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कविता

जीवन-संगीत
प्रेमशंकर शुक्ल


पत्तियाँ धूप का
कोई कुनकुना गीत गाती हैं
हवा ताल देती है
घास अपने तानपूरे पर
बनाए रखती है स्वर-विन्यास

सुबह-सुबह शिशु अपनी बोली में
सुना जाता है भैरवी

आम्रमंजरी को चिड़िया
एक मीठी लय में हिलाती है
और झूम उठता है पूरा पेड़

पानी की कल-कल में बज रही थी सुबह
और चट्टाने चौंड़ी होकर चरवाहों के इंतजार में थीं
यहीं से उठता है हमारे गँवई कंठ का :
विहाग, बसंत, तिलक का मोद, चारुकेशी, तोड़ी, मल्हार पूरिया, यमन, भीमपलाश
जिस से भीजते नदी जाती है अपने समुद्र

खेत की तरफ जाती हँसिया
जीवन-संगीत का कोई वाद्य लगती है
खुरपी-कुदाल का अपना संगीत है

बैलगाड़ी को देखिए आप -
धड़धड़ाती पूरब से लादे चली आ रही है
भरी-पूरी धड़कती हुई एक सुबह!

 


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