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कहानी

साहिब है रंगरेज
गीत चतुर्वेदी


हमने अच्छा किया या बुरा
इस सोच से बहुत आगे
एक मैदान है
मैं तुम्हें वहाँ मिलूँगी
जब आत्मा अपने से भी ऊँची
उस घास के बीच लेटती है
तो दुनिया इतनी ठसाठस भरी होती है
कि उसके बारे में कुछ भी बोलना
अच्छा नहीं लगता
विचार, भाषा, यहाँ तक कि यह कहना
हम एक दूसरे के लिए है
जहाँ कोई मायने नहीं रखता।
                  जलालुद्दीन रूमी


डिंपा की माँ के बारे में तो आप जानते ही होंगे। मैंने जब पिछली से पिछली बार कहानी लिखी थी, तो आपको बताया ही था उसके बारे में। भूल गए लगता है? यार, अपन ने लंबे टैम तब अस्सल लुक्खागिरी की है, तो अपुन को 'काहनी' में भोत इंटरेस्ट है। 'काहनी' बोले तो किसी की अक्खी लाइफ का एक्स रे। जब लुक्खागिरी के मूड में होते, तो 'काहनी' बोलते। जब अकेले में बैठ कर सोचते, तो कहानी सोचते। दोनों में डिफरेंस है। तो डिंपा की माँ अपन लोगों को बहुत जमी थी, क्योंकि उसके नितंब बहुत बड़े बड़े थे और हम लोगों में एक शर्त लगती थी, खासकर तब, जब वह बिरला गेट पर भाजी लेने आती थी। जब वह भाजी लिया करती, तो हम पीछे से उसे देखते हुए यह शर्त लगाते कि आज कौन उसके हिप्स पर चिकोटी काटेगा, कौन चमाट मार सकेगा, वगैरह वगैरह। और कहीं दिलचस्पी नहीं होती थी, बस हिप्स।

डिंपा की माँ को वैसे कोई खास आब्जेक्शन नहीं होता था, पर अगर चिकोटी ज्यादा तेज कट गई, तो वह बवाल कर देती थी। धीरे से सहला दो, तो वांदा नहीं। ग्रांटेड है।

जब वो आती, तो हम लोग गुनगुनाना शुरू करते थे - आधा किलो, एक किलो। आधा किलो, एक किलो। उसके विकट नितंब बहुत नैसर्गिक तरीके से अप एंड डाउन होते थे और हम उसे तराजू के रूपक में देखते थे। जैसे तराजू का भारी पलड़ा नीचे होता है, हल्का ऊपर, वैसे ही उसके नितंब भी ऊपर नीचे होते थे।

शर्त के कारण येड़ा ढेपलू तीन बार फँसा था। शायद वो ज्यादा ही जोर से चिकोटी काटता था। या फिर उसे ऐसा लगता था कि यह दस्तक है, अगर डिंपा की माँ ने उसे पहचान लिया, तो उसके घर में उसकी फ्री एंट्री हो जाएगी और फिर तो खल्लास। झक्कास में धमाल, फुक्कट में बजाओ माल। पन ऐसा कभी हो नहीं पाया। येड़ा ढेपलू को तीन बार डिंपा की माँ के चमाट गाल पर झेलने पड़े। और मजे की बात है कि तीनों बार डिंपा की माँ ने उसे पहचाना।

बोली 'रंडी के, फिर आ गया तू।'

और तड़ाक। येड़ा ढेपलू ने शर्त लगाना बंद कर दिया। यही नहीं, डिंपा की माँ अगर बिरला गेट पर दिख भी गई, तो येड़ा ढेपलू सीधे कल्याण निकल जाता, डुक्कर पकड़ के।

सच्ची बोले तो तीसरी बार बेचारे येड़ा ढेपलू का कोई कसूर ही नहीं था। चमाट तो टकले गुड्डू गांधी ने मारी थी। दो बार येड़ा ढेपलू पिट गया, तो तीसरी बार उसने शर्त लगाने से ही मना कर दिया। गुड्डू गांधी ने उसे बहुत उकसाया। जमाने भर के हीले दिए। पर येड़ा नहीं माना, तो नहीं माना। फ्लैट नकार। तय हुआ कि इस बार किला फतह करने का जिम्मा गुड्डू गांधी का। साला, गुड्डू गांधी भोत शाणा बनता था। अक्खा टाइम टकला रहता था। दाढ़ी बढ़ी रहेंगी, चल जाएँगा, पर टकले पे बाल नहीं मंगता। जब छोटा था, तो बाप ने उसको बहुत प्यार से गुड्डू नाम दिया था। उसके टकले को देख हममें से किसी ने गांधी नाम दे दिया। बाप और दोस्त का प्यार मिल गया, तो गुड्डू गांधी बन गया। हम लोगों ने सोचा कि हर बार बेचारे येड़े को पड़ती है, इस बार गांधी के शाणपणे की थोड़ी वाट लगनी चाहिए। डिंपा की माँ से खाएगा, तो शाणपणा निकल जाएगा। तो तय हुआ कि हाथ तो गांधी ही फिराएगा। गांधी ने भी टंगड़ी मार दी। येड़ा ढेपलू उसके साथ गाड़े तक जाएगा, जिधर डिंपा की माँ दो रुपये की भाजी के लिए सौदागरी कर रही है।

गुड्डू गांधी गया। साथ में येड़ा भी। येड़ा डर रहा था। दो चमाट याद थे उसको। वह थोड़ा पीछे ही रहा। गाड़े के पास भीड़ तो होती है। येड़े को पता नहीं चला कि गांधी ने कब हाथ साफ किया। उसे तो डिंपा की माँ के लल्ले काले चेहरे पर भभकती हुई लाल आँख दिखाई दी और उसका हाथ अपने गाल की दिशा में बढ़ता दिखाई दिया। रापचिक काला क्रिश्चियन हाथ। माईला... येड़े का उदरीच वाटरलू हो गया।

डिंपा की माँ बोली, 'यह रंडी का... हमेशा तंग करता है।'

किसी ने पूछा, 'क्या हो गया?'

'अरे, ये हरामी का बच्चा है।'

दो चार लोग और पलट गए। क्या हो गया, क्या हो गया, की रट लग गई।

डिंपा की माँ बस इत्ता बोली, 'ये स्साला हरामी है...।'

दो लोग आगे बढ़े, तो लगा, येड़े को सलटा देंगे ओर येड़ा भी नक्की ढक्कन, कि जगह से हिले ही नहीं। आँख फाड़ कर बस डिंपा की माँ को देखे जावे। उसको मजबूत पड़ती पब्लिक की, उससे पहले ही गांधी एक्टिव हो गया। पूछा, 'क्या हो गया आंटी? क्या हो गया भइया?'

'ये स्साला हरामी है...'

'क्या किया रे? बोल? भड़वे? बोल?'

गांधी ने येड़े को हड़काना शुरू किया और धक्के मारते हुए थोड़ा आगे तक ले गया। फिर बोला, 'निकल ले लपुट। तेर्कों बचाके यहाँ तक ले आया। अब निकल ले। मेरी गारंटी नहीं अब चल निकल।'

और येड़ा वहाँ से भागा, कि साला दूसरे दिन तक किसी को नजर नहीं आया। जब आया, तो गांधी की बैंड बजा दी।

साले, मजे तेरे और पड़ी मेर्को।

गांधी ने उसको समझाया कि कितनी चतुराई से उसको पब्लिक से पिटने से बचा लिया उसने। और येड़ा ये बात मान भी गया। दोनों में फिर पक्की दोस्ती। येड़ा को चैरिटी में जो मिला था, वह हर वक्त भूले रहता था, पर डिंपा की माँ बिरला गेट पर आई नहीं कि येड़ा ढेपलू की फटने लगे। तभी से हम लोग उसे 'येड़ा ढेपलू फट्टूभाई, डिंपा की माँ ने सॉलिड बजाई' - कहने लगे थे। हालाँकि इसके बाद भी शर्त लगाने में कभी कोताही नहीं हुई। गुड्डू गांधी हर बार सहला आता, कभी पकड़ा नहीं जाता, और धीरे धीरे पूरे बिरला गेट में ये फेमस हो गया कि डिंपा की माँ फिराने देती है, बशर्ते प्यार से फिराओ। गांधी को, पता नहीं, क्या तरीका आता था, कि धीरे धीरे डिंपा की माँ के लिए शर्त लगना ही बंद हो गई। वह आती, तो पहले ही हम बोल देते - जा रे गांधी। आ गई तेरी।


तो जैसा कि आप जानते ही हैं, डिंपा के तीन नाम हैं। पहला नाम तो आप जान ही गए, दूसरा नाम है अशोक और तीसरा नाम है डेविड। इस नाम को डिंपा सरनेम की जगह इस्तेमाल करता है। स्कूल के शुरुआती दिनों में उसके नाम के साथ एक और नाम जुड़ा था - कुमार। यानी अशोक कुमार डेविड। पर चिढ़ के मारे उसे जल्द ही वह नाम हटाना पड़ गया। स्कूल के बच्चे उससे पूछते कि तेरे बाप का नाम कुमार है क्या? वह बोलता नहीं, तो सवाल आता, फिर नाम के साथ कुमार क्यों लगाया है? वह कुछ लोगों के लिए राष्ट्र से भी बड़े महाराष्ट्र की उससे भी बड़ी राजधानी के पास बसा हुआ छोटा सा कस्बा था, जहाँ मराठी बोलने वाले लोग रहते थे और उनमें नाम रखने का रिवाज ऐसा था - नामदेव सखाराम बांडेकर, अतुल रमेश करमरकर, विजय दीनानाथ चव्हाण। तो जो बीच का नाम होता था, वह बाप का मान लिया जाता था और लोग बाप का नाम साथ में बोलने पर या तो बहुत फख्र महसूस करते थे या गाली जैसा। सो, कुछ चिढ़ते भी थे। तो अशोक कुमार डेविड के नाम में से कुमार इसलिए हट गया कि बाकी छात्रों को वह पसंद नहीं आया। इसके बाद भी डिंपा की टेंशन कम नहीं हुई थी। अब सब पूछते - ये डेविड किसका नाम है रे?

वह बोलता - मेरा सरनेम है।

पन ऐसा कैसा सरनेम? ये तो नाम होता है।

और उसके बाद डेविड नाम वाले कुछ लोगों का जिक्र होता है। डिंपा ने एक दिन बहुत परेशान होकर अपने बाप राधेश्याम डेविड, जिसके कारण उसे डेविड जैसे एक नाम को सरनेम की जगह इस्तेमाल करने की गंदी आदत पड़ी थी, से जिद की कि वह अपने बेटे के लिए एक अच्छा सा सरनेम खोज कर लाए - जैसे पाटिल, चव्हाण, साठे, जोशी, पांडे या मिश्रा। पर उसके बाप ने उसे डाँट दिया कि जो मिला है, उसी में सब्र कर। मेरे बाप ने मुझे कोई सरनेम नहीं दिया, मैं तेरे लिए कहाँ से लाऊँ।

और मन मार कर डिंपा को इसी सरनेम के साथ काम चलाना पड़ा। एक दिन राधेश्याम डेविड ने किसी अखबार में एक सरनेम पढ़ लिया - चाटे। उसके बाद जब भी डिंपा सरनेम का जिक्र छेड़ता, राधेश्याम डेविट चाटे का हवाला देते और कहते, इससे तो अच्छा सरनेम है न तेरा। डिंपा मान जाता। और उसके बाद उसने इसे एक मजबूत तर्क की तरह स्वीकार किया।

तो बातों बातों में आपको यह भी पता चल गया कि डिंपा के बाप के दो नाम थे। राधेश्याम और डेविड। उनमें अपने सरनेम को लेकर कोई कांप्लेक्स नहीं। उनका एक और नाम था साहिब, पर यह नाम उनकी बीवी के सिवाय कोई नहीं लेता। बीवी उसे नाम नहीं मानती, यह तो फीलिंग है। फीलिंग को कोई नाम दे सकते हैं क्या? यहीं, लगे हाथ यह बता दिया जाए कि डिंपा की माँ के चार नाम हैं। पहला तो आप जान ही गए, दूसरा नाम है हेमा। यह नाम उसके मायके वाले भी कभी नहीं लेते। किसी को याद ही नहीं। स्कूल में लिखा हुआ था। बाद में शादी के कार्ड पर छप गया। उसे शादी से पहले भूतपूर्व नाम छकुली से जाना जाता था। शादी हो गई, तो राधेश्याम डेविड ने उसे डार्लिंग कहना शुरू किया और यह उनकी जबान पर इस तरह चिपका कि जब कभी झगड़े के दौरान उन्हें अपनी पत्नी को गाली देनी होती, तो कहते - साली हरामखोर डार्लिंग...। यह सुनने में फनी लग सकता है, पर जब राधेश्याम डेविड के मुँह से इस तरह शब्द निकलते, तो पूरी कॉलोनी में आफत आ जाती। और इसके बदले में डिंपा की माँ भी क्या न बोले, एक से एक आभूषण सिंगार के साथ भाषा को सजाया जाता है कि रीति काल का कोई कवि भी वहाँ से मूतते हुए भागे।

डिंपा की माँ के चौथे नाम के बारे में काफी कहा जा चुका है। वह पारिवारिक नाम है। पूरा परिवार उसे ढोता है, भले नई पीढ़ी को वह पसंद नहीं। जिस जगह से डिंपा का बाप आया था, वहाँ कोई सरनेम चलता भी नहीं। बीसियों साल पहले वे लोग झाबुआ में रहा करते थे। एक दिन कोई सिस्टर नन आई। उसने इनका पूरा नाम नहीं बदला। पानी छिड़का और सिर्फ डेविड नाम जोड़ दिया। कहा - आज से भैरू बाबा की पूजा बंद। ये खीस्त है, तुम्हारा नया देवता। फिर उसके भजन गाए गए - खीस्त बाबा तेरी अजब है कहानी। राधेश्याम डेविड जब छोटे थे, तो उन्हें खीस्त बोलने में बहुत मशक्कत करनी पड़ती थी, पर उन्होंने यह बात किसी से कही नहीं। पुरानी पीढ़ी के लोग विरासत पर सवाल वैसे ही नहीं करते थे। जो पुरखों ने दिया, सिर माथे लगा लिया। पर उनकी जुबान की बाबा ने सुन ली, जल्द ही खीस्त, यीशु हुआ, फिर ईसा, फिर जीसस। ये नाम सही था। जुबान को आराम मिला। संकट के समय 'ओ खीस्त बाबा' बोलने में कई बार खाँसी आ जाती थी। 'ओ जीसस' चल जाएगा।

नाम के साथ डेविड जुड़ने के बाद राधेश्याम डेविड के पिता जी को जो पैसे मिले थे, उससे उन्होंने झाबुआ छोड़ दिया और शिरपूर आ गए। वहाँ उन्होंने पानी से बरफ बनाने का धंधा शुरू किया और साइकिल पर गली गली घूम कर बरफ बेचने लगे। जूनियर डेविड जब कांबा के पास इस कॉलोनी में आए, तब तक उनके पास बारहवीं और आईटीआई का सर्टिफिकेट था, उम्र में 27 दिन बड़ी एक बीवी थी और अगर सब कुछ ठीक रहा, तो उसके पेट में उन्हीं का बच्चा भी था। हाँ जी, राधेश्याम डेविड को अक्सर यह शक हो जाता है कि डिंपा की माँ के पेट में जो कुछ भी है, वह उनका नहीं है। कई बार वह डर जाते हैं, जब डिंपा की माँ कॉलोनी के किसी घर से कुछ खाकर आ जाती है। किसी दूसरे का पेट में जाए, उन्हें बर्दाश्त नहीं। वह किसलिए कमाते हैं? पेट में डालने के लिए ही न। सो, पेट उनके लिए बहुत अहम है। पेट में जाने के रास्ते भी।

मैंने बताया था कि डिंपा की माँ अपनी किस्मत पर हमेशा रोती रहती है। जिंदगी ने उसे इतने संघर्ष नहीं दिए कि उसका रंग काला हो जाए, वह तो बचपन से ही ऐसी है। जितना काला उसका चेहरा है, उससे ज्यादा काले उसके बाल हैं। और बाल भी कमर से नीचे तक लपकते, पर एक बार डार्लिंग के साथ किसी झगड़े को अंजाम तक पहुँचाने के लिए मिस्टर डेविड ने कैंची से उन बालों को काट दिया था। उसके बाद डिंपा की माँ के बाल पीठ से नीचे गए ही नहीं। उसके चेहरे की कालिमा में उसकी आँखें इतनी सफेद लगती हैं, मानो चिल्ला चिल्ला कर कुछ बोलना चाहती हैं। संस्कृत के किसी विद्वान ने उसे देख लिया होता, तो उसका पाँचवाँ नाम 'चिल्लाक्षी' रख देता। उसके काले रंग के बारे में बहुत बातें होतीं। जिस माँ को अपनी बेटी से दुश्मनी निकालनी होती, वह डिंपा की माँ को सर्वश्रेष्ठ उपमा की तरह प्रयोग करती।

पर अगर डिंपा की माँ के सामने उसके रंग का जिकर कर दें, तो उसके चेहरे पर बहुत तिरछी मुस्कान आ जाती। बहुत शर्माते हुए वह कहती, 'मैं ऐसी नहीं थी रे। बहुत साफ रंग था मेरा। पर मेरा साहिब है न रे जो, बहुत बड़ा रंगरेज है। जब मुझे खूब प्यार करता है, तो मेरा रंग उजला हो जाता है। जब नाराज होता है, तो मेरा रंग काला हो जाता है। जब मुझसे बातें करता है, तो मैं नीली होती हूँ। जब मुझे छूकर गुजरता है, तो लाल पड़ जाती हूँ। इन दिनों वह मुझ पर बहुत नाराज है। क्या करूँ, मेरे मिस्टर अब भी मुझ पर शक करते हैं बोलो, ये भी कोई बात हुई। लड़का सोलह का होने आया, अब भी शक करते हैं। पर प्यार भी बहुत करते हैं।'

यह कहते हुए इतना डूब जाती थी, इतनी देर तक बोलती रहती थी कि सामने वाला फिर कभी उसके सामने उसके रंग के बारे में कुछ कहने की हिम्मत नहीं कर पाता था।

डिंपा की माँ को यह बताने में बहुत गौरव होता था कि उसका पति अब भी उस पर शक करता है।


डिंपा की माँ शाम को आठ बजे घर में घुसी थी। राधेश्याम डेविड सोफे पर बैठा था। रंगरेज का चेहरा आज जर्द था। रंग बदल देगा। डिंपा की माँ को तब डिंपा पैदा हो चुका था। उससे पहले जंबो भी पैदा हो चुका था। डिंपा की माँ को जंबो की माँ भी कहा जा सकता था, क्योंकि पहली संतान तो वही था, लेकिन पैदा होने के कुछ समय बाद ही जंबो को डिंपा की माँ का भाई ले गया था। डिंपा की माँ का भाई, राधेश्याम डेविड का दोस्त था। शिरपूर में खासा रसूख रखता था। डेविड पहले उसके कारखाने में ही नौकरी करता था। वहीं पर डिंपा की माँ को उसने पहली बार देखा था। नहीं, कोई फर्स्ट साइट लव नहीं हुआ था। डिंपा की माँ भले कितनी भी काली थी, पर हमेशा से वह ऐसी नहीं थी कि उस पर हँसा जाए। आज हम लोग जब डिंपा की माँ को याद करते हैं, तो समझ में आता है कि उसने अपना स्टाइल सिग्नेचर डेवलप किया था। उस जमाने में फैशन मैग्जीन्स इतनी नहीं थीं, न ही इतने सारे फैशन डिजाइनर। फिल्मों में जो दिखा दिया जाता था, वही आम जनता का फैशन हो जाता था। आज तो अलग से फैशन सेगमेंट है। फैशन फिल्मों से आगे हो गया है। सैलेब्रिटीज पहले ही तय कर देती हैं कि आने वाला साल का स्टाइल सिग्नेचर क्या होगा। तो डिंपा की माँ ने उस पिछड़े समय में भी अपना स्टाइल सिग्नेचर बना रखा था, यह बात आज समझ में आती है, पर उन दिनों में भी वह सबसे अलग लगती थी। उसका रंग पहले से ही काला नहीं था, वह तो कालेपन में भी एक चमकते उजास से भरी रहती थी। वह तो उसका साहिब रंगरेज है, उसे जाने कैसे रंगों में रँगता रहता है।

शिरपूर की उस शाम को जब कारखाने के काउंटर पर डिंपा की माँ बैठी हुई थी, तो डेविड ने उसे देखा था। वह डिंपा की माँ के चेहरे को ध्यान से देखता, उससे पहले डिंपा की माँ खड़ी होकर थोड़ा झुकी थी और उसका कुर्ता छाती से खुल गया थोड़ा सा। डेविड की नजर डिंपा की माँ के दूधिया खरगोशों पर सबसे पहले पड़ी। डेविड दंग रह गया। इतना काला बदन और इतने दूधिया खरगोश। डिंपा की माँ वापस बैठ गई। पल भर में किसी ने उसकी रहस्य की आवृत्त दुनिया में प्रवेश कर लिया है, उसे नहीं पता चला था। शादी के बाद पहली रात जब डेविड उसके खरगोशों को बेतहाशा प्यार कर रहा था, तब वे दूधिया नहीं थे।

डेविड ने पूछा, 'तुम्हें यहाँ पाउडर लगाने का बड़ा शौक है न?'

डिंपा की माँ चौंक गई थी, 'तुम्हें कैसे पता?'

'बस, देखा है मैंने।'

'क्या देखा है तुमने?'

'तुम्हारे उछलते हुए खरगोशों को सफेद रुई का लिहाफ ओढ़े देखा है।'

'मतलब?'

'हाँ, मैंने तुम्हारा चेहरा देखने से पहले तुम्हारे खरगोशों को ही देखा था। छोटे से गोल, दोनों के बीच की लकीर, जो किसी सरहद की तरह नहीं है।'

'कैसे देख लिया तुमने?'

डिंपा की माँ याद करने लगी कि उसने कभी सपने में भी डेविड को नहीं देखा था। उसकी सिर्फ तस्वीर ही दिखाई थी उसके भाई ने और कहा था - बघ छकुली, ये तेरा नवरा है। तेरी शादी इससे बनने की। उसे बिल्कुल याद नहीं कि डेविड उस तस्वीर से बाहर निकल कर उसके कुर्ते के गले में कैसे बैठ गया कि उसे वहाँ से उसके खरगोश दिख गए।

'झूठ बोलते हो जी तुम।'

'विश्वास नहीं, तो बताओ, मुझे कैसे पता चला कि तुम्हें यहाँ पाउडर लगाना बहुत अच्छा लगता है।' डिंपा की माँ चुप हो गई। हाँ, कैसे पता चल सकता है?

'जिस दिन मैंने पहली बार इन खरगोशों को देखा था, मेरे दिल में ये बात आ गई थी कि एक दिन ये मेरे होंगे।'

'बता दो, कब देखा था?'

'पहली बार सिर्फ एक बार देखा था। उसके बाद बार बार देखा। आँख बंद होती, तो नजर आँख से निकल कर तेरे कुर्ते में चली जाती थी। वहाँ बैठ कर मैं देर तक तेरे खरगोशों को देखा करता था। प्यारे से नन्हें, फुदकते हुए खरगोश।'

'हट्ट।' डिंपा की माँ शर्मा गई।

खरगोश एक सम था। साहिब ने उसे सफेद रंग में रंगा था। सफेद रुई का लिहाफ ओढ़े फुदकता खरगोश, जिसकी आँखों में कत्थई रंग का बिंदु था। जिसके चेहरे के चारों ओर उभार था। जो उनके जीवन का सम था। डेविड जब नाराज होता, तो डिंपा की माँ बात को खरगोश तक ले आती। वह बरसों तक पूछती रही कि बता दो, कब दिखे थे तुम्हें खरगोश?

डेविड बरसों तक नहीं बताता।

'हाँ देखा, सिर्फ इतना बता दूँ कि तेरा चेहरा देखने से पहले देखा था खरगोश। और उनको देखते ही तय किया था कि एक दिन मेरे होंगे ये खरगोश।'

भयंकर गुस्सा और जानलेवा झगड़े को खरगोश ने अपना जिक्र आने पर कोमल प्यार और गांगेय रूलाहट में बदलते देखा है। खरगोश बहुत ताकतवर था। उसका जिक्र आता था, तो पत्थर सा हो गया दिल पिघल कर उसकी कंदरा में बहने लगता।

डेविड जब क्रोध में जलते हुए, पार्क की बेंच पर जाकर बैठता, तो पीछे से एक छोटा सा कंकड़ आता, जिस पर एक कागज लिपटा होता। उसमें बहुत खराब हैंडराइटिंग और गलत स्पेलिंग्स में लिखा होता - आज नाही बघायचं खरगोश? आओ न, आज उन्होंने बर्फ जैसी रुई का लिहाफ पहना है। देखो न, ठंड के मारे गले जा रहे हैं तुम्हारे खरगोश।

डेविड इस कागज को फाड़ कर फेंक देता। यहाँ वहाँ देखता। कोई नजर न आता। वह जिद में बैठा रहता। फिर एक कागज आता, उसमें भी खरगोश के इंतजार के बारे में लिखा होता। डेविड उठता और डिंपा की माँ को बाँहों से पकड़ कर बाहर ले आता। पार्क की सूनी बेंच पर दोनों एक दूसरे का हाथ हाथों में लिए बैठे रहते। डेविड की आँखों से आँसू गिरते रहते। डिंपा की माँ अपनी उँगली की पोर पर एक एक आँसू जमा करती और कहती, 'हर बूँद आँसू, खरगोश की कत्थई आँख में रोप देना। मेरा खरगोश तुम्हारा हर गुस्सा, आँसू अपनी आँख में समेट लेना चाहता है।'

डेविड की आँखों से और आँसू बहने लगते। डिंपा की माँ का रंग बदल जाता। उसके साहिब ने आँसू से उसका पूरा शरीर रंग दिया। पहले उसके होंठों का रंग बदला। फिर उसके गालों का। फिर उसके खरगोशों का। उसका पोर पोर उजला हो गया। डिंपा की माँ ने बर्फ का लिहाफ ओढ़ लिया।

दोनों हाथों में हाथ डाले देर तक कॉलोनी की सड़क पर भटकते रहते। बीच बीच में रोते। फिर कस के एक दूसरे को पकड़ लेते। डिंपा की माँ डेविड की हथेली चूमती और कहती, 'मालूम क्या साहिब? आत्मा हथेली के सिरे में रहती है। हथेली चूमने का मतलब आत्मा चूमना होता है। देख साहिब, मेरे होंठ तेरी आत्मा को चूमते हैं। मुझे अपनी रूह के रंग में रंग दे।'

लल्ले, राधेश्याम डेविड पर सेंटी होने का दौरा पड़ जाता। भगीरथ के बुलाने पर गंगा पहले डेविड की आँखों में गिरी थी। शिव की जटा में तो बाद में गई थी। बोले तो, शिव ने चीटिंग की। डेविड की आँखें इस वक्त यही कह रही हैं। वह भरे हुए गले से कहता है - माझी रानपाखरूँ... (मेरी बनतितली) और अरुण दाते की आवाज में गाता है...

आज हृदय मम विशाल झाले
त्यास पाहुनि गगन लाजले

(आज मेरा हृदय बहुत विशाल हो गया है, जिसे देख आसमान भी लजा रहा है।)

डिंपा की माँ मुस्कराने की कोशिश करती आँखों से देखती, एक लैंपपोस्ट के नीचे खड़े हो जाती है। लैंपपोस्ट से बहुत हल्की पीली रोशनी नीचे गिर रही है। डिंपा की माँ जब अपने बरामदे में खड़ी हो यहाँ देखती है, तो उसे कोई यहाँ सिर झुकाए बैठा दिखता है, जिसके चारों ओर रोशनी के बीच एक काला अँधेरा घेरा दिखाई देता है। डिंपा की माँ उस लैंपपोस्ट से टिक कर खड़ी हो जाती है और सुर जोड़ती है :

आज माइया किरणकरांनी
ओंजलीमध्ये धरली अवनी

अरुणाचे मी गंध लावले...

(मुझ पर रोशनी करने वाली किरणों ने अपनी अंजरियों में भर लिया है धरती को। मैंने अपनी पूरी देह पर सूरज की सुगंध लगा ली है।)


आज रंगरेज का रंग बदला हुआ है। डेविड ने पहली बार कहा, 'साली डार्लिंग, तू ज्यादा समय तक घर से बाहर मत रहा कर।'

'क्या हो गया?'

'कुछ नहीं, बस मैंने कह दिया है ना। ज्यादा समय तक घर के बाहर मत रहा कर।'

बर्फ से ढके हुए उन दिनों में ऐसा बहुत कम हुआ था कि डिंपा की माँ घर में आई हो और डेविड उसका इंतजार करते बैठा हो। डिंपा कॉलोनी में खेलता रहता था और डेविड पालियों में नौकरी करता था। कभी रात पाली, कभी दिन पाली। कलपुर्जों की फिटिंग करता था। घर आता, तो सोने की लगी रहती। आज वह डिंपा की माँ के घर में घुसने के वक्त सोफे पर इस तरह बैठा था, जैसे इंतजार ही कर रहा तो।

दोनों के बीच बहुत अजीब किस्म का संबंध था। दोनों बहुत लड़ते थे और शायद उतना ही प्यार करते थे। उनका प्यार मिसाल था और झगड़े भी। हर झगड़े के पीछे प्यार ही होता है, ऐसा डिंपा की माँ हर झगड़े के बाद कॉलोनी के हर घर में जाकर कह आती थी, क्योंकि उनके घर के भीतर हुआ झगड़ा थोड़ी ही देर में कॉलोनी के पत्ते पत्ते, बूटे बूटे तक पहुँच जाता था। अगर किसी को रात बारह बजे सड़क पर दो आत्माएँ एक दूसरे की बाँहों में बाँहें डाले, बाबा आदम और बब्बी ईव के अपराधों के पथ पर चलती दिखतीं, तो भूतों की तमाम खबरों के बाद भी यह मान लिया जाता था कि डेविड दंपति आज नाइटवॉक पर निकला है। कॉलोनी के थिएटर में दिखाई जाने वाली साप्ताहिक फिल्मों के सबसे करुण दृश्यों पर अगर किसी को रोने की आवाज सुनाई दे जाए, तो समझ लिया जाता था कि मिस्टर एंड मिसेज डेविड आज बहुत इमोशनल हैं और घर जाते जाते रास्ते में घंटों प्यार करेंगे। सालाना जलसा तब तक खत्म घोषित नहीं होता था, जब तक डिंपा की माँ और राधेश्याम डेविड साथ साथ ठुमके न लगा लें। और महीने पखवाड़े की किसी एक रात में जब सारी कॉलोनी में किसी महिला की दारुण चीखें गूँजती थीं, रात भर लोगों के दरवाजों पर कोई सिसकी आहट करती थी, तो बाकसम, वह भूत नहीं होता था, डिंपा की माँ रो रही होती थी। वह जितना धीमे हँसती थी, उतना ही चिल्ला कर रोती थी।

डिंपा की माँ का पिटना एक सार्वजनिक कर्म था। यह ऐसा दृश्य था, जिसे देखने के बाद लोग देर तक दरवाजा नहीं खोलते थे। दरवाजा खोलें, तो क्या पता, डिंपा की माँ बाहर ही खड़ी हो, कब दौड़ कर आपके घर के भीतर आ जाए और राधेश्याम डेविड डिंपा की माँ से ध्यान हटा कर आप पर लगा दे, डिंपा की माँ को गालियाँ देना छोड़ आपको देने लग जाए और कह दे कि आपके साथ ही सोती है यह। इसे पिटते देख आप इसे बचाने के लिए अपना दरवाजा खोल कर खड़े हो गए हैं। आप आयँ बायँ करते रह जाएँ, लड़ा जाए, या पहले इसे शांत कराया जाए, इसका सिर फोड़ दिया जाए या सिर पर ठंडा पानी डाला जाए, आपको समझ में नहीं आता। आप और कुछ बोलें, तब तक डेविड आपसे धक्का मुक्की कर चुका होगा। आपके घर के भीतर घुस कर, डिंपा की माँ को पकड़ कर बाहर ला चुका होगा ओर उसे गालियाँ देते हुए ले जाएगा - 'साली, अक्खी कॉलोनी में तमाशा कर दिया है। इधर भाग रही है, उधर भाग रही है, चल घर में।'

हम सबको लगता कि अब घर ले जाकर डेविड उसे और मारेगा। वह तो चला जाता पर आपके घर में नया बखेड़ा शुरू हो जाता। आपकी बीवी एकाध बार तो जरूर पूछ लेती - 'कब सोए थे डिंपा की माँ के साथ?' आप भौंचक उसका मुँह देखते रह जाएँ और वह बात को मजाक में उड़ा दे। एक घर का झगड़ा दूसरे घर में ट्रांसफर हो जाए।

पहली बार ऐसा तब हुआ था।

कोई तपती हुई दोपहर थी, जब बाहर खेलते कई बच्चों ने डिंपा की माँ को पेटीकोट और ब्लाउज में ही बाहर दौड़ते देखा था। उसके पीछे बेल्ट लेकर डेविड दौड़ रहा था - नाड़े वाला धारीदार कच्छा पहने हुए। वे दोनों शायद अपराह्न - अंतरँगता में थे और उसी समय किसी बात को लेकर तनातनी हुई थी। दोनों में जब भी तनातनी होती, तो शुरुआत में कोई सँभालना नहीं चाहता था। बात बढ़ती रहती, बढ़ती रहती और बढ़ ही जाती। फिर बहुत बड़ा हंगामा होता, चीखें गूँजतीं, पकड़ा पकड़ी होती, और उसके बाद दोनों में से एक को कुछ ख्याल आता और वह दूसरे को पकड़ कर घर में ले जाता।

इस वक्त डिंपा की माँ पेटीकोट और ब्लाउज में कॉलोनी की काली, डाबर से बनी हुई साफ सुथरी सड़क पर दौड़ रही है और डिंपा का बाप पीछे है। इस वक्त कॉलोनी की औरतों ने पहली बार जाना था कि डिंपा की माँ पेटीकोट भी सैटिन का पहनती थी। जैसा फिल्मों में हीरोइनें। ज्यादातर औरतें कॉटन का रद्दड़, सस्ता पेटीकोट पहनती हैं और उनके लिए डिंपा की दौड़ती हुई माँ का धूप में चमकता सफेद सैटिन का पेटीकोट गहरे आश्चर्य में डालने वाला था। दूसरे दिन जब कुछ औरतें डिंपा की माँ के घर उसका हालचाल जानने गई थीं, तो उनकी दिलचस्पी उसकी पिटाई से ज्यादा यह जानने में थी कि इसके पास और कौन कौन से पेटीकोट हैं। वहीं लोगों को पहली बार पता चला था कि डिंपा की माँ कितनी अच्छी कारीगर है। एंब्रॉएडरी, क्रोशिया, बुनावट, सिलाई सब में एक्सपर्ट।

जब डिंपा की माँ दौड़ रही थी उसका सैटिन का पेटीकोट लहरा रहा था, तो औरतों ने उसमें लटकती हुई झालरें देखी थीं। सिल्क की झालरें गहरे सफेद रंग की थीं। चमकती हुई झालरें। उसके ब्लाउज में सिल्क की लेस लगी हुई थी, वह भी डिंपा की माँ ने खुद ही लगाई थी।

तो डिंपा की माँ सैटिन का सफेद पेटीकोट और सफेद ब्लाउज पहने कॉलोनी की पतली सड़कों पर दौड़ रही थी और उसका पति बेल्ट ताने उसके पीछे। डिंपा की माँ के होंठों के नीचे से खून टपक रहा था। उसके कमर तक के बाल खुले हुए थे। उस वक्त तक वह बहुत ज्यादा मोटी नहीं हुई थी। भव्य लग रही थी। पिटने से बचने के लिए दौड़ती एक भव्य स्त्री। सँवार सँवार कर बनाए हुए रूप को सबको दिखाते हुए दौड़ती एक भव्य स्त्री। डर के लिहाफ में लिपट कर अनावृत्त दौड़ती एक भव्य स्त्री। बेल्ट लहराते दौड़ते आते पति को बार बार पीछे मुड़ कर देखती हुई एक भव्य स्त्री। थोड़ी देर पहले तक प्यार के महासागर में गोते लगाने के बाद खौफ के रंग में पगी हुई एक भव्य स्त्री।

यहीं कहीं सैटिन के सफेद पेटीकोट के कारण डिंपा की माँ का पैर अटका और सड़क पर ढुलक गई। बहुत तेजी के साथ उसके पेटीकोट के अंदर का शरीर दिखा और फिर छिप गया। उसका सिर किसी पत्थर से लगा और हाथ उसके पेट के नीचे आकर दब गया। दर्द से वह बुरी तरह चीख उठी। डेविड अब तक उसके पास पहुँच गया और सनाक से एक बेल्ट दे मारी। डिंपा की माँ बिलबिला उठी और उठने की कोशिश में फिर गिर पड़ी।

उसने पलट कर पति को देखा। वह गुस्से में काँप रहा था। गालियाँ बक रहा था। डिंपा की माँ के काले चेहरे पर उसके काले बाल बिखरे हुए थे। उसका चेहरा दिख ही नहीं रहा था। बाल हटाते हुए वह चीखी, 'और मार साले भड़वे। इसी में शांति है तुझको, मार डाल। आज मार डाल मुझे। तू साला भड़वा कभी यकीन कर नहीं सकता मुझ पर। इससे तो अच्छा है, मर जाऊँ। मार डाल मुझे और जाकर फोड़ दे अपना घंटा। हरामी की औलाद... मार... मार मुझको... मार...'

डिंपा की माँ के होंठों से खून बह रहा था। आँखों में छाया हुआ था। माथे से बह रहा था। उसकी कोहनी छिल गई थी। उल्टी हथेली, जहाँ आत्मा का वास होता है, वहाँ खून छलका हुआ था। डिंपा की काली माँ, डिंपा की लाल माँ में बदल गई थी। रंगरेज ने फिर उसका रंग बदल दिया था। उसका साहिब रंगरेज है। उसके रंगों से खेलता है। उसके बदन की चुनरी में अपनी मर्जी का रंग भर देता है। उसकी मर्जी कभी पूछता तक नहीं। कैसा जोगी है। मन नहीं रँगता। कपड़ा रँगता है।


'नहीं घर आकर नहीं मारा उसने मुझे। वह मुझे देर तक अपनी बाँहों में ले रोता रहा। फिर बोला, तुझसे कितनी बार कहा है न, ज्यादा देर तक घर से बाहर मत रहा कर। क्या करूँ, मैं सुबह 8.40 की लोकल से निकल जाती हूँ, फिर शाम को आने में टाइम लग जाता है। स्टेशन से कॉलोनी तक आना भी तो टेंशन का काम है। रस्ते में बिरला गेट से भाजी भी लेती हूँ। बस मिल जाए, तो ठीक, नहीं तो ऑटो करना पड़ता है कई बार। पन इनको मेरे पे हमेशा डाउट रहता है। इनको लगता है कि मैं हॉस्पिटल नहीं जाती, कहीं और जाती हूँ। क्या बोलूँ, शायद एक दो बार ये मेरे पीछे पीछे हॉस्पिटल भी आए हैं। अब कितना समझाऊँ, ये बात तो समझने की ही होती है। हर वक्त बोलता है कि मुझ पर विश्वास करता है। जब शांत रहता है, तो बहुत अच्छा रहता है, पर जाने क्या हो जाता है बीच बीच में।'

डिंपा की माँ घर आई औरतों से कह रही थी या खुद से, नहीं पता। कल का वाकया ऐसा था कि डिंपा की माँ का मन ही नहीं हो रहा था कि किसी का चेहरा देखे। वह ऊपर से मुस्कुरा रही थी, पर भीतर ही भीतर उसके दिल में हल्ला हो रहा था। कल दोपहर को डेविड उसे ले आए और उसके बाद देर तक उससे प्यार करते रहे। प्यार करते रहे मतलब उसके घावों को सहलाया। उसे देर तक देखते रहे। डिंपा की माँ चुप थी। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि इस वक्त कैसे रिएक्ट किया जाए। कुछ पलों पहले जो आदमी जंगलियों की तरह व्यवहार कर रहा था, सड़क पर उसे दौड़ा कर मार रहा था, जिसे हमेशा ये शक रहता था कि कहीं मैं किसी के साथ सोती तो नहीं, कभी सड़क या बस में मेरा दुपट्टा जरा ढुलक जाए, तो जो आदमी जान ले ले कि तेरा कैरेक्टर ही ऐसा है, वह आदमी आज सरेराह मुझे पेटीकोट में दौड़ा रहा है, जो अपनी इज्जत के बारे में हमेशा मुझे चार बातें सुनाता रहता है और जिसे जरा सी फिक्र नहीं कि आज उसकी इज्जत का क्या हुआ है, उस आदमी की प्यार और सँभाल को कहाँ सहेजूँ? क्यों स्वीकार करूँ? क्यों नहीं पलट कर उसे दो हाथ मार दूँ और कहूँ कि भाग यहाँ से भड़वे...

डेविड उसके घावों पर कॉटन से डेटॉल लगा रहा है। जलन के मारे रूह हंगामा कर रही है। उसके भीतर जैसे कोई जुलूस निकल रहा है। हजारों लोग सड़क के किनारे खड़े हैं और नारे लगा रहे हैं। लेकिन जैसे किसी ने रिमोट पर म्यूट का बटन दबा दिया है। देखने पर पता चल रहा है कि बहुत हंगामा हो रहा है, लोग उछल रहे हैं, शब्द अपने रूप का सबसे भयंकर नृत्य कर रहे हैं, हवा में हाथ भांजे जा रहे हैं, मुट्ठियाँ तनी हुई हैं, लेकिन कोई आवाज नहीं हो रही। या तो उस आवाज को जिन कानों के रास्ते भीतर की दुनिया में जाना था, जिस जुबान के रास्ते बाहर की दुनिया में आना था, वे कान अंधी खाईं की मानिंद हो गए हैं, वह जुबान काठ हो गई है। वह उसके बालों में हाथ डाल रहे हैं। बालों को सहला रहे हैं। डिंपा की माँ को याद आता है कि वह एक वक्त इन बालों को पेड़ की छाँव की तरह महसूस करना चाहता है और दूसरे वक्त इन्हें जला देना चाहता है। वह उसकी आँखों की कोर को पोंछ रहा है, वह देर तक उनमें झाँक रहा है। उसे याद आता है कि वह एक पल इन आँखों को समंदर में चहकती हुई सीपी कहता है और अगले पल इन्हें फोड़ डालना चाहता है। डिंपा की माँ की आँखें झुक रही हैं। वह बार बार उसका सिर उठा रहा है। वह बार बार सिर झुका कर आँखें हटा रही है। कैसी विडंबना है, उसने सड़क पर मुझे मारा है, फिर भी कितनी जोर आजमाइश कर रहा है नजरें मिलाने की, मैंने सिर्फ उसे कुछ गालियाँ दी हैं, वो भी बुरी तरह आजिज आने के बाद, पर मैं नजरें भी नहीं उठा पा रही। इसलिए भी नहीं उठा पा रही कि क्या अब इससे कभी प्यार के दो बोल भी बोले जा सकेंगे?

पार्वती बाई सावंत ने एक बार बहुत सही कहा था कि कभी मर्द को अपने दिल के बारे में पूरी तरह मत बताना। वह तेरे दिल में हमेशा छेद करता रहेगा कि वहाँ से कोई बात निकल कर उस तक आ जाए। मत बताना कभी भी। उसे सिर्फ उतना ही बताना, जितने में वह खुश हो जाए, जितने में उसे अहसास हो कि हाँ, वही है सब कुछ। उसके आगे जहाँ बढ़ी, जहाँ उसे यह बताया कि उसके आगे भी कुछ है, वहाँ वह हाथ से निकला। वह तेरा जीना हराम कर सकता है। वह अगर बहुत प्यार करे, तो भी डरना। वह अगर बहुत नफरत करे, तो भी डरना। मर्द काबू करने की चीज होता है। और उसके लिए कभी मशक्कत वाला रास्ता मत अपनाना। कोशिश करना कि सिर्फ एक निगाह हजार हर्फ बोल दे।

डिंपा की माँ ने हजार हर्फों वाली वह निगाह उठाई, जो बाहर सड़क पर दौड़ते वक्त जाने कहाँ बिला गई थी। जब वह दौड़ रही थी, तो क्यों नहीं पलट कर एक बार उसी हजार हर्फों वाली निगाह से देख लेती? डिंपा की माँ ने उसे देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं। उसे बहुत दुख हो रहा था। उसका साहिब... वहशी रंगरेज...।

'डार्लिंग, पता नहीं, क्या हो जाता है मुझे... माफ कर देना यार... फिर हाथ उठाया तुझ पर... नहीं मारना चाहिए था तुझे... जो भी बात थी, बात करके हो सकती थी... पर क्या करूँ, मैं गुस्से में रहता हूँ, तो तू सँभाल लिया कर... तू भी ऐसे जवाब देती है कि और आग लगती है...'

'साहिब... हजार बार मार... हर रोज मार... तेरा गुस्सा... तेरी मार... सब सिर माथे है। बहुत प्यार करता है न मुझसे... इसीलिए तो इतना हाथ भी उठाता है... तुझे दे दिया है मैंने अपना ये शरीर... सजा कर दिल में रख... या खाल उतार कर दीवार पर टाँग... सब तेरा है... तेरे रंग में है... सिर्फ तेरे रंग में... पर ये न बोला कर कि मैं कहीं और जाती हूँ... किसी और के साथ... जो कुछ है, सिर्फ तू है... और अब इन सबके लिए कोई समय नहीं रे साहिब... मत बोला कर ऐसा...'

और वे फिर इमोशनल हो गए। नाइटवॉक पर निकल गए। दिन में जिस सड़क पर डिंपा की माँ देर तक दौड़ाई गई थी, उसी सड़क पर वह राधेश्याम डेविड की बाँहों में बाँहें डाल कर घूम रही थी। उसने पसंदीदा सफेद रंग की साड़ी पहनी थी, जिस पर गुलाबी रंग की एम्ब्रॉएडरी उसने खुद की थी। उसने गले में वह हार पहना था, जो उसके पिता ने उसे शादी के कुछ ही महीनों बाद लाकर दिया था। वह सड़क पर चल रही थी और सोच रही थी कि जिन लोगों ने उसे दिन में देखा है, कम से कम वही लोग उसे रात में भी देख लें। देखें कि उसके साहिब ने फिर उसका रंग बदल दिया है। देखें कि उसका साहिब कितने प्यार से उसकी चूनर में प्रेम का रंग बांधे है। कैसे रात की हवा में उसकी चूनर लहरावे है... कैसे खोया खोया है उसके रंग में, गंध में, देखो कि रात की इस हल्की रोशनी में मेरे दुखते हुए शरीर से भी सूरज की सुगंध आ रही है... मेरे साहिब ने सूरज की हल्दी बना कर मेरे जख्मों पर लगाया है... इस हल्दी से कैसे मेरा सियाही जैसा रंग झक उज्जर उज्जर होवे है... स्याही रंग छुड़ाए के रे दियो मजीठा रंग... बाँधणी चूनर मेरी...

देर रात तक डेविड दंपत्ति सड़क के किनारे भटकते रहे। फिर उन्होंने सुधीर फड़के के गाने गुनगुनाए। फिर उन्होंने एक दूसरे की हथेली में बसी आत्मा को चूमा। फिर उन्होंने आँसुओं से दिन की कलुषता का आचमन किया। आत्मा का प्रच्छालन।

डिंपा की माँ जितनी काली थी, डेविड उतना ही तगड़ा और खूबसूरत था। कमाल का रेसलर था। बदन में ताकत का झरना था। छह बाई छह की सेटी को टाँग से धक्का मार कर खसका देता था। डिंपा की माँ जब खासी मोटी हो गई थी और उसके नितंब पूरी कॉलोनी में चर्चा का केंद्र हो गए थे, तब भी डेविड डिंपा की माँ को अपनी गोद में उठा कर दिन भर घूम सकता था। और उसके बाद भी थकान नहीं। इस तरह की बातें डिंपा की माँ ही कॉलोनी वालों को बताया करती थी।

शिरपूर में डेविड ने जब डिंपा की माँ को पहली बार देखा था, उससे पहले तक उसके जीवन में कुछ खास नहीं हुआ था। जो हुआ भी था, उसे वह डिंपा की माँ के खरगोशों को देखने के बाद भूल गया था। उसने उसके भाई से दिल की बात कही - बहुत डरते डरते। हालाँकि इस बारे में कई दिन तक सोचता रहा कि पहले बात किससे की जाए, डार्लिंग से या फिर उसके भाई जॉन विश्वनाथ बटनवाला से। उसके भाई का बिजली के बटन बनाने का कारखाना था। डेविड वहीं काम करता था। बारहवीं पढ़ने के बाद प्रोफेशनल कोर्स करने का बड़ा फैशन था। इसी के चलते डेविड ने आईटीआई कर लिया और फिटर के रूप में वहाँ ज्वाइन कर लिया। छोटा सा कारखाना था। छोटे से कस्बे में। डेविड ने अपनी माँ के रास्ते जॉन तक जाना चाहा। माँ और ज्यादा रिस्की थी। दस सवाल पूछने लगी। क्या जानता है तू लड़की के बारे में? पता नहीं, किदर किदर मुँह मारा होगा। कभी उसको ढंग के कपड़ों में देखा है? क्या क्या नहीं लगाती वह थोपड़े पर? मेली कलूटन। तेरे लिए गोरी लड़की ढूँढ़ कर लाऊँगी मैं।

डेविड की माँ के सपने अलग किस्म के थे। डेविड सुंदर था। गाँव में गुजर जाए, तो हर लड़की के दिल में उछल कूद मच जाए, पर डेविड को खरगोश बुला रहे थे। उसने बटनवाला से बात कर ली। और जाने क्या राज था, बटनवाला पहली ही बार में मान भी गया। डेविड ने कहा कि एक बार वह छकुली से मिलना चाहता है।

बटनवाला ने मना कर दिया, 'मिलने की क्या बात है? तेरा फोटू दिखा देता हूँ उसको। मेरी साइड से फाइनल है। तू डेट वगैरा निकलवा ले।'

शाम को डेविड ने कारखाने में सबको बता दिया कि वह बटनवाला की बहन से शादी करने वाला है। सब चौंक गए। किसी ने कुछ नहीं कहा था, डेविड को याद है, बस, सबकी आँखें फटी की फटी रह गई थीं।

'तू बटनवाला की बहन के साथ... नहीं रे... ऐसा नहीं हो सकता...'

'कायकू नहीं हो सकता?'

'अरे... तेरे सामने क्या है रे वो... तेर्को तो साले मस्त पिक्चर में जाने का मँगता..'

'मेर्को नहीं करनी पिक्चर विक्चर। मेरी नक्की है उसके साथ... बटनवाला से बात हो गैली है।'

फिर किसी ने कुछ नहीं कहा। डेविड ने बटनवाला की बहन से शादी की और उसके तीसरे ही दिन बटनवाला ने उससे कहा कि कल्याण के पास कांबा में नई कंपनी खुली है। उसने उसकी बात वहाँ कर दी है। बिजली बनाती है कंपनी। वहाँ चले जा। फिर भी डेविड को शिरपूर से निकलते निकलते तीन महीने लग गए। उसमें से ज्यादातर दिन अपनी माँ के साथ लड़ने में बीते। फिर माँ शिरपूर में ही अपने भाई के पास रहने चली गई।

डेविड बहुत गुस्सैल, हर बात में आस्तीन ऊपर कर लेने वाला और शौकीन किस्म का था। उसे नाटकीयता बहुत पसंद थी। सादा सा गुलाब भी वह इतने ड्रामे के साथ देता था कि आप उसके ड्रामे पर मर मिटें। रजनीकांत की तरह उसे सिगरेट उछाल कर पीने में बहुत मजा आता था। बस जब तक सड़क पर खड़ी है, डेविड उसमें नहीं बैठेगा। बस चल पड़ी है, तो डेविड अपनी जगह से हिलेगा। बस रफ्तार पकड़ चुकी है, तो डेविड अपनी जगह से उठेगा। बस अब बहुत दूर हो गई है, तो डेविड बला की तेजी के साथ दौड़ेगा और हत्था पकड़ कर बस में कूद जाएगा। वह जितनी बार दौड़ती हुई बस में चढ़ता, उतनी बार ड्राइवर को मन ही मन गाली देता साला, अपुन से पल्ली?

कमोबेश यही बात उसके काम में भी थी। शिफ्ट मैनेजर ने 11 बजे काम सौंपा है। सात बजे तक पूरा करके देना है। डेविड को काम की कोई टेंशन नहीं रहती। पाँच बजे तक घूमता रहेगा। फिर एक घंटे में धड़ाधड़ सब कुछ निपटा देगा। सात बजे से पहले काम पूरा है। डेविड अपनी अदाओं पर खुद ही मरता था। बाकी लोग उसकी आदतों का मजाक उड़ाते थे।

कॉलोनी जाने के चार महीने बाद जब वह शिरपूर लौटा, तो उसकी माँ ने डिंपा की माँ का हाल पूछते हुए कहा था, मैं बोली थी न, बहुत फेमस है वो। बहुत कुछ सुना उसके बारे में मैंने। यही वास्ते तो बटनवाला एक बार में ही मान गया था। शिरपूर की इस यात्रा में डेविड का इतना ज्ञान बढ़ा था कि वह उस ज्ञान को सँभाल नहीं पाया और आकर डिंपा की माँ पर उल्टी कर दी। डिंपा की माँ उसे बार बार समझाती रही कि उसके बारे में कहा बहुत जाता था, पर वह ऐसी है नहीं।

एक रात डेविड ने बहुत इमोशनल होकर डिंपा की माँ से पूछा, 'सच बताना डार्लिंग, कोई था न, शिरपूर में सब बोलते हैं। कोई था, तभी तो बोलते हैं। वरना क्यों कोई बोले? मेरे बारे में तो कोई नहीं बोलता?'

'साहिब... तुम मर्द हो। कुछ भी करोगे, कौन बोलेगा... पर लड़की के बारे में सब बोलते हैं। वह जैसी जगह थी, वहाँ जरा सा लिपस्टिक लगा लो, तो चार बात फैल जाती है। जरा सा स्लीवलेस पहन लो, तो मान लेते हैं कि आपने कुछ भी नहीं पहना है। साहिब, पढ़े लिखे हो। इतना तो समझो।'

डेविड ने फिर कहा, 'बता दो। कोई तो था। प्लीज। बता दो।'

'कोई नहीं था। हाँ, मेरी क्लास में एक लड़का था, जिसे बहुत पसंद करती थी मैं। उसके साथ रहना चाहती थी। एक बार उसका हाथ भी पकड़ा था। हम सब लोग पिक्चर देखने गए थे, तब। पर फिर कुछ भी नहीं हुआ था। वह अपने घर। मैं अपने घर। उसके बाद वह लड़का खुद ही दूर रहने लगा। शायद उसका कोई अफेयर था। बाकी किसी को देख लो, तो वह पसंद आ ही जाता है। ऐसा तो होता है। किसी को देखो, तो देखने को दिल करता है। पर ऐसे कई लोगों से तो बात भी नहीं हो पाई। शादी पार्टी में जाते थे हम लोग। तो ऐसा कुछ भी नहीं था रे। भरोसा कर।'

'है रे भरोसा। पर जो सुना, वही तो पूछा है। ये मत सोचना कि तेरा साहिब तेर्पे डाउट करता है।'

'नहीं, मैं नहीं सोचती ऐसा रे। पर अच्छा नहीं लगता, जब तू ऐसे सवाल करता है।'

पर डेविड का ज्ञान धीरे धीरे बढ़ता गया। कोई बेताल था, जो पीठ पर लदा था। बेताल आपका अतीत होता है। जब तक पेड़ पर टँगा रहे, आप खुश रहते हैं। जैसे ही पीठ पर आता है, दस सवाल पूछने लगता है। आप उसके सवालों के जवाब खोजने दौड़ते हैं, दौड़ते रहते हैं। वह आपको पस्त कर देता है। राजा विक्रम पागल हो गया था उसके पीछे दौड़ते दौड़ते। डेविड राजा विक्रम की संतति था। उसकी किसी पुश्त के लहू से निकला। अपनी पीठ पर बहुत भरोसा था उसको। ताकतवर थी। बेताल पेड़ पर टँगा था। गया, उसकी पूँछ खींच ली। बेताल पेड़ छोड़ उसकी पीठ पर आ लदा।

डेविड एक खेत था। लिहाफ ओढ़ा खेत। लिहाफ तले उसने कुछ बीज बिखेर रखे थे। लिहाफ के कारण अंदर गर्मास रहती थी। लिहाफ के बाहर पानी बरसता था, तो रिस रिस कर भीतर जाता था। जैसे स्पंज के भीतर पानी जमा होता है। जैसे ककड़ी के भीतर पानी रहता ही है। ककड़ी खाओ, तो मुँह पानी से भर जाता है। लिहाफ को दबाओ, तो पानी उलचने लगता है। जब पानी के साथ गर्मास मिलती है, तो बीज का मुँह खुल जाता है। डेविड शराब पीता था, तो उसके भीतर के बीज बोलने लग जाते थे।

डिंपा के पैदा होने के कुछ साल बाद उसकी माँ ने नौकरी शुरू कर दी थी। शिरपूर के समय से ही वह ट्रेंड नर्स थी। शिरपूर के एक अस्पताल में नौकरी करती थी, पर शादी के कारण उसे छोड़ना पड़ा था। शादी के बाद उसका बड़ा मन था कि कोई नौकरी करे। कुछ नहीं, तो पास के मांटेसरी में जाकर बच्चों को ही पढ़ा आए। डेविड को लगता था कि नौकरी के बारे में केवल तभी सोचना चाहिए, जब आपको पैसों की जरूरत हो। फिर भी कभी वह नौकरी के खिलाफ नहीं था।

डिंपा की माँ ने थोड़े हाथ पैर चलाए, तो उसे दादर के एक बड़े अस्पताल में नर्स की नौकरी मिल गई। उसे सिर्फ एक दो बार ही जाना पड़ा था। बटनवाला ने सिर्फ एक बार बोलने पर ही डेविड के साथ उसका रिश्ता मंजूर कर लिया था। जंबो सिर्फ आठ महीने ही डिंपा की माँ के पेट में रहा था। डॉक्टर ने बहुत दुखी होकर बताया था कि बहुत कमजोर पैदा हुआ है, समय पूरा नहीं कर पाया। कॉलोनी में उसे डिंपा की माँ के पति के रूप में जाना जाता था। डिंपा की माँ किसी भी घर में बेरोक टोक जा सकती थी। नाइटगाउन पहन कर भी। बाहर वाला कोई टोके, तो बात मजहब की हो जाती कि हमारे में तो ऐसा अलाऊड है। डेविड टोके, तो क्या साहिब, इतने भी पिछड़े मत बनो। कपड़ा तो है, पूरा बदन ढकता है। देखो, कुछ दिख रहा है क्या? चाहे शादी हो या पार्टी, डेविड और डिंपा की माँ साथ खड़े हों और कॉलोनी के लोग आ जाएँ जो वे डेविड से नमस्ते करते और फिर डिंपा की माँ से मुखातिब हो जाते। कोई घर आता, तो हॉल में बैठ कर डेविड से सबसे पहले यही पूछता, काय भाऊ? वहिणी कुठे? और जब वहिणी आकर हॉल में बैठ जाती, तो भाऊ की कोई बखत ही नहीं। जो आता, वो डिंपा की माँ से ऐसे बात करता, जैसे एक दो जन्मों की पहचान हो। कॉलोनी के गेट से बाहर निकलो, तो ऑटो वाले तैयार, डिंपा की माँ को बिठाने के लिए। आओ आओ भाभी। अच्छा, तो आज भाई साहब भी साथ में ही जाएँगे। भाभी भी बोले, हाँ न? क्यों, नहीं जा सकते क्या? बिरला गेट पहुँचो, तो भाजी वाले पहले ही बोलने लग जाएँ - भाभी, आज करेला मस्त...अ...आएला है। ले के जाओ। केले वाला दूर से ही आवाज लगाने लगे। साला, कई बार तो देखा है कि नईम केलेवाला पैसे ही लेने से मना कर देवे। आनंद कट पीस सेंटर में घुसो, तो काउंटर वाला तीन बार मुस्कराए देख कर। बोले सिंधी में - अचो सैहब, अचो। वंज, स्टूल खणी अच। बैठो भाभी। और भाभी भी पूछ लेवे - क्या जी, कैसी है थाईज अभी? अभी जास्ती तो नहीं दुखता ना? अब आनंद वाले की थाईज का दर्द इसको कहाँ से मालूम पड़ गया? आनंद वाला बोले - इधर तो दिखा नईं सकता, पन दर्द तो कम है। आप अच्छा दवा बताया था।

डिंपा की माँ से हर कोई बात करता है, डेविड से कोई नहीं करता। ऐसे ही थोड़े कोई औरत इत्ती फेमस हो जाती है?

ये सारे बीज खेत में बिखरे हुए थे। एक एक बीज अलग अलग, सोने के दाने की तरह। हर बीज का खेत के साथ एक अलग रिश्ता होता है। उसे बीज और खेत के सिवा कोई नहीं जान सकता। ऊपर से देखने में ऐसा लगता है कि हर बीज का खेत के साथ एक जैसा जुड़ाव है।

डेविड के दिमाग में घूमता रहता था एक एक बीज। एक एक वाकया। वह रस्ते भर डिंपा की माँ को छेड़ता रहता - 'क्या मैडम? बहुत चलती है आपकी तो? लीडर बन जाने का।'

और डिंपा की माँ खुश हो जाती। उसे लगता कि उसके पीआर ने आज फिर उसके पति को प्रभावित कर दिया है। वह और जोश से अपने पीआर को खाद पानी देती। डेविड को लगता, यह औरत बहुत बड़ी बेशर्म है। अब और चिढ़ा रही है। डिंपा की माँ डेविड के सामने नईम केलेवाले से दो मिनट और ज्यादा बात करती। बताती - ये मेरे मिस्टर हैं। नईम केलेवाला नमस्ते बोल कर फिर डिंपा की माँ की सेवा में लग जाता। आनंद वाला बोलता - अरे, बहुत हैंडसम हैं आपके मिस्टर। और डिंपा की माँ एक ऐंठ से भर जाती। डेविड को लगता - साला, दुनिया मानती है कि मैं इससे जास्ती हैंडसम है, यही नहीं मानती। फिर भी दस लोगों के मुँह लगती रहती है।

डिंपा की माँ बोलती - 'साहिब, तेर्को मेर्पे बहुत डौट होता रहेंगा न?'

साहिब बोलता - 'कायका डौट रे? ठीक है न।?'

'फिर कायको मेर्को ऐसा बोलता?'

डेविड मौन में चला जाता। एक ऐसी ढाल, जो तलवार टूट जाने के बाद काम में आती है।

शाम होने के बाद डेविड के मुँह से शराब की बास आने लगती थी। पहले वह घर में ही बैठ कर पीता था, अब बाहर पीता है। शराब की बास से डिंपा की माँ का सिरदर्द होने लगता है। डेविड सोचता है, बाहर से पीकर आएगा, तो घर आते आते आधा बास तो वैसे ही मर जाएगा।

उसने कई लोगों से सुना है कि डॉक्टर और नर्स के बीच खतरनाक रिश्ता होता है। कोई भी डॉक्टर अपनी नर्स को नहीं छोड़ता। उसने कई लोगों से सुना है कि कैसे सब्जी वाले घर के भीतर घुसते हैं और फिर घर बना कर रहने लग जाते हैं। कैसे लाइट फिटिंग करने वाले एक बार घर में आकर मरम्मत कर जाते हैं और कैसे उस घर की लाइट बार बार खराब होने लगती है। उसे उल्हासनगर की सिंधी औरतें याद आ गईं, जो पूरी दोपहर बॉलकनी में खड़ी रहती हैं। बाबू संपत ने बताया, तो उसको यकीन नहीं आया था - इन सबके मरद बिजनेस में जास्ती लगे रहते हैं, घर में कम ध्यान देते हैं। तो बेचारी दिन भर बालकनी में खड़ी रहती हैं और कोई जास्ती देर तक इनको टापे, तो घर में बुला लेती हैं। एक बार जाओ, तो बार बार जाने को मिलता है।

उसे बाबू संपत याद आने लगा। उससे छोटा है। ऑर्डर पर एसी ठीक करने जाता है। क्या एक से एक किस्से सुनाता है। विश्वास ही नहीं होता। कैसे एसी ठीक करने के बाद उसी घर में मजे करता है। बोला है, मेर्को ऑफिस में फोन आता है कि कल दोपहर को मेरा एसी खराब हो जाएँगा, आने का ठीक करने को। मेर्को क्या, मैं भी एड्रेस नोट कर लेता है। जाएँगा न, फुक्कट में मिलता है, कायको छोड़ने का? घिस थोड़े ई जाएँगा मेरा।

डेविड शराब पीता है और बाबू संपत की बातों पर सोचता है। डेविड शराब पीता है और नईम केलेवाले के बारे में सोचता है। डेविड शराब पीता है और डिंपा की माँ के बारे में सोचता है।

डिंपा की माँ सिर्फ छह महीने नौकरी कर पाई। छोड़ कर घर बैठना पड़ा। अस्पताल में बताने तक नहीं जा पाई कि क्या हो गया है और क्यों उसे नौकरी छोड़नी पड़ रही है। उसने डिंपा को डॉ. कस्बेकर का फोन नंबर दिया और कहा उनको बता देना, मैं दस पंद्रह दिन की छुट्टी पर हूँ। जास्ती मत बोलना, सिर्फ इतना ही।

लंबे समय के बाद उसके जीवन में ऐसी दोपहर आई थी। जब से वह जॉब करने लगी थी, उसकी दोपहर घर में नहीं होती थी। अस्पताल में ड्यूटी पालियों में होती थी, लेकिन उसे एक घंटे ट्रेन का सफर करना होता है और घर में छोटा बच्चा है, यह कह कर उसने मोहलत ले ली थी कि वह सिर्फ दिन में ही काम कर पाएगी। संडे के दिन घर में रहती थी। डिंपा के बाप से ज्यादातर शाम या सुबह ही मुलाकात हो पाती थी। बहुत दिनों से वह कुछ नहीं बोल रहा था, पर एक दिन डिंपा के बाप ने सुबह उसे लोकल नहीं पकड़ने दी।

वह नाइट शिफ्ट पर था और सुबह सात बजे घर पहुँचा, तो डिंपा की माँ तैयार हो रही थी। जब से वह नौकरी करने लगी थी, डेविड ज्यादातर नाइट शि¬फ्ट पर ही रहता था। दिन में डिंपा की देखभाल करता था। डिंपा की माँ के नौकरी पर जाने से डेविड ने बहुत खुशी जताई थी। उसे लगा था कि यह ज्यादा समय बाहर रहेगी, तो इसके बारे में बातें नहीं फैलेंगी। तब कॉलोनी के लोगों से इसका मिलना जुलना भी कम हो जाएगा। प्यार के नाजुक लम्हों में, जब उसकी आँखों की कोरें गीली होती थीं, वह कई बार डिंपा की माँ को समझा चुका है कि कॉलोनी में उल्टी सीधी बातें चलती ही रहती हैं। हर किसी के बारे में कुछ न कुछ बोला जाता है। एक बार वह सावंत की लड़कियों के बारे में कहने लगा। अभी उमर ही क्या है उनकी? कैसी कैसी बातें कही जाती हैं उनके बारे में? बड़ी वाली को तो कई लोगों ने बैठी चॉल के पीछे लड़कों के साथ देखा है - अजीब हालत में। उसकी माँ के बारे में भी सुना है न कि दीनानाथ कांबले के साथ चिपकी रहती है। बेचारा विजू सावंत, आईचा नंदी बैल है। पीछे बीवी तो गुल खिलाएगी ही।

'हाँ, करमरकर की बीवी के बारे में भी ऐसा ही बोलते हैं सब लोग।'

'पता नहीं, तुझसे मिलने आती है वो तो।'

'नहीं, लोग बोलते हैं कि वो तुमसे मिलने आती है, साहिब।'

'क्या बोलना चाहती है तू कि मैं उसको लेकर घूमता हूँ?'

'मैंने तो ऐसा नहीं कहा, लोग बोल रहे थे, तो तुमको बता दिया। मुझे सलाह दे रही थीं कुछ बुजुर्ग औरतें कि करमरकर की बीवी को ज्यादा घर में मत आने दिया करो। वह मर्दों को फाँस लेती है।'

'और तूने सलाह नहीं मानी?'

'मैं क्या बोलती?'

'मुझे भी बहुत सारे बुजुर्ग सलाह देते हैं कि डिंपा की माँ सबके साथ हँस हँस कर बातें करती है, श्री.पु. जोशी के साथ घंटे घंटे लाइट के खंभे के नीचे खड़ी रहती है। उसको पता होता है कि आनंद कटपीस सेंटर वाले की जाँघ में चोट लगी है। पता नहीं कब देख ली उसने उसकी जाँघ? नईम उससे पैसे नहीं लेता। भाजी मार्केट में वह लड़कों को देखती रहती है केवल। मैं क्या बोलूँ उनको?'

'मुझे नहीं पता, मेरे बारे में ऐसा बोलते हैं। मैं तो सबसे ही बात करती हूँ। जो मिल जाता है, उससे। आनंद वाले को चोट लगी थी, तो उसको एक दवा बता दी थी मैंने। बस। मेरा नेचर ही ऐसा है, मैं सबसे मिलती हूँ। बात करती हूँ। वे लोग भी मुझसे बात करते हैं। पर इसका मतलब यह तो नहीं कि मैं खराब औरत हूँ।'

'हाँ, तो मैं भी यही सोचता हूँ, पर लोगों का मुँह बंद करते बैठने से तो अच्छा है कि अपन अपने नेचर को बदल डालें। किसी को बोलने का मौका ही नहीं देने का।'

उनमें देर तक बात होती रही। कई दिनों बाद डिंपा की माँ को ऐसा लग रहा था कि साहिब सच में बहुत समझदार है। वह बात को गंभीरता से लेने लगा है। शक ऐसी बीमारी है, जिसके बारे में बात करना भी अब अच्छा नही लगता। इसे बातचीत और आपसी समझ विश्वास से ही दूर किया जाता है, साहिब यह बात समझ ले, तो अच्छा होगा। साहिब मुझ पर इतना शक करता है, लेकिन इसके बारे में क्या कम बोला जाता है। अभी उसी दिन जोशी भाई साहब बोल रहे थे कि डेविड को समझाओ जरा, वह काम पर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहा। उसका मन कहीं और लगा हुआ है। शराब भी बहुत ज्यादा पीने लगा है। काम पर भी पीकर ही आता है। यूनियन है, जिसके कारण कोई कुछ नहीं कर रहा, वरना किसी दिन मुश्किल हो जाएगी। करमकर की बीवी जब घर में आती है, तो उसी को देखता रहता है। उसके आगे पीछे घूमता रहता है। एक बार करमकर की बीवी घर में आई। लो कट गले का सूट पहन रखा था। कैसे उचक उचक कर उसके गले में देख रहा था मैंने टोका भी था - काय हो? खरगोश खोज रहे हो क्या? कैसे सकपका गया था। इधर उधर देखने लगा था।

साहिब को लग रहा था कि डिंपा की माँ सब कुछ समझती है। उसको पता है कि उसका स्वभाव ही ऐसा है, जिसके कारण चार लोगों को शक होता है। अगर डिंपा की माँ उसकी बातों का अर्थ समझ ले, तो दिक्कत ही नहीं होगी। वह क्यों फिजूल में लोगों से बातें करती रहती है, लोगों को बातें बनाने का मौका देती है। जोशी के साथ खंभे के नीचे खड़ी थी, तो कई लोग अपनी बाल्कनी में खड़े होकर देख रहे थे दोनों को। कैसे हँस हँस कर बात कर रही थी। बीच बीच में ताली मार रही थी उसके हाथ पर। बिरला गेट पर भी इसके बारे में कुछ न कुछ बोला ही जाता है।

पर उस दिन डिंपा के बाप ने उसे ऑफिस ही नहीं जाने दिया। उस दिन हल्की सी ठंड थी। धूप थोड़ी देर से आई थी। डिंपा की माँ बरामदे में गीले कपड़े डाल रही थी। चिड़ियाँ खूब बोल रही थीं। वह डिंपा को बुला कर चिड़ियों को शोर करता दिखा रही थी। कभी एक चिड़ियाँ उड़ कर कुर्सी के पास आ जाती, तो अचानक कई सारी चिड़ियाँ उड़ कर ऊपर की ओर जातीं। डिंपा उन्हें देख चिल्ला रहा था - चिऊताई... चिऊताई... ये माइया घरात... चिऊताई... चिऊताई... ये तुला मी तांदूला देईन...

तभी धड़धड़ाता हुआ डेविड आया। आते ही सनक गया।

तू दिन में खाना कहाँ खाती है?

अस्पताल में। डब्बा लेकर जाती हूँ न मैं।

अस्पताल में किसके साथ?

अरे, स्टाफ रहता है साथ में। कैंटीन है

नहीं, कस्बेकर के साथ खाती है तू।

वो तो एक ही दिन खाया था। उसका डब्बा नहीं आया था घर से, इसलिए मैंने पूछ लिया कि खाओगे क्या? बोला हाँ, तो उधर ही बैठ कर खा लिया।

एक ही दिन? रोज खाती है तू उसके साथ। तेर्को क्या लगता है, मेर्को कुछ भी मालूम नहीं पड़ेगा क्या?

और उसके बाद दोनों में फिर हो गई। ऐसे माहौल में संवादों को कोई महत्व नहीं होता। किसी भी भाषा में कहे जाएँ, सबका असर एक सा पड़ता दिखता है। दोनों की जुबान लाल मिर्च की नोंक जैसी हो जाती थी। उस दिन जो लड़ाई हुई कि बाप रे बाप! अक्खी कॉलोनी सहम गई॥ उनके घर की दीवारें उड़ गईं। दरवाजे टूट कर बिखर गए। दीवार पर लगा पलस्तर पपड़ियों में तब्दील होकर फर्श पर झरने लगा। पहले चूना फैला, फिर मिट्टी और उसके बाद बहुत तेज हवा आई, जिसमें पहले उनकी छत उड़ी, फिर फर्श पर पड़ी मिट्टी और उसके बाद पूरी फर्श ही उड़ गई। वह जमीन इतनी बेतरतीब और नालायक लग रही थी कि वहाँ अरसे से कुछ रहा ही न हो। लादियों पर बने गुलाबी फूल सूख गए। एक एक पंखुड़ी बह कर पूरी कॉलोनी में फैल गई। खिड़कियों के पल्ले पहले जोर से टकराए, फिर ऐसे लड़े, जैसे किसी ने पीछे से गरदन पकड़ उन्हें भिड़ा दिया हो। फिर अचानक खिड़की उछल कर दूर जा गिरी। दरवाजे खौफ में दीवारों और चौखटों का साथ छोड़ भागे। चार आठ दीवारों के पीछे जो कुछ बंद था, दीवारों के हट जाने के कारण एक अजीब सी नंगई में आ गया।

जैसे पानी के फव्वारे उछलते हैं और आसमान को छूने की जिद करते हैं, गालियाँ निकल रही थीं और आसमान की ओर फूहड़ तरीके से दौड़ रही थीं। हर गाली, पिछली से आगे निकलने की गलाकाट होड़ में थी।

एक बार फिर डिंपा की माँ पस्त हाकर जमीन पर पड़ी थी। डेविड के हाथ में कैंची थी। वह उसे डिंपा की माँ की आँख में भोंक देना चाहता था। उसके पेट में डाल देना चाहता था। उससे उसके शरीर के खास अंगों को चीर कर दो फाँक कर देना चाहता था। डिंपा की माँ बार बार बच रही थी। डेविड ने उसके कमर तक लहराते बालों के बीच कैंची खुभो दी और झटके से बाहर खींची। एक बड़ा से गुच्छा जमीन पर बिखर गया। डेविड की कैंची चलती रही। जमीन बालों से पट गई। डिंपा की माँ के बाल कट गए। इतने छोटे कि वह खुद भी आईने में अपना चेहरा देखे, तो न पहचान पाए। कहीं से छोटे, कहीं से बड़े। कहीं सिर की चमड़ी झलकती, तो कहीं कानों तक लटकती लट झूल रही होती। जैसे तूफान के बाद दाँतों में धूल का आभास होता है, आँखों में किरकिर कुछ बजता रहता है, कानों की लौ मिट्टी में सराबोर होती है, और उँगलियाँ आपस में रगड़ो, तो कणों की खरखराहट रूह को खरोंच जाती है, वैसे ही डिंपा की माँ के पूरे शरीर में होने लगा। उसे लगा, वह बाल झड़े खजुआ कुत्ते की तरह हो गई है, जिसके शरीर के बचे खुचे बाल दूसरे कुत्तों के साथ लड़ाई के कारण जगह जगह से नुच गए हैं। उसके पीछे से जख्म झाँक रहे हैं और उन पर मक्खियों ने बुरी तरह हमला कर दिया है। उसके शरीर में इतनी भी ताकत नहीं बची कि अपनी पूँछ हिला कर वह मक्खियों को भगा सके।

उस घर में दीवारें नहीं बची थीं। दरवाजे, खिड़कियाँ नहीं बचे थे। छत और फर्श भी नहीं थी। सोफे, पलंग, मटके, टेबल, गिलास और थाली की आड़ में ही जाना था। डिंपा की माँ उठ नहीं पा रही थी। उसने महसूस किया, उसका पेटीकोट गीला हो चुका था। गीलेपन ने उसके दर्द को और बढ़ा दिया। उसे लगा, न केवल दीवारें, दरवाजे बल्कि उसके शरीर का हर कपड़ा उड़ कर दूर जा गिरा है। पूरी कॉलोनी उसी को घूर घूर कर देखे जा रही है। वह अपने कटे हुए बालों की आड़ लेकर छुपने की कोशिश करने लगी। वह घुटने दबा कर अपना जिस्म मोड़ रही थी, जैसे गोल कर सिर और घुटने ेक बीच सरका देगी। उसका पूरा शरीर काँप रहा था। बचपन में उसने एक मरती हुई गौरैया पर मग्गे से पानी डाल दिया था। वह ऐसे ही काँप रही थी उस वक्त। गौरैया की आँख से चींटियों की पूरी कतार बाहर निकल रही थी। सबकी आँखों में चींटियाँ रहती हैं। जब वे गीले होकर मर जाते हैं, चींटियाँ उनकी आँखों से निकल कर चली जाती हैं, किन्हीं और आँखों की तलाश में। डिंपा की माँ की आँखों में खुजली होने लगी। उसे जमीन पर कतार बाँध कर चलती चींटियाँ साफ दिख रही थीं।

डेविड की कैंची दूर छिटकी पड़ी थी। वह आसपास कहीं नहीं था। डिंपा की माँ के नथुनों में उसकी बदबू बसी हुई थी। दरवाजे पर जहाँ तोरण टँगे हुए थे, वे वहाँ नहीं थे। वहाँ गालियाँ किसी धागे में गूँथ कर टँगी हुई थीं। डेविड ने सिलबट्टे के बीच रख कर डिंपा की माँ को पीस दिया था। उससे जो रस निकला था, उसकी अल्पना बना कर उसने द्वार की सजावट की थी। जो रस बच गया था, उसे कॉलोनी की तरफ उलीच दिया था।

पीछे दूसरे कमरे के दरवाजे के पास खड़ा डिंपा रो रहा था। वह बुरी तरह डरा हुआ था। वह किसी श्मशान में पड़ी थी। आसपास दुखी पिशाचिनियों की सिसकियाँ थीं बस, जो कानों तक आने से पहले मद्धम हो जाती थीं।

डिंपा की माँ ने एक सपना देखा था। कोई लड़का है, जो पेट के बल लेटा है। उसके हाथों में एक किताब है। मगरमच्छ की तरह लेटा वह अपने कंधे उठाए है। कोहनियों के बल पर टिका है। किताब में आँखें धँसाए है। उसका पेट निकला हुआ नहीं है। उसका रंग क्या है, उसे याद नहीं। उसने क्या पहन रखा है, यह भी उसकी नींद में खो गया। उसने उस लड़के से कोई बात की थी, वह लड़का पलटा था और उठ कर उसकी ओर आया था। उसने क्या कहा था, शब्द नींद की किसी अबोध करवट में दब गए थे। वह उठी थी, तो उसे अपने बिस्तर पर पिसे हुए शब्द और एक आकृति मिली थी, जिसे लाख कोशिश के बाद भी वह पहचान नहीं पाई थी।

जब वह उठी, तो उसके शरीर को किसी ने आटे की तरह गूँद दिया था। वह कितनी सदियों से सो रही है। उसे बिलकुल भान नहीं कि इस बीच दुनिया में क्या हो गया है। नींद में ही उसने खुद को कई हिस्सों में बाँट दिया। उसमें से एक हिस्सा निकला और उसने दरवाजे की शक्ल ले ली। और जाकर एक ओर खड़ा हो गया। एक और अंग निकला, खिड़की बन गया। उसने अपने बदन से खाल उतारी और जमीन पर बिछा दी। फिर देर तक रोती रही, आँसुओं को लकड़ी की एक कलम में भर कर अपनी खाल पर चित्र बनाने लगी। उस चित्रा में एक फूल था, कुछ पत्तियाँ, दूर कुछ पहाड़ियाँ थीं और उनके पीछे से निकल रहा सूरज था। सूरज के मुँह पर चिड़ियाँ उड़ रही थीं। उसने जमीन पर पड़े बालों को बुहारा और उनमें से कुछ बाल लेकर चिड़ियों के इर्दगिर्द रख दिया। चिड़ियों को काले पंख मिल गए थे। अब वे उड़ रही थीं। उड़ते उड़ते उन्होंने आवाज नहीं की। डिंपा की माँ ने उनसे आवाज न करने की गुजारिश की थी। उस चित्र में उसने एक गुड़िया के बाल उसकी कमर से नीचे तक जाते थे। किनारे पर एक बिल्ली बनाई और गुड़िया बनाई और अपने नुचे हुए बालों को उसके सिर पर लगाया। इस तरह गुड़िया बहुत सुंदर बन गई। गुड़िया के बालों से रबर निकाल कर बिल्ली के नाखून घिस दिए। फिर अपने छह बाल उठा कर बिल्ली के मुँह के दोनों ओर रख दिए। बिल्ली को मूँछ मिल गई थी। उसकी मूँछ खूँखार शेर से बड़ी थी, लेकिन उसके पास नाखून नहीं थे। इस तरह उसने अपनी खाल से फर्श बनाई। फिर उसने अपने हाथों को काट कर अलग कर दिया। उन्हें किसी रोल की तरह खोलने लगी। उसे दीवारें भी बनानी थीं। इस वक्त वह बिन दरवाजे, दीवारों, खिड़कियों के मकान में थी, जिसके ऊपर छत तक नहीं थी और फर्श भी नहीं। उसने अपने टुकड़े टुकड़े करके घर को पूरा बनाया। वही दीवार थी, दरवाजा भी वही।

फिर उसने अपनी आँखों को निकाल कर दीवार पर दे मारा। उससे एक आईना बन गया। उसने आईने में खुद को देखा। सामने डिंपा की काली माँ खड़ी थी, जिसका रंग कुछ समय पहले तक सफेद था। उसका साहिब बहुत बड़ा रंगरेज है। उसे अपनी मर्जी का रंग पहना देता है। आईने में जो सामने खड़ी थी, उसने कोई सपना नहीं देखा था।

जब वह छोटी थी, तब से उस युवक का सपना देखती थी। जब उसकी शादी हो गई, तो उसे वह सपना आना बंद हो गया। शादी के बाद एक बार उसने डेविड को बताया था कि मुझे वह सपना हमेशा आता था, लेकिन अब नहीं आता। डेविड ने मुस्कुराते हुए कहा था कि वह लड़का अब सपने से निकल कर उसके जीवन में आ गया है, उसकी तलाश पूरी हो गई है, तो फिर भला वह सपने में क्यों आने लगा? डिंपा की माँ ने कभी इस तरह से सोचा भी नहीं था। सपने का रहस्य बहुत अलग तरह से उसे समझ में आया। क्या वह कोई परी थी, जिसे सपने में आकर दिखाया जा रहा था कि दुनिया में कोई है, जो तेरा इंतजार कर रहा है? कोई है, जो उठ कर तेरे पास तक आएगा, और तुझसे खूब प्यार करेगा। कि उसके बाद तुझे किसी चीज की जरूरत नहीं होगी।

डेविड ने कहा, तू उस लड़के के पास नहीं गई थी, वह लड़का तेरे पास आया था। मैं आया था न तेरे पास, तेरे भाई के जरिए। तुझसे हाथ माँगा न मैंने? अगर तू मेरे लिए नहीं बनी होती, तो भला एक बार में ही क्यों मान जाता तेरा भाई? ऊपर वाला जोड़ी ऐसे ही बनाता है। कोई सोच सकता है कि मैं इतना हैंडसम, तू... मतलब... उतनी नहीं, फिर भी तुरंत हो गई शादी। इसी को बोलते हैं कि जोड़ी यहाँ नहीं, वहाँ से बनके आती है।

और दोनों इस बात से इतना भावुक हुए थे कि आने वाले संडे को दोनों हाथ में कैंडल लेकर कल्याण के सेंट जोसेफ चर्च गए थे, जीसस का शुक्रिया अदा करने। वहाँ एक तस्वीर में मैरी जीसस को गोद में लेकर खड़ी है। मैरी के चेहरे पर मातृत्व की प्रसन्नता है। पर ध्यान से देखो, तो ऐसा भी लगता है कि मैरी अभी बिलखने लगेगी। कोई कैसे एक ही वक्त में खुश भी हो सकता है और दुखी भी, मैरी बता रही थी। डिंपा की माँ ने मैरी की गोद देख कर अपने बारे में उससे कुछ कहा था।

जो रिश्ता ऊपर वाले ने बनाया था, जिसके कारण एक ही बार में बटनवाला ने हाँ कर दी थी, वह रिश्ता आज इतना नापाक हो गया था कि डेविड कह रहा था - तेरा तेरे भाई के साथ ही चक्कर था। वह तुझे किसी के मत्थे करना चाहता था और वो मैं निकला। तभी एक बार में ही मान गया था वो। तूने आठवें महीने में ही बेटा जन दिया था और उसे लेकर भी गया तेरा भाई। भांजे को नहीं, अपने पाप को लेने आया था वो।

डिंपा की माँ कागज की तरह हो गई थी। डेविड की कैंची उसके पेट से आरपार निकल गई। वह चिंदियों में तब्दील हो गई। उसने अपना सिर झटका और वापस पलंग पर ढह गई। पता नहीं, कितनी देर तक वह वैसे ही पड़ी रही। घर में कोई नहीं था। डेविड तब का गया है, डिंपा को दीनानाथ कांबले की वाइफ ले गई। वह चाहती भी थी कि कम से कम डिंपा यहाँ न रहे। वह चाहती थी कि कोई भी न रहे। उसके घर में हर कोई देख रहा है। उसका घर एक स्टेज में तब्दील हो गया है, ऊँचाई पर है। चारों ओर लोग गोल बना कर खड़े हैं। उसे नंगा देख रहे हैं। कागज की नाव और हवाई जहाज बना कर उसकी ओर उछाल रहे हैं।

बाहर अँधेरा हो गया था। उसने घर के भीतर कोई बत्ती नहीं जलाई है, फिर भी रोशनी बहुत है। उसने देखा, उसी के शरीर से निकल रही है रोशनी। पूरी कायनात को उसका शरीर रोशनी दे रहा है। क्या बिसात है उसकी, एक बुझा हुआ दिया तो है, पर रोशनी फेंकता हुआ बुझा हुआ दिया, जिसे किसी ने लहू से जलाया है।

वह उठी। आईने के सामने गई। खुद को देखा नहीं जा रहा। कितनी बेढब लग रही है। जिन बालों पर परफ्यूम छिड़क कर डेविड सूँघा करता था, उन बालों को कैसे काट डाला उसने? एक लट अभी भी साबुत बची थी। डिंपा की माँ ने माप कर देखा, वह हिप्स के बीच गटरलाइन तक जाती थी। उसके सारे बाल वहाँ तक पहुँचते थे। सब उससे लंबे बाल का राज पूछते थे। बटनवाला उससे जब लड़ता था, धमकी देता था कि तेरे बाल काट दूँगा। जब वह छोटी थी, तो एक बार बटनवाला ने कैंची दिखाते हुए कहा था, आज तू सोई और मैंने तेरे बाल काटे। डिंपा की माँ सो ही नहीं पाई थी। उसने सारे बालों को इकट्ठा कर गोल बना दिया था और उसे स्कार्फ में समेट लिया था। बार बार आँखें खोल कर देखती कि जॉन कहीं आ तो नहीं गया कैंची लेकर? कई रातें उसने बालों के कट जाने के खौफ में बिताई थीं। बटनवाला उसे देख कर हँसता रहता। बार बार कैंची की याद दिलाता। एक दिन बटनवाला उसके लिए दो लीटर का शैंपू का पैक लेकर आया। एक बार बीयर की दो बोतल देकर गया और बोला, इससे शैंपू से भी अच्छे धुलते हैं बाल। एक बार उसके लिए रोलर कैंची, ड्रायर और अलग अलग रंगों के कई रबर बैंड देकर गया। तब डिंपा की माँ का खौफ थोड़ा कम होना शुरू हुआ। उसने काफी समय बाद बीयर का इस्तेमाल किया, क्योंकि उसे डर लगा था कि यह कोई दवा है, जिसे लगाया, तो बाल साफ हो जाएँगे।

उसने लंबी बची उस इकलौटी लट को गोल किया और एक स्कार्फ में समेट लिया। स्कार्फ सिर के चारों ओर लिपटा हुआ था। वह किसी नन की तरह लग रही थी। नन के चेहरे पर हमेशा अवसाद की लकीरें होती हैं। अवसाद गांभीर्य देता है। वह बताता है कि लौकिकता से अब इन चेहरों का कोई लेना देना नहीं। यह अवसाद ही इन्हें दूसरी दुनिया में ले जाएगा। डिंपा की माँ ने मन ही मन अवसाद के लिए प्रार्थना की। उसने अपना चेहरा पकड़ा और निचोड़ दिया। जो पानी निकला, उसे एक तश्तरी में रख दिया। धीरे धीरे यह पानी नमक के एक पहाड़ में बदल जाएगा। उसने अपने जीवन का नमक वहाँ रख दिया है।

स्कार्फ पहन कर वह बरामदे में गई। चारों ओर अँधेरा था। आज तो कोई स्ट्रीट लाइट भी नहीं जल रही। उसे नीचे कुछ भी नहीं दिखा। उसने चालीस वाट वाला बल्ब जलाया। नीचे सारे बाल बिखरे हुए थे। सब मर गए थे। किसी ने उठ कर यह नहीं कहा - उठाओ हमें, अपने सिर में रोप लो। ऐसे रोपो कि कोई कैंची कामयाब न हो पाए। उसने झाड़ू उठाई और सबको एक झटके में बुहार दिया। वह जल्दी जल्दी यह मंजर साफ कर देना चाहती है। इस तरह कि एक बाल भी न हो। दुनिया मुझे ढूँढ़े मगर मेरा निशाँ कोई न हो।

डेविड और डिंपा की माँ में इससे पहले भी कई बार झगड़े हुए थे, लेकिन इस झगड़े ने गहरा असर छोड़ा था। सबसे बड़ा असर उनके बेडरूम में पड़ा था। इससे पहले भी कई बार झगड़े हुए थे, लेकिन दोनों कभी अलग नहीं सोए थे। पलंग एक ही रहता था। वे लड़ते, झगड़ते, एक दूसरे का खून पीने को उतारू रहते, पर रात गहराती और जब आँखें बगावत करने लगतीं, तो एक ही बिस्तर पर धँसते थे। और नींद की ही किसी अनजानी करवट में कब वे दोनों एक दूसरे से चिपके होते, दोनों को नहीं पता चलता। वे मानते थे कि नींद में वे एक दूसरे के करीब हो जाते हैं। डेविड फिर कहता, देखा न, एक दूसरे के लिए ही बने हैं हम। तू जागते में कितना भी लड़, नींद तो निर्दोष होती है। उसमें हम क्यों करीब आ जाते हैं फिर? वे एक थाली में नहीं खाते थे, एक ही बाथरूम में एक साथ नहीं जाते थे, पर एक साथ न होकर भी एक दूसरे का साथ महसूस करते थे।

इस झगड़े के बाद डिंपा की माँ ने दो पलंगों को जोड़ कर बनाए गए डबल बेड को अलग अलग कर दिया। बीच में चार फुट का गैप। निर्दोष नींद न पाट सके, इतना गैप। अब कोई जाग कर ही इतनी दूर आ सकता है और किसी की जाग में जब इतना जहर भर गया हो, तो नींद भी निर्दोष कहाँ रह जाती है?

डिंपा की माँ ने घर के भीतर ही बँटवारा कर दिया था। अगर कोई एक चीज दोनों की साथ थी, तो वह था साथ में खाना पकना। पूरे परिवार के लिए डिंपा की माँ ही खाना बनाती थी। बाद के दिनों में जब जंबो उनके साथ रहने आ गया था, तब खाना बनाने और घर को साफ करने की जिम्मेदारी उस पर आ गई थी, पर उसमें बहुत समय था। डिंपा की माँ के सिर पर हमेशा स्कार्फ बँधा रहता था। काले रंग के बदन पर टँगे काले चेहरे के ऊपर काले नुचे बालों को छिपाता हुआ काला स्कार्फ। उस स्कार्फ के साथ ही वह बाथरूम में घुसती थी, उसी स्कार्फ के साथ ही वह बाहर निकलती थी। डेविड चाह कर भी नहीं देख पाया कि उस स्कार्फ के नीचे क्या था। दोनों में बातचीत तो वैसे भी होती नहीं थी, सिर्फ इशारों में ही होता था। डिंपा पुल था। डिंपा, जाकर बाप को बोल दे, उसका खाना थाली में लगा पड़ा है, किचन से जाकर उठा लेवे। और डिंपा की माँ अपनी थाली लेकर बेडरूम में चली जाती थी। पहली पलंग से चार फुट दूर रखी दूसरी पलंग पर बैठ कर खाती थी। एक बार डेविड ने चार फुट पहले रखी पहली पलंग पर बैठ कर खाने की कोशिश की, तो डिंपा की माँ अपनी थाली लेकर बरामदे में चली गई। डेविड थाली लेकर वहाँ भी चला आया, तो डिंपा की माँ ने थाली उठा कर कौओं के सामने फेंक दी। उसने आलमारी से अपने कपड़े भी अलग कर दिए थे। पहले डेविड बाथरूम में घुसता था, तो उसे वहाँ अपनी अंडरवियर, तौलिया टँगे हुए मिलते थे। वह अपनी गीली अंडरवियर बाथरूम के फर्श पर ही पड़ी छोड़ कर चला जाता था कि उसके जाने के बाद डिंपा की माँ उसे उठा लेगी और धोकर बरामदे में सूखने को टाँग देगी। उस दिन ऐसा हुआ कि डेविड नहाने के लिए बाथरूम में घुसा, पर उसके पास तौलिया नहीं था, अंडरवियर भी नहीं। उसने ध्यान नहीं दिया। जाने की जल्दी में फटाफट पानी डाला और अंडरवियर गीली लेकर साइड में गिरा दी। तब उसका ध्यान गया कि कल की अंडरवियर अभी तक वहीं गिरी पड़ी है। उसे उस दिन बिना अंडरवियर पहने ऑफिस जाना पड़ा। एक दिन उसके पेट में बहुत दर्द हुआ और वह दर्द से चिल्लाता रहा। पर डिंपा की माँ अपनी जगह से नहीं उठी, तो नहीं उठी। चार फुट दूर रखी अपनी पलंग पर बाइबल पढ़ती बैठी रही। डेविड में हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह उठ कर किचन तक जाए और वहाँ आलमारी में रखी अपनी दवा ले आए। उसने डिंपा को आवाज दी। डिंपा के लिए वह आलमारी ऊँची थी। उसने स्टूल लगा कर वहाँ तक पहुँचने की कोशिश की, पर दवा क्या उतार पाता, खुद ही गिर गया। उसकी पें पें ने डेविड के पेट का दर्द और बढ़ा दिया। वह उठ कर गया। डिंपा की ठुड्डी फट गई थी। उसको स्कूटर पर बिठा डॉक्टर के पास ले गया। तीन टाँके आए डिंपा को। वहीं से डेविड ने अपने लिए भी दवा ली और घर आया। देखा, डिंपा की माँ बिल्कुल नया गाउन पहन कर बरामदे में खड़ी थी। वह गाउन डेविड खरीद कर लाया था और डिंपा की माँ ने कहा था वह गाउन अपनी शादी की सालगिरह पे पहनेगी। डेविड को बहुत बुरा लगा। डिंपा माँ को बाहर खड़ा देख रोने लगा। जाकर अपना टाँका दिखाने लगा। डिंपा की माँ ने उसे झिड़क दिया और भीतर भेज दिया। भीतर घुसते वक्त डेविड उसके पास थोड़ी देर तक खड़ा रहा कि वह कुछ बोलेगी या पूछेगी, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। वह झुटपुटे को देख रही थी या हवा को, नहीं पता। लेकिन वह जिस ओर देख रही थी, उस ओर डेविड का चेहरा नहीं दिख सकता। थोड़ी देर बाद डिंपा ने उससे कहा कि होमवर्क करा दो, तो डिंपा की माँ ने जवाब दिया - हट जा, नहीं तो जान ले लूँगी तेरी। और इतनी जोर का धक्का दिया कि डिंपा पीछे दीवार पर जाकर टिका। इतनी जोर से रोया कि पेट दर्द से जूझ रहे डेविड ने पलंग के नीचे पड़ा गिलास खींच कर डिंपा की माँ को दे मारा। गिलास डिंपा की माँ की बाँह पर आकर लगा। फिर जमीन पर आवाज करते हुए डोलने लगा। डिंपा की माँ ने अपनी बाँह देखी और शोर करते डोलते गिलास को। फिर गिलास उठाया और किचन की तरफ जाने लगी। अचानक क्या सूझा कि पलटी और खींच कर गिलास डेविड को दे मारा। वह पहले लेटे हुए डेविड के पेट पर गिरा और उछल कर दीवार से टकरा कर चिंचियाया। डेविड ने सपने में भी नहीं सोचा था कि गिलास इस तरह उसके पास लौट कर आएगा। वह बुरी तरह डर गया। इससे पहले कि कुछ करता, उसने देखा, डिंपा की माँ दौड़ कर किचन में जा रही है। उसने वहाँ जाकर दरवाजा बंद कर लिया। डेविड उसी तरह बिस्तर में पड़ा कराहता रहा।

डिंपा की माँ ने एक दिन सोनी ब्यूटी पार्लर वाली को घर में बुलाया। डिंपा की माँ के चेहरे पर चोट के दाग अभी भी थे। सोनी वाली ने उसके चेहरे की सफाई करनी थी। डिंपा की माँ ने अपने शरीर के बाल भी साफ कराए। उसने सोनी वाली के सामने स्कार्फ खोला। जब सोनी वाली गई, तो स्कार्फ फिर अपनी जगह बँधा हुआ था। डिंपा की माँ ने सिर मुँड़ा लिया था। पति के जीते सिर मुँड़ा लिया था। उससे पहले जो स्कार्फ वह बाँधती थी, तो अपने सिर पर बचे बेतरतीब बालों को छिपाने के लिए, पर अब जो स्कार्फ बँधा था, वह मुँड़े हुए सिर को छिपाने के लिए था। सोने वाली जाते जाते अपने साथ सारे बाल भी ले गई थी। उस दिन जमीन पर बिखरे पड़े बालों को डिंपा की माँ ने गोलिया कर एक पॉलीथिन में रख दिया था। फिर कभी उस ओर पलट कर भी नहीं गई। अगर कभी गलती से उस पॉलीथिन की तरफ निगाह चली भी जाती, तो तुरंत कहीं और देखने लग जाती।

डिंपा की माँ के जीवन में ठहराव आ गया था। उसे इस वक्त उस लड़के की याद आने लगी, जिसे वह शादी से पहले पसंद करती थी। वह अगर उसके साथ रहती, तो क्या जिंदगी का रूप कुछ और होता? पिछली बार जब दादा आया था, तो बता रहा था कि वह लड़का अमेरिका चला गया है। उसने अभी तक शादी नहीं की थी। दादा को पता था कि छकुली उस लड़के से प्यार करती है, पर उसने यह भी कह दिया था कि वह लड़का कभी भी छकुली से शादी नहीं करेगा, क्योंकि वह जिस खानदान से था, वहाँ कभी अपनी जात के बाहर शादी नहीं हुई है। वह ब्राह्मण लड़का था और डिंपा की माँ के क्लास में ही था। डिंपा की माँ जब इंदौर से शिरपूर आ रही थी, तो सेंधवा में मिला था पहली बार। शिरपूर का ही था। डिंपा की माँ उसके साथ काफी आगे बढ़ चुकी थी, जब दादा ने आकर उसे डेविड की तस्वीर दिखाई थी। दादा ने घंटों उसे समझाया था, तब उसने हाँ कर दी थी। एक संडे को उन्होंने चर्च में जाकर छकुली और डेविड की शादी कर दी। हफ्तों बाद तक उस लड़के को पता नहीं चल पाया था कि छकुली की शादी हो गई है। शादी के कुछ दिनों बाद ही दादा ने उसे बाजार में मारा था। दादा जब भी कॉलोनी में आता, डिंपा की माँ कुरेद कुरेद कर उसके बारे में पूछती है। दादा टालता रहता है, लेकिन छकुली को पता है कि जो बात दादा नहीं बताना चाहता, उसे कैसे उसके मुँह से निकाल ली जाए। दादा ने एक बार कहा था कि अगर मुझे पता होता कि वह तेरे लिए इतना मरता है, तो मैं कभी तेरी शादी डेविड के साथ नहीं करता। एक बार वह लड़का मेरे कारखाने में आया था, जब मैंने उसे मारा था उसके बाद। सिर्फ इतना बोला था, छकुली तेरी बहुत इज्जत करती थी। बोलती थी, तेरी किसी बात को नहीं टाल सकती। तूने बोला होगा उसको शादी करने को, तो उसने किया होगा। पर वो मुझको कभी भूल नहीं पाएगी। बटनवाला, तू जानता है न, मैं क्या हूँ, मेरा बाप क्या है, तेरे बटन कारखाने के साथ तुझको उठवा दूँ तो कोई घंटा भी नहीं उखाड़ सकता मेरा... पर ऐसा करके कोई फायदा नहीं। तुझे जो नुकसान करना था, कर दिया तूने। तूने मेरा नहीं, अपना बहन का नुकसान किया है बटनवाला...

दादा जब यह बात बता रहा था, तो रोने लगा था। वह बता रहा था कि वह लड़का किस तरह रो रहा था। रो रो कर कह रहा था। दादा को लगा था कि वह धमकी देने आया है उसके कारखाने में, पर वह तो बुरी तरह रोने आया था। उस दिन दादा को बहुत दुख हुआ था उसके रोने पर। उसके बाद जब धीरे धीरे वह डेविड और डिंपा की माँ के झगड़ों के बारे में जानने लगा, तो उसे हमेशा उस रोते हुए लड़के का ख्याल आता और वह खुद भी दुखी होने लगता।

डिंपा की माँ आज उस लड़के को याद करके रो रही है। वह बरामदे में खड़ी है। चारों ओर अँधेरा छाया हुआ है। पीली स्ट्रीट लाइट कहीं पर जल रही है, कहीं पर नहीं। दूर पार्क में अब भी कुछ बच्चे खेल रहे हैं। उनका शोर यहाँ तक आ रहा है। क्लब की ओर जाने वाली सड़क पर एक स्ट्रीट लैंप के नीचे कोई बैठा है। इतनी दूर से समझ में नहीं आ रहा है कि कौन होगा। कोई है, जिससे पूरी दुनिया नाराज हो गई है, जिसके पास छिपने के लिए अपना निजी कोना तक नहीं है। जो सिर झुका कर सड़क पर रोशनी के नीचे बैठा अँधेरे की शक्ल ले रहा है। उस दिन जब उस लड़के को पता चला होगा कि छकुली ने चर्च में शादी कर ली है, तो वह भी ऐसे ही किसी सड़क के किनारे खंभे की मरियल रोशनी के नीचे सिर झुका कर बैठा होगा और रो रहा होगा। डिंपा की माँ का मन हुआ कि वह उसे आवाज देकर बुला ले। उसे अपने साथ बरामदे में खड़ा कर देवे। उससे बातें करे और कहे कि अकेले मत रहना ऐसे समय में। किसी को साथ जरूर ले लेना। इनसान का सबसे बड़ा दुश्मन होता है अपनी मर्जी के खिलाफ मिला अकेलापन। पर उसके गले से आवाज ही नहीं निकल रही। सिर्फ हिचकियाँ हैं। उसने गालों पर हाथ फिराया। वह पानी की तरह गीले थे। उँगलियाँ डालो, तो शीत हो जाय।

कहीं से हवा आ रही है। कहीं को जा रही है। सड़क पिघली हुई है। उस पर पत्तियाँ गिरी हुई हैं। डिंपा की माँ रो रही है। उसकी आँच में बरसों पुराना एक प्रेम तप रहा है।

डिंपा की माँ जहाँ पूरी कॉलोनी से बातें करती थी, वहीं अब चुप रहने लगी है। बहुत कम लोगों से बात करती है। अगर किसी के घर जाने की जरूरत पड़ भी जाए, तो डिंपा को भेज देती है। कॉलोनी वालों को भी समझ में आ गया था कि डिंपा की माँ इस समय मातम मना रही है। डेविड की तो खैर किसी से बात होती भी नहीं थी। लोग वैसे ही उससे दूर भागते थे।

डिंपा घर का प्रवक्ता बन गया था। वह जिसके घर जाता, वह उसे प्यार से बिठाता। चाय के साथ बिस्कुट या बन देता और उसकी माँ का हालचाल पूछता। उसके बाप के बारे में बात करता। डिंपा से यह पूछा जाता कि आजकल उसके घर में क्या चल रहा है। और डिंपा चाय में डुबो कर बिस्कुट खाते हुए विस्तार से बताता कि कल पापा ने मम्मा को फिर मारा था या फिर मम्मा ने कल पापा को गिलास खींच कर मारा था। डिंपा ने ही कॉलोनी वालों को बताया था कि उसकी माँ ने अपना सिर टकला कर लिया है और पापा इस बात के कारण उससे बहुत नाराज हैं। दोनों में बात नहीं होती, लेकिन लड़ने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते दोनों। जब मम्मा ने पापा को गिलास मारा था, तो पापा दर्द से रो रहे थे। मम्मा ने तुरंत खुद को किचन में बंद कर लिया था और पापा सो गए थे, पर दूसरे दिन सुबह जब पापा की तबीयत ठीक हुई, तो उन्होंने जमीन पर पड़ा वही गिलास उठाया और मम्मा को ढूँढ़ने लगे। मम्मा बरामदे में खड़ी थी। गए और गिलास उसके सिर पर मार दिया। मम्मा जोर जोर से रोने लगी। मैंने मम्मा को चुप कराया। उसके बाद मम्मा किचन में गई और संड़सी उठा कर लाई। पापा को ढूँढ़ने लगी। पापा तब बाथरूम में नहा रहे थे। मम्मा ने दरवाजा खटखट किया और पापा से कहा, दो मिनट सुनना जरा। पापा ने आधा दरवाजा खोल कर सिर बाहर निकाला, तो मम्मा ने संड़सी उनके सिर पर दे मारी। पापा ने तुरंत दरवाजा बंद कर लिया। बाद में बाहर निकले, तो उनके सिर पर गोल गुम्मड़ उठा हुआ था। पापा ने मुझसे बोरीलीन माँगी और गोल गुम्मड़ पर लगा लिया।

एक दिन किसी आंटी ने पूछा कि डिंपा, तुझे पापा और मम्मा में से कौन पसंद है, तो उसने कहा, कोई नहीं। मम्मा को मैंने कितनी बार बोला है कि अपने बटक्स कम करो। पर नहीं सुनती। जब वह मुझे लेने स्कूल जाती है, तो मेरे सारे फ्रेंड्स मुझे चिढ़ाते हैं कि अशोक की मम्मी के बटक्स अप एंड डाउन होते हैं। वह कितनी काली है। और पापा हमेशा ड्रिंक करते हैं। ड्रिंक करके वो मम्मा को बहुत मारते हैं। वह मुझे भी कपड़ा उतार कर मारते हैं।

डिंपा जितना बताता, उससे उतने ही सवाल पूछे जाते। डिंपा भी जब तक सवाल समझ में न आते, बताता रहता। फिर चुप हो जाता। डिंपा जब थोड़ा बड़ा हो गया, तो वह कॉलोनी के लोगों से कटने लगा, कोशिश करता था कि कॉलोनी वालों से मिला ही न जाए। क्योंकि कॉलोनी वालों की सवाल पूछने की आदत गई नहीं और उसे सवालों के मतलब समझ में आने लगे थे। जब वह दसवीं में गया, तो एक बार दामू अण्णा की बीवी ने उससे पूछ लिया, क्या रे डिंपा, अभी भी तेरी मम्मा के बटक्स अप एंड डाऊन होते हैं? डिंपा तप गया। बोला, क्यों तुम्हारे नहीं होते, तो मैं कर दूँ क्या आकर? दामू अण्णा की बीवी, जिसे सब वहिणी कहते थे, का मुँह फटा रह गया। क्या बोले? फिर उसने डिंपा से उसके घर के बारे में कुछ नहीं पूछा।

उन दिनों डिंपा बहुत तपा हुआ था। कॉलोनी की ही एक लड़की पुष्पा के साथ उसकी अच्छी दोस्ती थी। बचपन से ही दोनों साथ थे। एक दिन दोनों पार्क में बैठे हुए थे, तो पुष्पा ने ही उसे आइडिया दिया कि वह शिरपूर में अपने मामा को चिट्ठी लिखे कि वह आकर उसे ले जाय। डिंपा ने कहा कि उसे यह आइडिया पहले ही आया था, पर वह जाना नहीं चाहता। उसे नहीं पता कि उसे वहाँ पुष्पा जैसी कोई दोस्त मिल पाएगी। यह कहते हुए उसने पुष्पा का हाथ पकड़ लिया था।

जब डिंपा ने अपने मामा को चिट्ठी लिख कर यह कहा था कि मेरा यहाँ रहने को मन नहीं करता, मुझे आकर ले जाओ, तो बटनवाला आया भी था। जब वह आया था, तो दिन बदले हुए थे। रंगरेज ने चुनरी का रंग बदल दिया था। किसी भयंकर झगड़े के बाद डेविड और डिंपा में बात बंद थी, पर किसी माध्यम से फिर शुरू हो गई थी। घर पर ही डिंपा की माँ जब स्विचबोर्ड को कपड़े से पोंछ रही थी, तो उसे करंट लग गया। वह बेहोश होकर गिर पड़ी। डिंपा को कुछ समझ में नहीं आया। उसने माँ के चेहरे पर पानी डाला। फर्क नहीं पड़ा, तो तिड़के के घर से गेट पर फोन किया डेविड के पास। डेविड जैसे था, वैसे ही दौड़ता आया। ऑटो में बिठा कर डिंपा की माँ को डॉक्टर के पास लेकर गया। दो घंटे बाद डिंपा की माँ वापस आई, तो डॉक्टर ने कई ताकीदें कर दीं। डेविड ने पाँच दिन की छुट्टी ले ली और पूरी तरह से डिंपा की माँ के लिए समर्पित हो गया। डिंपा की माँ के दाहिने हाथ में बुरी तरह मोच आ गई थी। उस पर पट्टी बँधी हुई थी। डेविड खुद घर के सारे काम कर रहा था। काम वाली बाई को करने नहीं देता था। चौबीसों घंटे साये की तरह डिंपा की माँ के आसपास। उसे किसी चीज के लिए पलंग से उठने की जरूरत नहीं। समय पर खाना, नाश्ता, धुले हुए कपड़े। और मजे की बात, घर भी पूरा साफ सुथरा। वैसे, डिंपा की माँ से ज्यादा सफाई पसंद तो डेविड ही था। पहले भी बी शिफ्ट से रात के बारह बजे जब घर पहुँचता और देखता कि सामान बिखरा पड़ा है, तो कितना भी नशा हो, कितनी भी नींद आ रही हो, जब तक सामान करीने से नहीं रख देता, बिस्तर तक नहीं जाता था। यही नहीं, कभी नंगे पैर चलते समय फर्श पर धूल मिट्टी का आभास होता, तो सारे काम छोड़ कर पहले झाड़ू पोंछा, फिर कुछ और करता। इसी बात पर कई बार वह डिंपा की माँ से लड़ भी पड़ता। बात धूल से शुरू होती, फिर डिंपा की माँ के गाउन तक जाती, और उसके बाद जोशी, बटनवाला, शादी के पहले क्या क्या किया, सब पता है मुझे और तेरा कैरेक्टर ही ऐसा है, जैसी बातों तक पहुँच जाता। अगर उस वक्त उनकी कुंडलियों में सारे ग्रह शरीफ होते, तो किसी मोड़ पर जाकर हँसी में बदल जाती, वरना सिर फूटता, तलवारें चाकू चलते और कोई एक धराशायी होता। ज्यादातर डिंपा की माँ को जमीन चूमना होता था।

पर वो पाँच दिन! डेविड जैसा सेवाभाव शबरी में भी नहीं था। रामायण के सारे पात्रा दूरदृष्टि वाले थे। शबरी ने हजारों साल बाद कलियुग में घटने वाली इस घटना को पहले ही देख लिया था कि कैसे एक पुरुष, बिस्तर में लेटी एक स्त्री को अपने मुँह से संतरे काट काट कर खिला रहा है। बस, शबरी ने वो आइडिया कॉपी कर लिया, राम आए, तो उन पर अप्लाई कर दिया और वर्ल्ड फेमस हो गई। बेचारे डेविड को घंटा क्रेडिट नहीं मिला।

फिर भी डेविड ने रग रग सेवा और प्रेम में पग कर डिंपा की माँ की सेवा की। डिंपा की माँ डेविड में आए इस बदलाव को सहन नहीं कर पा रही थी। उसका मन हो रहा था कि वह बिस्तर में ही फूट फूट कर रोए। डेविड चाहता, तो उसको जरा भी नहीं पूछता। डिंपा की माँ बिस्तर में ही पड़ी थी, वह पीछे से कब आ गया, पता ही नहीं चला। चार फुट दूर रखी पलंग, जो बार बार अपनी जगह बदलती थी, पर बैठ कर डेविड ने इस्तरी निकाली और बड़े इत्मीनान के साथ डिंपा की माँ के एक एक गाउन, साड़ी, सूट को प्रेस करने लगा। उसने डिंपा की माँ का ड्रेसिंग टेबल खोला और एक एक सामान को करीने से जमाया। जिन चीजों की जरूरत डिंपा की माँ को रोज पड़ती थी, उन सामान को आगे रखा और बाकी पीछे।

और खरगोश फिर उछलने लगे। डिंपा की माँ बर्फ का लिहाफ ओढ़ने लगी। डेविड के होंठों पर फिर अरुण दाते और सुधीर फड़के के गाने आने लगे। फिर रात को दो साये कॉलोनी की पतली डांबर वाली सड़क, जिस पर खूब पत्तियाँ बिखरी होती थीं, जिस पर ठंडी हवा पैदल चल कर गुजरती थी, पर दिखने लगे हाथों में हाथ डाले। किन्हीं बातों पर जम कर एक दूसरे के कंधे पर सिर रख कर रोते हुए। बहुत सारी रुलाहटें लंबे समय से उनके भीतर जमा थीं। कंधे का ताप मिला और दिल का द्वार खुला। पहले डेविड रोया, तो डिंपा की माँ ने कसमें दे दे चुप कराया। फिर डिंपा की माँ रोने लगी, तो डेविड ने उसके होंठों को चूमना शुरू कर दिया। फिर वे दोनों देर तक घूमते रहे। उन्हीं सड़कों पर, जहाँ बहुत हल्की पीली रोशनी पड़ती थी। डिंपा की माँ डेविड के साथ चलते चलते उस लैंप पोस्ट के नीचे तक पहुँची, जहाँ एक बार उसने दुख के गहन क्षणों में किसी को सिर झुकाए बैठे देखा था। आज वहाँ कोई नहीं था। डिंपा की माँ मुस्कराई। बोली, साहिब, कभी मन उदास होगा, तो इसी लैंप पोस्ट के नीचे आकर बैठ जाना। तुम्हें पता भी नहीं चलेगा, कि मैं तुम्हें देख रही हूँगी। जब तुम मुझसे बात न कर पाओ, भले तुम्हारा कितना भी दिल कर रहा हो, तो तुम कुछ मत करना, यहीं आकर बैठ जाना। तुम महसूस करोगे कि मैं तुम्हारे बिल्कुल साथ हूँ। तुम मेरी साँसों को अपने सीने पर महसूस करना।

डेविड की आँखें भर गईं। कुछ बोलने की कोशिश में उसके होंठ काँपने लगे। डिंपा की माँ ने अपनी बरौनियों से उसके होंठ छुए। जल्दी जल्दी तीन चार बार पलकें झपकाईं। डेविड को होंठों पर गुदगुदी हुई। वह मुस्कराने लगा। उसका साहिब रंगरेज है। उसे बर्फ का रंग पहना दिया है। उसके आँसू जो टपक रहे थे, उन्हें उसने बीच राह बर्फ बना दिया। बर्फ की नथ उसकी नाक से लटक रही है। कानों में उसने बर्फ के बूँदे पहन रखे हैं। वह उसकी पीठ पर बर्फ की कलम से उन दिनों का नाम लिख रहा है, जिन दिनों में वह आग थी। उसके साहिब के हाथ में बर्फ का मोरपंख है, जिससे वह उस पर पसरे सारे बुरे असरों को हवा कर रहा है। उसके साहिब ने जेब से रंगों की पुड़िया निकाली और उस पर छिड़कने लगा। राग रंग, प्रेम रंग, अंग अंग रंग रंग। दुख देह मैल लुटाए दे रे खूब रँगी झकझोर।

डिंपा की माँ की बड़ी बड़ी सफेद आँखें एक बहुत बड़े कैनवास में बदल गई हैं। वह उस लैंप पोस्ट से टिक कर खड़ी जो जाती है, फिर पीछे की ओर आधा बदन लचका कर झुक जाती है...

...अरुणाचे मी गंध लावले...

बटनवाला अपने साथ जंबो को भी ले आया था। डिंपा की माँ ने बहुत दिनों के बाद जंबो को देखा था, तो उसके दुलार में लगी रहती। पर जैसे ही डेविड सामने आता, वह उसके पीछे पीछे लग जाती। डिंपा की माँ को समझ में नहीं आ रहा था कि वह किसके प्रति प्रेम का ज्यादा प्रदर्शन करे। बहुत दिनों के बाद नजर आए बेटे को या बहुत दिनों बाद वापस आए पति को। कुछ समय पहले तक वह जैसा सोच रही थी, उससे बिल्कुल अलग हो गई थी। वह डेविड के मुँह पर तपा हुआ लाल चिमटा रख देना चाहती थी, वह उसकी आँखों में एक सलाख भोंक देना चाहती थी, वह उसे प्रेशर कुकर में बंद करके स्टोव पर रख देना चाहती थी, पर ऐसा कुछ नहीं कर पाई और इस वक्त उसका ऐसा करने का मन भी नहीं कर रहा।

कॉलोनी वालों ने डिंपा की माँ के घर में सिर्फ तीन मेहमानों को आते देखा था। एक बटनवाला था। दूसरा डेविड की रिश्ते में एक बहन थी, जो दूर पंजाब के जालंधर में रहती थी। वह अब तक दो तीन बार आ चुकी थी। और तीसरा था डेविड का दुबई में रहने वाला एक भाई। सच में भाई नहीं था, लेकिन डेविड और वह दोनों बचपन से साथ में पढ़े थे, इसलिए भाई ही कहते थे। हालाँकि कॉलोनी वालों की मानो, तो उनमें से किसी ने श्री.पं. जोशी, दीनानाथ कांबले, शिरढोनकर और पीजी पांडेय को कई कई बार डिंपा की माँ के घर के भीतर देखा है, जिन्हें वे जानते तक नहीं। पर किसने देखा है, यह किसी को नहीं पता। हर कोई कहता है, कोई बता रहा था, उसका नाम नहीं बोलना चाहिए।

पीजी पांडेय के साथ तो एक बार बहुत ही अजीब वाकया हो गया था। डिंपा की माँ अपने बरामदे में खड़ी होकर बाल सुखा रही थी।

- बाल क्या सुखा रही थी, धूप सेंक रही थी।

- धूप क्या सेंक रही थी, किसी को सड़क पर टाइम दिया होगा, उसे टापने आई थी।

- टापने क्या आई थी, सड़क पर जो भी खड़ा होगा, उससे इशारों में बात कर रही थी।

- बात क्या कर रही थी, टाइम फिक्स कर रही थी कि किस वक्त डेविड घर में नहीं है, और वो किस वक्त आ सकता है।

- फिर, तुमको मालूम नहीं है क्या, किसी अस्पताल फस्पताल थोड़े जाती थी वो, किसी न किसी को टाइम दिए रहती थी, उसके पास जाती थी। दिन भर उसके साथ रहती थी, फिर रात को घर आती थी।

- दिन में इतना थक जाती थी कि रात को डेविड जब साथ में सोता था, तो आनाकानी करती थी और डेविड को मिर्ची लगती थी तब। इसीलिए तो जम के धोया था उसने और उसकी नौकरी ही छुड़ा दी थी। अब कहीं जाके दिखा?

- डिंपा की माँ नहीं जा पाई, तो कॉलोनी में आ गए लोग उसके घर। आखिर, आदत ऐसे ही थोड़े जाती है। जिसको एक बार कई की आदत पड़ जाय, फिर उसका पेट नहीं भरता एक से।

- भई, जिसको होटल के खाने की आदत पड़ जाय, उसका घर के खाने में मन लगता है क्या?

हजार किस्म की बातें होती थीं। हर कहने वाला दावे से अपनी बात कहता था। हर एक के पास एक बड़ा सा स्कूप होता था। पता नहीं, किसकी बात सच होती थी, किसकी झूठ, पर बोलने वाले हर एक के चेहरे पर इतना तेज होता था कि दुबारा सवाल करने का मन ही नहीं होता किसी का। और कोई डिंपा की माँ से तो पूछने जा नहीं रहा।

- उससे पूछने तो डेविड जाता है और अगर वह सही हो, तो डेविड भला क्यों मारा करे उसको? क्यों चौराहे पर नंगा करे? वह नंगी होगी, तो क्या डेविड भी नंगा न होगा?

कॉलोनी तो साली वैसे ही अफवाहों का कमाठीपुरा है। एक बात के दस मतलब निकालने का शऊर दुनिया को यहीं से तो मिला है।

तो पीजी पांडेय की बात हो रही थी। हाँ, तो डिंपा की माँ अपने बरामदे में खड़ी थी कि सामने से पीजी पांडेय की सात साल की लड़की साइकिल चलाते हुए, गाते हुए आई कि मेरा रोता अशोक बेटा, सोता नहीं, चाचा बुलावे, तो जाता नहीं, चाची हरामजादी लेती नहीं... कौन सा गाना है वो?

चाची को लगा कि लड़की उसको हरामजादी कह रही है। भड़क गई। वहीं खड़े खड़े लड़की को गालियाँ देने लगी। लल्ले गंदी गंदी गालियाँ। लड़की रोने लगी। बोली, चाची, मैं तो गाना गा रही हूँ।

साली, मेरे सामने आकर मुझी को हरामजादी कह रही है। कैसा गाना सिखाया है तेरी माँ ने?

चाची, माँ ने नहीं, पापा ने सिखाया है।

पापा ने? जा बुला के ला अपने बाप को। चाची ने उसकी साइकिल जब्त कर ली। बाप को बुला के ला। तभी साइकिल दूँगी।

लड़की रोते रोते गेट तक गई और अपने बाप को बुला कर लाई। वॉचमैन बाप डयूटी पर था। आया। चाची उसको लेकर घर के अंदर। लड़की को साइकिल लौटा दी और पीजी पांडे की क्लास लगा दी। एक घंटे वे दोनों घर में थे।

- जाहिर सी बात है, डेविड तब घर में नहीं था।

- अरे, डिंपा भी नहीं होगा।

- होगा भी, तो चाची को क्या परवाह? एक कमरे में बंद कर दिया होगा उसको?

- हाँ, वैसे भी तो डिंपा कहता था, मेर्को एक कमरे में लॉकएनकी में रखती है माँ।

- फिर?

- आईला... मेरी भी कोई लड़की होती... मैं भी उसको चाची के घर के सामने हरामजादी वाला गाना सिखा के भेजता...

- हा ... हा... हा...

- तभी तो उस दिन डेविड ने उसको बहुत मारा था। डेविड से छिपती है क्या कोई बात? डिंपा की माँ की हर हरकत जानता है वो।

- सही बात है। पीजी पांडेय की किस्मत है, डेविड उसको मारने नहीं आया।

- पहले घर सँभालेगा कि आँगन?

खैर, डिंपा की माँ के घर में सबसे ज्यादा आता था बटनवाला। साल में दो चार चक्कर मार देता था। कई बार उसे महीनों तक अपनी बहन का हालचाल नहीं मिलता, तो बिना बताए भी चला आता था। शादी के बाद जब पहली बार आया था, तो डेविड बहुत खुश हुआ था। क्या नहीं कर रहा था वो बटनवाला के लिए। उसके लिए भगवान था। उसकी बात रखने के लिए एक बार में मान गया था। उसके दिल की इज्जत की थी। उसके लिए यहाँ काबा में नौकरी पक्की कर दी थी। चलती थी बटनवाला की। वह यहाँ आया, तो दौड़ा गया बृजवासी तक। मारवाड़ी पेड़े अपने सामने बनवा कर लाया। साथ में रबड़ी और रसमलाई भी। फिर दिन में खुद ही किचन में जाकर उसके लिए बटाटा बड़ा बनाया। आते समय पाव लेता आया था। बोला, बंबई की खास डिश है बड़ा पाव। मैंने अपने हाथ से बनाया है। तीन दिन की छुट्टी ले ली। डिंपा की माँ और बटनवाला को साथ लेकर टिटवाला गया, फिर नासिक गया और वहाँ से शिर्डी के साईंबाबा तक घुमा कर लाया। बटनवाला को जल्दी जाना था, पर जाने ही नहीं दिया। दो तीन दिन तो ऐसे ही रोक लिया। बटनवाला भी बहुत खुश हुआ था उसकी आवभगत से। डिंपा की माँ के साथ वह जिस प्यार से रह रहा था, बटनवाला ने अपनी नजर की दाद दी।

पर डेविड धीरे धीरे बदलता गया। फिर तो ऐसा समय आ गया कि बटनवाला अगर घर के भीतर आया है, तो डिंपा की माँ के लाख बुलाने पर वह बेडरूम से बाहर निकल कर नहीं आता था। एक बार पूछता तक नहीं था कि कैसे आए, क्या सफर रहा, चाय पानी दी कि नहीं? डिंपा की माँ ने एक बार उससे कहा, अरे, एक बार चाय के लिए तो पूछ लो? बोला, शिरपूर में चाय मिलनी बंद हो गई है, जो यहाँ आकर पिएगा? बटनवाला कुछ नहीं बोला। शादी के पहले की बात होती, तो कारखाने में डेविड की नाक में रस्सी डाल कर रखता। डेविड ने एक स्क्रू गलत फिराया कि बटनवाला की फिर गई। ल्ल्ले गालियाँ। सात पीढ़ी तक किसाब किताब चुकता, भाड़ में जाए गुप्ता।

बटनवाला जंबो को अपने साथ ले गया, तो डेविड और नाराज हुआ। वह बटनवाला को मना करना चाहता था, लेकिन उसके सामने उसकी जुबान नहीं खुल पाई थी। पहले ही उसका माथा ठनका हुआ था कि जंबो आठवें महीने में ही क्यों पैदा हो गया? अगर हुआ तो उसे बहुत कमजोर होना चाहिए था, पर वह था भी तंदुरुस्त। और अगर हुआ भी है, तो उसका पहला बेटा है, कम से कम उसके साथ तो रहने दिया जाए। पर तीन साल बाद इधर डिंपा हुआ नहीं कि उधर बटनवाला जंबो को लेकर चला गया। डेविड देखता रह गया। साथ में बटनवाला की बीवी भी आई थी। एक्स्ट्राइच लाड़ दिखा रही थी।

बटनवाला ने डिंपा की माँ से पहले ही बात कर रखी थी। उन दिनों डिंपा की माँ डेविड को लेकर कुछ अलग से विश्वास में रहती थी। उसे लगता था कि एक बार वह हजार हर्फों वाली निगाह से डेविड को देख लेगी, तो उसके भीतर से सारे सवाल निकल जाएँगे, पर डेविड किस मिट्टी का बना था, यह तो खुद मिट्टी भी नहीं जानती थी। जंबो गया, तो फिर लंबे समय तक नहीं आया। बीच बीच में डिंपा की माँ कुछ बार शिरपूर गई जंबो से मिलने। साथ में डेविड भी गया था। डेविड जंबो को बड़ा होते देखना चाहता था। वह इतना छोटा था कि डेविड को समझ में नहीं आता था कि वह किसके जैसा दिखता है।

खैर, जंबो बड़ा होता रहा और बीच बीच में डेविड जाकर उसके बड़े होने को देख आता। शुरुआत में डेविड ने कुछ नहीं कहा, पर बाद के झगड़ों में जंबो के आठवें महीने में आ जाने, उसको बटनवाला का ले जाने और शिरपूर में शादी से पहले डिंपा की माँ के बहुत फेमस होने को देखा जा सकता है। जब डिंपा की माँ ने जंबो का भरा भरा बाप जैसा चेहरा देखा था, तो उसने बटनवाला से कहा था - दादा, है न अपने बाप का ही। तू फुक्कट में पूछ रहा था। तू क्या, साहिब भी मेर्पे डाउट करता था कि किसका है? ऐसे कैसे होते हो तुम मरद लोग? कैसे खट से पूछ लेते हो, किसका है?

और उसने जंबो को डेविड के सामने करते हुए कहा था, साहिब, देख लो जी भर के। जब तुम छोटे रहे होगे, तो ऐसे ही दिखते होगे।

डेविड ने देखा, खूबसूरत गोरा बालक, जिसमें से दिव्य ज्योति फूट रही थी, सामने खड़ा था। चारों ओर प्रकाशपुंज था। उसके सिर के पीछे वैसी ही गोल गोल व्हाइट रोशनी थी, जैसी कि हम लोग बचपन से कैलेंडरों में भगवानों के सिर के पीछे देखते हैं। उसके साथ कोई और बालक नहीं था, वरना डेविड उसी वक्त उन दोनों का नाम बदल कर लव कुश रख देता। डेविड की आँखें भर आई थीं। उसने जंबो के माथे पर हाथ फिराया, लेकिन भरी आँखों से वह डिंपा की माँ को ही देखता रहा। डिंपा की माँ के चेहरे से एक सती वाला गौरव निकल पड़ने को अकुला रहा था।

वह बोलने जा रही थी, बिना मतलब तुमने... पर कुछ नहीं बोल पाई। पानीदार नजरों ने उसके होंठों पर उँगली रख दी थी, कुछ बोलने की जरूरत नहीं डार्लिंग। और उस रात को शिरपूर में दोनों बाहर निकल गए थे। डिंपा को बटनवाला की बीवी की गोद में सोने के लिए छोड़ कर। देर रात तक शिरपूर की सड़कों पर दो साये घूमते रहे।

लेकिन फिर भी बटनवाला के साथ डेविड की दूरी रही, तो रही। वह अब भी उसे देख कर चिढ़ जाता था। डिंपा की माँ ने कई बार पूछा, साहिब, दादा से इतना चिढ़ने क्यों लगे हो?

उसके करम ही ऐसे हैं।

शायद बटनवाला डेविड के कंफर्ट जोन का अतिक्रमण करता था।

इन दिनों भी बटनवाला घर में है। जंबो भी यहीं है। लेकिन डेविड दोनों से बात नहीं करता। वह डिंपा की माँ के पास ही बैठा रहता है। बटनवाला जंबो के साथ खाता है और डेविड के लिए खाना अलग से जाता है, उसके कमरे में, जहाँ दो पलंगों के बीच अब चार फुट का गैप नहीं है।

बटनवाला सुबह होते ही डिंपा और जंबो को लेकर चला जाता है। कभी उल्हासनगर के मार्केट, तो कभी टिटवाला के मंदिर। कभी साथ में लेकर सामने उल्हास नदी चला जाता है। एक बार डिंपा ने बहुत जिद की कि उसे समंदर देखना है, तो सुबह की लोकल पकड़ी और उसे जुहू चौपाटी ले गया। कुछ ही दिनों में डिंपा को बटनवाला की इतनी आदत पड़ गई कि उसे उसी का साथ अच्छा लगने लगा। बटनवाला को बुलाया भी उसी ने था चिट्ठी लिखकर। हालाँकि यह बात किसी को पता नहीं थी। मामा को वह पिछले दिनों की एक एक बात बता रहा था। बार बार कहता था कि मुझे इनके साथ नहीं रहना मामा, अपने साथ ले चल। मैं और जंबो साथ में तेरे पास रहेंगे। अगर तू मुझे अपने साथ नहीं ले के गया, तो देख लेना, एक दिन मैं ये घर छोड़ कर चला जाएगा। या तो सीधा तेरे पास आएगा या फिर किधर भी चला जाएगा। मेर्को नहीं रहना ये लोकन का साथ।

बटनवाला की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह डेविड से इस बारे में बात करे। उसने डिंपा की माँ से कहा कि वह डिंपा को अपने साथ ले जाना चाहता है, तो डिंपा की माँ, जिसके बदन का रंग उन दिनों सफेद हो गया था, बोली साहिब इस पर जान छिड़कता है। वह पहले ही तुझ पर नाराज है कि तू जंबो को ले गया। इसको भी ले गया, तो वो बोलेगा कुछ नहीं, पर मेरी जान ले लेगा। तुझको पता ही है कि वह किसी को कुछ नहीं कहता, सारा गुस्सा मेरे पे निकालता है।

बटनवाला ने तय किया कि डिंपा की माँ भी साथ में शिरपूर चले चले, जिससे डिंपा का मन भी फ्रेश हो जाएगा और उसकी माँ वहाँ रिश्तेदारों से मिल भी लेगी। कई रातों को लैंपपोस्ट के नीचे ले ले जाकर डिंपा की माँ डेविड को मना पाई कि एक महीने के लिए वह डिंपा को लेकर शिरपूर जाना चाहती है।

शिरपूर उसका अपना कस्बा था। वहाँ की सड़कों, गलियों, पार्कों में उसकी यादें बिखरी हुई हैं। कांबा में वे कहीं घूमने नहीं निकलते थे। घर में कोई ज्यादा आता जाता न था। बाहर वे निकलते कम थे। बटनवाला के साथ डेविड उसे एक दो बार शिर्डी तक, एक दो बार जुहू और बांद्रा तक घुमा लाया था। उसे याद है कि एक बार वे लोग सात संडे लगातार बांद्रा गए थे। वे दोनों बहुत प्यार करना चाहते थे, पर जाने कौन सी बला थी कि दोनों के बीच हमेशा झगड़े होते रहते थे। ऐसे में डेविड ने कहीं पढ़ लिया था कि बांद्रा के माउंट मैरी चर्च में सात संडे तक वैक्स कपल चढ़ाएँ, तो जीवन में सुख आ जाता है। वैक्स कपल माउंट मैरी के बाहर मिल जाता है।

सात संडे दोनों ने त्योहार की तरह मनाए। डिंपा को करमरकर के घर में छोड़ कर दोनों सुबह सात चालीस की लोकल से निकले। ट्रेन में भीड़ नहीं थी। डेविड उसके साथ हाथमस्ती किए जा रहा था। और डिंपा की माँ बोल रही थी कि देखा, चर्च के लिए सिर्फ निकले और हमारे रिश्ते ठीक होना शुरू भी हो गए। चर्च पहुँचने के बाद दोनों वैक्स कपल यानी मोम से बने दुल्हा दुल्हन खरीदते और जाकर मदर मैरी के सामने रख देते। उनकी तरह वहाँ कई वैक्स कपल पड़े थे, वैक्स हैंड्स, वैक्स लेग्स, वैक्स डॉल्स पड़े थे। जिसको शरीर के जिस अंग में समस्या है, उस अंग को वैक्स में मदर मैरी को पेश करना होता है। उसके बाद हाईमास होती। ये दोनों साथ में खड़े होकर मैरी से बातें करते रहते। दाहिनी ओर एक झिरी थी। वह कन्फेशन बॉक्स था। डेविड जब भी चर्च जाता, डिंपा की माँ से एक बार जरूर कहता, डार्लिंग, कुछ कन्फेस करना है, तो कर लो।

और हर बार डार्लिंग मुस्करा देती।

बहुत सारी सीढ़ियाँ उतर कर वे नीचे पहुँचते। डिंपा की माँ ने वहाँ पहली बार जिंदगी में किसी फिल्म स्टार को देखा था। जैकी श्रॉफ सामने खड़ा था। डिंपा की माँ दौड़ कर उसके पास गई। काफी भीड़ थी उसके आसपास। पर डिंपा की माँ भीड़ को चीरते-चारते उसके काफी नजदीक पहुँच गई। देखती रह गई। उसे याद है, जैकी ने एक बार उसकी ओर देखा था और मुस्कराया था। डिंपा की माँ ने आसपास देखा, डेविड नहीं था। वह भीड़ से बाहर निकली। उसे डेविड नहीं दिखाई पड़ा। वह जहाँ से दौड़ कर आई थी, डेविड वहीं खड़ा उसका इंतजार कर रहा था।

तू एक फिलमवाले के लिए मेरा साथ छोड़ कर चली गई?

डेविड बहुत डिस्टर्ब हो गया। उसके बाद वे लोग पास ही बैंड स्टैंड गए। समुद्री चट्टानों पर बैठ कर देर तक कागज की पुल्ली में मूँगफली खाते रहे। डेविड कुछ नहीं कह रहा था। डिंपा की माँ को हवाएँ और चीखता समंदर बहुत अच्छा लग रहा था। वह उन्हीं को देखे जा रही थी। उसे मूँगफली खाना अच्छा नहीं लग रहा था - अमोल पालेकर टाइप का टटपुंजिया काम लग रहा था। वह आइसक्रीम का ठेला ढूँढ़ रही थी, पर डेविड ने मूँगफली वाले से दो पुल्ली और खरीद ली।

डिंपा की माँ ने हनीमून शिरपूर में ही मनाया था। उस वक्त डेविड उसके साथ रोज बाजार के लिए निकलता था। भले कुछ न खरीदना हो, पर शाम को बाजार घूमना डिंपा की माँ को बहुत पसंद था। उन दिनों डेविड हर वह काम करता था, जो डिंपा की माँ को पसंद हो। रात का खाना खाने के बाद वे दस बजे घर से निकल जाते, गली में घूमते रहते, रात को आइसक्रीम वाले वहाँ बहुत घूमते हैं। डेविड डिंपा की माँ के लिए रोज रात एक कॉर्नेटो लेता था। एक ही आइसक्रीम को जीभ से सहलाते हुए वे गलियों में घंटा गुजार देते थे। उसे याद है कि वह रात के इस एक घंटे के लिए पूरा दिन इंतजार कर लेती थी। कितना बड़ा रंगरेज है वो? उसका साहिब। हर रंग दिखाता है, लेकिन नेह का रंग भूलता नहीं। प्रेम का रंग छूटता नहीं। हर रंग पर ये रंग भारी है। कितना चोखा रंग है उसका। धोय से छूटै नहीं रे दिन दिन होत सुरंग।

वह शिरपूर के बाजार में घूम रही थी। दादा ने कल ही बताया कि वह लड़का, जिसने अब तक उसके कारण शादी नहीं की थी और जो अमेरिका चला गया था, एक महीने से शिरपूर में है। दो तीन बार मिल चुका है, और चाहता है कि एक बार तू उससे मिल ले। डिंपा की माँ ने पहली बार में ना कह दिया, लेकिन फिर थोड़ी देर बाद बोली, घर पर ही बुला ले उसको। मैं उससे मिलने बाहर नहीं जाऊँगी।

शिरपूर की गलियाँ उससे पूछ रही हैं कि तुम वही हो, जो बाइक की पिछली सीट पर बैठ कर चिल्लाते हुए यहाँ से गुजरती थी? उसकी उँगलियाँ माथे पर गईं। यहाँ उसने एक बार एक लाल रंग की बिंदी लगाई थी। डिंपा की माँ को बिंदियाँ बहुत अच्छी लगती थीं।

'मैंने सपना देखा है तुमने अपने होंठों से मेरे माथे को छुआ है। तुम्हारे गोल होंठों ने वहाँ एक बिंदी बना दी है। थोड़ी देर बाद तुम फिर मेरे माथे पर चूम रहे हो। उससे मेरी बिंदी मिट जाती है और मैं बहुत रोने लगती हूँ।'

'पगली। बिंदी मैंने ही तो लगाई थी। मैंने ही हटाई है। मैं जितनी बार तेरा माथा चूमूँगा, वहाँ सूरज की बिंदी लगेगी। मैं तेरा माथा नहीं, तेरे भीतर बसे अपने आप को चूमता हूँ और उससे कहता हूँ कि आ, मेरे भीतर बस जा।'

और उसने मुझे बाइक पर बिठाया, मार्केट पहुँच गया। एक दुकान में घुस गया। वहाँ उसने अपने हाथों से बिंदियाँ छाँटीं। गुलाबी रंग की एक नेल पॉलिश ली और भवों के ऊपर लगाने वाले सितारे लिए।

'मुझे ये सितारे अच्छे नहीं लगते?'

'लेकिन तुम पर बहुत अच्छे लगेंगे।'

उसने बिंदी को अपने होंठों से पकड़ा और मेरे माथे पर लगा दी। फिर उसे देर तक चूमता रहा।

'देखो, बिंदी को परमानेंट कर दिया मैंने। मेरे होंठों के दाब से वह हमेशा के लिए तेरे माथे पर चिपक गई है।'

डिंपा की माँ को लगा, यह वही दुकान है। वह अभी रो देगी। जंबो और डिंपा उसके साथ थे। वह दुकान में घुसी। पता नहीं, याद नहीं आ रहा, वही है या कोई और? एक गिलास पानी माँगा। देर तक वहीं सोफे पर बैठी रही। पूरी दुकान भरी पड़ी थी सामान से। बिंदियाँ, मेकअप, पाउडर, कॉस्मेस्टिक्स, रंग बिरंगी चूड़ियाँ, बेटेक्स के गहने... सड़क पर कई बाइक्स खड़ी थीं। वह भी ऐसे ही टेढ़ी बाइक लगाता था। उसे कितनी बार कहा था कि ऐसे कभी गिर जाएगी, वह हँस देता था। कई बार हम बाजार के बाहर ही बाइक छोड़ देते थे। और यहाँ देर तक पैदल घूमते रहते थे। दिन का खाना हम साथ ही किसी होटल में खाते थे। खाने का ऑर्डर देने से पहले वह सारे आइटम्स जोड़ कर अंदाजा लगा लेता था कि कितना बिल आएगा और मैं लाख बोलूँ, दो रुपया टिप तो रख दो, कभी नहीं मानता था। बोलता, ऐसे फिजूलखर्ची करोगी, तो मेरा घर उजाड़ दोगी।

वह ऊँचा था। एक बार उसने मुझे उठा कर उछाल दिया था, जैसे मैं कोई छोटी बच्ची हूँ। कितना डर गई थी मैं?

'जान ले लोगे क्या? गिर जाती तो?'

'मेरे हाथ किसलिए हैं? जब गिरने का डर लगे, तो इन्हें पकड़ लेना।'

'तुमने मेरे माथे पर बिंदी क्यों लगाई थी?'

'तुम्हारे माथे ने कहा था।'

'क्या कहा था?'

'मेरे होंठों से कहा था, आओ, हमेशा के लिए यहाँ सुर्ख सूरज बन कर बस जाओ।'

'लाल बिंदियों का एक पैकेट देना।' डिंपा की माँ ने हौले से कहा।

उसने गैस पर चाय की पतीली रखी, तो वह सीधा किचन में ही आ गया।

शायद, वह अब भी वैसा ही दिखता था। उतना ही ऊँचा, वैसा गोरा, सुंदर। चौड़ा माथा। पीछे की ओर समेटे सारे बाल। कॉटन की एक सफेद शर्ट, आस्तीनें मुड़ी हुईं, हल्की नीली रंग की एक जीन्स, स्पोर्ट्स शूज, जिस पर लाल लाइनें खिंची हुई थीं। परेशान कर देने वाली एक महक अब भी उसके भीतर से आ रही थी। उसका पेट थोड़ा सा निकल आया था। आँखें वैसी ही थीं, जैसे बादाम के दो टुकड़े माथे के नीचे दोनों ओर रख दिए गए हों। एक हरी मिर्च नुकीली जैसी नाक। आगे से थोड़ा झुकी हुई। और संतरे की फाँक को बीच में चीर दो, वैसे होंठ। जैसे संतरे में रसीले रेशे दिखते हैं, उसके होंठ का रस अब भी वैसा ही था। डिंपा की माँ बीच बीच में उसे देख रही थी। उसकी मूँछ के बालों में थोड़ी सफेदी आ गई थी। उसके होठों पर रह रह कर कँपकँपी आ जाती थी।

डिंपा की माँ उसे देख कर मुस्करा दी। जवाब में वह नहीं मुस्कराया।

'बाइक अब भी टेढ़ी ही खड़ी करते हो?'

'हाँ, बाइक ऐसे ही खड़ी की जाती है।' बरसों पहले भी वह यही जवाब देता था। कुछ लाइनें कैसे हमारे दिमाग में ज्यूँ की त्यूँ बस जाती हैं। लोगों की छवियाँ बनती बिगड़ती रहती हैं, जैसे पानी के हिलने पर अक्स हिलता है, पर लाइनें पानी पर नहीं लिखी होतीं। पानी कितना भी हिले, लाइनों के अक्स पर कोई असर नहीं पड़ता।

'तुमने बाल इतने छोटे क्यों करा लिए हैं?'

'ऐसे ही। बड़े बाल सँभलते नहीं थे।'

'तुम्हें याद नहीं, मैंने कसम दी थी तुम्हें, कहा था ये बाल मेरे हैं। इन्हें कभी काटना मत।'

'बहुत समय हो गया, हमने एक दूसरे की कसमें माननी कब की बंद कर दीं। है न?'

डिंपा की माँ ने संड़सी से चाय का पतीला उठाया और दो कपों में चाय डालने लगी।

दोनों के बीच गर्म भाप का एक परदा आ गया। पतीले से छन छन की आवाज आ रही थी। जैसे गर्म तपते तवे पर कोई पानी की बूँदें छिड़क रहा हो। डिंपा की माँ की आँखें झुकी हुई थीं। कप में गिरती चाय को देख रही थी ध्यान से। भाप उड़ कर उसके चेहरे पर आ रही थी। एक बार इसने कहा था, जब मैं स्टीम ले रही थी -

'छकुली, देख, भाप बन कर तेरे चेहरे पर चिपक रहा हूँ मैं।'

डिंपा की माँ के चेहरे पर भाप सी सनसनाहट आ गई।

वह उसे अब भी देख रहा था। दूर खड़ा था। पहले के दिन होते, तो वह अब तक उसकी कमर से लिपट चुका होता।

उसकी कमर में सन सन करते भाप घुसी।

'तुम बैठो, मैं चाय लेकर आती हूँ।'

उसने दूध का पतीला खोला और चम्मच से मलाई उतारने लगी। उसे गर्म चाय पर मलाई की परत बहुत अच्छी लगती है।

वह अपनी जगह से नहीं हिला। चाय पर मलाई को बिछते, फिर डूबते, फिर ऊपर आते देखता रहा। डिंपा की माँ ने नैसकैफे का पैक खोला। चम्मच से कॉफी के हल्के हल्के बुरादे उठाए और तैरती हुई मलाई पर छिड़क दिया।

वह मुस्कराने लगा।

उसने अपनी हथेली बढ़ाई, जैसे कुछ माँग रहा हो। जब बहुत लाड़ में आता था, तो ऐसे ही हथेली आगे कर देता था, चाहते हुए कि छकुली भी उस पर अपनी हथेली रख दे।

डिंपा की माँ ने ट्रे उठा ली और दरवाजे की ओर बढ़ गई - आ जाओ, हॉल में।

वह हथेली फैलाए खड़ा रहा। सिर झुका कर मुस्कराता रहा।

डिंपा की माँ ने पलट कर देखा, वह जाती हुई डिंपा की माँ को देख रहा था, कनखियों से।

बटनवाला उसे घर में बिठा कर बाहर चला गया था। जंबो और डिंपा पहले ही क्रिकेट खेलने चले गए थे। हॉल में कोई नहीं था। वे आमने सामने सोफे पर बैठे थे।

'क्यों मिलना चाहते थे तुम?'

'बस, तुमको एक बार देख कर ताजा कर लेना चाहता था। क्यों, तुम नहीं मिलना चाहती थी एक भी बार?'

'एक बार तो जरूर मिलना चाहती थी। तुमसे कुछ कहना था।'

'क्या कहोगी अब? ये कहोगी कि तुम्हें अब भी एक एक बात याद है? मेरी चाय, मेरी बाइक, मेरी छुअन?'

'प्लीज।'

'तुम कैसे जा सकती थी बिना बताए?'

'यही पूछने आए हो?'

'नहीं, मैं सिर्फ तुम्हें देखने आया हूँ।'

'चाय पियो।'

डिंपा की माँ ने अपना कप उठा लिया।

'तुम्हें अब भी लाल बिंदी पसंद है?'

... ... ...

'मेरी बिंदियाँ खो दी न तुमने?'

'मैंने इस लाल बिंदी के नीचे छिपा कर रखी है तुम्हारी बिंदी।'

'और मेरी उँगलियों की छुअन? तुम्हारे बालों में जो सिहरन होती थी? तुम्हें मेरी भाप याद नहीं आती? तुम्हें नहीं याद आती मेरी आवाज, जिसे तुम अपने कानों में पहन कर कहती थी कि मेरी आवाज हवा में तुम्हारा चित्र बनाती है, कि वह कानों में जाती है और यहाँ धड़कन चुप हो जाती है...'

'प्लीज... सब याद है मुझे... याद है सब कुछ...'

'याद है, तुमने कहा था, जब तुम्हारी बहुत याद आए, तो उस लैंप पोस्ट के नीचे बैठ जाना। उसके नीचे अब भी पीली रोशनी आती है... हेमा, तुम्हें दिखता हूँ मैं वहाँ बैठा हुआ? तुमने कभी उस लैंप पोस्ट तक जाने की हिम्मत क्यों नहीं की?'

'मुझे याद है... याद है... प्लीज... मत बोलो ये सब...'

'क्यों नहीं बोलूँ? मैं अभी भी उसी लैंप पोस्ट के नीचे बैठा हूँ... तेरे बारे में जानता हूँ छकुली... तू चल मेरे साथ... हम फिर से सब कुछ शुरू कर सकते हैं...'

उसने डिंपा की माँ का हाथ पकड़ लिया। उठ कर बगल वाले सोफे पर आ बैठा। डिंपा की माँ आँखें बंद कर गहरी साँस ले रही थी। उसने अपना सिर पीछे टिका दिया और बंद आँखों से छत पर बसी हुई दुनिया देखने लगी।

उसे लगा, उसके माथे पर लगी बिंदी पर दबाव पड़ा है। कोई गर्म भाप उसके भवों और मुँदी हुई पलकों पर फिर रही है। उसने अपने गालों पर दो गीले हाथों का दबाव महसूस किया। उन हाथों ने उसके गालों को इस तरह पकड़ रखा था, जैसे गुलाब की कली और डंठल के बीच एक हरा सा पुष्पाधार होता है, फूल उसी की कोख में से बाहर निकलता है, उसकी सुगंध और उसका बीज उसे हरे में महफूज रहता है। वह हरा हटा दो, फूल नीचे गिर जाएगा।

भाप धीरे धीरे नीचे आ रही थी। उसकी नाक की ठंडी कोर पर भाप इस तरह टिक गई, जैसे उड़ते हुए बादल का टुकड़ा पेड़ की किसी टहनी पर अटक जाता है। उस टहनी पर, जहाँ एक चिड़िया अपने दो चुरुंगुनों के साथ घोसला बना कर रहती है। बादल वहाँ थोड़ी देर रहता है और उसके बाद टहनी और बादल एक रंग हो जाते हैं। बादल की जोर जोर की साँसों से टहनी झूलने लगी। टहनी के झूलने से बादल की रुई बिखरने लगी। थोड़ी सी रुई पिघली और टहनी पर बरसात होने लगी।

उसने अचानक हाथ छोड़ दिया। उसे लगा, वह उठ कर फिर सामने वाले सोफे पर बैठ गया। वह हाथ नहीं छुड़ाना चाहती थी। वह चाहती थी कि उसके गोल होंठ एक बार फिर उसके माथे पर एक गोल सूरज उकेर दें। उसकी भाप एक बार फिर उसके भीतर तक को नम कर जाय। उसकी उँगलियों की छुअन से बर्फ पर एक गहरी लकीर बनती जाय।

डिंपा की माँ ने आँख खोली। वह सामने बैठा हुआ था, सिर झुकाए।

गरदन घुमाई, बगल में डिंपा खड़ा था।

'हाँ बोल, क्या हो गया?'

'मम्मा, टेन रुपीज देना। मैच लगाया है हम लोगों ने।'

टहनी पर्स लेने भीतर चली गई।

डिंपा की माँ जब शिरपूर से जा रही थी, तो वह भी बस अड्डे तक छोड़ने आया था। बस निकलते निकलते उसने फिर कहा था, मैं इंतजार कर रहा हूँ छकुली। ध्यान रखना मेरी बात का। डिंपा की माँ के गले में काँटे उग आए थे। उसके लिए थूक तक भीतर लीलना मुश्किल हो रहा था। उसे लगा, कोई चाक है, जिस पर उसे रख दिया गया है, वह घूमे जा रही है। कोई बहुत तेज रफ्तार से उसे घुमा रहा है। किसी ने उसका आकार बदलना शुरू कर दिया है। आसपास सब कुछ घूम रहा है। पृथ्वी, चाँद, सूरज, आसमान, पेड़, इमारतें, बस, सब घूम रहे हैं। एक अंतहीन घूम है। जैसे कोई डायनमो घूमता है। उसने पलट कर नहीं देखा। बस छूट रही थी। वह लड़का अपनी जगह खड़ा होकर हाथ हिला रहा है। वह नहीं देख रही थी। वह लड़का वहाँ से चलता है। चलते चलते दूर एक लैंप पोस्ट के नीचे जाकर बैठ जाता है। वह नहीं देख रही थी। वह खुद भी लैंप पोस्ट के पास जाकर खड़ी हो जाती है। देखती है, लड़का अपने घुटनों में मुँह छिपा कर बैठा हुआ है। वह नहीं देख रही है।

बस रफ्तार ले लेती है। शिरपूर कस्बा गली दर गली छूट रहा है। सड़क दर सड़क पुराना पड़ रहा है। चक्का घूम रहा है। दुनिया चक्के पर रखी हुई है। चक्का दुनिया के गर्भ में है।

डिंपा ने कितनी मिन्नतें की थीं कि उसे वहीं शिरपूर में ही रहने दिया जाय, पर डिंपा की माँ नहीं मानी। वह कितनी बार कह रहा था, जंबो को भी साथ ले लो, पर जंबो एक किनारे खड़ा हो गया। उसे नहीं जाना इन लोगों के साथ। डिंपा जंबो का हाथ नहीं छोड़ना चाहता। बोल रहा था, मुझे रोक लो, वरना जंबो को भी मेरे साथ भेजो। डिंपा की माँ इतने दिनों से जंबो से लगातार कह रही थी कि हमारे साथ चलो बेटा, पर जंबो हर बार यह सुनने के बाद बटनवाला की बीवी के पास जाकर बैठ जाता था। वह इतना छोटा नहीं था कि जाकर पल्लू में छिप सके, पर उसके पास जाने का मतलब यही था। जंबो कह रहा था बटनवाला से कि डिंपा को यहीं रोक लो। पर डिंपा की माँ, डिंपा को साथ में लेकर बस में बैठ गई।

डेविड चाहता था कि जंबो अब बड़ा हो गया है, तो यहीं आकर इनके साथ रहे, पर जंबो खुद ऐसा नहीं चाहता था और बटनवाला भी नहीं चाहता होगा, तभी नहीं आया। डेविड को बहुत बुरा लगा कि बेटा मेरा है और उसे बटनवाला ने एक तरह से किडनैप कर रखा है। बटनवाला पर पहले ही उसका दिमाग सनकता था।

इसी बात पर वह डिंपा की माँ पर भड़क गया। उसका मानना था कि डिंपा की माँ ने ढंग से कहा ही नहीं होगा कि जंबो को अब उनके साथ रहना है। बटनवाला को कोई संतान नहीं, तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं हमेशा के लिए उसे अपना बेटा दे दूँ।

डिंपा की माँ पहले तो उसे समझाती रही कि मैंने कहा था, पर खुद जंबो नहीं चाहता। पंद्रह सोलह साल का हो गया है, अपने बारे में खुद सोच सकता है। बोल रहा था, बुआ, जब भी तेरी याद आएगी, तेरे पास आ जाऊँगा। है ही कितनी देर का सफर। सच बात है, मैं उसकी बुआ हूँ और तुम फूफा हो। बचपन से वह यही मानता आया है। भले उसे यह पता है कि हम उसके माँ बाप हैं, लेकिन उसे इससे कोई मतलब नहीं, क्योंकि वह उन्हें ही माँ बाप मानता है, तो बोलो, अचानक कैसे मान लेगा कि उसके माँ बाप हम हैं, लेकिन डेविड को मानना ही नहीं था।

तंग आकर डिंपा की माँ ने उससे पूछा, एक बात बताओ, जब जंबो आया था, तब तो तुम उसकी ओर देखते भी नहीं थे, दो मिनट उसके साथ बैठ कर बात तक नहीं करते थे, उससे पहले हमेशा तुम्हें यह लगता रहा कि वह तुम्हारी औलाद है ही नहीं, फिर अब क्यों इतना लाड़ आ रहा है उस लड़के पर?

डिंपा की माँ का इतना कहना था कि डेविड को ताव आ गया। इतने दिनों से वह अकेले था, तो बार बार सोचा करता था कि अपने ताव पर काबू रखेगा। रिश्ता ठीक करने के लिए वह माउंट मैरी तक हो आया है। इस बीच भी वह एक संडे गया था प्रेयर करने। वह नहीं चाहता कि डिंपा की माँ के साथ उसका झगड़ा बढ़ता रहे, पर कुछ न कुछ हो ही जाता है।

और फिर वही हुआ, जो इतने बरसों से होता आया। कोई नयापन नहीं। सब कुछ वही।

डिंपा की माँ एक सपने से निकल कर आई थी। एक ऐसा सपना, जहाँ जुबान पर मीठा ही मीठा लगा हुआ था, जहाँ मोरपंखों से उसके सिर पर हवा की जा रही थी, जहाँ कोई बादल उसे भिगो रहा था। उस सपने से वह एक भट्ठी में आई है, जहाँ उसे सींक में डाल कर तपाया जा रहा है। बरौनियों से नमक उठावाया जा रहा है। किनारे पर बिठा कर चप्पू चलाने को कहा जा रहा है।

कॉलोनी में डिंपा की माँ से बात करने वाला कोई नहीं बचा। वह जहाँ जाती है, उसे समझ में आ जाता है कि उसे टाला जा रहा है, लेकिन टलना उसकी आदत है नहीं। वह विजू सावंत के घर जाकर बैठ जाती है। उसकी बेटी नंदू सावंत अलग किस्म की प्रॉब्लम में पड़ी हुई है। बेचारी, घर से भाग गई थी। उसके माँ बाप ने उसका घर से बाहर निकलना बंद कर दिया है। उसने पार्वतीबाई को समझाना चाहा कि वह जिससे शादी करना चाहती है, उससे करा दे, वरना आगे चल कर पछताना ही पड़ेगा, लेकिन पार्वतीबाई ने उल्टे उसी को चार बातें सुना दीं। वह नंदू से मिलती है। उसकी आँखें रो रोकर सूजी हुई हैं।

डिंपा की माँ पार्वतीबाई से बात करके उसे अपने घर ले जाती है। वह उसे बाइबल के कई किस्से सुनाती है, जिससे दिल साफ हो जाता है, उस पर का बोझ कम हो जाता है।

नंदू पूछती है, चाची, तुम्हारे दिल पर बोझ आता है, तो क्या करती हो?

बाइबल पढ़ती हूँ बेटा। चुपचाप। एक कमरे में बैठ कर। बचपन से मेरी आदत है। जब भी दिल बहुत उदास होता है, मैं वो चैप्टर पढ़ने लगती हूँ, जिसमें जीसस दुबारा इस धरती पर आता है। तुम्हें पता है, यह दुनिया की सबसे बड़ी उम्मीद है - गए हुए आदमी का लौट कर आना। जो आपके जीवन से चला जाता है, जब तक आप उसका इंतजार करते रहते हैं, तब तक आप में ताकत रहती है। जैसे अंधे की आँख चली जाए, तो उसे इंतजार रहता है नजरों के लौट आने का। एक दिन उसका इंतजार इतना गाढ़ा हो जाता है कि उसकी नजर तो नहीं आती, लेकिन उसका इंतजार ही उसका नजर बन जाता है। इंतजार इनसान को सबसे बड़ी मजबूती देता है। इससे बड़ा टॉनिक कोई और नहीं। और जीसस का दुबारा आना यह बताता है कि इंतजार की हमेशा जीत होती है। बस, जीत की शक्ल बदली हुई होती है। उस दिन आपका इंतजार खत्म होता है, आप जीसस के सबसे करीबी बन जाते हैं।

डिंपा की माँ अपने जीवन का सार उसे सुनाती है। उसे अपने पसंदीदा चैप्टर सुनाती है। वह रोज उसके पास आती है। डिंपा की माँ उससे बहुत कुरबत महसूस करती है। एक दिन कहती है, नंदू, तू तो भाग भी सकती है, एक बार अपनी मर्जी कर भी चुकी है। उन लड़कियों के बारे में सोचा है कभी, जो अपनी मर्जी से कभी कर भी नहीं पातीं?

मैं सिर्फ अपने बारे में सोचती हूँ, चाची। मुझे ज्यादा चीजें समझ में नहीं आतीं। सच कहती हूँ, मन करेगा, तो मैं फिर भाग जाऊँगी। मेरा बाबा बहुत डरपोक है। अगर उसमें थोड़ी भी हिम्मत होती, तो मेर्को कभी भागने की जरूरत नहीं होती। आई तो ठसबुद्धि है। उसको कुछ नहीं समझता। दामू अण्णा की बीवी जैसा बोल के जाती है, बस वैसा ही करती रहती है।

पर तुझे बदनामी से डर नहीं लगता क्या? डिंपा की माँ ने उससे पूछा।

चाची, तुमको लगता है बदनामी से डर?

चाची चुप हो गई। उसने अपना ध्यान किचन के काम में लगा दिया। नंदू सावंत वहाँ खड़ी थी, सिर झुकाए अँगूठे से फर्श पर कोई चित्र बना रही थी या किसी का नाम लिख रही थी या किसी लिखे हुए नाम को दुरुस्त कर किसी और का नाम लिख रही थी या अँगूठे का व्यायाम कर रही थी।

हाँ, मुझे तो डर लगता है नंदू, बदनामी से।

नहीं, डरना चाहिए चाची। तुझे पता है न, तेरे बारे में क्या क्या बोलते हैं लोग, चाची, तेरे पड़ोसी, इसी कॉलोनी के लोग? इसके बाद भी तू किसी की परवाह नहीं करती, यहाँ ऐश से रहती है। चाचा के साथ इतना लफड़ा होता है, तू क्यों नहीं छोड़ के चली जाती? जब बिना कुछ किए बदनामी होती है, तो फिर कर के लो न। अपना तो यही फंडा है चाची।

डिंपा की माँ सन्नाटे की दीवार के भीतर चिन कर खड़ी हो गई। वह अपने हाथ से एक एक ईंट रख रही थी। यह ईंट उसने अपनी आँखों के सामने रखी और बस, कुछ भी दिखना बंद। हर ओर अँधेरा।

एक दिन नंदू ने कहा था, चाची, बहुत आसान होता है किसी को बदनाम कर देना। समझ ले, मैं एक मरद हूँ। तुझसे बोलता हूँ कि वो देख, वो सामने जो जा रही है न, बहुत कड़क है। परसों दिन में ली थी उसकी मैंने। तो बोलो, क्या सोचोगी तुम? उस औरत से पूछने तो नहीं जाओगी न। यकीन कर लोगी न मेरी बात पर। ऐसा ही होता है। मरद जिसकी सपने में भी लेता है, उसके कैरेक्टर को असल लाइफ में भी बदनाम कर देता है। जिस औरत के बारे में बोलता है कि वह बहुत खराब है, दरअसल उसे खराब करने में वह अपना भी हिस्सा देखना चाहता है। चाचा जिस दिन सपना देखेगा कि तू किसी और के पास से आ रही है तो उस सपने पर विश्वास कर लेगा। उसे लगेगा कि जीसस उसे आगाह कर रहा है सपना दिखा कर।

ये सारी बातें एक ही दिन में नहीं हुई थीं। रोज के टुकड़े टुकड़े को जोड़ दो, तो ऐसी ही बातें बनती थीं। डिंपा की माँ को लगता है कि उसके भीतर भी थोड़ी सी नंदू सावंत होती, तो अच्छा था। थोड़ी सी नंदू सावंत कहाँ से मिलेगी? उसे नंदू सावंत अच्छी लगी थी। नंदू हर वक्त एक कोशिश करती रहती है - अपने आप को पाने की कोशिश। उसे पता नहीं, कितना सफल होगी वह। पर खुद को पाने की कोशिश करती लड़की से खूबसूरत कुछ नहीं हो सकता। इसीलिए उसने सबके सामने कहा था, खम ठोंक कर कि फिजूल तुम लोगों ने लड़की को बदनाम कर रखा है। हीरा है वो तो।

डिंपा की माँ खुद अपने भीतर तलाश कर रही थी। वहाँ कई औरतों का वास था, पर वह किसी को पहचान नहीं पा रही थी।

गुड्डू गांधी को तो जैसे चस्का लग गया था। हाथ फिराते फिराते साला क्या हो गया, रात दिन डिंपा की माँ के बारे में ही सोचे जावे। पहले ऐसी हालत येड़ा ढेपलू की हुई थी, लेकिन येड़ा को जब पड़ी, तो उसके बाद वो भूल गया। वो हम लोगों को पता ही नहीं था, जब एक दिन गुड्डू गांधी डिंपा की माँ की पूरी जन्मकुंडली लेकर बैठ गया। वह पिछले कुछ दिनों से डिंपा की माँ को लगातार फॉलो कर रहा था। डिंपा की माँ रोज सब्जी लेने आती थी बिरला गेट तक। हालाँकि इस बात का कोई तुक नहीं था। ज्यादातर कॉलोनी की औरतें संडे टु संडे आती हैं और हफ्ते भर की सब्जी लेकर जाती हैं, पर डिंपा की माँ रोज क्यों आती है। आकर वह नईम केलेवाले के पास लगी कुर्सी पर बैठ जाती है। नईम से अच्छी बनती है। नईम उसके लिए बहुत से काम कर देता है। कुछ औरतों की आदत होती है चेले पाल कर रखने की। कोई जरूरत हो, तो उसको दौड़ा दो। चेलों को कुछ मिलता नहीं, बस, जी हुजूरी में ही निकाल देते हैं पूरा टाइम, उम्मीद के साथ। नईम भी वैसा ही था। नईम के साथ उसकी दोस्ती बहुत पहले हो गई थी। नईम की तब बहुत ज्यादा उम्र नहीं थी, जब वह केले की दुकान पर बैठने लगा था। डिंपा की माँ उसे रोज देखती थी। एक दिन नईम के हाथ में चोट लगी थी। उसने सिंपल पट्टी बाँध रखी थी। डिंपा की माँ उससे केला लेती थी कभीकभार। पट्टी देखी, तो पूछ लिया। नईम ने बताया, ऐसे ही फल पे चाकू चलाते समय लग गया। डिंपा की माँ ने चोट देखी। उसने बोरोलीन लगा कर पट्टी बाँध रखी थी। वह सामने के मेडिकल स्टोर में गई और एक पाउडर, कुछ दवाएँ लेकर आई। पाउडर लगा कर पट्टी बांधी और उसे दवाइयाँ दे दी। फिर उससे पूछा, तू कौन सी क्लास में पढ़ता है? बोला, ग्यारहवीं में। डिंपा की माँ उसके लिए ग्यारहवीं की चार किताबें और चार रजिस्टर खरीद कर लाई। बोली, आज से पढ़ाई में जास्ती ध्यान देने का। पता नहीं, क्यों किया उसने ऐसा, पर उसके बाद से नईम उसका भक्त हो गया। डिंपा की माँ आदमी लूटना जानती थी।

तो गुड्डू गांधी एक बार उसके पीछे पीछे तक उसके घर गया। पहले बिरला गेट से कॉलोनी की बस में उसके पीछे बैठा। बस सीधे कॉलोनी के अंदर रुकती थी। आखिरी स्टॉप तक गया। पैदल पैदल डिंपा की माँ के पीछे पीछे उसके घर तक, फिर वहीं से कॉलोनी के एक दोस्त के घर चला गया। वहाँ उसने डिंपा की माँ के बारे में काफी मालूमात की।

बस, फिर उसका नियम बन गया। रोज उसके पीछे पीछे कॉलोनी की बस में, फिर अंदर तक छोड़ कर आवे। एक दिन डिंपा की माँ के पास बहुत ज्यादा सामान हो गया। बेचारी उठा ही नहीं पा रही थी। उठा कर बस तक न जा पावे। इससे पहले कि वह आसपास देखे, गुड्डू गांधी पहुँच गया मदद के लिए। उठा कर बस में रखा सामान। बस में साथ बैठा। यहाँ वहाँ की बात करते हुए टाइम पास किया और उसके बाद घर के दरवाजे तक छोड़ कर आया। गांधी तो घर के भीतर तक जाने की पूरी ट्रिक में था, पर डिंपा की माँ ने उसे रोक दिया। कहा, यहीं रख दो। यहाँ से मैं एक एक करके ले जाऊँगी। गांधी बोलता रहा गया कि अंदर तक छोड़ आता हूँ, पर डिंपा की माँ ने थैंक्यू थैंक्यू बोल कर उसे विदा कर दिया।

गांधी बहुत उत्साहित था। उसने डिंपा की माँ के सामने बहाना बना दिया था कि वह कॉलोनी में फलाँ लड़के का दोस्त है और उसके साथ पढ़ने के लिए वह रोज शाम कॉलोनी में जाता है। बस, रोज का साथ हो गया।

एक दिन बस में डिंपा की माँ से बोला, आंटी, कॉलोनी की लड़कियाँ... तो... क्या बोले अब?

क्या हो गया?

अरे बस, सब ऐसे ही फेमस हैं।

लड़के कम हैं क्या?

अरे, पर लड़कों का क्या?

देखो, लड़के कुछ कर नहीं पाते, तो लड़कियों को बदनाम करने लगते हैं।

नहीं आंटी, मैंने तो अपनी आँख से देखा है कई को।

तो उसमें क्या है? सबको उनके माँ बाप ने बिगाड़ रखा है। जितना दबाओगे, उतना भागेंगी।

हाँ, फ्री तो छोड़ना ही चाहिए, पर ऐसा होता नहीं। सबसे ज्यादा दिक्कत वहीं होती है, जहाँ फ्री नहीं होते।

गांधी को लगा कि फ्री बोल कर आंटी ने कई रास्ते खोल दिए हैं।

हम हर रोज उम्मीद करते कि आज गांधी कोई बड़ी मटकी फोड़ेगा। आकर बताएगा कि आज ये कर दिया, वो कर दिया, वो कर दिया, पर उसको इतने में ही बहुत खुशी हो रही थी। वह डिंपा की माँ का जबर्दस्त पीआर करने लगा था। अगर हममें से कोई उसके बारे में कुछ गलत बोलता, तो गांधी लड़ जाता। इतनी नड़ीबाजी उसने किसी चीज के लिए नहीं की थी।

एक दिन गांधी आया। बहुत सनका हुआ था। वह किसी भी तरह डिंपा के बाप को मार डालना चाहता था। हम हैरान थे। पूछ रहे थे - क्या हो गया, बाबा बता तो सही?

मार डालेगा उसको। गया वो साला। आठ इंच का डालेगा उसके अंदर।

ए बाबा बस कर। चल बोल, हुआ क्या?

उसके बाद गांधी ने जो सुनाया, तो हँस हँस कर हम सबका बुरा हाल था। इतना तो कभी येड़ा ढेपलू की हरकतों पर भी नहीं हँसे थे हम।

दो दिन में डिंपा की माँ उसे घर में ले जाने लगी थी। पहले दिन तो सच में सामान बहुत ज्यादा था। डिंपा की माँ बोलती रही कि यहीं रख दो, यहीं रख दो। पर गांधी नहीं माना।

अरे नहीं आंटी, आप खोलो तो सही दरवाजा। अंदर रख देता हूँ।

डिंपा की माँ ने दरवाजा खोला, तो गांधी ने एक एक सामान अंदर रख दिया। उसका घर देखने लगा। टाइम पास करने के लिए बातचीत करने लगा कि घर तो बहुत अच्छा मेंटेन किया है आंटी वगैरह वगैरह।

आंटी ने भी उसकी बातें सुनीं और उसे पानी का एक गिलास पिलाया। उसके बाद गांधी बैठने के बारे में सोचने लगा, तो आंटी ने कहा, ठीक है गुड्डू। फिर कल मिलते हैं। उम्मीद है, कल मेरे पास सामान ज्यादा नहीं होगा और मैं तुम्हें इतना परेशान नहीं करूँगी।

अरे आंटी, अरे आंटी बोलता, शर्मिंदा होने का नाटक करता गांधी निकल गया। अपनी किस्मत को कोसता।

दूसरे दिन भी उसे घर के अंदर जाने में कामयाबी मिल गई। आज आंटी ने उसके लिए चाय रख दी थी। वह खुद बोल रहा था कि आंटी, चाय फिर कभी पियूँगा, मैं जाता हूँ। पर आंटी ने रोक लिया।

चाय बनाने लगी। इतने में दरवाजे की घंटी बजी। गांधी घबरा गया। आंटी ने आवाज दी, दरवाजा खोलना। गांधी ने उठ कर दरवाजा खोला, तो सामने डिंपा का बाप।

कौन है तू?

म...म...

डेविड उसे धक्का देता हुआ घर में घुस आया। डिंपा की माँ चाय बना रही थी।

कौन है ये?

ये ...ग...ग...गुड्डू है। डिंपा की माँ बुरी तरह सकपका गई। काँपने लगी। वो मेरा सामान ज्यादा हो गया था, तो ये अंदर तक छोड़ने आ गया था।

कित्ता सामान था तेरा?

गांधी की फट गई। उस दिन सामान था ही नहीं। एक झोला था, जिसमें थोड़ी सी सब्जी थी। कल ही तो इतना सामान लेकर आई थी बाई।

इतने से सामान को तू नहीं उठा पा रही थी? असिस्टैंट लेना पड़ गया? तेरा असिस्टैंट और क्या क्या करता हे तेरे वास्ते?

डिंपा की माँ ने गांधी को जाने के लिए कहा।

नहीं रुक बेटा रुक।

दो महीने से तुम लोगों का नाटक चल रहा है। बहुत सामान होता है तेरा और तेर्को घर के भीतर तक छोड़ने आता है ये। फिर दो दो घंटे तक सामान ही छोड़ता रहता है ये। कितना अंदर तक लेती है रे तू इसका सामान?

अंकल, जास्ती मत बोलो। गांधी ने बीच में कहा। उसे बुरा लगा, किसी ने उसकी वाली के बारे में ऐसा कहा। वह तप रहा था। एक तो पहले ही डरा हुआ था। कोस रहा था। आज ही जल्दी भागने को सोच रहा था। शायद डर था, पनौती का।

डेविड को बर्दाश्त नहीं हुआ उसका टोकना।

साले, तू मेरे घर में आकर अय्याशी कर रहा है और मुझको बोल रहा है, जास्ती नको बोलो। तू जास्ती कर रहा है कि मैं?

और सनाक। डेविड ने गांधी को चैरिटी में दिया। रख के। कान के नीचे लाल हो गया।

डिंपा की माँ बीच में आ गई।

डेविड को एक ओर ले जाने लगी।

साले, दिखना मत कल से यहाँ पर। जानता नहीं क्या मेर्को? तेर्से बड़ा लुक्खा हूँ मैं? पूछ लेना जाके बिरला गेट वालों से। वहीं खड़ा होकर अपनी मय्या... है न तू?

गांधी के तन बदन में आग लग गई। डेविड डिंपा की माँ के बस में आने से तो रहा। छुड़ा कर फिर मारने आया। गांधी को संपट नहीं, क्या करे? अगर इधर पब्लिक इकट्ठी हो गई, तो वांदे लगजाएँगे।

गुड्डू, तू जा यहाँ से। डिंपा की माँ चीखी।

गांधी के शरीर में जैसे जान आई। वह घूमा, तब तक डेविड का एक और हाथ उसके कंधे पर पड़ा। वह बिलबिला गया। दरवाजे पर गिरा। तेजी से दरवाजा खोला। और बाहर। बंदे ने एक शाणपणा किया। दरवाजा बाहर से बंद कर दिया। बाहर देखा, कोई नहीं था। डेविड की गालियों के लिए दरवाजा बंद नहीं था। वे दरवाजे के पार भी वैसे ही आ रही थीं। वह कॉलोनी के बाहर आया। रिक्शा पकड़ा और सीधे हम लोगों के पास। रास्ते भर वह सोचता आया कि जाकर सीधा अर्जुन गढ़वाली से मिलेगा और डेविड को फोड़ डालेगा।

हम जितना हँसते, गांधी को उतनी मिर्ची लगती।

गढ़वाली बोला, फोड़ने को तो अभी फोड़ देते हैं उसको। पन ये बता, डिंपा की माँ का क्या हुआ? तू तो दरवाजा बंद करके आ गया, अब वो तो उसकी फाड़ देगा। बेचारी, भाग भी नहीं पाएगी पेटीकोट में।

और सारे लुक्खे फन फन करते हँसने लगे।

उसके बाद डिंपा की माँ गांधी से नजरें नहीं मिला पाई, न ही गांधी। कई दिनों तक तो डिंपा की माँ नजर ही नहीं आई। एक दिन गांधी कॉलोनी में जाकर देख आया कि वह ठीक तो है। उसे कुछ पता नहीं चला। एक दो लोगों से पूछने की कोशिश की तो वो लोग गांधी को ऐसे देखने लगे, जैसे मंगल ग्रह से आया हो। शाम होने के बाद काफी देर तक छिप कर उसके घर के पास खड़ा रहा, तो टयूबलाइट की रोशनी में डिंपा की माँ का अक्स खिड़की में दिख गया। उसे अच्छा लगा। वह लगातार सोच रहा था कि डेविड को बजा दे, पर गढ़वाली ने उसको हड़का दिया।

बोला, शादी करेगा उससे? तेरी उमर के बच्चे हैं उसको, पालेगा क्या? गांधी कुछ नहीं बोला।

फिर कायको उछल रहा है? गप बस, और ढंग का माल ढूँढ़ अपने वास्ते। और हाँ, माल ढूँढ़, मालगाड़ी नहीं।

गांधी को फिर बुरा लगा।

बहुत अच्छी है वो। फुक्कट में उसका आदमी उस पर डाउट करता रहता है।

बहुत अच्छी है तो, तेर्को घर में कायको ले के गई?

वो तो दोस्ती हो गई थी। ये वास्ते।

दोस्ती से ही होता सब शुरू। तू क्या माँ बनाने की नीयत से जाता था उसके साथ?

नहीं, उसका मरद बहुत खराब है। खुद चौबीसों घंटे तर्राट रहता है। राँड़गिरी में लगा रहता है। अरे, हम दोनों ने साथ में कित्ती आइटम बजाई है। भोत बड़ा चमड़ी है साला।

और तू उसी की वाइफ को बजाने चला गया? जब तू उसके साथ ये सब कर चुका है, तो तेर्को अपने घर में देख कर वो क्या सोचेगा? फिर कैसे छोड़ेगा तेर्को? सत्यनारायण करवाने आया है, ये सोचेगा वो तेर्को देखके?

वैसे, गांधी येड़ा से बड़ा फट्टू था। वह गढ़वाली से पूछ ही इसलिए रहा था कि वह मना कर दे। इतना ही मन था, तो बिना पूछे ही बजा कर आ जाता। गढ़वाली रोक लेता क्या उसको?

इन दिनों डेविड का दुबई वाला भाई आया हुआ था। डेविड दिल से उसके साथ लगा रहता है। भाऊ बोलता है उसको। एक दो साल पहले आया था पिछली बार। भाऊ डिंपा पर जान देता है। जब भी आता है, कुछ न कुछ बड़ा गिफ्ट लेकर आता है। पिछली बार आया था, तो डिंपा के लिए मस्त स्पोर्ट्स साइकल और एक स्टडी टेबल लेकर आया था। चॉकलेट बिस्किट की तो गिनती ही नहीं। डिंपा की माँ के लिए हमेशा मेकअप का सामान होता था। और डेविड के लिए दारू। महँगी विदेशी। डेविड से बहुत दोस्ती है उसकी। इतने साल बाद भी याद रखता है, कम है क्या? चार पाँच दिन रहता है, फिर डेविड को लेकर शिरपूर चला जाता है।

इन दिनों आया है, तो सारा समय डिंपा के साथ रहता है। जितनी देर डेविड घर में रहता है, वह डेविड के साथ, वरना डिंपा को लेकर बाहर निकल जाता है। डिंपा उससे दुनिया भर की बातें पूछता रहता है। उसे बहुत अच्छा लगता है दुबई की बातें सुनना, फ्लाइट की बातें सुनना। एयरपोर्ट पर कितना मजा आता होगा, कैसे विदेश में काका अपनी मराठी सुनने को तरस जाता है।

भाऊ दुबई में एक होटल में काम करता है। शिरपूर का है। कमाने के लिए दुबई गया है। उससे पहले दो साल बहरीन के एक होटल में रह चुका है। खाना बनाता है। साउथ इंडियन डिश। भाऊ के हाथ का सांबर कभी पी लो, तो अक्खी लाइफ इंडिया में सांबर पीने को दिल नहीं करेगा। काका एक से एक कहानी बताता है। जब वह बहरीन गया था, तो उसके पास बिल्कुल पैसे नहीं थे। एक दोस्त के साथ गया था। उससे पहले मुंबई में कुक था वो। पर पहले साल वो बहरीन से लौटा, तो सबसे पहले गाँव में तीन एकड़ जमीन खरीदी थी उसने। उसके बाद एक दो साल में आ जाता है महीने भर के लिए। यहाँ प्रॉपर्टी खड़ी करता है और फिर चला जाता है। ऐसे ही एक भांजे को उसने डॉक्टरी के कोर्स में डाल दिया है। भाऊ का अपना कोई परिवार नहीं है। उसने शादी ही नहीं की। एक बार डिंपा की माँ ने पूछा था, भाऊ, अभी तक क्यों नहीं की? कोई पसंद नहीं आई क्या?

पसंद तो आई, लेकिन अभी तक उसने हाँ नहीं की।

जवाब सुन कर डिंपा की माँ शर्मा गई थी। बटनवाला के कारखाने में भाऊ भी आता था। बटनवाला के साथ उसकी दोस्ती थी। वह हमेशा डिंपा की माँ को हँसती हुई निगाह से देखता था। जवाब में डिंपा की माँ भी उसे एक हँसती हुई निगाह का दान करती थी।

डिंपा की माँ खाना परोसती है।

भाऊ कहता है, मैंने अक्खी दुनिया का खाना खाया, लेकिन वहिणी जैसा बनाती है, वैसा कोई नहीं बना सकता।

डिंपा की माँ खुश होकर उसे देखने लगती है। कुछ कह नहीं पाती।

भाऊ पलंग पर बैठ कर खाता है। डेविड की आदत है यह। डेविड को कितनी बार बोला जाय कि डाइनिंग टेबल पर बैठ जाओ, उसको नहीं जमेगा। ज्यादा बोलो, तो जमीन पर बैठ जाएगा। ज्यादा देर तक जमीन पर बैठेगा, तो फिर कमर दर्द कह कर चिल्लाएगा। बोलेगा, ठंडी जमीन सीधा कमर में घुस गई।

भाऊ तारीफ की नजर से उसे देखने लगा। उसकी आदत है, देखेगा, तो देर तक देखता रहेगा, नहीं तो नजर भी नहीं उठाएगा।

ये डेविड की तरह क्यों देख रहा है? नहीं, डेविड नहीं, यह तो उसकी तरह देख रहा है? वैसी ही मूँछ है, घनी मोटी। इसकी भी शर्ट से सीने के बाल वैसे ही झाँक रहे हैं? नहीं, यह तो गुड्डू गांधी की तरह देख रहा है? डिंपा की माँ उसे देखे जा रही है। उसे लग रहा है, भाऊ को आज पहली बार देख रही है वह। इतने सालों में उसने देखा ही नहीं कि भाऊ उसकी तरह लगता है, जो उसके इंतजार में अभी भी बैठा है। क्या उसका इंतजार कभी खत्म होगा? क्या डिंपा की माँ भी किसी इंतजार में बैठी है? क्या डिंपा की माँ का इंतजार कभी खत्म होगा? क्या भाऊ का हाँ सुनने का इंतजार कभी खत्म होगा? जीसस लौट कर आएगा और बताएगा कि इंतजार की हमेशा जीत होती है। दुनिया की हर चीज को हक है थकने का, इंतजार को नहीं है।

उसने डेविड को वह सपना बताया था। डेविड ने कहा था, तेरा इंतजार खत्म हो गया है।

कैसे खत्म हो गया?

जब मैं तेरे साथ नहीं था, तब भी तेरे साथ था। तेरे सपने में आता था मैं।

हाँ, तभी तो तुम जब मूड में होते हो, तो कहते हो डार्लिंग, मैं जा रहा हूँ। अब सपने में मिलूँगा तुझसे।

हाँ, सपने में मैं बिल्कुल अलग दिखता हूँ। जब तू मेरा सपना देखती है, तो मुझे पता चल जाता है, मेरी आँखों में नींद उतरने लगती है। वे मुँदने लगती हैं। ऐसा लगता है, तेरी नींद मेरी आँखों को अपने पास बुला रही है।

डिंपा की माँ की आँखों में नींद उतरने लगी है। उसकी आँखें मुँद रही हैं।

भाऊ खा रहा है या डेविड? कौन है, जो उसके सामने बैठा है। कौन है, जो इतनी देर से उसे तके जा रहा है? कौन है, जिसकी आँखों का एक कोना उसके लिए गीला रहता है? कौन है, जो सपना देखता है और सामने वाले को सपना दिखाने के लिए अपनी पूरी नींद कुर्बान कर देता है?

भाऊ डिंपा को एक और कहानी सुनाने में लग गया है। डिंपा की आँखें चमक रही हैं। अपनी आँखों में सपने बो रहा है। ये जो चमक है, वह खेत में पानी डालने की चमक है। ये बीज बिखेरने वाली चमक आई। उफ! डिंपा की आँखें कितनी चौड़ी हो गई हैं। ये खेत में हल चलने की चमक है। आँखें फिर पानी से भर गईं। ये बरसात की चमक है। इससे बीज आँखें खोलते हैं। और ये, डिंपा की आँखें हरी हो गई हैं। सपनों की फसल लहलहा रही है। डिंपा, चल, सपनों की फसल को काट लेते हैं, इससे पहले कि फिर एक और बारिश हो, सारी फसल चौपट हो जाए।

डिंपा की माँ के पास अकेलेपन का एक बीहड़ है। उसमें ये चमक कितनी सुंदर दिख रही हैं जब अपनी आँखें बेनूर हो जाएँ, तो दूसरों की आँखों की चमक ताकत देती है।

डेविड की आँखों में ऐसी ही चमक आती थी, जब वह डिंपा की माँ के करीब बैठता था।

मैं तेरे पास होता हूँ, तो खुशी से मेरा दिल काँपने लगता है। तब मुझे डर लगता है कि मेरी खुशी बचेगी न? रहेगी न मेरे पास ताउम्र?

क्यों नहीं रहेगी? हम दोनों खुशी की इस चमक को अपनी पुतलियों से पकड़ कर रखेंगे।

डिंपा की माँ के बदन का रंग बदल रहा है। साहिब बहुत बड़ा रंगरेज है। उसकी बातें याद करो, तो रंग बदलने लगता है। उसकी आँखों में उसकी रंग की सफेदी छा रही है। उसका मन कर रहा है कि इसी वक्त अँधेरा हो जाए, और वह किसी लैंप पोस्ट के नीचे बैठ कर देर तक घुटनों में सिर छिपा कर रोती रहे। उसका वादा है जब उदास होना, लैंप पोस्ट के नीचे एक बार आ जाना। वहाँ, जहाँ रोशनी बहुत कम होती है। और जो एक मैदान के किनारे है, जहाँ सारे विचार और भाषा खो जाएँगे... जहाँ इस ठसाठस भरी दुनिया के बारे में कुछ कहने को जी नहीं करेगा... जहाँ भी रहेंगे हम दोनों, वहाँ नजर जरूर चली जाएगी। हम बिना भाषा, बिना विचार के वहाँ मिल लेंगे... उस मैदान में, जहाँ घास होगी हमारी आत्माओं के कद से ज्यादा...

कौन आएगा लैंप पोस्ट के नीचे, अगर कभी उदास होकर मैं बैठ गई तो?

मम्मा, भाऊ कैसा लगता है तुझको?

अच्छा है न। क्यों, क्या हुआ?

मुझे भी बहुत अच्छा लगता है। मैं उसको बोल भी रहा था एक दिन कि काका, तू मेरा बाप होता, तो बहुत अच्छा होता।

तेरा बाप ही अच्छा है रे।

क्या अच्छा है? तू भी बोलेगी अब ये बात?

क्यों? मैंने कब कहा कि अच्छा नहीं है।

पर कहना तो चाहती है न?

नहीं, मेरे लिए बहुत अच्छा है वो। तेर्को दूसरा बाप चाहिए, तो पूछ ले एक बार अपने बाप से। डिंपा की माँ हँसने लगी।

क्या पूछूँ कि पापा, मैं तुम्हें रिप्लेस करना चाहता हूँ भाऊ से?

हाँ, पूछ लेना। डिंपा की माँ ने होंठ दबा लिए।

वो मेर्को कुछ नहीं बोलेगा, आ के तुझ पे भड़क जाएगा कि यानी अब तू उसके साथ...

चुप्प। डिंपा की माँ ने आँख दिखाई।

उसकी आदत है वो, पर दिल से बुरा थोड़े है।

मम्मा, दिल को चाटना होता है क्या? और वैसे भी जो दिल में होता है, वो बाहर आ ही जाता है। डिंपा की माँ चुप हो गई।

मैंने भाऊ से बात कर ली है। मैं अपना पासपोर्ट बनवा रहा हूँ। मैं दुबई चला जाऊँगा। यहाँ नहीं रहने वाला।

क्या करेगा दुबई जाकर?

काका ने बोला है, उसके होटल में बात कर लेगा वो।

पापा से बात कर ले। वो जैसा बोलते हैं...

पापा से बात नहीं करनी। वो कभी नहीं जाने देंगे।

क्यों नहीं जाने देंगे? जाकर अच्छा कमाएगा, तो क्यों मना करेंगे?

मना करेंगे क्योंकि तू भी मेरे साथ जा रही है।

मैं क्यों जाऊँगी? तुझे जाना है तो जा। मैं क्यों जाने लगी?

तू भी चलेगी, क्योंकि मेरे पीछे पापा तेरा जीना हराम कर देंगे।

नहीं रे। मैं उसको छोड़ कर नहीं जाऊँगी।

इतना होने के बाद भी? हर दूसरे दिन का ड्रामा है। बात बात पर मारपीट।

इसका मतलब घर छोड़ कर तो जाना नहीं होता। और जाना ही होता, तो बहुत पहले चली जाती।

चले जाना था, तुझे हम लोगों को लेकर चले जाना था। कम से कम इस माहौल से तो छुट्टी मिलती।

देख डिंपा, उसको बता कर जाऊँगी, तो वह जाने नहीं देगा। और बिना बताए जाऊँगी, तो बोलेगा, कि भाऊ के साथ भाग गई है वो।

तो वैसे भी तो इतना बोलता है। तेरे बारे में कम बोलता है क्या?

पर मैंने तो ऐसा कभी किया नहीं। मैं तो सच्ची रही। मुझे क्या फर्क? बोलता रहे।

वही तो मैं भी बोल रहा हूँ, बोलता रहे, सोचता रहे। कम से कम तेरी लाइफ तो अच्छी रहेगी न।

जो चीज मैंने नहीं की, उसके लिए क्यों सुनूँ मैं?

देख, क्या किया तूने, क्या नहीं किया, इससे फर्क नहीं पड़ता। सवाल एक बेटर लाइफ का है। वैसे, शिरपूर में क्या किया था, मैंने भी देखा था, पर वो दूसरी बात है।

क्या किया था शिरपूर में मैंने।

छोड़। देखा था मैंने।

बोल ना, क्या किया था मैंने?

हाथ नहीं पकड़ा था उसका।

मैंने नहीं पकड़ा था। उसने पकड़ा था। और फिर मैंने छुड़ा भी दिया था। और वो जो भी था, उसको समझने के लिए तू बहुत छोटा है।

मैं छोटा नहीं हूँ। तूने हाथ पकड़ा था। पापा तुझ पर चिल्लाता है, तो ऐसे ही नहीं चिल्लाता। बोल ना, भाऊ क्यों आता है रात को तेरे कमरे में?

सटाक। डिंपा की माँ को अब बर्दाश्त नहीं है। उसने अपनी पूरी ताकत से डिंपा के मुँह पर मारा है। गालों पर नहीं, होंठ पर।

डिंपा! तू तो अपने बाप की भाषा बोलने लगा है। इतना बड़ा हो गया है तू?

मैं क्या बाप की भाषा बोल रहा हूँ? तूने जो किया है, वही बता रहा हूँ। तुझको इज्जत से बोल रहा हूँ कि यहाँ से चले चलते हैं।

अरे, तुझको जाना है, तो जा मुझको क्यों ऐसा बोल रहा है?

और तू यहाँ, जो मर्जी आए, करती रहे? भाऊ ने बोला है, तू आती है, तो वह मुझको भी काम दिलाएगा। तेरे लिए नर्सिंग का काम देखेगा वहाँ पर।

यानी तू मेरा सौदा कर रहा है। मैं जाऊँगी, तो वो तेरे लिए काम देखेगा, नहीं तो...

कोई सौदा नहीं है मम्मा। डिंपा चीख रहा था। कोई सौदा नहीं। मेरा सपना है, बाहर जाने का। बस उसके लिए पूछ रहा हूँ तुझको। और मैं चाहता हूँ कि तू उस आदमी के चंगुल से छूटे, इसलिए बोला।

घर से निकाल कर बाजार में बिठाना चाहता है मुझको? घर में छत है। वहाँ जाऊँगी, तो भाऊ छोड़ेगा मुझको? जब वो तेरे सामने ऐसी शर्त रख सकता है, जब वो रात को मेरे कमरे में घुस सकता है जबर्दस्ती, तो तेर्को लगता है, छोड़ेगा मुझको?

मम्मा, अगर तू वहाँ भाऊ के साथ रहेगी, तो रोज तेर्को चौराहे पर नंगा तो नहीं करेगा? मारेगा पीटेगा तो नहीं। कम से कम इज्जत से तो रह लेगी...

डिंपा की माँ ने फिर उसके मुँह पर एक हाथ मारा। और फिर दूसरा। और फिर तीसरा।

मैं माँ हूँ तेरी... माँ हूँ... माँ हूँ तेरी... भड़वे, ऐसे कैसे बोल सकता है तू... माँ हूँ तेरी... इतना ही भला चाहता है तो अपने साथ रख माँ की तरह... रंडी की तरह नहीं... मेर्को बेच कर तू नौकरी ढूँढ़ेगा... सपना पूरा करेगा...

डिंपा की माँ पर आग हाथ रख गई थी। एक तीली जली थी और उसके नथुनों के जरिए उसके फेफड़ों में घुस गई थी।

तेर्को इतनी ही फिकर होती माँ की, तो लड़ता अपने बाप से... बोलता उसको कि माँ को क्यों मारता है... क्यों शक करता है उस पर ...इतना ही मरद था, तो पूछता उससे ...पर तू मुझको बोल रहा है... बाप से भी गंदा है तू... वो तो सिर्फ इल्जाम लगाता है ...सोचता है ... तू तो वैसा करके दिखाना चाहता है ...छी डिंपा ...कैसे बोल दिया रे तूने...

डिंपा की माँ को लग रहा है कि आज वह इतना रोए कि फिर कभी उसकी आँखों से आँसू ही न निकलें। वह एक तकिए में मुँह छिपाए है। उसे लग रहा है, उसके पूरे बदन पर एक भी कपड़ा नहीं है। उसकी रूह को नंगा कर दिया गया है। उसने जो चूनर बहुत प्यार से पहनी थी, उसे कोई तार तार कर गया है।

डिंपा के होंठ फट गए हैं। वह माँ को उठा कर बिठाना चाहता है, पर डिंपा की माँ उसका चेहरा भी नहीं देखना चाहती। हट जा तू यहाँ से ... हट जा इस वक्त।

डिंपा की माँ चप्पल उठा कर हाथ में ले लेती है। तू कैसे सोच सकता है ये सब... मुझे बेच देगा तू...

हट पीछे... डिंपा ने तेजी से उसे धक्का दिया। कसम खा रखी है मेरी बात को न समझने की... तू न... मेरे बाप की लात खाने की आदी हो गई है... तेर्को वही लात चाहिए होती है समझने को...

डिंपा दनदनाता हुआ चला गया।

उसकी माँ जमीन पर एक तरफ पड़ी उसका जाना देखती रही।

अँधेरा बहुत हो गया है। आसपास कोई आग नजर नहीं आती, लेकिन पूरी दुनिया का धुआँ यहाँ जमा है। नाक से घुसता है, फेफड़ों को जख्मी कर देता है। पूरा धुआँ आँख में जा रहा है। आँख की दीवार पर एक भारी खुरचन है। लाख कोशिश है कि आँखें खोल ले, पर कोई पलकों को रस्सी से बाँध कर नीचे की ओर खींच रहा है। काबू ही नहीं। मुँदी जा रही हैं। इतना गाढ़ा धुआँ कहाँ से आ रहा है?

लैंप पोस्ट के नीचे आज रोशनी बहुत कम है। पीली रोशनी ने बगावत कर दी है। इतना गाढ़ा धुआँ और इतनी कम रोशनी। एक पत्थर रखा है लैंप पोस्ट के नीचे। सफेद रंग का पत्थर। एक आदमी बैठ सकता है बस। सिकुड़ कर। घुटनों के बीच सिर छिपा कर। काली रंग की एक शॉल ओढ़ कर। आधे चेहरे पर शॉल लपेट कर। चेहरे पर सिर्फ इतनी जगह बचती है कि एक जोड़ी आँखें उसमें से झाँक सकें। आँख, जिसमें पिटा हुआ आँसू होता है। आँख, जिसमें उम्मीद और इंतजार का अर्क होता है आँख, जिसे कोई ध्यान से देखे, तो उसकी भाषा सुन सकता है। आँख, जहाँ से रूह शरीर में प्रवेश करती है। आँख, जहाँ से ईश्वर अपनी रजा बताता है। आँख, जिसे देख कर ईश्वर हमारी रजा समझ जाता है। मैं बैठी हूँ यहाँ एक काली शॉल ओढ़ कर चेहरे को ढाँप, रूह का बदन पहन कर। मुझे मिलना है तुमसे इस जगह, जहाँ एक मैदान है...

ऊपर से रोशनी गिरती है, जैसे मद्धिम बारिश में बूँदें। बेआवाज।

बेआवाज पिटी है आज डिंपा की माँ। सुबह से ही तांडव मच गया था घर में। डेविड आज अपने सबसे उग्र रूप में था।

देर से आया। और आते ही सनक गया।

तूने भाऊ को भी नहीं छोड़ा?

मैंने क्या किया?

तू रात को भाऊ के कमरे में क्यों घुस गई थी?

मैं कब घुसी उसके कमरे में?

भाऊ ने ही बताया मुझको। पूछ रहा था, तुझे नींद में चलने की बीमारी है क्या? जाके उसके बगल में क्यों सो गई तू?

मैं नहीं गई थी भाऊ के कमरे में। वो भड़वा आया था मेरे पास... हाथ जोड़ कर कह रहा था... चल मेरे साथ दुबई चल... तेरे बिना नहीं जी सकता...

झूठी औरत। कितनी बार तेरे झूठों की गांड खोलूँगा मैं...

पूछ ले उससे ... आज से नहीं... दस साल से बोल रहा है वो मेर्को... मेरे साथ चल करके...

दस साल से चल रहा है तेरा नाटक... साली... तेरी प्यास बुझती नहीं और दूसरे को बोल रही है। उसको जानता हूँ मैं बचपन से... और सुन रंडी... तुझे भी जानता हूँ... तेरे हर झाँटे की हरकत... मादर...

डिंपा की माँ बोलती रही कि उसने कुछ नहीं किया है। उस पर यकीन करो।

पर डेविड का हाथ फिर चलने लगा था। एक चित्रकार, जो अपनी कृति पर तेजी से रंग फेंक रहा है, ऐसे कि पूरे चित्र को रंगों का कसाईबाड़ा बना कर रख देगा। किसी की गरदन पर तलवार चला दी हो, तो सिर्फ एक ही रंग चारों दिशाओं में फैलेगा। डिंपा की माँ पर एक ही रंग फैल रहा था। पहले उसकी आँखों का रंग बदला। फिर उसके गालों का। फिर उसके होंठों का। उसके पूरे बदन का रंग बदल रहा है। उसके रंगरेज साहिब ने आज फिर उसका रंग बदल दिया है। उसकी चूनर में फिर उसने अपनी ही मर्जी का रंग भरा है। उसकी मर्जी पूछी तक नहीं।

डिंपा की माँ बेआवाज पिट रही थी। रो नहीं रही थी। बस पिट रही थी। कोई आवाज नहीं। पहले चार खाती थी, तो एक लगा भी देता थी। चार गालियों के बदले एक बार भड़वा तो कह देती थी। उसने अपने बदन को चूनर की तरह बिछा दिया है। हरी घास के ऊपर बिछी हुई चूनर। रँग दे, आज जिस रंग में रँगना चाहता है।

तेरी रजा, मेरी रजा, तू ही मेरा काजी।

उसने आँखें बंद कर ली हैं। साहिब रंग रहा है उसकी चूनर। चूनर सीतल हो रही है। रंगरेज पियारा चतुर सुजान आज फिर दयालु हुआ है। लग रहा है सब कुछ उस पर बार दूँ रे तन मन धन और प्रान। उसे लग रहा है कि कितना प्यार भरा हुआ है उसके भीतर। कितना प्यार कर रहा है। सारा कुछ आज ही उँड़ेले जा रहा है। मैं कैसी एक हल्की चूनर में बदल गई हूँ। वह पीट रहा है। मैं उड़ रही हूँ। मेरा बदन हवा से हल्का हो गया है। रूई हूँ मैं। सफेद रूई का लिहाफ ओढ़ रखा है मैंने। मुझे घाव नहीं लग रहा। मेरा बदन तो चूनर बन गया है। चूनर को घाव कहाँ लगता है? मैं तो एक रूह में बदल गई हूँ। रूह कहाँ रोती है? वह तो बस देखती है खुद पर चढ़ती हुई चूनर का रंग।

डिंपा की घायल माँ को घाव नहीं लग रहे। उसके मन में आक्रोश नहीं आ रहा। वह पलट कर उसके सिर पर संड़सी नहीं मारना चाहती। उसे मारा हुआ गिलास मार कर नहीं लौटाना चाहती। साहिब तो बहुत बड़ा रंगरेज है। वह तो उसकी चूनर रंग रहा है।

वह लैंप पोस्ट के नीचे खड़ी है, जहाँ उसने किसी को इंतजार करने के लिए कहा था। वह कब से कर रहा है इंतजार? उसका साहिब भी तो वहाँ इंतजार ही कर रहा है? वह खुद भी वहाँ इंतजार कर रही है? वहाँ, जहाँ सिर्फ एक आदमी बैठ सकता है। जहाँ सिर्फ एक पत्थर है। जहाँ सिर को घुटनों में छिपा कर बैठा जाता है। जहाँ रोशनी ऐसे गिरती है सिर पर बेआवाज, जैसे बूँद गिर रही हो।


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