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कविता

पत्थरों में रंग रहते हैं
प्रेमशंकर शुक्ल


पत्थरों में रंग रहते हैं
पके हुए रंग
कितनी दोपहरों से
सिझे हुए रंग

दिन-रात की धूप-छाँव से
रचे-बचे बने हुए रंग

पत्थरों में रंग रहते हैं
कोई उन्हें कठोर कह
अवमानना न करे
कोई उनकी पुकार को
न करे अनसुना

पत्थरों में रंग रहते हैं
तभी तो पत्थर
अपना पत्थरपन सहते हैं।

 


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