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कविता

विजेता
प्रेमशंकर शुक्ल


हाँ, मैं विजेता हूँ
जीत लिया मैंने भी
एक लड़की का दिल

सुगंध से
हँसी-खुशी से
झूठ के रियाज से
सच के अभ्यास से
जीत लिया मैंने उसे

झगड़े-मनुहार से
जीत लिया

जिंदगी में
मैं भी कभी हारा नहीं
जूझता जरूर रहा

लेकिन हार गया एक लड़की के दिल से
हार गया मैं भी
जैसे सिकंदर हारा था
हारा था अशोक

हार गया मैं
इतना हार गया
कि फिर जीतने की चाहत न रही
हर हमेश छोटी लगने लगी मुझे
हार से जीत

 


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