकुमार कुंभज


कोई जासूस है शायद
जो खटखटा रहा है स्मृतियों का दरवाजा
और फेंक रहा है रंग-बिरंगे सपनों के रंग
जिंदगी के अजनबी मोड़ पर यदा-कदा
जो छूट चुके हैं सदियों पहले
मुक्ति की कामना का दीवाना-मस्ताना में
मगर मैं मुक्त कहाँ स्मृतियों से ?

 


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