hindisamay head
डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

कविता

पटरी-बाजार
राजकुमार कुंभज


रोशनी कम है, अँधेरा अधिक
जन-कल्याण-बीच खड़े हैं चतुर्दिक
सर्व-समर्पित सत्ताई-बधिक
आवारा पूँजी का खेल रहे खेल
मुनाफे की दौड़ा रहे सुपरफास्ट रेल
याराना-विचार फिरते हैं मारे-मारे
जैसे बारिश के बुलबुले सारे
पटरी - बाजार।

 


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में राजकुमार कुंभज की रचनाएँ