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कविता

कितने पास जीवन, कितने पास मृत्यु ?
राजकुमार कुंभज


सूख रहे हैं शब्द
सच कहने से पहले और बाद भी निर्जल
बिजली के तारों पर बैठे पक्षियों की तरह
उड़ानों का सांताक्लॉज उदास है
कविता की किताबों में चहकती हैं पुकारें
गुब्बारे उड़ाती हैं लड़कियाँ
और तितलियों के पीछे भाग रहे हैं बच्चे
किंतु अभी असंभव है जो कल-कैसे होगा संभव
पूछती हैं खिलती कलियाँ और गिलहरियाँ
आखिर कितने पास
कितने पास जीवन, कितने पास मृत्यु ?
कितने पास शब्द ?

 


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