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कविता

लाख हों पहरे तो क्या हुआ
राजकुमार कुंभज


चट्‍टानों को चीरते हुए
आती है नदी, स्मृति और कविता
लाख हों पहरे तो क्या हुआ ?
टूट ही जातीं हैं सलाखें सब
नाचने लगता है मन।

 


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हिंदी समय में राजकुमार कुंभज की रचनाएँ