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कविता

जो, जितना, हँसता हूँ मैं
राजकुमार कुंभज


जो, जितना, हँसता हूँ मैं
उतना, उतना, उतना ही रोता हूँ एक दिन एकांत में
एक दिन सूख जाता है भरा पूरा तालाब
कुबेर का खजाना भी चुक जाता है एक दिन
स्त्रियाँ भी कर देती हैं इनकार प्रेम करने से
उमंगों की उड़ान भरने वाले तमाम कबूतर भी
उड़ ही जाते हैं एक न एक दिन अनंत में
फिर रह जाता है एक दिन सिर्फ वह सच जो चट्‍टान
माना कि पहाड़ भी उड़ते थे कभी फूँक से
मगर अब उड़ता नहीं है पत्ता कोई
शक नहीं कि बहती हैं हवाएँ...
बहती हवाओं की तरफ ही पूर्ववत
शक नहीं कि पकती हैं फसलें...
पकती फसलों की तरह ही पूर्ववत
शक नहीं कि झरती हैं पत्तियाँ...
झरती पत्तियों की तरह ही पूर्ववत
मैंने सोचा मुझे हँसना चाहिए
मैं हँसा और निरंतर-निरंतर जोर-जोर से भी
फिर उतना, उतना, उतना ही रोका एक दिन एकांत में भी
जितना, जितना, जितना हँसा मैं सार्वजनिक सभा में
जितना, जितना, जितना भी हँसता हूँ मैं
रोता हूँ उससे कहीं ज्यादा।

 


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