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कविता

काया
गीत चतुर्वेदी


तुम इतनी देर तक घूरते रहे अँधेरे को
कि तुम्हारी पुतलियों का रंग काला हो गया
किताबों को ओढ़ा इस तरह
कि शरीर काग़ज़ हो गया

कहते रहे मौत आए तो इस तरह
जैसे पानी को आती है
वह बदल जाता है भाप में
आती है पेड़ को
वह दरवाज़ा बन जाता है
जैसे आती है आग को
वह राख बन जाती है

तुम गाय का थन बन जाना
दूध बनकर बरसना
भाप बनकर चलाना बड़े-बड़े इंजन
भात पकाना
जिस रास्ते को हमेशा बंद रहने का शाप मिला
उस पर दरवाज़ा बनकर खुलना
राख से माँजना बीमार माँ की पलंग के नीचे रखे बासन

तुम एक तीली जलाना
उसे देर तक घूरना


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