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कविता

भरोसे में भरोसा
राजकुमार कुंभज


जो नहीं था अपना-सा
लगा एक दिन बेहद अपना-अपना-सा
फिर दे गया दगा एक दिन
हजार-हजार टुकड़े करके दर्पण के
सोचा नहीं था कभी किसी ने
कि होगा यह भी
कि मारा जाएगा भरोसे में भरोसा
और भस्म हो जाएगी
कागज की नाव।

 


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हिंदी समय में राजकुमार कुंभज की रचनाएँ