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विमर्श

गांधी की व्यथा - एक प्रसंग के बहाने कुछ बातें
राजीव रंजन गिरि


महात्मा गांधी के सचिव थे - महादेवभाई देसाई। महादेव भाई उन अर्थों में सचिव नहीं थे, जैसे आज के ज्यादातर सचिव होते हैं। महादेवभाई सच्चे अनुयायी थे गांधीजी के। सहयोगी भी। गांधीजी की चिंता और चिंतन से इत्तेफाक रखते थे। इनके शब्द और कर्म के प्रति भरोसा का भाव था। महादेवभाई के मन में। गांधी जी भी महादेवभाई के प्रति अपने 'निकट का संबंध' स्वीकार करते थे। महादेवभाई ने गांधीजी के जीवन से जुड़े अनेक छोटे-बड़े प्रसंगों को लिखा है। अपनी डायरी में।

हिंदी के अनूठे गद्यकार अनुपम मिश्र द्वारा सुसंपादित और गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली से प्रकाशित दोमाही पत्रिका 'गांधी मार्ग' (मई-जून 2012) में, महादेवभाई लिखित, एक मार्मिक प्रसंग छपा है। 'ऐसा भगवान चाँदी का सिक्का है' शीर्षक से।

डेलांग, उड़ीसा में गांधी सेवा संघ की वार्षिक बैठक थी। इस बैठक में महादेवभाई की पत्नी शामिल हुई थीं। इस मकसद से कि पुरी जा सकेंगी। महादेवभाई की पत्नी को यह मालूम नहीं था कि पुरी का मंदिर हरिजनों के लिए नहीं खुला है। जबकि वे गांधीजी की हरिजन-यात्रा के दौरान जेल भी थीं। पहले दिन के भाषण में ही गांधीजी ने कहा भी था कि ''जगन्नाथ का मंदिर हरिजनों के लिए खुला हुआ नहीं है और जब तक यह स्थिति बनी हुई है, तब तक उनके विचार से जगन्नाथ जगत्-नाथ नहीं हैं; वे केवल उन लोगों के नाथ हैं जो उनकी छाया तले फलते-फूलते हैं।'' महादेवभाई को लगा कि यह भाषण उनकी पत्नी समेत सभी लोगों के लिए चेतावनी जैसा होगा। लिहाजा वे पुरी मंदिर नहीं जाएँगे। हालाँकि महादेवभाई के मन में आशंका भी थी। कि उनकी पत्नी पुरी जरूर जाएँगी। पर साथ में कस्तूरबा गांधी जा रही थीं। महादेवभाई ने मान लिया कि कस्तूरबा मंदिर के बाहर ही रहेंगी। इसका असर उनकी पत्नी और अन्य लोगों पर भी होगा और कोई भी अंदर नहीं जाएगा। महादेवभाई ने जैसा सोचा, वैसा हुआ नहीं। उनकी पत्नी मंदिर में गई। कस्तूरबा गांधी भी। साथ गए कुछ लोग भी अंदर गए। महादेवभाई के 'नादान बेटा' (जिन्हें हम लोग नारायणभाई देसाई के नाम से जानते हैं।) और साथ गए कुछ सदस्य बाहर ही रहे। इनके बेटे का पंडों से खूब झगड़ा भी हुआ।

इन लोगों के वापस आने के बाद गांधीजी को सारी बात मालूम हुई। जानकर उन्हें काफी दुख हुआ। रात भर नींद नहीं आई। उन्होंने महादेवभाई, उनकी पत्नी और कस्तूरबा गांधी को बुलाकर पूछा। इन लोगों ने जो सफाई दी उससे गांधीजी को संतोष नहीं हुआ। वे और भी चिढ़ गए। उन्होंने महादेवभाई को ही मुख्य रूप से दोषी माना। गांधीजी का कहना था कि महादेवभाई को अछूतोद्धार आंदोलन, हरिजन-यात्रा की पृष्ठभूमि सबको समझानी चाहिए थी। ''किस प्रकार सन् 1934 में गांधीजी पुरी गए थे, किस प्रकार से वहाँ पर सुनियोजित ढंग से हिंसा की गई थी और कैसे उन्हें उड़ीसा की पदयात्रा करनी पड़ी थी, कैसे सुधारकों को चेतावनी दी गई थी कि जब तक हरिजनों को प्रवेश नहीं दिया जाता तब तक वे लोग मंदिर में न जाएँ।'' यह सब सुनने के बावजूद यदि महादेवभाई की पत्नी कहना न मानती तो गांधीजी की मदद लेनी चाहिए थी। अगर तब भी वे जाने का आग्रह करती तो उन्हें जाने दिया जाता। गांधीजी का मानना था कि ऐसा नहीं करने से पता चलता है कि महादेवभाई पूरी तरह से सावधान नहीं थे। ऐसा करके महादेवभाई ने गांधीजी के प्रति, अपनी पत्नी के प्रति तथा जिस उद्देश्य को लेकर वे सभी चल रहे थे, उस उद्देश्य के प्रति अन्याय किया है।

गांधी सेवा संघ के सदस्यों के सामने गांधीजी ने इस बारे में अपनी व्यथा सुनाई। उन्होंने कहा कि ''आप चाहे चरखा संघ, देहाती धंधे या हरिजनों का काम करते हों, जो कुछ काम आप करते हैं, वह तो केवल एक बहाना है। उस बहाने हम यह देखना चाहते हैं कि सत्य कहाँ तक चल सकता है। अहिंसा हमको कहाँ तक ले जा सकती है। हम अहिंसा के साथ रहे हैं। लेकिन असली परीक्षा इसमें नहीं है। सबका निचोड़ तो यह हो जाता है कि उससे हमें आजादी प्राप्त हो। इसलिए हम इन सब प्रवृत्तियों को चला रहे हैं। लेकिन अछूतपन का विचार हमको इस तरह नहीं करना चाहिए। हमको तो यह प्रार्थना करनी चाहिए कि अगर अछूतपन हिंदू धर्म का अंग है और वह नहीं मिट सकता तो फिर भले ही हिंदू धर्म ही मिट जाए। अछूतपन जैसा धब्बा किसी कौम पर न रहे। ...मैं वर्षों से चीख-चीख कर कह रहा हूँ कि जिस मंदिर में हमारे अछूत भाई नहीं जा सकते, वहाँ हम न जाएँ। क्या उस मंदिर में मेरी पत्नी, लड़की या माँ जा सकती है? हमारा कर्तव्य है कि उन्हें समझाएँ और यदि वे न माने तो हमारा कर्तव्य है कि माता को भी त्यज दें और पिता को भी।'' गांधीजी के इस उद्धरण में तीन बातें काबिलेगौर हैं। एक, हम जो भी काम कर रहे हैं, उसके जरिए देखना है कि सच्चाई और अहिंसा के जरिए हम कहाँ तक जा सकते हैं? हम जो भी काम कर रहे हों, उसकी बुनियाद में सत्य और अहिंसा है या नहीं?

दो, छुआछूत यदि हिंदू धर्म का अंग है और यह खत्म नहीं हो सकता तो इससे ठीक है कि हिंदू धर्म ही खत्म हो जाए। हमें यह प्रार्थना करनी चाहिए कि या तो अस्पृश्यता खत्म हो या हिंदू धर्म। दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते। छुआछूत कायम रहने की हालत में हिंदू धर्म का खात्मा गांधीजी को मंजूर था। यह उस व्यक्ति का कहना था जो खुद को सच्चा हिंदू मानता और स्वीकार भी करता था। यह उस शख्स का स्पष्ट मत था, जो पूरी साफगोई से बताता था कि 'मैं हिंदू क्यों हूँ?' छुआछूत को खत्म करने के लिए गांधीजी जद्दोजहद कर रहे थे, उसकी स्वाभाविक परिणति इस विचार में झलकती है। इसमें उजागर हुई है एक सच्चे धार्मिक की व्यथा। अस्पृश्यता को समाप्त करने की प्रतिबद्धता के परिणामस्वरूप जो आंतरिक पीड़ा गांधी के मन में थी, उसे यह तो गवारा था कि हिंदू धर्म समाप्त हो जाए; पर यह कतई मंजूर नहीं था कि किसी के साथ छुआछूत बरता जाए। यह एक वैष्णव की पुकार थी। इन्हीं विचारों के कारण नरसी मेहता की रचना 'वैष्णव जन तू तेने कहिए पीर पराई जाने रे' गांधीजी के सबसे पसंदीदा भजनों में शुमार था। (इस पक्ष पर और ज्यादा जानने के लिए देखिए - 'अंतिम जन', मई का 'प्रसंगवश' स्तंभ) गांधी जी का दृढ़ विश्वास था कि अस्पृश्यता हिंदू धर्म का अंग नहीं है। यह विकृति कालांतर में इस धर्म में समा गई। हिंदू धर्म ही नहीं, किसी भी कौम में छुआछूत की रवायत रहे, इसे वे गलत मानते थे। छुआछूत को वे धब्बा मानते थे। इसकी सफाई जल्दी करना जरूरी समझते थे।

तीन, उनकी इच्छा थी कि दूसरे लोग भी तब उस मंदिर में न जाएँ जब तक तथाकथित अछूतों के लिए खोल न दिया जाए। ऐसी कामना वे परिवार के सदस्यों से भी करते थे। अगर परिवार के सदस्य न मानें, ऐसे मंदिरों में जाएँ तो उनको त्याग दिया जाए। भले ही इसमें माता-पिता ही क्यों न हों। इतनी कठोर शर्त कायम की थी अपने विचारों की प्रतिबद्धता के कारण। आखिर ऐसा क्यों सोचते थे गांधीजी? उन्होंने पुरी मंदिर के प्रसंग में कहा कि ''महादेव अपने धर्म को भूल गया। उसने सोचा उन्हें श्रद्धा है तो मैं क्यों खलल पहुँचाऊँ? उसने उस मूढ़ श्रद्धा को धर्म मान लिया। उसने यह नहीं सोचा कि वह तो बढ़ा (गांधीजी) पड़ा है, उसके दिल पर क्या असर होगा, समाज पर क्या असर होगा? हमें व्यक्तिगत धर्म और सामाजिक धर्म को समझ लेना चाहिए।''

गांधीजी द्वारा पेश कठोर शर्त का कारण महादेवभाई का धर्म, मूढ़ श्रद्धा, व्यक्तिगत धर्म और सामाजिक धर्म के बीच के रिश्ते को समझने पर पता चलता है। अपना कौन-सा धर्म भूल गए थे महादेवभाई? क्या यह माना जाए कि गांधीजी की हरिजन-यात्रा जिसके प्रति महादेवभाई की भी प्रतिबद्धता थी, को भूल गए थे। क्या इन्होंने अपनी पत्नी की मूढ़ श्रद्धा को धर्म मान लिया था? सच तो यह है कि महादेवभाई भूले नहीं थे। महादेवभाई ऐसे मंदिरों में जाने के विरुद्ध थे, जो हरिजनों के लिए तो खोल दिए गए हों, पर जिनमें बेईमान पंडों का आश्रय हो। हाँ, उन्होंने ध्यान इस मसले पर थोड़ा कम दिया था। उनको यह भी लगा था कि 'गांधीजी के हृदय की विशालता तो असीम है और उन्होंने मंदिर जाने का इतना आग्रह रखनेवाली मेरी पत्नी को क्षमा कर दिया होगा?' गांधीजी का हृदय विशाल था और असीम भी। बावजूद इसके वे नाराज थे। उन्होंने माफ नहीं किया था। कारण कि इतिहास के उस दौर में वे व्यक्तिगत धर्म और सामाजिक धर्म के फर्क को समझ रहे थे। इसके प्रति सचेत भी थे। अपनी हरिजन-यात्रा के दौरान उन्होंने श्रद्धा और मूढ़ श्रद्धा को बखूबी देखा था। व्यक्तिगत धर्म और सामाजिक धर्म के अंतर्द्वंद्व को देखा था।

गांधी जी व्यक्तिगत धर्म और सामाजिक धर्म को समझने का इसरार कर रहे थे। इसका आशय क्या है? क्या इनसान का व्यक्तिगत धर्म अलग होता है और सामाजिक धर्म अलग? क्या व्यक्तिगत धर्म और सामाजिक धर्म में विलोम का रिश्ता अनिवार्य है? पुरी मंदिर के प्रसंग को जेहन में रखने पर कहा जा सकता है कि महादेवभाई की पत्नी दुर्गाबाई, कस्तूरबा गांधी आदि लोग व्यक्तिगत धर्म के अनुसार मंदिर में जाने के आग्रही हो सकते हैं। पर सामाजिक धर्म के मुताबिक नहीं। यह इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि गांधीजी ने कहा था कि महादेव ने सोचा था कि उन्हें श्रद्धा है तो मैं क्यों खलल पहुँचाऊँ। यह भी कहा कि ऐसा कर मूढ़ श्रद्धा को धर्म मान लिया महादेव ने। इसके बाद गांधीजी ने व्यक्तिगत धर्म और सामाजिक धर्म को समझने का इसरार करते हुए कहा कि महादेवभाई ने यह नहीं सोचा कि गांधी पर क्या असर होगा। समाज पर क्या असर होगा? यानी समाज पर पड़ने वाले असर से हमारे सामाजिक धर्म का पता चलता है। समाज के प्रति हमारा क्या दायित्व है। हमारे किसी भी कदम से समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसकी याद दिला रहे थे गांधी जी। उल्लेखनीय है कि परंपरा द्वारा अपने परिवार में बाल्यावस्था से विकास के क्रम में जो हम देखते-सीखते हैं, वह हमारा व्यक्तिगत धर्म बन जाता है।

गांधीजी ने मूढ़ श्रद्धा को धर्म मानने से रोका था। मतलब कि कस्तूरबा, दुर्गाबाई सहित जो लोग पुरी मंदिर में गए वे सोचकर तो यह गए कि वे अपने धर्म के मुताबिक आचरण कर रहे हैं। धर्म के अनुसार पुरी मंदिर में जा सकते हैं, पर वह उनका धर्म नहीं था; मूढ़ श्रद्धा थी। कारण कि हिंदू धर्म के एक तबके को मंदिर में प्रवेश करने से रोका गया था। ऐसे में, मंदिर में कस्तूरबा और दुर्गाबाई सरीखे लोगों के जाने से, हरिजनों का प्रवेश रोकने वालों को सामाजिक वैधता मिलती। और मंदिर में सभी लोग जाएँ, ऐसा माननेवालों को धक्का पहुँचता। यहाँ यह भी याद रखना होगा कि कस्तूरबा और दुर्गाबाई दोनों छुआछूत के विरोध में गांधीजी द्वारा चलाए जा रहे हरिजनों के मंदिर-प्रवेश आंदोलन के साथ थे। पर इसके लिए पुरी मंदिर का बहिष्कार किया जाए, ऐसा नहीं मानते थे।

गांधीजी ने कठोर बात कही कि जिस मंदिर में अछूत भाई-बहन नहीं जा सकते, उसमें जाने वाले माता-पिता को त्याग दिया जाए; समाज पर पड़नेवाले असर के हिसाब से ही कही गई बात है। कोई तर्क कर सकता है कि जैसे कस्तूरबा और दुर्गाबाई को अपनी परवरिश के साथ परिवार से जो व्यक्तिगत धर्म मिला; इन लोगों ने जगन्नाथ पुरी मंदिर में प्रवेश कर इस व्यक्तिगत धर्म का अनुसरण किया। पर छुआछूत मुक्त समाज का जो सपना इन लोगों ने देखा था, और इस सपने से जो 'सामाजिक धर्म' निर्मित हुआ था, उसके मुताबिक इन्हें मंदिर में नहीं जाना चाहिए था। कोई यह भी कह सकता है कि परिवार और समाज में जैसा व्यक्तिगत धर्म कस्तूरबा और दुर्गाबाई को मिला था, वैसा ही गांधीजी को भी मिला। इस हिसाब से छुआछूत का बोध भी मिला। तो फिर गांधीजी से इनका व्यक्तिगत धर्म अलग कैसे था।

असल में अपने वैचारिक विकास के साथ-साथ व्यक्ति अपना 'व्यक्तिगत धर्म' खुद गढ़ता भी है। इनसान जैसे समाज बनाना चाहता है, जैसे राष्ट्र-निर्माण का सपना देखता है उससे उसका 'सामाजिक धर्म' बनता है। अपने यूटोपिया के हिसाब से गढ़े गए सामाजिक धर्म के मुताबिक अपने व्यक्तिगत धर्म को बनाना होता है, ताकि कथनी-करनी में एका हो जाए। चूँकि गांधीजी अस्पृश्यता को हिंदू धर्म का कलंक मानते थे, इसलिए वे अपना सामाजिक धर्म मानते थे कि ऐसे मंदिरों में न जाया जाए, जिसमें हरिजनों का प्रवेश वर्जित है। अपने इस विचार के कारण उन्होंने पुरी मंदिर में प्रवेश को धर्म नहीं, मूढ़ श्रद्धा कहा था।

गांधीजी ने अपनी हरिजन-यात्रा इसी मूढ़ श्रद्धा के खिलाफ शुरू की थी। कस्तूरबा, दुर्गाबाई आदि लोगों के मंदिर में जाने से गांधीजी को गहरा धक्का लगा। बकौल गांधीजी ''मैं निस्तेज हो गया। मेरा दिमाग इस तरह गरम हो गया कि मानों नसें टूटने की नौबत आ गई। उस बात को जब सोचता था ब्लड-प्रेशर खूब बढ़ जाता। मुझे इसकी परवाह नहीं थी कि वह बढ़ रहा था। 'गीता' की भाषा जाननेवाले कहेंगे कि इन चीजों का ऐसा असर नहीं होना चाहिए।'' 'गीता' को अत्यधिक महत्व देने वाले गांधीजी नहीं चाहते थे कि इन चीजों का उन पर असर नहीं होना चाहिए। उन्होंने साफ-साफ कहा है कि ''मैं ऐसा नहीं बनना चाहता कि किसी चीज का असर मुझ पर न पड़े। 'गीता' में त्रिगुणातीत के लक्षण मैंने पढ़े हैं। लेकिन वह तो आदर्श है। बाकी हम सब तो वहीं तक जा सकते हैं जहाँ तक हमको सात्विकता ले जाए। अगर इस तरह हमें सदमा न पहुँचे तो हम कोई काम नहीं कर सकते।'' इसलिए गांधीजी त्रिगुणातीत आदर्श को मानते हुए भी 'सदमा' जरूरी समझते थे। 'सदमा' का लगना इनसान की भावना के सजीव होने का परिचायक है। जब किसी चीज का असर नहीं पड़े तो इनसान मूढ़ बन जाता है। भावनाशून्य बना जाता है। पत्थर हृदय बन जाता है। ऐसे में, क्या कोई व्यक्ति मनुष्य रह पाता है?

गांधीजी इस सदमे के लिए खुद को जिम्मेवार मानते थे। उन्होंने कहा था कि सदमे का 'कारण यह नहीं है कि वे तीन औरतें चली गईं, लेकिन यह कि उन्हें सही तालीम नहीं मिली। महादेव अपने धर्म को भूल गया।' यानी गांधी की पीड़ा के कारण थे - मंदिर में जानेवालों को सही तालीम नहीं मिलना और गांधीजी की समझ के मुताबिक महादेवभाई का अपना धर्म भूल जाना। गांधीजी इन्हें सही तालीम न मिलने के लेकर व्यथित थे। उन्होंने कहा कि 'पचास साल मेरे साथ गृहस्थाश्रम करने के बाद वह (कस्तूरबा) वहाँ क्यों गई? और वे दूसरी दो औरतें भी क्यों गईं? वे तो मेरी लड़कियाँ हैं। वह भी मेरी गलती है। उनकी इस कृति से हमारी आत्मिक शक्ति को ह्रास हुआ है।' गांधीजी के साथ रहने पर भी अगर कस्तूरबा, दुर्गाबाई आदि में चेतना न पनपी कि पुरी मंदिर में नहीं जाना चाहिए तो यह उनका (गांधीजी) दोष है। गांधीजी दूसरे को इसके लिए जिम्मेवार ठहराकर खुद को अलग नहीं करते थे। अपितु वे इन सबके लिए खुद को दोषी मानकर व्यथित होते थे, पश्चाताप करते थे।

इसके बाद जो गांधीजी ने कहा वह मानीखेज है। 'हम औरतों को औरतें समझकर इन बातों की उपेक्षा करते हैं। यह अहिंसा का मार्ग नहीं है। यह जागृति का विषय है।' औरतों को औरतें समझकर इन बातों की उपेक्षा गौरतलब है। यह बताता है कि परंपरा प्रदत्त मान्यता औरतों को कमतर मानने की थी। गांधी के कथन में पहले प्रयुक्त 'औरतों' संज्ञा सूचक है जबकि बाद में प्रयुक्त 'औरतें' विशेषण। यहाँ 'औरतें' हीनतर के पारंपरिक बोध के लिए विशेषण के रूप में इस्तेमाल किया गया। गोया पुरुषों ने ऐसा किया होता तब तो चिंताजनक था पर औरतों ने किया है तो उपेक्षणीय है। औरतों की चेतना को कमतर मानने का नतीजा होती है ऐसी उपेक्षा। इसीलिए गांधीजी ने एक बार राजेंद्र प्रसाद की बहन को भी मंदिर प्रवेश से रोका था। गांधीजी का ठीक अनुमान था कि 'कोई कहेगा कि मैंने अनुचित दबाव डाला।' इसके जवाब में इन्होंने कहा कि 'मैं कहता हूँ मैंने उसको अधर्म से बचाया। मैंने यदि दस्तांदाजी की है तो धर्म के नाम पर की हैं।' ऐसे मंदिरों में प्रवेश, जहाँ हरिजनों का जाना मना है, गांधीजी के मुताबिक अधर्म है। लिहाजा मंदिर जाने से रोकना धर्म का काम है। गौरतलब है कि ऐसा कर गांधीजी, धर्म को लेकर जो मान्यताएँ समाज में व्याप्त थीं उसे, दरका रहे थे। तथाकथित अछूतों को मंदिर प्रवेश का अधिकार मिले। इसके लिए गांधी हरिजन-यात्रा करके जनजागरण कर रहे थे, आंदोलन चला रहे थे। इससे धर्म और अधर्म की नई परिभाषा निर्मित हो रही थी।

गांधीजी की व्यथा का एक बड़ा कारण था - कस्तूरबा और दुर्गाबाई का पुरी मंदिर में जाना। कस्तूरबा उनकी पत्नी थीं और दुर्गाबाई उनके आत्मीय महादेवभाई की पत्नी। इन दोनों के मंदिर-प्रवेश से इन पर, गांधीजी द्वारा प्रसारित चेतना के अभाव का पता चलता है। इससे समाज में यह संदेश जाता कि गांधी जो स्वप्न देख रहे हैं, और उसके लिए जो आग्रह कर रहे हैं, उनसे अनन्य रूप से जुड़े लोग ही उसका पालन नहीं करते। शब्द और कर्म में एका रखनेवाले गांधी के लिए यह पीड़ादायी बात थी। हिंदी-उर्दू भाषी इलाके में उन्नीसवीं सदी में जो लेखक नवजागरण की चेतना के लिए अंधविश्वास और बाह्य आडंबर के खिलाफ साहित्य रच रहे थे, उनकी आलोचना में यह बात भी बताई जाती है कि इनके घरों में पत्नियाँ इस चेतना से वंचित थीं। वे अंधविश्वास और आडंबर का पालन करती थीं। गांधी का मन यह स्वीकार नहीं कर सकता था। गांधीजी ने जो व्यक्तिगत धर्म गढ़ा था वैसा धर्म उनके सहयोगियों का भी हो, ऐसा अरमान था उनका। इसलिए वे कहते थे कि 'उनका और मेरा अगर समान धर्म हो जाए तब तो मैं समाज को भी समझाऊँगा कि ऐसे मंदिरों में क्या पड़ा है? और अगर जाना ही है, तो वहीं तक जाएँ जहाँ तक हरिजन जाते हैं। सिर्फ झाड़ू लगा देने से हरिजनों के साथ तादात्म्य सिद्ध नहीं होता। जो मंदिर सैकड़ों, हजारों वर्षों से पवित्र गिने गए हैं, जहाँ जाने के लिए हम तरसते हैं, वहाँ पर भी अगर हम सिर्फ इसलिए न जाएँ कि हमारे हरिजन भाई नहीं जा सकते तो वह बड़ा भारी धर्म कृत्य होगा।'

गांधीजी ने अपनी व्यथा जाहिर करते हुए साथियों को समझाया कि बड़ा भारी धर्मकृत्य होगा, अगर हम उन मंदिरों में सिर्फ इसलिए नहीं जाएँ कि हमारे हरिजन भाई नहीं जा सकते। भले ही वे मंदिर सैकड़ों, हजारों सालों से पवित्र गिने गए हैं, जहाँ चैतन्य-जैसे महात्माओं ने पूजा-अर्चना की हो; या जहाँ जाने के लिए हम तरसते रहे हों। और अगर जाना ही है तो सिर्फ वहीं तक जाएँ जहाँ तक हरिजन जा पाते हैं। कारण कि 'सिर्फ झाड़ू लगा देने से हरिजनों के साथ तादात्म्य सिद्ध नहीं होता।' गांधीजी ने एक ऐसे ही मंदिर के बारे में बताया कि वहाँ पंडा आए थे। वे कहते थे कि आपके (गांधीजी) साथ हरिजन जा सकते हैं। गांधीजी को यह गवारा नहीं था। वजह यह कि हरिजन उस मंदिर में सिर्फ गांधीजी के साथ जा सकते थे। बाद में नहीं। ऐसी छूट गांधीजी को मंजूर नहीं हो सकती थी। कारण कि इसमें मंदिर-प्रवेश का प्रचंड विरोध करने वालों का दिल-दिमाग बदलने का संकेत तक नहीं मिलता।

गांधीजी ने उस पंडे के बारे में एक बात और कही, जो मानीखेज है। गांधीजी ने कहा कि, 'उसका ईश्वर तो चाँदी का सिक्का है।' यानी पंडे ने चढ़ावा में मिलने वाले चाँदी के सिक्के के लालच में उस दिन गांधीजी के साथ हरिजनों के मंदिर-प्रवेश की इजाजत दी थी। साथ में, राजेंद्र बाबू की बहन थीं। गांधीजी ने उनको भी मंदिर-प्रवेश से रोक दिया था। पंडा के बारे में गांधीजी का विश्लेषण सोलह आने सही था। प्रसंगवश, उर्दू-हिंदी के महान कथाकार प्रेमचंद भी दलितों के मंदिर-प्रवेश आंदोलन के समर्थक थे। पर, इनके मंदिर-प्रवेश से पंडों को होने वाले फायदे को भी बखूबी समझ रहे थे। 'कर्मभूमि' उपन्यास में प्रेमचंद ने दलितों के मंदिर-प्रवेश के बाद लिखा है कि ''उस दिन पुजारी बहुत खुश था, क्योंकि चढ़ावा बहुत ज्यादा चढ़ा था।'' बगैर दिलो-दिमाग में बदलाव आए मंदिर-प्रवेश की छूट गांधीजी को स्वीकार नहीं था। अथवा मौका-विशेष पर हरिजनों का मंदिर-प्रवेश गांधीजी की विचारधारा के अनुकूल नहीं था।

हरिजनों के मंदिर-प्रवेश के सवाल का रिश्ता गांधीजी हिंदू-मुस्लिम मसले से भी संबद्ध मानते थे। बकौल गांधीजी, ''सनातनी तो कहते हैं कि छुआछूत हिंदू धर्म का अंग है। मुसलमान भी यही मानते थे। वे कहते हैं कि हिंदू-धर्म में सिवाय छुआछूत और बुतपरस्ती के और है ही क्या? लेकिन इस छुआछूत की बू उन्हें भी लग गई है। वे भंगियों को दूर रखते हैं। जब मुसलमान देखेंगे कि हमने छुआछूत का छोड़ दिया, मुसलमानों के विरोध के लिए या राजकीय कारणों से नहीं, बल्कि आदमियत के लिए, तो उन पर भी असर पड़ेगा। वे कहेंगे कि ये लोग बुतपरस्त भले ही हों, लेकिन इनके बुत में भी खुदा हैं। इसीलिए मैंने बुतपरस्तों से कहा है कि तुम मुसलमानों से दोस्ती करो। यही बहादुरी की अहिंसा का मार्ग है। मौलाना साहब भी शायद ऐसा ही मानते हैं कि गांधी तो जैसा कहता है, वैसा ही है। लेकिन दूसरे हिंदू छुआछूत से सराबोर हैं। हमारी यह जिम्मेवारी है कि हम उनकी इस राय को बदल दें।'' गांधीजी हिंदू धर्म के बारे में दूसरे धर्मावलंबियों की राय को लेकर भी सचेत रहते थे। दूसरों की राय सकारात्मक हो, इसके लिए प्रयत्नरत भी रहते थे। हाँ, दिशा मानव-मूल्यों के मुताबिक हो। इनसानियत की राह में सहायक हो।

डेलांग में गांधीजी ने 'गांधी सेवा संघ' के सदस्यों से पूछा कि क्या कोई सदस्य यह भी कहेगा कि मेरे लिए एक धर्म है और मेरी स्त्री और बहन के लिए दूसरा? अगर कोई ऐसा कहता है तो गांधीजी के मुताबिक, 'यह न तो धार्मिक उदारता है और न अहिंसा ही। लोग हमें दंभी समझेंगे।' गांधी की मान्यता थी कि ''धर्म तो उत्कट श्रद्धा का नाम है। धर्म का निचोड़ उसका दूसरा नाम अहिंसा है।''

यहाँ गांधीजी की दो बातें जिक्रतलब हैं। एक, उनके मुताबिक धर्म का मतलब है 'उत्कट श्रद्धा।' जगन्नाथ मंदिर में कस्तूरबा और दुर्गाबाई के जाने पर गांधीजी ने महादेवभाई के बारे में कहा था कि इन्होंने 'मूढ़ श्रद्धा' को धर्म समझ लिया, जो गलत है। यहाँ गांधीजी ने उत्कट श्रद्धा को धर्म के पर्याय के तौर पर प्रयोग किया है। लिहाजा, 'मूढ़ श्रद्धा' और 'उत्कट श्रद्धा' के बीच के अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है। दो, गांधीजी के अनुसार, धर्म का निचोड़ है अहिंसा। धर्म का सार है अहिंसा। इतना ही नहीं धर्म का दूसरा नाम ही है अहिंसा। अहिंसा की ताकत को बताने के लिए गांधीजी ने पंतजलि को उद्धत किया है 'अहिंसा के सामने हिंसा निकम्मी हो जाती है।' कोई पूछ सकता है कि आज तक ऐसा क्यों नहीं हुआ तो इसका कारण यह है कि 'हमारी अहिंसा दुर्बलों और भीरुओं की थी।' ऐसा कहकर गांधीजी अहिंसा के संबंध में इनसानी सोच को बदल रहे थे। लोगों का माइंडसेट ऐसा है कि अहिंसा को कायरता का प्रमाण और परिणाम समझा जाता रहा है। गांधीजी ने सिर के बल खड़ी इस अवधारणा को पैर के बल खड़ा किया। इन्होंने स्थापित किया कि अहिंसा शौर्य और साहस का प्रमाण है और परिणाम भी। गांधीजी ताकत, शौर्य के पर्याय के तौर पर पुरुषत्व शब्द का उपयोग भी करते थे। लिहाजा कहा जा सकता है कि अहिंसा पुरुषत्व का सबूत है। अहिंसा वीरता की परिचायक है। अहिंसा धैर्य, धर्म, ताकत और आत्मिक बल का पर्याय है। गांधीजी के द्वारा ऐसा प्रस्तावित करना दरअसल एक नए सभ्यतागत मूल्य को स्थापित करने की कोशिश है। यह बलशाली के अधिकार को मार्मिक चुनौती है। यह जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली मानसिकता को बदलने का प्रयास है। यह 'सर्वाइवल ऑफ दि फिटेस्ट' की अवधारणा का इंकार है। यह ऐसी सभ्यता की स्वीकृति है, जो हिंसा बल वालों के अधिकारवान होने का खंडन करता है।

गांधीजी की इन व्याकुलता भरी बातों को सुनकर महादेवभाई देसाई के हृदय की पीड़ा और भी बढ़ गई। महादेवभाई ने सोचा कि 'मैंने विवेक की इतनी गंभीर भूल की है तो मैं उनकी सेवा में किस प्रकार बना रह सकता हूँ? मैं हरिजन-कार्य का सही प्रतिनिधित्व और हरिजनों की सेवा कैसे कर सकता हूँ? मुझे उनका चौकीदार बनने का क्या अधिकार है?' ये सारे विचार महादेवभाई को व्यथित कर रहे थे। उन्होंने निराश होकर गांधीजी को खत लिखा कि 'मुझे अपनी सेवा से अलग कर दें।' महादेवभाई के इस पत्र से गांधीजी और ज्यादा क्षुब्ध हो गए। गांधीजी ने कहा कि 'मैं ऐसे व्यक्ति के साथ, जो मुझे प्यार नहीं करता, जिंदा रहने की अपेक्षा उस व्यक्ति के हाथों मरना अधिक पसंद करूँगा जो मुझे प्यार करता है।' गांधीजी ने महादेवभाई को कहा कि 'तुम्हें तो सत्याग्रही तीर्थयात्रियों का एक जत्था लेकर पुरी जाना चाहिए था और इस तरह अपनी भूल को सुधारने की कोशिश करते। ऐसा न करके, शुभ हेतु से मैंने जो थोड़ा-सा डाँटा उसका तुमने बुरा माना और भावुकता में आकर अनाप-शनाप लिख बैठे। अपनी पत्नी की देखभाल करने के बजाय तुमने उसके प्रति अपने अंधे प्रेम के कारण अंधविश्वास को बढ़ावा दिया।'

गांधीजी की ये बातें सुनकर महादेवभाई 'सन्न रह' गए। बकौल महादेव देसाई गांधीजी ने ''प्रेम का क्लोरोफॉर्म सुँघाकर कई आध्यात्मिक ऑपरेशन किए थे। पर मुझे लगा कि यह ऑपरेशन तो उन्होंने बिना क्लोरोफॉर्म के किया है।''

जगन्नाथ पुरी मंदिर के इस प्रसंग के बाद जो बातें गांधीजी ने व्यथापूर्वक कही, उस पर राय जाहिर करते हुए महादेवभाई ने समझा कि 'मुझे जो बातें अत्यंत तुच्छ जान पड़ती हैं, वहीं बातें उनके जीवन-मरण का प्रश्न बन सकती हैं।' महादेवभाई के इस कथन से पता चलता है कि गांधीजी छोटे-छोटे मुद्दों को कितनी गंभीरता से लेते थे। राष्ट्रीय-आंदोलन का नेतृत्व करने वाले महात्मा गांधी अस्मितावादी आवाजों को प्रमुखता देकर राष्ट्र के समक्ष की चुनौतियों को सुलझाने की कोशिश कर रहे थे। इसके आधार पर उन आरोपों का खंडन होता है जो अछूतोद्धार को रणनीति मात्र मानते थे अथवा डॉ. अंबेडकर की मौजूदगी का परिणाम। अछूतोद्धार के सपाल के साथ गांधी किस संजीदगी के साथ संबद्ध थे, इसे डेलांग-प्रकरण के आधार पर समझा जा सकता है। यहाँ याद करने योग्य बात है कि गांधीजी के अछूतोद्धार आंदोलन के महत्व को तत्कालीन कांग्रेसी नेतृत्व नहीं समझ पाया था।

महादेवभाई ने बिल्कुल साफ-साफ महसूस किया, ''गांधीजी का हरिजनों के प्रति अनन्यतम प्रेम तथा उनके लिए प्राण तक न्यौछावर कर देने की उत्सुकता।''


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