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कविता

जगदीश चतुर्वेदी
राजकुमार कुंभज


1 .

मैं, इस समय दिल्ली में हूँ
दिल्ली इस समय भी देश की राजधानी है
दिल्ली में रहते हैं देश के बड़े बड़े ओहदेदार
कुछेक बद्दिमाग ओहदेदार भी
और मैं उन बद्दिमाग ओहदेदारों से
उनके उन-उन सभी ओहदों को छीन लेने की खातिर
और लेने को लोहा
दिल्ली के एक बेहद ही सुंदर मकान में बैठा हूँ
दिल्ली का यह एक बेहद ही सुंदर मकान
दिल्ली में होते हुए भी, दिल्ली का न होकर
जगदीश चतुर्वेदी का हुआ करता था कभी
जब वे रहते थे यहाँ और लिखते थे कविताएँ
और पता ईस्ट पटेल नगर जैसा ही
कुछ-कुछ हुआ करता था
कहते हैं कि ईस्ट पटेलनगर नाम का इलाका और इतिहास
बहादुरशाह जफर के जमाने में नहीं हुआ करता था कभी
कहते हैं कि ईस्ट पटेल नगर का आविष्कार
जगदीश चतुर्वेदी के सुस्ताने से भी नहीं हुआ करता था कभी
कहते हैं कि ईस्ट पटेलनगर को एक खास पहचान
हिंदी के उस कोलंबस ने ही दी थी
नाम जिसका जगदीश चतुर्वेदी जैसा ही कुछ-कुछ
जगदीश चतुर्वेदी के जागने से बेहतर जाग जाती थी तब
बोरीबंदर की बुढ़िया
बजने लगते थे घंटे-दर-घंटे यहाँ-वहाँ
बोरीबंदर के बजते घंटों से ही पता चलता था
साहित्य की म्युनसिपालिटी को
कि जगदीश चतुर्वेदी ने आज मूता है कितना
खाँसा है कितना और पी है शराब कितनी?
और कहाँ-कहाँ की है कै?
इन तमाम बातों का सच्चा-सच्चा पता तभी मिलता था
जब, बोरा भर-भरकर पहुँचती थी डाक देशभर से
बोरीबंदर की बुढ़िया के डब्बे में ठेठ भीतर तक
मैं, इस समय दिल्ली में हूँ
और यहाँ इस समय दिल्ली में भारी बरसात हो रही है।
मैं, इस समय दिल्ली में हूँ
और यहाँ इस समय दिल्ली में कवियों की बाढ़ हो रही है
मैं इस समय दिल्ली में हूँ
और यहाँ इस समय दिल्ली में, समूची दिल्ली
दारू से दिल बहलाने को तरस रही है
नहीं कहीं कोई अलाब, भाव बढ़ गए हैं
नहीं कहीं कोई आग, दाग बढ़ गए हैं
नहीं कहीं कोई विचार, व्यभिचार बढ़ गए हैं
चारों तरफ सिर्फ अलगाव ही अलगाव हैं
और वैचारिक-सर्दियों से काँप रहे हैं सब
पता नहीं फिर भी
किस एक अलगाव की तलाश में निकले हैं जगदीश
शीला अथवा लीला से लिपटकर रोना चाहते हैं जगदीश
चाकू की नोक पर सौमित्र मोहन से मिलना चाहते हैं जगदीश
शायद इसी बहाने पैदा हो सके थोड़ी गर्माहट, थोड़ी वैचारिकता
अफवाहें बता रही हैं इन दिनों की, इन दिनों की तरह
कि आजकल खूँटी पर रखे रहते हैं हाथ और हथियार
और काँच के कटोरे में रखे रहते हैं दाँत
जगदीश चतुर्वेदी के
जगदीश चतुर्वेदी शायद भूल गए हैं मुस्कुराना
और पुकारना सोना-मोना इत्यादि
और स्वाद दारू, नमक का।


6 .

जब भी होगा कहीं भी, कोई भी युद्ध
कदापि दौड़ नहीं पाएगी एक गर्भवती स्त्री
एक बार फिर होगा उसके साथ बलात्कार
एक बार फिर किया जा सकेगा उसके साथ व्यभिचार
एक बार फिर होगी उसकी असामयिक-मृत्यु
जब भी होगा युद्ध
शांति-स्थापना के नाम पर ही होगा
आलू की जगह बम परोसे जाएँगे रसोई में
और आदेशात्मक अंदाज में कहा जाएगा
कि खाओ, सेहत बचाए रखने के लिए जरूरी है यह
जगदीश चतुर्वेदी काम नहीं आएँगे तब


10 .

जगदीश चतुर्वेदी की सेनाएँ हार रही हैं
बिपाशा बासु और मल्लिका शेरावत की सेनाएँ जीत रही हैं
नामवर सिंह चुप-चुप देख रहे हैं सब तमाशा
भीमसेन जोशी अब भी गा रहे हैं भीमपलासी
सोफे पर बैठी हैं सोना-मोना
पलंग पर नंग-धड़ंग लेटे हैं जगदीश चतुर्वेदी
जगदीश को उठाना है, सोना-मोना को झुकाना है
जगदीश को चलना है, सोना-मोना को रुकना है
जगदीश को जलना है, सोना-मोना को सहना है
जगदीश आते हैं, जगदीश चले जाते हैं
सोनाएँ-मोनाएँ सहती रहती हैं
जगदीश लिखे जाते हैं, जगदीश सिखे जाते हैं
सोनाएँ-मोनाएँ कहती रहती हैं
जगदीश पीते जाते हैं, जगदीश जीते जाते हैं
सोनाएँ-मोनाएँ मरती रहती हैं
सोनाओं-मोनाओं का मरना बंद होना चाहिए
सोनाओं-मोनाओं का हारना बंद होना चाहिए
सोनाओं-मोनाओं का छला जाना बंद होना चाहिए
सोनाओं-मोनाओं की हार जगदीशों की जीत नहीं है
जगदीशों को चाहिए कि वे अपने युद्ध खुद लड़ें
सोनाओं-मोनाओं के कंधों का इस्तेमाल नहीं करें
वर्ना तो तय रहा कि सोनाओं-मोनाओं की हार
जगदीशों की भी हार कही जाएगी
अज्ञेय ने नहीं समझा गेय, तो क्या हुआ?
गेय गया तेल लेने
यहाँ तो संपूर्ण कार्यक्रम संपन्न हो रहा है आजकल
संपूर्ण क्रिया-कर्म सहित प्रेमपूर्वक
बना रहे प्रेम, बनी रहें प्रेमिकाएँ, तभी मजा है जीवन
राहुल सांकृत्यायन महाराज की सौ प्रेमिकाएँ थीं
सौ में से सौ नहीं, तो कम से कम
दस बंदिनियों के नाम बताओ और ईनाम पाओ
सजा रहे द्वार, सजी रहे द्वारिका, तभी मजा है जीवन
कर्मवीर महाराज की सोलह हजार रानियाँ थीं
सोलह हजार में से सौ नहीं, तो कम से कम
दस रागिनियों के नाम बताओ ईनाम पाओ
किंतु पहले जरा साबुन से हाथ धोकर तो आओ
सोफे पर बैठी हैं सोनाएँ-मोनाएँ
और पलंग पर नंग-धड़ंग लेटे हैं जगदीश चतुर्वेदी
सदी और समय का गंजत्व और नंगत्व भी यही है शायद आज
कि जो, जगदीश चतुर्वेदी ने दिखा दिया था सभी को
दशकों-पूर्व।


11 .

ऊपर आकाश,
नीचे पृथ्वी, पाताल का पता नहीं
मगर बीच-ब्रह्मांड की उपस्थिति ही है प्रारंभ और अंत
अपने समस्त शक्‍तिपात,
अपने समस्त रक्‍तिपात,
अपने समस्त हिमपात,
और अपने समस्त वीर्यपात के उपरांत
समय से पूछते हैं जगदीश चतुर्वेदी
कि किस उम्मीद के किस निश्‍चय तक
बचा रहेगा नागरिक-उन्माद?
कि कब तक बची रहेंगी सुरों-असुरों के बीच
स्वर्ग-नरक की अर्द्ध-विक्षिप्त-व्याख्याएँ?
कि कब तक बचे रहेंगे भद्रजनों के भेष में हत्यारे
लपेट कर लोहे की चादर पारदर्शी?
कि आखिर मनुष्यों के मन में मनुष्यता ही मनुष्यता लहराएगी कब तक ?
साफ-साफ कुछ भी कह पाना कितना कठिन होता जा रहा है इन दिनों
यह कठिनाई सिर्फ वही शख्स जानता है
या कि जान सकता है ठीक-ठीक
जिसकी जुबान पर लकवा जम गया है
और कि जिसे हाँक रहा है हंटर
अगर साफ-साफ ना कह सको कुछ भी तो न सही
लेकिन अपनी कविताओं में ही सही
थोड़ा तो फुसफुसा दो प्रिय-प्यारे पात-चीकने
चतुर्वेदी जी !


13 .

समझो और समझाओ ये सच सभी को
कि मुश्किल नहीं है जरा भी समझना और समझाना
कि यदि तीसरा युद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा
तो चौथा युद्ध अनिवार्यतः दारू के लिए लड़ा जाएगा
गुलामी से मुक्ति का कोई मार्ग नहीं मिल पाएगा तब
लोग मरते रहेंगे फिर-फिर चींटी की तरह
युद्ध होते रहेंगे फिर-फिर रात की तरह
बुद्ध होते रहेंगे फिर-फिर दिन की तरह
बुद्ध होने से पहले वह युद्ध होना जरूरी है
इसलिए जरूरी है कि सीखा जाए लड़ना
और लड़ते-लड़ते मरना
ताकि बेहतर रहा जा सके
ताकि बेहतर कहा जा सके
और दर्ज रखा जा सके
कि हराने वाले भी बेहतर लड़ते-लड़ते मरें
ओम जय जगदीश हरे


14 .

कविता की इस एक कहानी में
लीलाधर जगूड़ी के अल्मोड़े का वह पहाड़ नहीं है अब
जिसकी तलहटी में बैठकर
जगदीश चतुर्वेदी के नाम का जाप किया जाता था
कविता की इस एक कहानी में
गंगाप्रसाद विमल के चंडीगढ़ का वह चूजा भी नहीं है अब
जिसके मुर्गा बन जाने की विकास-यात्रा
जगदीश चतुर्वेदी द्वारा कॉफी हाउस में रची जाती थी
कविता की इस एक कहानी में
चंद्रकांत देवताले के उज्जैन का वह खिलौना भी नहीं है अब
जिसके क्लॉसिक-प्लॉस्टिक में बारूद भरने की प्रक्रिया
जगदीश चतुर्वेदी के अड्डे पर ही बुनी जाती थी कभी
बहुत कुछ, बहुत पीछे छूट रहा, बदल रहा है
'शलभजी' के शास्त्रीय-स्कूल का शास्त्रीय-आँगन ही नहीं
बल्कि वह एक आज्ञाकारी शिष्य भी, नाम जिसका 'मेघजी'
चूँकि बीच में भारत-भवन आ गया था
चूँकि बीच में कमलाकर आ गया था
चूँकि बीच में जमानतदार आ गया था
तब जरूरी नहीं था कि यह सब
कि किसी मामूली कीमत पर ही तय हो जाता वह सब
वाजिब कीमत मिलने का इंतजार होता है सबको
जब वाजिब कीमत मिलने पर ही
गधे-घोड़े, साँड़-सुअर बिकते हैं
तो फिर वाजिब कीमत पर कवियों का बिकना क्यों हुआ गैर वाजिब?
वाजिब के लिए थोड़ा इंतजार कोई गैर जरूरी तो नहीं?
और फिर वाजिब का प्रश्न क्या, क्यों और किसलिए?
कविता की इस एक कहानी में किंतु,
अशोक महान की कहानी अचंभित नहीं करती है जरा भी
पता नहीं कि किस-किसके भेजे में
कितना-कितना भूसा भरा उस अकेले
कुशल-कारीगर ने?
अशोक महान मंत्री नहीं था, संत्री नहीं था
और यहाँ तक कि वह कोई यंत्री भी नहीं था
किंतु, ताश के पत्ते फेंटने वाला
वह एक उच्चपदस्थ खास सरकारी तंत्री था
भाई मियाँ ने ऐसा जादू दिखाया
कि हाथी की शादी में चूहों को नचा दिया !
बनाया, सबको बनाया, बेलकर रोटियों जैसा
अपनी पसंद का खास उधर...।
मगर इधर जगदीश चतुर्वेदी के खास भेजे में
जरा भी खाली जगह नहीं थी भूसे के लिए
वह एक काँटा जो अनंतकाल, चूमता ही रहेगा
वह एक महक जो अनंतकाल, महकती ही रहेगी
वह एक दिन उजाला जो अनंतकाल, बना ही रहेगा
कविता की इस एक कहानी में
बहुत कुछ होते हुए भी सब कुछ नहीं है
थोड़ा प्याज नहीं है, थोड़ी मिर्च नहीं है
गांधी कम मार्क्स के हिस्से की दारू तो है
मगर कोई खार-मंजन तो नहीं है
कविता के भुखमरों के पास भूख तो है
मगर कुछ भुखमरे ऐसे भी होते हैं
जो, मरे मवेशी का गोश्त नहीं खाते हैं
समा-मंडप में कभी-कभार आ तो जाते हैं
मगर गाने के नाम पर बेसुरा ही गाते हैं
और जब भी करते हैं प्रेम
तो समूची वासना और समूची घृणा से करते हैं
डरने के नाम पर खुद से भी नहीं डरते हैं
कविता की इस कहानी में
जगदीश चतुर्वेदी का वह पागलखाना झूम रहा है
जो, दुनियादारी की तमाम दीवारें तोड़कर
कवियों की कच्ची बस्ती में आजकल
ससम्मान घूम रहा है


15 .

नंगे फर्श पर एक नंगी लाश पड़ी है
देह के व्यापारियों का कहना है कि ये एक स्त्री लाश है
जगदीश चतुर्वेदी का कहना है कि ये लोकतंत्र की लाश है
चांडाल का कहना है कि जलाओ जरा जल्दी जलाओ
मुझे बदबू से बचाओ और पैसा चुकाओ
मुझे दारू की तलब उठ रही है
देर की, तो दारूखाना भी हो जाएगा बंद तब तक
और मेरी ब्याहता स्त्री के पेट में हो रहा है दर्द
उसके पेट में उधम मचा रहा है मेरा बच्चा
किंतु मेरी स्त्री अब भी कर रही है काम फर्राश का
काम वही जो कविता का भी
कविता और स्त्रियाँ जानती नहीं हैं किसी भी साहेब को
उनका काम सिर्फ सफाई
फिर चाहे जितनी करे गंदगी साहेब मर्जी उनकी, देश उनका
कविता और स्त्री के पेट में डाउट नहीं है
क्योंकि वहाँ ऐसा कोई आलआउट नहीं है
जिसमें जरा भी जनहित जन शाउट नहीं है
संभव नहीं है कि लेकर छुपा चेहरा बस्ती से गुजर जाए कोई
अगर ऐसा हो जाए
तो कविता का कविता से और स्त्री का स्त्री से
नैसर्गिक तौर पर तलाक हो जाए
क्योंकि सबकी व्यथा से बड़ी नहीं है, अपनी व्यथा
जबकि अपनी व्यथा से बड़ी है, दूसरों की व्यथा
दूसरों की व्यथा की व्याख्या ही कविता है
बात को जरा खोलकर देखो तो
सब साफ हो जाएगा, घुल जाएगा मैल सदियों का
खुद का खुद-मुख्तार चेहरा भी हो जाएगा साफ
साफ चेहरे से ही पहचानो अपने समय का साफ सब
और अपने समय के, अपने लोकतंत्र को भी
और वह जो एक नंगी लाश पड़ी है, नंगे फर्श पर
जगदीश चतुर्वेदी के हवाले से कहा जा रहा है और आज भी
कि उसका हत्यारा लोक नहीं तंत्र है
मगर हा ! हा ! भारत दुर्दशा
देखी ना जाए, सही ना जाए
इसी बात पर क्यों ना फिर दो-दो पैग दारू हो जाए
नंगे फर्श पर एक नंगी लाश पड़ी है
चुनाव है तो किन्नर भी खड़ा है या खड़ी है शायद यही फैसले की घड़ी है।


17 .

होने वाली है इस रात की सुबह
फिर भी कुछ कुत्ते हैं कि बंद नहीं कर रहे हैं भौंकना
कुछेक भूरी बिल्लियाँ भी हैं, जो काट रही हैं रास्ता
और किले का लगातार-लगातार लगा रही हैं चक्कर
उनके चक्कर के चक्कर से
अपने किले को बचाना जरूरी है
इस या उस धर्म का अनुयायी हो जाना पर
नहीं होता है किसी भी कलम का कर्म
कलम का सच्चा कर्मकांड सिर्फ वही-वही
जो बचाए इनसान, बनाए इनसान
गर नहीं रहा इनसान तो क्या करेगा कविता का भव्य मकान?
साँप, बिच्छू और चूहे ही रहेंगे वहाँ
जगदीश चतुर्वेदी नहीं।

 


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हिंदी समय में राजकुमार कुंभज की रचनाएँ