hindisamay head
डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

विमर्श

इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान
वैभव सिंह


( संदर्भ : उन्नीसवीं सदी का हिंदी लेखन)

भारत में परंपरागत रूप से इतिहास के प्रामाणिक स्रोतों के अभाव में पौराणिक मिथकीय कथाओं और शास्त्रों ने ही इतिहास की भूमिका का निर्वाह किया है। हिंदू धर्म की कतिपय धर्मशास्त्रीय मान्यताओं जैसे अवतारवाद, वर्णधर्म और कर्मकांड को सामाजिक आदर्श का दर्जा प्राप्त था और विभिन्न पौराणिक मिथकीय पात्रों एवं घटनाओं को इन्हीं सामाजिक आदर्शों की प्राप्ति या इनसे विचलित होने के आधार पर व्याख्यायित किया जाता था। धार्मिक मान्यताओं द्वारा अनुमोदित इन सामाजिक आदर्शों को विभिन्न रोचक कथाओं के जरिए वैधता दिलाने का काम पुराणों ने इतनी कुशलता के साथ किया कि इतिहास की जरूरत ही नहीं रह गई।

18वीं और 19वीं सदी में एक आधुनिक अकादमिक विषय के रूप में इतिहास लेखन को मान्यता मिलनी प्रारंभ हुई और पश्चिम के साथ साथ पूर्वी देशों में भी विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों और समुदायों के इतिहास पर शोध करने का काम शुरू हुआ। एक ओर राजनीतिक सामाजिक स्थितियाँ बदलने से इतिहास लेखन की आवश्यकता का अनुभव किया गया तो दूसरी ओर इतिहास के निर्माण और व्याख्या के विभिन्न दृष्टिकोणों के जरिए विभिन्न समुदायों की राजनीतिक सामाजिक आकांक्षाओं को नया रूप मिलना आरंभ हुआ।

19वीं सदी में ही साम्राज्यवाद का भी अभूतपूर्व विस्तार हुआ और उसने मध्य एशिया व पूर्वी एशिया के अनेक पिछड़े देशों की अर्थव्यस्था को नियंत्रण में लेने के लिए उन्हें राजनैतिक रूप से गुलाम बनाना आरंभ कर दिया। इस साम्राज्यवाद ने निहित स्वार्थों और व्यावहारिक जरूरतों के लिए इतिहास लेखन को भी अपना माध्यम बनाया। जब इतिहास लिखने का काम उन्होंने भारत में आरंभ किया तब उन्होंने यहाँ के स्थानीय स्रोतों का भी पता लगाने की कोशिश की। प्रामाणिक इतिहास लेखन के स्थानीय स्रोतों के अभाव को देख कर तो वे भी आश्चर्यचकित हो गए। लोग अपने ही इतिहास की मौर्यकालीन और गुप्तकालीन घटनाओं एवं शासकों के नाम से अनभिज्ञ थे। इस स्थिति के बारे में 18वीं सदी में भारत आने वाले एक यात्री अमारी डी राएनकोर्ट ने अपनी किताब 'सोल ऑफ इंडिया' में लिखा :

' आर्य भारत में कोई स्मृति नहीं क्योंकि उसका ध्यान शाश्वतता पर है, न कि समय पर... भारतीयों के लिए आध्यात्मिक वास्तविकता ' स्थान' है न कि समय, प्रकृति है न कि इतिहास।' 1

यह भी एक अजीब विडंबना थी कि इतिहास के प्रति अरुचि को हिंदुओं की आध्यात्मिकता के प्रति अपवाद रूप से अत्याधिक रुचि के आधार पर व्याख्यायित किया गया। सीधे सीधे यह तर्क दिया गया कि दुनिया की अन्य सभ्यताओं व संस्कृतियों की तुलना में विशिष्ट रूप से लोकोत्तर जीवन और पारलौकिक विश्वासों पर उनके जीवन और समस्त बौद्धिक चिंतन के केंद्रित होने के कारण ही भारत में इतिहास लेखकों एवं इतिहास की प्रामाणिक रचनाओं का अभाव रहा है। यह एक कोरा सरलीकरण था और भारत में इतिहास के प्रति अरुचि के कारणों को सही ढंग से सामने रखने के स्थान पर उस समय आने वाले योरोपीय यात्रियों की भारत के सांस्कृतिक अतीत के संबंध में नासमझी को अधिक प्रकट करता है। कौटिल्य, वात्स्यायन, अश्वघोष और चार्वाक आदि की रचनाएँ जिस देश में मौजूद रही हों वहाँ आध्यात्मिकता को उसका केंद्रीय सांस्कृतिक मूल्य बताना यथार्थपरक दृष्टि का सूचक कम और राजनीतिक दृष्टि का सूचक ज्यादा था। हालाँकि विलियम जोन्स के समय से ही भारत के बारे में इस साम्राज्यवादी निष्कर्ष का खंडन भी होने लगा था कि पश्चिमी पुनर्जागरणकालीन मूल्यों के गर्भ से उपजी जिस आधुनिकता का संवाहक यूरोप है, उसके सामने भारतीय सभ्यता और संस्कृति तथा उपलब्धियाँ कहीं नहीं ठहरतीं। विलियम जोन्स ने भारतीय संस्कृति की महान उपलब्धियों के रेखाँकन के बहाने पश्चिमी पुनर्जागरण और एशियाई जड़ता की रूढ़ दृष्टियों पर आधारित द्वंद्व के बारे में लिखा :

' हमें एशियाई लोगों का तिरस्कार नहीं करना चाहिए, जिनकी प्रकृति, कला, आविष्कार से अपने विकास और लाभ के लिए अनेक महत्वपूर्ण संकेत प्राप्त कर सकते हैं।' 2

इस तरह से 14-15वीं सदी में विश्व भर में योरोपीय यात्रियों के फैलाव, आर्थिक राजनीतिक उपनिवेशों की स्थापना एवं साम्राज्यवादियों की स्थानीय संस्थाओं के अनुरूप प्रशासन चलाने की बाध्यता, इन सबके बीच 18वीं सदी के अंत और 19वीं सदी में भारतीय इतिहास के निर्माण एवं व्याख्या का काम व्यापक रूप से आरंभ हुआ। इस काम को अधिक व्यवस्थित और संस्थागत रूप से 1784 ई. में स्थापित रायल एशियाटिक सोसायटी के द्वारा शुरू किया गया। इसमें सिक्कों, अभिलेखों व प्राचीन पुरातात्विक अवशेषों की खोज के बावजूद अधिक महत्व धर्मशास्त्र, साहित्य, भूगोल, संगीत और ज्योतिष की रचनाओं को दिया गया और उन्हीं के आधार पर ऐसी भारतीय सभ्यता के प्राचीन अतीत का निर्माण किया गया जो अपनी उपलब्धियों पर गर्व कर सके। इन साहित्यिक धार्मिक स्रोतों की व्याख्या करते हुए यह प्रश्न नहीं किया गया कि इन माध्यमों से अतीत की जो तस्वीर उभर कर सामने आ रही है, वह समग्र समाज के यथार्थ को व्यक्त करती है या फिर किसी खास समूह की अभिरुचियों व सामाजिक गतिविधियों को। इस बारे में रोमिला थापर का मत है :

' प्राचीन समय के बचे-खुचे साहित्यिक स्रोतों में ज्यादातर राजा, महत्वपूर्ण पुजारी वर्ग, मठों और संपन्न व्यापारियों की जिंदगी का पता चलता है। इस प्रकार समाज के उच्च वर्ग के बारे में अधिक सूचनाएँ मिलती हैं। इसके अलावा परंपरागत समाजों में शिक्षा प्रायः केवल अभिजन समूहों को ही मिल पाती है। इसलिए केवल वही अपनी गतिविधियों को साहित्य के माध्यम से व्यक्त कर पाते हैं। कालिदास के नाटक उदाहरण के तौर पर शासन और दरबार के अध्ययन की दृष्टि से शानदार ऐतिहासिक सामग्री हैं, लेकिन यह कहना कि इनमें पूरे भारतीय समाज का वर्णन है, अतीत की गलत तस्वीर बनाना है।' 3

एक ओर विलियम जोन्स, चार्ल्स विलकिन्स, एच.एच. विलसन, मैक्समुलर, मारिज विंटरनित्ज और रूडोल्फ रॉय आदि अंग्रेज और जर्मन प्राच्याविद वेदों, उपनिषदों और साहित्यिक कृतियों के आधार पर भारतीय अतीत पर मुग्ध होने के लिए लोगों को प्रेरित कर रहे थे, तो दूसरी ओर मिशनरियों ने अपने ढंग से भारत में औपनिवेशिक शासन को सही ठहराने के लिए भारतीय इतिहास के निर्माण और व्याख्या का काम किया। विलियम कैरे (1761-1834), अलेक्जेंडर डफ (1806-1878), जॉन मुअर (1810-82) और चार्ल्स ग्रांट (1746-1823) ने भारत के इतिहास को अंधकारग्रस्त और हिंदू धर्म को समस्त पाखंड और झूठ का पर्याय बताया। भारत में अंग्रेजी शिक्षा के समर्थक और ईसाइयत के प्रचारक थामस बैबिंजटन मैकाले (1800-59) ने अपने 1835 ईसवी के शिक्षा संबंधी मिनट्स में यहाँ तक कहा कि 'भारत और अरब के संपूर्ण साहित्य का मुकाबला करने के लिए एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की एक अलमारी ही काफी है।' यानी 19वीं सदी में एक ओर प्राच्यविद थे, जो मुख्य रूप से प्राचीन कृतियों की खोज और उनके अनुवाद तैयार करके शेष विश्व को भारत की साहित्यिक और धार्मिक विशेषताओं से परिचित करा रहे थे, दूसरी ओर मिशनरी लेखक भारतीयों के अंधविश्वास, मूर्तिपूजा और बहुदेववाद की अवधारणा की आलोचना कर रहे थे, क्योंकि वे ईसाइयत की संसार की उत्पत्ति संबंधी धारणा, ईश्वर के स्वरूप और उपासना पद्धति के अनुरूप नहीं थीं।

इतिहास के निर्माण और व्याख्या के इन प्रयत्नों से अलग अलग निष्कर्ष उभर कर सामने आए। प्राच्यविदों, मिशनरियों और जेम्स मिल जैसे उपयोगितावादियों ने भारतीय अतीत की रूढ़ छवियों के निर्माण में अपने अपने ढंग से योगदान दिया। ऐसे भारतीय समाज की छवि बनी जो हमेशा ही वेदों उपनिषदों वाले आध्यात्मिक चिंतन में लीन रहता है या संस्कृत नाटकों की रचना में ही हर समय खोया रहता है। इस छवि के केंद्र में ऐसे हिंदू मनीषी उपस्थिति थे जो हर समय ब्रह्मांड की पहेलियों को सुलझाने के लिए पारलौकिक सत्ता से संवाद कायम करते रहने की चेष्टा करते रहते थे।

19 वीं सदी में ही जेम्स मिल की हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया (1817), कर्नल टाड की एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान (1820), इलियट डाउसन की हिस्ट्री ऑफ इंडिया ऐज टोल्ड बाई इट्स ओन हिस्टोरियंस (1849) जैसी महत्वपूर्ण कृतियों की रचना हुई जिसने अतीत के बारे में दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया। मिल ने समूचे भारतीय इतिहास का हिंदू काल, मुस्लिम काल और ब्रिटिश काल में विभाजन कर इतिहास की सांप्रदायिक व्याख्या की पृष्ठभूमि तैयार की। उनके ऐतिहासिक अध्ययन की विषयवस्तु एवं निष्कर्ष ठोस तथ्यों पर आधारित होने के स्थान पर सभ्यता के विकास और उपयोगितावाद से संबंधित सामान्य अवधारणाओं पर निर्भर थे, जैसा कि उन्होंने खुद लिखा भी :

' अच्छी समझदारी रखने वाला कोई भी इनसान बिना इतिहास की प्रामाणिक जानकारी जुटाए प्राचीन ग्रंथों एवं कृतियों को पढ़ कर लोगों की प्रवृत्तियों को जान सकता है।' 4

मिल ने भारतीय अतीत की कटु आलोचना के आधार पर भारत के अंग्रेजों के हाथों पराधीन होने को तर्कसंगत साबित करने का प्रयास किया। इतिहासकार जे.एस. ग्रेवाल के शब्दों में :

' मिल ने हिंदुओं को उनके अतीत या वर्तमान में सभ्य मानने से इनकार कर दिया।' 5

उधर प्राचीन संस्कृत ग्रंथों और वैदिक सभ्यता को हिंदू अतीत संस्कृति की धुरी बताने वाले विलियम जोन्स, मानियर विलियम्स और मैक्समुलर जैसे प्राच्यविदों ने हिंदू स्वर्णकाल के रूप में ऐतिहासिक कालखंड की कल्पना की। उनके द्वारा समस्त विश्वासों और उपासना पद्धति के सभी पहलुओं को आत्मसात करने वाले हिंदू धर्म की कल्पना की गई और इस कल्पना के माध्यम से हिंदू धर्म को भी ईसाइयत की तर्ज पर एक ऐतिहासिक रूप से विकसित धर्म के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया। इन प्राच्यविदों में बुनियादी समानता के बावजूद कुछ दृष्टिकोण संबंधी भेद भी थे। जैसे आरंभिक प्राच्यविदों कोलब्रुक, विल्सन, प्रिन्सेप और टी.एस. बर्ट ने हिंदू अतीत की ऐतिहासिकता के निर्धारण के लिए प्राचीन संस्कृत ग्रंथों का सहारा लिया, साथ ही शोध के आधुनिक तरीकों जैसे अभिलेखों, सिक्कों, स्थापत्य आदि के संग्रह और अध्ययन पर भी बल दिया। प्रिन्सेप के योगदान के बारे में केजरीवाल का कहना है :

' प्रिन्सेप ने भारत में पुरावशेषों और मुद्राओं के अध्ययन की नींव डाली और इस प्रक्रिया में प्राचीन भारत के कई प्रमुख शासकों और राजवंशों की खोज की।' 6

आगे चल कर मैक्समुलर, अलब्रेख्त वेबर, विंटरनित्ज और रूडोल्फ रॉय के रूप में प्राच्यवाद का जिस प्रकार से विकास हुआ, उसमें प्राच्यवाद पूरी तरह से वैदिक साहित्य, उपनिषदों और अन्य संस्कृत ग्रंथों तक सीमित हो गया। इनमें अधिसंख्य प्राच्यविद जर्मनी और इंग्लैंड के विभिन्न विश्वविद्यालयों में इंडॉलोजी और संस्कृत के प्रोफेसर के रूप में पढ़ाते भी थे। जर्मन प्राच्यविदों के हाथों जिस प्रकार से वेदों और अन्य संस्कृत ग्रंथों तक प्राच्यविद्या को सीमित करके भारतीय अतीत का अध्ययन हुआ, उसमें ठोस ऐतिहासिक जानकारियों का उतना महत्व नहीं रहा जितना अमूर्त गौरव और महानता को इन संस्कृत ग्रंथों के माध्यम से स्थापित करने का। संस्कृत ग्रंथों का इतनी गहराई से अध्ययन होने लगा कि जर्मन राष्ट्रवाद और योरोपीय सभ्यता की उच्चता की भावना रखने वाले जर्मन प्राच्यविद रूडोल्फ राय ने यहाँ तक कहा कि 'एक शिक्षित यूरोपियन भारत के ब्राह्मणों की तुलना में वेदों के सार को ज्यादा अच्छी तरह से समझ सकता है।'7

हिंदी नवजागरण के लेखक प्राच्यविद्या व उसकी इतिहास दृष्टि से गहराई से प्रभावित होने के कारण और कुछ ब्रिटिश उपनिवेशवाद से उपजी आत्महीनता के कारण वर्तमान को अस्वीकार्य मान कर उसे तिरस्कार की दृष्टि से देखते थे और अतीत या भविष्य को महत्वपूर्ण मान कर उसमें अपने आत्म गौरव की कल्पना करते थे। सुधीर चंद्र ने उन्नीसवीं सदी के शिक्षित बुद्धिजीवियों और लेखकों के इसी अनुभव को 'उत्पीड़क वर्तमान से संघर्ष' का नाम दिया है। और लिखा :

' वर्तमान की व्याख्या केवल अतीत अथवा भविष्य के संदर्भों के सहारे ही की जा सकती थी।' 8

इस समय अगर प्राच्यविदों ने 'आध्यात्मिक भारत' की एक आकर्षक और चमकदार तस्वीर खड़ी की तो, भारतीयों के प्रबुद्ध वर्ग ने भी न सिर्फ आध्यात्मिक अतीत बल्कि आध्यात्मिकता की भी नई छवियाँ और परिभाषाएँ गढ़ी। इसलिए आध्यात्मिकता की नई व्याख्याओं और राष्ट्रवादी विवेचन के लिए उसे नए संदर्भों और अभिप्रायों से किस प्रकार जोड़ा गया, इसका अध्ययन भी कम रोचक नहीं होगा। यहाँ तक कि समूचा भक्तिकाल, जिसके साहित्यिक, सांस्कृतिक और वैचारिक योगदान की काफी चर्चा होती है, वह भी बुरी तरह से विवादास्पद बना दिया गया। उस समय के एक महत्वपूर्ण लेखक बालकृष्ण भट्ट ने आध्यात्मिकता को भक्ति, आस्था, विश्वास और आत्मसमर्पण का विषय कम, देशभक्ति और मुल्की जोश का विषय अधिक बना डाला। उनके लेखन में हिंदू आध्यात्मिकता का अतिशय उल्लेख ही नहीं बल्कि उसकी पुनर्परिभाषित व्याख्या भी महत्वपूर्ण हो गई। उनके मुताबिक :

' आध्यात्मिक उन्नति (स्पिरिचुअल प्रोग्रेस) और जातीयता (नेशनैलिटी) या (पॉलिटिक्स) मुल्की जोश साथ साथ चलते हैं।' 9

हिंदू आध्यात्मिकता की पुनर्व्याख्या की सबसे स्पष्ट मिसाल मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के विवेचन के संदर्भ में मिलती है। इस विवेचन में भक्ति आंदोलन की सराहना और सख्त आलोचना दोनों ही एक साथ उपस्थित है। बालकृष्ण भट्ट के लिए भक्तिकाल की उपयोगिता अनुपयोगिता का प्रश्न मुस्लिम चुनौती का सामना करने से सीधे सीधे जुड़ गया था। इस दृष्टिकोण के कारण भट्ट जी ने मध्यकाल के भक्त कवियों का काफी कठोरता से विरोध किया और उन्हें हिंदुओं को कमजोर करने का जिम्मेदार भी ठहराया। भक्त कवियों की कविताओं के आधार पर उनके मूल्यांकन के बजाय उनके राजनीतिक संदर्भों के आधार पर मूल्यांकन का तरीका अपनाया गया। भट्ट जी ने मीराँबाई व सूरदास जैसे महान कवियों पर हिंदू जाति के पौरुष पराक्रम को कमजोर करने का आरोप मढ़ दिया। उनके मुताबिक समूचा भक्तिकाल मुस्लिम चुनौती के समक्ष हिंदुओं में 'मुल्की जोश' जगाने में नाकाम रहा। भक्त कवियों के गाये भजनों ने हिंदुओं के पौरुष और बल को खत्म कर दिया। उन्होंने भक्त कवियों की इसी कमजोरी और नाकामी के विषय में लिखा :

' मीराँबाई, सूरदास, कुंभनदास, सनातन गोस्वामी आदि कितने महापुरुष जिनके बनाए भजन और पदों का कैसा असर है जिसे सुन कर चित्त आर्द्र हो जाता है। मुल्की जोश की कोई बात तो इन लोगों में भी न थी उसकी जड़ तो न जानिए कब से हिंदू जाति के बीच से उखड़ गई।' 10

भक्तिकाल संबंधी अपने विवेचन में भट्ट जी ने मुस्लिम शासन के राजनीतिक संदर्भों को आवश्यकता से अधिक महत्व दिया और वल्लभाचार्य व चैतन्य महाप्रभु के भक्ति स्वरूप की व्याख्या करने के स्थान पर तत्कालीन परिस्थितियों पर अधिक जोर देते हुए लिखा :

' ये लोग ऐसे समय में हुए जब देश का देश म्लेच्छाक्रांत हो रहा था और मुसलमानों के अत्याचारों से नाकों में प्राण आ लगे थे। इससे आध्यात्मिकता पर इन्होंने बिलकुल जोर न दिया।' 11

भक्तिकालीन संतों पर इल्जाम लगाना कि उन्होंने आध्यात्मिकता पर जोर नहीं दिया, अजीबोगरीब बात थी। जाहिर है कि भट्ट जी के मस्तिष्क में आध्यामिकता ईश्वरीय भक्ति व चिंतन के बजाय लौकिक शक्ति व संपन्नता का पर्याय बन चुकी थी। मूल्यांकन की कसौटियाँ अगर काल्पनिक धारणाओं से निर्मित की जाती हैं तब वस्तुगत यथार्थ की व्याख्या भी वैज्ञानिक और वस्तुगत नहीं रह पाती। इतिहास के एक विशिष्ट चरण के आधार पर इतिहास की समूची प्रक्रिया के विषय में निष्कर्ष निकाले जाते हैं। भव्य और श्रेष्ठ की तुलना में पतन तथा विकार से भरे ऐतिहासिक युग, चरण तथा घटनाओं का उल्लेख किया जाता है। बालकृष्ण भट्ट ने भी इतिहास की व्याख्या ऐसे नजरिए से की जो यह जानने और बताने के लिए अधिक उत्सुक था कि हिंदुओं की शक्ति और आत्मगौरव में कब उन्नति हुई और कब गिरावट आई। मध्यकाल में उन्होंने भक्ति भावना के विकास के साथ ही यह भी शिकायत की :

' हमारी आध्यात्मिक उन्नति के सुधार पर किसी की दृष्टि न गई।' 12

इसके अतिरिक्त आध्यात्मिकता पर बिल्कुल जोर न देने के कारण भक्त कवियों व आचार्यों की निंदा करते हुए लिखा :

' ऋषि प्रणीत प्रणाली को हाल के इन आचार्यों ने सब भाँति तहस नहस कर डाला।' 13

जाहिर है कि बालकृष्ण भट्ट ने भक्ति और अध्यात्म के मध्य अपनी मर्जी से एक विभाजन खड़ा कर दिया था। उनके अनुसार भक्ति का संबंध रसीली और हृदयग्रहिणी प्रवृत्तियों, विमलचित्त अकुटिल भाव और सेवक सेव्य भाव से है जबकि अध्यात्म का संबंध ज्ञान, कुशाग्र बुद्धि और अंततः जातीयता ( नेशनैलिटी) से होता है। इसी आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला :

' भक्ति ऐसी रसीली और हृदयग्रहिणी हुई कि इसका सहारा पाय लोग रूखे ज्ञान को अवज्ञा और अनादर की दृष्टि से देखने लगे और साथ ही जातीयता नेशनैलिटी को भी विदाई देने लगे जिसके रफूचक्कर हो जाने से भारतीय प्रजा में इतनी कमजोरी आ गई कि पश्चिमी देशों से यवन तथा तुरुक और मुसलमानों के यहाँ आने का साहस हुआ।' 14

भक्तिकाल की यह पूर्वग्रहपूर्ण आलोचना आज शायद ही किसी को स्वीकार हो। लेकिन कमाल की बात है कि रामचंद्र शुक्ल से लेकर हजारी प्रसाद दिवेदी तक के भक्तिकाल संबंधी मतों का बारीक विवेचन करने वाली हिंदी आलोचना बालकृष्ण भट्ट की भक्तिकाल से जुड़ी धारणाओं पर ध्यान नहीं दे सकी। हकीकत यह है कि अध्यात्म और जातीयता का यह संबंध धर्म और राजनीति के संबंधों की वकालत करता था। हिंदी का समूचा नवजागरणकालीन चिंतन कुरीतियों और आडंबरों को समाप्त करने की दृष्टि से हिंदू धर्म की आंतरिक संरचना में सुधार की बात तो कहता था, लेकिन हिंदुओं की सांस्कृतिक धार्मिक अस्मिता का उपयोग किए बगैर हिंदुओं के राजनीतिक पुनरुत्थान को असंभव मानता था। भक्ति आंदोलन में चूँकि राजनीतिक ढाँचे को धार्मिक संस्थाओं व विचारों से नियंत्रित करने का स्पष्ट सरोकार नहीं मिलता, इसलिए भट्ट जी जैसे लेखकों ने उसकी आलोचना की। यह आलोचना इस कल्पना से प्रेरित थी कि प्राचीनकाल में धर्म और अध्यात्म राजनीति से विलग नहीं हुए थे इसलिए हिंदू जाति के शौर्य, मानसिक शक्ति और वीर्य जैसे गुण भी बने रहे और जातीयता का भावबोध भी।

सांस्कृतिक शुद्धता और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के पक्ष में आह्वान केवल हिंदू लेखकों की ओर से ही नहीं बल्कि अठारवीं और उन्नीसवीं सदी के मुस्लिम लेखकों की ओर से भी किया जाता रहा था। शाहवली उल्लाह (17.3-62), शाह अब्दुल अजीज (1764-1824), सैय्यद अहमद शाहिद (1786-1831) मौलाना इनायत अली (1794-1858) और अल्ताफ हुसैन हाली (1831-1914) ने मुस्लिम धर्म संस्कृति के लुटे हुए गौरव और राजनीतिक सत्ता के छिन्न भिन्न हो जाने के विषय में शोकपूर्ण ढंग से वर्णन किया। शाह वली उल्लाह ने अपनी किताब वसीयतनामा में लिखा :

' हम यहाँ के लिए अजनबी हैं। हमारे पूर्वज यहाँ रहने के लिए बाहर से आए। हमारे लिए अरब होना और अरब भाषा का इस्तेमाल करना सबसे अधिक गौरव की बात है।' 15

मुस्लिम पुनरुत्थान और विशुद्ध मुस्लिम संस्कृति के निर्माण के सबसे प्रसिद्ध प्रवक्ता अल्ताफ हुसैन हाली ने 1879 ई. में छपे संग्रह मुसद्दस ए हाली में इस्लाम के उत्थान और पतन को अपनी कविताओं के माध्यम से उभारा। इसमें इस्लाम के पतन की दशा का चित्रण इस प्रकार से किया गया :

' न हमारी धमनियों में, न खून में, न हमारी ख्वाहिशों में और न खोज में, हमारे दिल जबान और लफ्जों में, हमारी आदतों, तबियत जेहन और रवायतों में अब वह ऊँचाई नहीं मिलती। गर वह है भी तो महज इत्तिफाक है।' 16

लेकिन इस्लाम के पतन का जिक्र और सांस्कृतिक शुद्धता का पक्ष लेते हुए भी शाह वली उल्लाह से लेकर हाली तक, सभी ने किसी न किसी हद तक इस्लाम में तर्क और आधुनिक ज्ञानविज्ञान के प्रवेश को जरूरी माना। अल्ताफ हुसैन हाली तो सर सैय्यद अहमद खान (1811-98) के इस्लाम को आधुनिक शिक्षा और ज्ञान विज्ञान के नजदीक लाने के प्रयासों के पूरी तरह से कायल थे और ' उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में उन्होंने इस्लाम के पुनर्जागरण के लिए सैय्यद अहमद खान के रास्ते पर चलने की सलाह दी।'17

पर इन सारे प्रयासों के बावजूद अंततः इस्लाम की राजनीतिक ताकत और मजहबी पहचान ही उनके लिए प्रमुख थी जो हिंदू पुनरुत्थान की चेतना से टकराती थी। 1867 ईसवी में देवबंद में मोहम्मद वासिम नानौवती और शेख अहमद गंगोही द्वारा स्थापित संस्था ने इस्लामिक मतों का और जोर शोर से प्रचार किया। ऐसे ही दौर में उलेमाओं के द्वारा हिंदू सांस्कृतिक प्रभाव से मुक्त और कुरान का विशुद्ध रूप से पालन करने वाली मुस्लिम अस्मिता के निर्माण की चेष्टा हुई। सांप्रदायिकता के उदय और सांप्रदायिक प्रतीकों के निर्माण की चेष्टाओं में किसी भी धर्म मजहब के भद्र वर्ग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण थी। 19वीं सदी में हिंदू और मुस्लिम, दोनों ही धर्मों के भद्रवर्ग धार्मिक प्रतीकों के गठन की कोशिशें कर रहे थे। बंगाल और महाराष्ट्र में भी इस समय हिंदी क्षेत्र की तरह कई सवालों का सांप्रदायिकीकरण किया गया था। जैसे बंगाल में हिंदू भूस्वामी और मुस्लिम काश्तकारों के बीच के आर्थिक विभाजन को सांप्रदायिक संघर्ष की शक्ल देने के लिए इस्तेमाल किया गया। विपिन चंद्रा के अनुसार 1773 ईसवी के स्थायी बंदोबस्त के फलस्वरूप बंगाल में पुराने हिंदू और मुसलमान जमींदारों के परिवार विस्थापित हुए और उनकी जगह नए हिंदू व्यावसायिक वर्ग का उदय हुआ। गाँवों की जमीन पर कब्जा जमाए बैठे इस व्यापारिक साहूकार वर्ग से जब गरीब मुसलमानों का टकराव हुआ तो इसमें ' इन्होंने सामूहिक संघर्षों में अपने सह धर्मावलंबियों को शरीक करने के लिए सांप्रदायिकता का इस्तेमाल किया।'18 पर अन्य प्रांतों की तुलना में इस समय पश्चिमोत्तर प्रांत में हिंदू मुस्लिम संबंध सामाजिक आर्थिक धरातल पर किस तरह से अलग थे, इसका वर्णन पॉल ब्रास ने किया है। उन्होंने संयुक्त प्रांत में 19वीं सदी में पनपने वाली मुस्लिम सांप्रदायिकता के सामजिक कारणों का विस्तार से अध्ययन करते हुए इन मतों को गलत ठहराया है कि 1857 ईसवी के विद्रोह के बाद अंग्रेजों द्वारा मुसलमानों पर अत्याचार, हिंदुओं द्वारा अंग्रेजी शासन का अधिक कुशलतापूर्वक इस्तेमाल, मुस्लिमों का पारंपरिक पिछड़ापन या हिंदुओं की तुलना में मुसलमानों की बदहाली जैसे कारण मुस्लिम सांप्रदायिकता के उदय के जिम्मेदार बने। मुस्लिम पिछड़ेपन को इस समय की मुस्लिम सांप्रदायिकता से जोड़ने के मिथ का खंडन करने के लिए उन्होंने सरकारी नौकरियों और प्रशासन में मुसलमानों की संख्या प्रस्तुत करने के लिए आँकड़े प्रस्तुत किए और लिखा :

' मुसलमानों के पिछड़ेपन का तर्क और धारणा संयुक्त प्रांत पर लागू नहीं होती।' 19

अपने मत के पक्ष में आँकड़े पेश करते हुए उन्होंने लिखा है :

' अवध और पश्मिोत्तर प्रांत की सरकार के द्वारा मुसलमानों की सरकारी नौकरियों में स्थिति पर की गई टिप्पणियों से जाहिर होता है कि सरकारी दफ्तरों में मुसलमानों की कम संख्या होने की बात गलत है, बल्कि सरकार के आधिकारिक सचिव के मुताबिक उन्हें अपनी जनसंख्या के अनुपात से अधिक नौकरियाँ मिली हुई थीं। रिपोर्ट से पता चलता है सरकार के कुल 54,130 देसी अधिकारियों में 35,302 हिंदू और 18,828 मुसलमान यानी 65.22 फीसदी हिंदू और 34.78 फीसदी मुसलमान थे। जबकि कुल जनसंख्या में हिंदुओं और मुसलमानों का अनुपात 86.75 फीसदी और 13.25 फीसदी था।' 20

इसी तरह सबसे ऊँची तनख्वाहों वाली और सम्मानजनक नौकरियाँ जैसे डिप्टी कलेक्टर और तहसीलदार की नौकरियों के मामले में भी मुसलमान हिंदुओं से कहीं अधिक आगे थे। पॉल ब्रास के मुताबिक मुसलमानों खासकर उच्च तथा मध्यवर्गीय मुसलमानों की दशा उपरोक्त आँकड़ों के आलोक में ऐसी नहीं थी कि यह मान लिया जाए कि वे सामाजिक पिछड़ेपन की प्रतिक्रिया में हिंदुओं से अलगाव का रास्ता अख्तियार कर रहे थे। बल्कि फारसी की ओर झुकी उर्दू की माँग, अलीगढ़ आंदोलन और मुस्लिम लीग जैसे संगठनों की स्थापना 'मुसलमानों के अपेक्षाकृत संपन्न तबके द्वारा राजनीतिक वर्चस्व को बरकरार रखने'21 को कोशिशों का परिणाम थी।

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिंदी साहित्य की विविध विधाओं का विकास हो रहा था साथ ही विविध वैचारिक प्रवृत्तियों का भी उदय हो रहा था। यह समय था जब हिंदी क्षेत्र के साथ साथ भारत के बंगाल और महाराष्ट्र जैसे प्रांतों में भी राष्ट्रीय एकीकरण, प्रशासनिक विकास, व्यापारिक पूँजी के विस्तार ओर शैक्षिक विकास के फलस्वरूप एक राष्ट्रीय चेतना उभरने लगी थी। यह राष्ट्रीय चेतना भारत की व्यापक पहचान को अपने भीतर समाए रखने के साथ ही एक जातीयता के बोध को भी सुरक्षित रखने और उसे व्यक्त करने का प्रयास कर रही थी। चूँकि किसी राष्ट्रीय चेतना को विकसित होने के लिए राष्ट्रीय गौरव के विगत यथार्थ की स्मृतियों की आवश्यकता होती है, इसलिए उसमें अपने इतिहास के तलाश की कोशिशें भी साफ साफ मौजूद होती हैं। हिंदी लेखन में भी ऐतिहासिक गौरव के स्मरण के बहाने ही इतिहास के निर्माण और राजनीतिक उद्देश्यों को साधने वाली उपयोगी व्याख्याओं पर ध्यान दिया जाना आरंभ हुआ। इस प्रक्रिया में अनेक प्रवृत्तियाँ सामने आईं। पहली प्रवृत्ति में बड़ी ही गहराई और आस्थापरक रूप से यह मान लिया गया कि मध्यकाल में मुसलमानी आतंक और वर्तमान में औपनिवेशिक दमन के नीचे पिस रहे भारत की तुलना में प्राचीन काल में देश अत्यंत सुसमृद्ध और उच्च संस्कृति वाला था। दूसरी कि अपने ही ऐतिहासिक गौरव से हिंदुओं के अनभिज्ञ रह जाने की वजह ये है कि उन्होंने अपना इतिहास खुद लिखने की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। अपने निबंध 'बादशाह दर्पण' में भारतेंदु किसी समय पूरे भारत को 'सारी पृथ्वी का मुकुटमणि' मानते थे और आशा जता रहे थे कि 'कोई माई का लाल ऐसा होगा जो बहुत सा परिश्रम स्वीकार करके एक बेर अपने 'बाप दादों' का पूरा इतिहास लिख कर उनकी कीर्ति चिरस्थायी करेगा।' भारतेंदु ने कश्मीरकुसुम, महाराष्ट्र देश का इतिहास, बूँदी का राजवंश, अगरवालों की उत्पत्ति, बादशाह दर्पण, उदयपुरोदय, पुरावृत्त संग्रह और चरितावली जैसी अनेक ऐतिहासिक रचनाएँ लिखीं और हिंदी में शिवप्रसाद सितारेहिंद के बाद इतिहास के ज्ञान को बौद्धिक चेतना का अंग बनाने की दृष्टि में महत्वपूर्ण कार्य किया।

भारतेंदु और उनके सहयोगी जिस समय हिंदी लेखन के माध्यम से एक विशिष्ट इतिहास चेतना को हिंदू राष्ट्रवाद के लिए इस्तेमाल कर रहे थे, उस समय प्राच्यविद्या का इतिहास दृष्टि के रूप में गहरा प्रभाव बुद्धिजीवियों की चेतना को मथ रहा था। बौद्धिक जिज्ञासा के साथ साथ प्राच्यविद्या को बढ़ावा देने वाले विद्वान ईसाइयत पर केंद्रित पश्चिमी सभ्यता और वैदिक पौराणिक संस्कृति पर केंद्रित हिंदू संस्कृति की समानता पर जोर दे रहे थे। इस समानता पर जोर देते समय दो चीजें एक साथ सामने आईं। पहली यह कि इस बात का श्रेय प्राच्यविदों ने स्वयं अपने को प्रदान किया कि उन्होंने ऐसी संस्कृति की विगत महानता को खोजा है जिससे यूरोपवासी तो क्या स्वयं उसी देश के लोग परिचित नहीं थे। दूसरी यह कि उन्होंने उस विगत सांस्कृतिक महानता से यूरोपियनों का परिचय कराते समय उसकी इस ढंग से व्याख्या की कि ईसाइयत के सिद्धांतों के अभ्यस्त यूरोपियन लोग उसे आसानी से समझ सकें। यूरोप में ईसाइयत की धार्मिक अवधारणा में बहुदेववाद, अवतार पूजा और उपास्य की लौकिक लीलाओं का स्थान नहीं था और आरंभ में यही मान्यताएँ प्राच्यविदों के लिए कौतूहल का विषय बनीं। भारतेंदुयुगीन लेखकों ने हिंदुओं के प्राचीन गौरव और उनके मध्यकाल में मुसलमानों के द्वारा होने वाले दमन की स्मृतियों के जरिए एक सुसंगत हिंदू धार्मिक समुदाय के निर्माण का प्रयत्न किया और इस काम में प्राचीनकाल के संबंध में प्राच्यविदों की इतिहास दृष्टि की सबसे अधिक मदद मिली। प्राच्यविदों ने एकेश्वरवादी धर्मों की मान्यताओं को कसौटी बना कर एक ओर हिंदू धार्मिक सांस्कृतिक प्रवृत्तियों की व्याख्या की, तो दूसरी ओर हिंदी नवजागरण के लेखकों ने भी इतिहास के विवरण देकर हिंदुओं के आंतरिक भेदभाव को उनकी कमजोरी बताया और एकजुटता के राजनीतिक लक्ष्य को अपनाने पर बल दिया गया। प्राच्यविदों के द्वारा इतिहास के निर्माण एवं ऐतिहासिक अध्ययन के लिए प्रयुक्त कसौटियों के बारे में रोमिला थापर के मत को ही लें :

' प्राच्यविद्या ने धार्मिक विश्वासों तथा कर्मकांडों को हिंदू धर्म नाम के एक सुसंगत धर्म तथा एक तर्कसंगत विश्वास से बांधने की जो कोशिश की वे सब सभी धर्मों के नजरिए से की गई थी, क्योंकि प्राच्यविद्या उन्हीं से ज्यादा परिचित थी। उन्नीसवीं सदी तथा बीसवीं सदी के आरंभ के सामाजिक धार्मिक सुधार आंदोलनों पर इन विचारों का किसी न किसी रूप में प्रभाव अवश्य पड़ा था। हिंदू धर्म की आज की अनेक प्रस्तुतियाँ उसे, कुछ कुछ अस्पष्ट रूप से समझे गए, किसी सामी धर्म के समानांतर मान कर चलने से ही निकली हैं। लेकिन यह तस्वीर घरेलू स्रोतों से निकलने वाली तस्वीर से बहुत भिन्न है।' 22

अपने उन्नीसवीं सदी के अध्ययन में वसुधा डालमिया ने राजेंद्रलाल मित्र और आर.जी. भंडारकर जैसे विद्वानों द्वारा प्राच्यविदों की धारणाओं को थोड़े फेरबदल के साथ अपनाए जाने और उनसे हिंदू आत्मबोध का पुनर्निमाण होने की परिस्थितियों का जिक्र किया है। ब्रिटिश अधिकारी जैसे ग्रियर्सन व ग्रीव्ज द्वारा ईसाईयत और हिंदू धर्म की तुलना को उन्होंने ईसाईयत के खिलाफ हिंदू प्रतिरोध की धार को कुंद करने की राजनीति के रूप में भी देखा है। वसुधा का महत्वपूर्ण योगदान ये है कि उन्होंने भारतेंदु और उनके समकालीन लेखकों द्वारा हिंदू धर्म में वैष्णव मत को महत्व देने और हिंदू उपास्यों की प्राचीन यूरोपीय देवी देवताओं से तुलना करने के प्रयासों के प्राच्यविदीय स्रोतों की गहराई से पड़ताल की है। इसके लिए 1808 ईसवी में फ्रैडरिख श्लेगल द्वारा विष्णु को सूर्य का पर्यायवाची बताते हुए वैदिक एकेश्वरवाद पर बल देने, 1868 ईसवी में अलब्रेख्त वेबर द्वारा कृष्ण के मिथक का ईसाइयत से संबंध स्थापित करने, 1852 ईसवी में एफ.एस. ग्राव्जे द्वारा बल्लभ संप्रदाय की गतिविधियों की ईसाई धर्म से समानता तलाशने और मानियर विलियन्स के द्वारा बहुदेववाद के भीतर छिपी समस्त ईश्वरों की एकता का सिद्धांत प्रतिपादित करने का वसुधा डालमिया ने हवाला दिया है :

' व्यक्तिगत ईश्वर में विश्वास को धर्म की अनिवार्य विशेषता के रूप में देखा गया। उपनिषदों एवं अद्वैत वेदांत में मौजूद अवैयक्तिक ईश्वर की धारणा को दर्शन के रूप में समझा गया। फिर वैष्णववाद को भारत के एकेश्वरवादी धर्म के रूप में पहचाना गया क्योंकि वह व्यक्तिगत ईश्वर की धारणा पर आधारित था और विष्णु या उनके अवतार कृष्ण के रूप में व्यक्तिगत उपास्य की भक्ति या पूजा पर केंद्रित था' 23

प्राच्यविदों की इतिहासदृष्टि ने भारतेंदु को किस गहराई से प्रभावित किया, इसे भारतेंदु के 'वैष्णवता और भारतवर्ष'और 'इशूखृष्ट वा ईशकृष्ण'जैसे लेखों में देखा जा सकता है। भारतेंदु ने अपने नाटक 'भारत जननी' में भारत माता की सेवा कर रहे प्राच्यविदों के योगदान को स्वीकार करते हुए ही लिखा है, ' माता! तुमने क्या ग्लैडस्टन फासेट व मानियर विलियन्स इत्यादि महात्माओं का नाम नहीं सुना! ये लोग तो अभागे भारत संतानों के शोकनिवारण के हेतु तन मन सब अर्पण कर चुके हैं और रात दिन उसी का प्रयत्न किया करते हैं।' 24

अनंत अंधविश्वासों, कर्मकांडों और सामाजिक वर्जनाओं के पक्ष की अवहेलना करके हिंदू धर्म को विगत गौरव याद दिलाने में प्राच्यविदों ने अपनी भूमिका निभाई और साथ ही ईसाई धार्मिक सिद्धांतों से उसके कुछ पहलुओं की तुलना कर हिंदुओं और अंग्रेजों की धार्मिक निष्ठाओं में समानता होने के एक व्यापक भ्रम का सृजन किया।

समाज के किसी वर्ग या समूह को जब उन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है जिनमें राष्ट्र के गठन और उसकी पहचान के निर्धारण के प्रश्न केंद्र में हों तो उन्हें (वर्ग या समूह को) पीछे पलट कर अपने इतिहास को खंगालने और उसे पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता का भी अनुभव होता है। इतिहास की खोज का अर्थ यह नहीं होता कि कोई सच्चा, तटस्थ अथवा वस्तुनिष्ठ इतिहास खोज लिया जाएगा और उसे राष्ट्र निर्माण के लक्ष्य के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। राष्ट्र निर्माण की आवश्यकता और उससे संबंधित चुनौतियाँ जिस प्रकार इतिहास के एक खास दौर में पैदा होती हैं उसी प्रकार इतिहास निर्माण के प्रयत्न भी किसी खास वर्ग, समूह या जाति की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए किसी विशेष कालखंड में आरंभ किए जाते हैं। उन्नीसवीं सदी में देश के विभिन्न क्षेत्रों में इतिहास के शोध के प्रयत्न जारी थे और इतिहास के विभिन्न चरणों की व्याख्या हिंदू राष्ट्रीयता के गठन व उसे ऐतिहासिक वैधता दिलाने के लिए की जा रही थी।

भारत में आधुनिक अर्थों में राष्ट्र की अवधारणा का विकास 19वीं सदी के आरंभ में होना आरंभ हुआ जब अंग्रेजों ने उद्योग व्यापार और प्रशासन संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपने विराट तंत्र का निर्माण किया। भारत में इससे पहले भी बाहर से आए लोगों ने यहाँ राजनीतिक, प्रभुत्व स्थापित किया था, पर उस समय भी देश का राजनीतिक एकीकरण का काम पूरा न हो पाने के कारण लोग देश के विभिन्न भूभागों, राजाओं, छोटे बड़े सामंतों और जमींदारों के बीच बँटे रहे। पहले के आक्रमणों और भारत में अंग्रेजों के आगमन के बीच में फर्क के बारे में मार्क्स ने अपने भारत संबंधी लेखों में लिखा :

' अरब, तुर्क, तातार, मुगल जिन्होंने एक के बाद एक हिंदुस्तान पर चढ़ाई की, खुद बहुत जल्द हिंदुस्तानी बन गए। इतिहास के एक शाश्वत नियम के अनुसार बर्बर विजेताओं को उनकी प्रजा की ऊँची सभ्यता ने जीत लिया। अंग्रेज पहले विजेता थे जिनकी सभ्यता हिंदुस्तानियों से ऊँची थी और इसलिए जिन तक हिंदुस्तानी सभ्यता की पहुँच न थी।' 25

अंग्रेजों के अधीन जब राष्ट्र निर्माण की कोशिशें शुरू हुईं तब जिस चीज की सबसे अधिक आवश्यकता पड़ी वह थी राष्ट्र निर्माण के प्रतीकों की आवश्यकता। चूँकि राष्ट्र निर्माण की परिकल्पना 19वीं सदी में किसी धर्मनिरपेक्ष अथवा वर्गीय एकता के दायरे में न रह कर एक मुस्लिम विरोधी और हिंदूवादी दृष्टि से प्रभावित होने के लिए बाध्य हो गई थी इसीलिए हिंदू स्वाभिमान व शौर्य के प्रतीकों का इस काल में सावधानी से चुनाव किया गया और उनके अपने राजनीतिक सामाजिक संदर्भों से मुक्त करके उन्हें समूचे देश की प्रतीकात्मक संघर्ष और विजय में बदल दिया गया। प्रतीकों के इस चयन में प्राचीन और मध्यकाल दोनों कालों के मिथकीय चमत्कार और ऐतिहासिक वीरता का परिचय देने वाले प्रतीकों को विभिन्न विधाओं में रचित साहित्य के माध्यम से याद किया गया। 1882 ई. में रचित कवित 'विजयिनी विजय वैजयंती' में भारतेंदु ने ऐतिहासिक गौरत्व को तब याद किया जब इस वर्ष भारतीय सेना ब्रिटिश सरकार की ओर से लड़ती हुई मिस्र की जीतने में कामयाब रही। 22 सितंबर 1882 को शाम छह बजे बनारस के टाउन हाल में इस जीत का स्वागत करने के लिए एक सभा हुई थी जिसमें भारतेंदु ने अपनी 'विजयिनी विजय वैजयंती' का पाठ किया था।

इसमें भारत के अतीत की तुलना में उसकी वर्तमान हीन दशा पर क्षोभ व्यक्त किया गया। एक ओर अर्जुन, भीम, कर्ण, नकुल सहदेव, पुरु, रघु और परशुराम आदि मिथकों का भाववेगपूर्ण स्मरण किया, दूसरी ओर मध्यकालीन नायकों पृथ्वीराज और हम्मीर जैसे चरित्रों का स्मरण किया। इसके अलावा हिंदी नवजागरण के लेखन में प्रतीकों के निर्माण की प्रक्रिया केवल ऐतिहासिक मिथकीय चरित्रों तक ही सीमित नहीं थी बल्कि इसका दायरा वृहद समाज में भावात्मक उत्तेजना भरने की दृष्टि से अन्य विषयों जैसे भाषा, धर्म, गाय और स्त्री तक भी फैल गया।

हिंदी भाषा कैसे उर्दू का विरोध करती हुई और उसके प्रभाव से अपने को मुक्त करके हिंदू अस्मिता के प्रतीक में ढाली गई इसका सबसे सटीक उदाहरण 1892 में प्रतापनारायण मिश्र द्वारा 'ब्राह्मण पत्र' के विदाई अंक में दिया गया 'हिंदू हिंदी हिंदुस्तान' का मंत्र था। इसके अलावा उन्होंने अपने लेख 'नागरी महिमा की एक चीज' में अगर नागरी को 'सब गुण का छोटा सागर' और संस्कृत को 'ईश्वर की महिमा' या 'ऋषियों की उदार बुद्धि का अंश' के रूप में याद किया तो उर्दू बीबी की पूँजी में उर्दू को ऐसी भाषा में रूप में याद किया जिसे 'जन्म भर पढ़ा कीजिए, तेली के बैल की तरह एक ही जगह घूमते रहोगे।'26 इसी प्रकार इस समय के गोरखपुर के एक अन्य लेखक सोहन प्रसाद मुदर्रिस ने 'हिंदी और उर्दू की लड़ाई' नामक पद्य नाटक लिख कर हिंदी उर्दू के बीच की कट्टर दुश्मनी को सामने रखा। इसमें उर्दू एक पात्र है और हिंदी एक अन्य पात्र। उर्दू अपनी उपयोगिता यह कह कर साबित करने की कोशिश कर रही है कि उसकी वजह से लोगों को तहसीलदार जैसी नौकरियाँ मिल सकती हैं। वह कहती हैं :

' पढ़ब जो उर्दू प्रेम से होइब तहसिलदार।' 27

उधर हिंदी का तर्क है कि उर्दू हत्यारिन और नीच जाति की है और आर्यों के हाथ में ताकत न रह जाने से वह सिर पर चढ़ गई है। उर्दू के लिए नफरत को बयाँ करते हुए हिंदी कहती है :

' आर्य राज है आज नहिं देतौ मुँह पर थूक।' 28

इस पद्य नाटक में उर्दू को इस सीमा तक मुस्लिम अस्मिता का अंग बताया गया कि उर्दू सीखने पढ़ने का मतलब ही मुस्लिम धार्मिक संस्कृति को अपनाना हो गया।

18 अप्रैल 1900 ई. तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर सर एंटनी मैकडॉनल के आदेश के तहत प्रांतीय स्तर पर सरकारी दफ्तरों और अदालतों में फारसी के साथ नागरी लिपि में कामकाज को मंजूरी दे दी गई। इस फैसले का व्यापक स्वागत हुआ और 23 मई 1900 ई. में भारतमित्र में छपे अपने लेख में बालमुकुंद गुप्त ने इस मौके पर हिंदुओं खासकर नागरीप्रचारिणी सभा के लोगों द्वारा झूठमूठ के आनंद में उन्मत्त होने की जगह उन्हें संयम रखने की सलाह दी। लेकिन बालमुकुंद ने केवल मुसलमानों के अखबारों को इस बात का दोषी ठहराया कि वे भाषा के मुद्दे को 'महजबी रंग में रँगकर इसे हिंदू उर्दू की लड़ाई बता रहे हैं।'29 इसके अतिरिक्त यह सीख केवल मुसलमानों के लिए ही थी कि उन्हें :

' यह जानना चाहिए कि जिस भाषा को वे उर्दू कह रहे हैं, वह हिंदी से अलग नहीं है। उर्दू के आदि कवियों ने उस भाषा को हिंदवी कह कर पुकारा है।' 30

बालमुकुंद ने मुस्लिम लेखकों पर तो उर्दू के सांप्रदायिकीकरण का इल्जाम मढ़ दिया, पर खुद हिंदी लेखकों को भी ठीक यही सलाह दी जा सकती थी हिंदी भाषा और लिपि के सवाल को हिंदू मुसलमान झगड़े के रूप में पेश करना अतार्किक प्रयास है।

इस दौरान गाय के संरक्षण और उससे हिंदू पहचान के जुड़ाव पर भी कई तीखीं बहसें और विवाद उठ खड़े हुए। मसलन, शिवप्रसाद सितारेहिंद ने अपनी काफी आधुनिक व वैज्ञानिक तरीके से लिखी किताब 'इतिहासतिमिरनाशक' में प्राचीन वैदिक समाज में गोमांस खाने और यज्ञ में पशुओं की बलि देने से संबंधित इतिहास के विवादास्पद विषय को गंभीरता से उठाया, लेकिन पतली तनी पर नटचाल की तरह उन्होंने कई तरह के संतुलन साधने की कोशिशें कीं। प्राचीन काल में गोमांस सेवन के बारे में वे लिखते हैं, 'ब्राम्हण यज्ञ में बलि देकर स्वच्छंदता से गोमांस भक्षण करते थे।'

जब उन्हें लगता है कि यह कथन हिंदू धार्मिक आस्थाओं के प्रतिकूल है और काफी चुभने वाला हो सकता है, तो आगे यह भी जोड़ देते हैं 'फिर वह उस गौ को जिला भी देते थे।' यानी वैदिक युग के ब्राह्मण पहले तो गाय को मार कर खा लेते थे और बाद में गाय से जुड़ी धार्मिक आस्थाओं के कारण उसे फिर से जिंदा भी कर देते थे। ब्राह्मणों की मौज हो गई और गाय भी बच गई। अपने ही तर्कपूर्ण चिंतन से घबरा कर पीछे हटने और फिर हवा में हाथ पैर मारने से शायद ऐसी ही हास्यास्पद बातों का जन्म होता है। यही नहीं, जब शिवप्रसाद को लगता है कि इससे भी काम नहीं चल रहा तो यह लिखने के लिए मजबूर हो जाते हैं :

' वह ऐसी अथवा इतनी गायें उसके वास्ते कभी न लेते होंगे जिससे खेतीबारी इत्यादि का हर्जाना हो और कौन जाने ऐसी ही लेते हों जो न दूध देने के काम की हों न बच्चा जनने के काम की।' 31

इस तरह शिवप्रसाद इतिहासतिमिरनाशक में एक ओर बौद्धों की तुलना में ब्राह्मणों के पाखंड की हँसी उड़ाते हैं, दूसरी ओर गोमांस भक्षण जैसे मुद्दे पर खुल कर उनका बचाव करते नजर आते हैं।

आर्यों के मूल स्थान का सवाल शिवप्रसाद के समय भी राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बन चुका था और शिवप्रसाद ने इस विषय पर भी बड़ा ही नपातुला दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने आर्य आक्रमण की अवधारणा का सामना बड़ी ही बुद्धिमानी से करने के लिए एक नया सिद्धांत गढ़ दिया। वह यह कि भारत में सरस्वती नदी के तट पर स्थित पंजाब, सिंधु के इलाके और ईरान देश, दोनों ही आर्यों के मूल स्थान रहे हैं। भारत के प्राचीन आर्यों के बारे में उन्होंने लिखा :

' ये हिंदू आर्य लोग उस समय सुख चैन से सारस्वत देश में अर्थात सरस्वती के किनारे पंजाब और उसके आसपास निवास करते थे। ज्यों ज्यों संतान बढ़ते गए पूर्व की ओर फैलने लगे और भारी भारी जंगलों में आग लगा कर जैसा कि अब उत्तरी अमेरिका में करते हैं रास्ते निकाले। यहाँ तक कि जमुना और गंगा पार होकर कोशल और मिथिला अर्थात अवध और उसके समीपी इलाकों में चले आए। पश्चिमोत्तर हम लोगों का मूल स्थान होने में किसी तरह का संदेह नहीं पाया जाता है।' 32

इसी प्रकार ईरान को भी आर्यों का उद्भव स्थल दिखाने के लिए लिखा :

' पारस देश वाले भी आर्य थे वरन इसी कारण उस देश को अब भी ईरान कहते हैं। यूनान वाले उसे अरिआन पुकारते थे।' 33

जाहिर है कि पूर्वी एशिया के बारे में अठारवीं सदी में यूरोप में विकसित आर्य आक्रमण की धारणा से निपटने के लिए शिवप्रसाद ने खास तरीका ईजाद किया था। उन्होंने एक साथ आर्यों के दो मूल स्थान खोज निकाले। ईरान के अलावा सरस्वती तट पर बसा पंजाब क्षेत्र भी आर्यों की जन्मस्थली बन गया। बिना लाठी तोड़े साँप मार देने का यह अद्भुत उदाहरण था। एक समय बाल गंगाधर तिलक ने भी आर्यों की जन्मस्थली उत्तरी ध्रुव मानी थी। बाद में जब आर्यों के मूल स्थान को लेकर तीखी बहसें हुईं तो एक संघ विचारक विष्णुकांत शास्त्री ने यह कह कर अपनी ही हँसी उड़वाई थी कि उत्तरी ध्रुव पहले भारत का ही अंग था और वह बाद में खिसक कर दूर चला गया, जबकि आर्य यहीं रह गए।

इसी प्रकार गोकुशी के मुद्दे को भी हिंदुओं की आस्था और परंपरागत धर्म पर प्रहार के रूप में उछाला गया। 1877 ई. में जब दिल्ली दरबार हुआ तब भारतेंदु ने गोरक्षा के मुद्दे को अहमियत देते हुए इसके पक्ष में 60 हजार लोगों के दस्तखत वाला एक मेमोरियल सरकार को दिया। साहित्यिक स्तर पर भारतेंदु की किताब गोमहिमा (1881), अंबिकादत्त का नाटक 'गोसंकट' (1882) और प्रताप नारायण मिश्र का लेख आलमे तस्वीर इत्यादि कृतियाँ यह दिखाती हैं कि राष्ट्रनिर्माण की कल्पना पूरी तरह से आधुनिक, समावेशी ओर धर्मनिरपेक्ष नहीं हुई थी और राजनीतिक वर्चस्व के लिए कई बार धार्मिक आस्थाओं को पूरे राष्ट्र के जटिल प्रश्न के रूप में प्रस्तुत करने की भी चेष्टा की जाती थी। गोरक्षा के प्रश्न को उभार कर हिंदुओं की निर्दयी स्वभाव के मुसलमानों के आगे निरीहता को प्रस्तुत करने की कोशिश की जाती थी। अंबिकादत्त व्यास के नाटक 'गो संकट' में लाला गोबरधन दास नामक पात्र सारे मुसलमानों को गोकुशी का अपराधी ठहराते हुए कहता है :

' हम लोगों की तो यह भलमनसी कि निज मंदिरों के पास इनको मस्जिद बना लेने दें, रात दिन बड़े मियाँ बड़े मियाँ कह कर बातें करते हैं, और इनके यह कर्म कि हम लोगों की माता सदृश गौ को...। 34

'गो महिमा' में भारतेंदु ने गाय की पौराणिक शास्त्रीय महिमा का बखान करने के लिए इसमें प्राचीन पुराणों और अन्य हिंदू धार्मिक ग्रंथों में गाय के बारे में वर्णित श्लोकों के हिंदी अनुवाद का संग्रह किया। बाईस पृष्ठों की इस किताब के अंत में किताब छपाने के मकसद को स्पष्ट करते हुए लिखा :

' उसी आर्यतेजोमय रक्त को सतेज करने ही को यह संग्रह प्रकाशित होता है।' 35

उधर प्रताप नारायण मिश्र ने गौ माता की महिमा की तारीफ करते हुए उसे 'पूज्य ब्राह्मण के नाम से भी पहले स्मरण की जाने वाली' 36 कहा और लिखा कि 'पवित्रता यह कि उनका मल मूत्र तलक खाया जाता है।'37 गाय से जुड़े हिंदू धार्मिक विश्वासों की चर्चा करने के साथ ही प्रतापनारायण ने उनके व्यावहारिक उपयोग पर भी बल दिया। उन्होंने अफसोस जाहिर किया कि लोग आतिशबाजी और अदालतों में सैकड़ों रुपया फूँक देते हैं पर 'गऊ माता के नाम पर कुछ भी नहीं निकलेगा।'38

प्राचीन हिंदू कथा नायकों का स्मरण कविताओं में ही हुआ है जबकि मध्यकालीन हिंदू राजाओं के कृत्यों को प्रेरणास्रोत की तरह प्रस्तुत करने के लिए उन पर बड़े बड़े नाटक, जीवनियाँ और लेख लिखे गए। इन महान पराक्रमी और आर्य धर्म के रक्षक हिंदू राजाओं के चरित्र चित्रण का यह लाभ भी था कि इन्हीं के माध्यम से गाय, ब्राह्मण, स्त्री रक्षा और धर्म जैसे विषयों को ऐतिहासिकता का आवरण प्रदान कर दिया जाता था। यहाँ तक कि सभी ऐतिहासिक राजाओं की गाय ब्राह्मण रक्षक और स्त्री रक्षा के आधार पर ही प्रशंसा की जाती थी। भारतेंदु के 'नीलदेवी' नाटक में राजा सूर्यदेव और उसकी रानी नीलदेवी के मुस्लिम शासकों से संघर्ष को कथानक का आधार बनाया गया। राधाकृष्ण दास ने महाराणा प्रताप सिंह और पद्मावती नाटकों में मध्यकाल की ऐतिहासिक वस्तुस्थिति की अभिव्यक्ति के बहाने मुसलमानों की कट्टर और खलनायक छवि को उभारा। भारतेंदु जैसे अपने व्यक्तित्व और सामाजिक गतिविधियों के मामले में अन्य लेखकों के लिए मार्गदर्शक थे उसी प्रकार राधाकृष्णदास ने 1883 के अपने नाटक 'महारानी पद्मावती' में इस प्रेरणा को इस तरह से स्वीकार किया :

' पूज्यपाद भाई साहब बाबू हरिशचंद्र जी भारतेंदु ने जब नीलदेवी लिखा, मुझसे आज्ञा किया कि भारतवर्ष में अब ऐसे ही नाटकों की विशेष आवश्यकता है जो आर्य संतानों को अपने पूर्व पुरुषों का गौरव स्मरण करावे अतएव तुम कोई नाटक इस चाल का लिखो।' 39

पूर्व पुरुषों के गौरव का स्मरण कराने का अर्थ था पूर्व पुरुषों का केवल ऐसे संघर्ष में लिप्त दिखना जिसका मकसद मुस्लिमों के हाथों अपनी खोई हुई सत्ता को पुनः वापस पाना हो। मध्यकाल के हिंदू राजाओं के चरित्र के वर्णन के माध्यम से यह भी साबित किया जाता था कि जिन परिस्थितियों के बीच उन्होंने हिंदू धर्म और आस्था की रक्षा के लिए मुसलमानों से डट कर लोहा लिया वर्तमान में हूबहू नहीं तो कम से अनेक प्रवृत्तियों के असर के रूप में उनकी निरंतरता बनी हुई है।

इस समय पृथ्वीराज, महाराणा प्रताप, शिवाजी, रत्नसेन, पद्मावती, हम्मीर समेत कई ऐतिहासिक एवं कल्पित हिंदू राजाओं को हिंदू राष्ट्र के निर्माण के आदर्श प्रतीकों के रूप में खड़ा किया गया। यह मिथ्याभास भी खड़ा किया जाता था कि हिंदू शौर्य अस्मिता के मध्यकालीन प्रतीक मुसलमानों से हिंदू धर्म व हिंदू राज की रक्षा के संघर्ष में अकेले नहीं थे, बल्कि समस्त हिंदू प्रजा उनके लिए एकजुट हो गई थी। जबकि सच ये था कि परंपरागत वर्णव्यवस्था ने पहले से ही इतना आंतरिक विखंडन और विभाजन कर रखा था कि किसी आक्रमणकारी के खिलाफ हिंदू साम्राज्य की रक्षा करने के लिए उनकी एकजुटता की बात करना हवाई कल्पना के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था।

भारतेंदु, प्रतापनारायण, राधाकृष्णदास और राधाचरण गोस्वामी आदि ने मध्यकालीन हठी लोभी और दुष्ट मुसलमानों की तुलना में हिंदू नायकों की वीरता व उदारतापूर्ण चरित्र के माध्यम से यह दर्शाने की कोशिश की कि हिंदुओं के लिए राष्ट्रीय चेतना से प्रेरित होना कोई नई बात नहीं, बल्कि अत्यंत प्राचीन और मध्यकाल में भी इनके भीतर राष्ट्रीय भावनाएँ उपस्थित थीं।

विपिन चंद्रा ने इस प्रक्रिया को बौद्धिकों और लेखकों की ऐसी विवशता के रूप में देखा है जिसमें वे ब्रिटिश राज्य के प्रति अधिक आलोचनात्मक हुए बगैर अपनी देशभक्तिपूर्ण भावनाओं को अभिव्यक्त करना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने 1857 ई. के गदर के बहादुरशाह, नाना साहेब, रानी झाँसी, तात्या टोपे और कुँवर सिंह जैसे चरित्रों के स्थान पर मध्यकालीन हिंदू राजाओं को राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वाधीनता के नायक के रूप में प्रस्तुत किया। विपिन चंद्रा लिखते हैं :

' नायकों के निर्माण के मामले में ब्रिटिश अधिकारियों के रवैए ने खासी महत्वपूर्ण भूमिका निबाही। सच्चे राष्ट्रवाद या साम्राज्यवाद विरोध की किसी अभिव्यक्ति पर त्यौरियाँ चढ़ाते उन्हें ऐसे व्यक्तियों के महिमामंडन से खास चिढ़ थी जिन्होंने उनके शासन का विरोध किया होता। जबकि फूट डालो और राज करो की नीति के अनुरूप वे छद्म राष्ट्रवाद को प्रोत्साहन देते।' 40

ब्रिटिश अधिकारियों की नाराजगी और 1857 के गदर के प्रति अपने वर्गीय रवैए के कारण हिंदी नवजागरण के रचनाकारों ने भी गदर के नायकों की छवि और कारनामों को राष्ट्रनिर्माण का प्रतीक बनने के अनुपयुक्त माना और इसके लिए मध्यकाल के हिंदू राजाओं व रानियों से जुड़ी ऐतिहासिक कथाओं में अनेक काल्पनिक सामग्री ठूँस कर उसके जरिए हिंदू जनभावनाओं को उकसाने का प्रयास किया। इन प्रतीकों के महिमा मंडन के पीछे वास्तविक उद्देश्य मुसलमानों के किसी भी विनाशकारी संपर्क से अछूती एक पृथक हिंदू ब्राह्मणवादी संस्कृति के मिथक का निर्माण करना भी था। लेकिन क्या धार्मिक विभाजन के आधार पर संस्कृतियों के विभाजन की चेष्टाएँ यथार्थ का खुला उल्लंघन और अवहेलना नहीं करती थीं। प्रेमचंद ने 15 जनवरी 1934 के 'माधुरी' के अंक में 'सांप्रदायिकता और संस्कृति' नामक लेख लिखा था जिसमें विस्तार से और सोदाहरण इस बात का उल्लेख किया था कि भाषा, पहनावे, खानपान, संगीत, चित्रकला जैसी चीजों के आधार हिंदुओं और मुसलमानों के मध्य इतनी अधिक समानता है कि उन्हें दो पृथक सांस्कृतिक समुदायों के रूप में देखना यथार्थ विरोधी बात है।

मध्यकाल से राष्ट्रनिर्माण के प्रतीकों का चयन अपने भीतर एक सकारात्मक पहलू भी छिपाए हुए था। इसके माध्यम से साम्राज्यवाद के इस अहंकार को तो तोड़ा ही जा सकता था कि भारत के लोग स्वशासन के सर्वथा अयोग्य हैं और उनकी सर्वमुखी प्रगति केवल तब ही संभव है जब वे ब्रिटिश राज की अधीनता को स्वीकार कर लें। आगे चल कर साम्राज्यवाद का राजनीतिक और विचारधारात्मक स्तर पर सामना करने के लिए अनेक राष्ट्रवादियों ने जैसे आर.सी. दत्त, के.पी. जायसवाल और पी.एन. बनर्जी ने इतिहास के गौरवशाली प्रतीकों का प्रयोग किया। प्राचीन मिथकों और प्रतीकों का प्रयोग उस अवस्था में अधिक कुशलता से हो सकता है जब राष्ट्रवाद के मकसद से साम्राज्यवाद के विरोध का संघर्ष काफी तेज हो गया हो। पर उन्नीसवीं सदी में हिंदी बौद्धिकों में राष्ट्रीय चेतना में साम्राज्यवाद के विरोध के स्थान पर मुसलमानों के खिलाफ भावनाएँ अधिक महत्वपूर्ण हुईं और राष्ट्रीयता के हिंदू प्रतीकों के बल पर आधुनिक काल में ही नहीं बल्कि मध्यकाल में भी हिंदू और मुसलमान दो पृथक राष्ट्रों की कल्पना को अधिक आवेग और गंभीरता से उभारा गया।

भारत में अन्य देशों की भाँति ही राष्ट्र निर्माण की अपनी ही एक प्रक्रिया और विशिष्टता थी, जो औपनिवेशिक शासन के अधीन जारी थी। व्यापार विनिमय और पूँजीवादी क्रांति की देशव्यापी प्रक्रिया के फलस्वरूप सबसे पहले इंग्लैड में राष्ट्रवाद का विकास हुआ और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का भी उदय हुआ।41 राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास के साथ कैथोलिक चर्च और उसके द्वारा समर्थित सामंती ढाँचे की शक्ति का विघटन भी आरंभ हुआ। लेकिन भारत में राष्ट्रीय चेतना के विकास की प्रक्रिया भिन्न थी क्योंकि यहाँ खुद ब्रिटेन के औपनिवेशिक हितों के लिए व्यापार, तकनीक और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास के मार्ग को अपनाया गया। इसलिए यहाँ राष्ट्रीय चेतना के विकास के लिए दो प्रक्रियाएँ समानांतर रूप से चलीं। एक ओर यूरोप के आधुनिक सुधारवादी विचारों का लाभ उठा कर अपनी धर्म संस्कृति के प्रति आलोचनात्मक रुख अपनाया गया तो दूसरी ओर नए संगठित हो रहे मध्यवर्ग ने पूँजीवादी अर्थव्यवस्था और आधुनिक शिक्षा का लाभ उठाते हुए उपनिवेशवाद द्वारा पैदा वैचारिक चुनौतियों का सामना करने का प्रयास किया। इसी प्रक्रिया में 'राष्ट्र' और 'इतिहास' के संबंधों को नए ढंग से उठाया गया और इतिहास राष्ट्रीय अस्मिता को पुनर्परिभाषित करने का माध्यम बन गया। हिंदी लेखन में भी 'राष्ट्र' और 'इतिहास' के संबंधों की व्याख्याएँ प्राचीन गौरवपूर्ण प्रतीकों के माध्यम से सामने आईं। इन प्रतीकों का चयन हिंदू विशिष्टता पर जोर देने के लिए किया गया। लुप्त मिथकीय स्वर्ण युग की स्मृति और हिंदू संघर्ष दोनों को उभारने के लिए मुख्यतः तीन कारणों से प्रतीकों का सहारा लिया। पहला इस कारण से कि भारतेंदु और उनके सहयोगी लेखक स्वयं भी अपने लेखन के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का विस्तार कर रहे थे और अपनी उच्च जातीय हिंदू विश्व दृष्टि के कारण प्राचीन और मध्यकालीन हिंदू राजाओं का राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक के रूप में प्रयोग कर रहे थे। दूसरा कारण यह कि 1857 ई. के गदर के बाद हिंदू मुस्लिम अलगाव की परिस्थितियाँ नए ढंग से तैयार हुईं। 1857 के विद्रोह को बलवे का नाम देते हुए प्रताप नारायण मिश्र ने 'हम राजभक्त हैं' निबंध में लिखा :

' वह अपराध प्रजा का था, किसी प्रतिष्ठित हिंदू मुसलमान का दोष न था, केवल थोड़े से अदूरदर्शी लोगों के कारण हमारे भारतीय नेशन मात्र को कलंक लगाना बुद्धिमत्ता से दूर है।' 42

यहाँ 'प्रतिष्ठित हिंदू मुसलमान'शब्द का प्रयोग ध्यान देने योग्य है क्योंकि यह एक ओर विद्रोह के प्रति शिक्षित एवं उच्च जाति के हिंदू मुसलमानों के दृष्टिकोण को प्रकट करता है वहीं यह भी पता चलता है कि विद्रोह से सांप्रदायिक एकता की प्रेरणा लेने के स्थान पर प्रतिष्ठित हिंदू मुसलमानों द्वारा अपने हितों को अलग अलग कर देखने और कुछ सीमा तक एक दूसरे के विरोध में देखने की प्रवृत्ति गहराती जा रही थी। इस निरंतर गहराती प्रवृत्ति के कारण हिंदी लेखन के माध्यम से देश पर हिंदुओं का प्राचीन अधिकार और स्वाभाविक दावा प्रस्तुत करने के लिए ऐतिहासिक पौराणिक रचनाएँ लिखी जाने लगीं। एक नए किस्म का इतिहासबोध हिंदू सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से स्थापित किया जा रहा था जो यह तर्क देता था कि बेगुनाह हिंदुओं के कत्लेआम से पूरा मध्यकालीन इतिहास रक्तरंजित है जबकि प्राचीन सभ्यताओं 'मिस्र, यूनान, रोम आदि देश की प्राचीनता भारत के समकक्ष है, सभी ने सभ्यता और उन्नति का अंकुर यहीं से ले ले अपनी अपनी भूमि में लगाया।'43

हिंदू प्रतीकों के प्रयोग का तीसरा प्रमुख कारण प्राच्यविदों के प्रभाव से पैदा हुआ जिन्होंने अपने शोधकार्यों के माध्यम से प्राचीन आध्यात्मिक गौरव की सुसंगत अवधारणा निर्मित की। इसके असर से हिंदी लेखन में भी हिंदू प्रतीकों को धार्मिक आध्यात्मिक लक्ष्य के लिए प्रतिबद्ध दिखाया गया। भारतेंदु का नीलदेवी, प्रतापनारायण मिश्र का हठी हमीर, राधाचरण गोस्वामी के नाटक अमर सिंह राठौर और राधाकृष्णदास के महाराणा प्रताप सिंह एवं पद्मावती जैसे नाटकों के मुख्य पात्र मुख्य रूप से हिंदू धार्मिक आध्यात्मिक लक्ष्यों के लिए संघर्षरत दिखाए। यह साबित करने का प्रयास किया गया कि हिंदू चरित्रों का जीवन और उनके निर्णय धर्म और उससे संबंधित विभिन्न चिंताओं से प्रभावित होता है। हिंदू चरित्रों की व्याख्या धार्मिक प्रभाव के आधार पर करने की इसी पद्धति के बारे में असगर अली इंजीनियर ने लिखा :

' सांप्रदायिक इतिहासकार यह पूर्व मान्यता लेकर चलते हैं कि मानव व्यवहार मुख्यतः धार्मिक विश्वासों से प्रेरित होता है। यह एक पूर्णतया गलत धारणा है। वास्तव में एक सामान्य व्यक्ति का व्यवहार विभिन्न जटिल कारणों से प्रभावित होता है। मानव व्यवहार के निर्धारण में निजी हितों और सांस्कृतिक प्रभाव का भी कम महत्वपूर्ण योगदान नहीं होता। शासकों के मामले में तो और अधिक जिन्हें अनेक परस्पर विरोधी हितों का आपस में सामंजस्य स्थापित करना पड़ता है।' 44

सच यह है कि हिंदू राजपूत राजाओं और शिवाजी जैसे मराठा शासकों को प्रतीक बना कर हिंदू राष्ट्र के जिस मुस्लिम राष्ट्र के साथ टकराव की कल्पना की गई थी वह ऐतिहासिक सच एवं निष्कर्षों से एकदम उलट था। सत्ता व राजनीतिक स्वार्थ के लिए हिंदू शासकों ने हिंदुओं और मुस्लिम शासकों ने मुसलमानों पर जुल्म ढाने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। बाबर ने इब्राहीम लोदी के साथ युद्ध करके दिल्ली पर कब्जा किया। बाबर के मरने के बाद जब हुमायू गद्दी पर बैठा तो उसको पहली चुनौती किसी हिंदू शासक से नहीं बल्कि शेरशाह सूरी से मिली। इसी प्रकार हल्दीघाटी की लड़ाई में अकबर की सेना का नेतृत्व राजा मानसिंह और महाराणा प्रताप की सेना का नेतृत्व एक पठान मुस्लिम हकीम खाँ सूर के हाथ में था। इस प्रकार शिवाजी को भी एक हिंदू राष्ट्र के निर्माण का प्रतीक बनाया जाता है। इतिहास के तथ्य कुछ और ही बयाँ करते हैं। औरंगजेब ने शिवाजी को पकड़ने और उनके विरुद्ध षड्यंत्र करने का कार्यभार और किसी को नहीं बल्कि आमेर के मिर्जा राजा जयसिंह को सौंपा जिन्होंने जेम्स टॉड के इतिहास के अनुसार ही 'सभी प्रकार से मुगल साम्राज्य की सहायता की। बादशाह के प्रभुत्व को बढ़ाने के लिए अनेक अवसरों पर उसने अद्भुत कार्य किए।' 45

खुद शिवाजी का निजी अंगरक्षक कोई हिंदू नहीं बल्कि एक मुसलमान सिद्दी अब्राहम था। इसके विपरीत जब औरंगजेब ने शिवाजी को पकड़ा, तब एक हिंदू राज्य सामंत जसवंत सिंह ने शिवाजी की हत्या कर देने के लिए औरंगजेब को उकसाया था। सारांश यह कि सामंती सत्ता और मध्यकालीन राजनीतिक ढाँचे वाले समाजों के राजनीतिक संघर्ष इतने जटिल हैं कि उन्हें केवल हिंदू मुस्लिम द्वंद्व के रूप में पेश करना एक जटिल समस्या का आसान हल तलाशने जैसी बात है। ऐतिहासिक चरित्रों के ऐतिहासिक संदर्भों को ठीक से समझा जाए तो यह साफ नजर आता है कि ये हिंदू प्रतीक स्वयंभू और शाश्वत रूप में नहीं बल्कि समकालीन राजनीतिक आवश्यकताओं की निर्मिति अधिक थे। पर प्रश्न यह है कि जब मुस्लिम प्रभावों एवं प्रलोभन से मुक्त विशुद्ध हिंदू सांस्कृतिक प्रतीक निर्मित किए जा रहे थे तब क्या हिंदुओं मुसलमानों के साझे प्रतीक बनने की भी संभावना थी? खासकर ऐसे दौर में जब भारतेंदु हिंदू मुसलमानों की एकता की व्यावहारिक जरूरत को समझ कर कहते थे :

' यह समय इन झगड़ों का नहीं। हिंदू जैन मुसलमान सब आपस में मिलिए।' 46

या प्रतापनारायण मिश्र लिखते हैं :

' हिंदू मुसलमान भारत माता के दो हाथ हैं।' 47

बाबू बालमुकुंद ने भी बंगविच्छेद पर 'स्वदेशी आंदोलन' शीर्षक कविता में लिखा :

' आँगन में दीवार बनाई, अलग किए भाई से भाई

भाई से किए भाई दूर , बिना विचारे बिना कसूर।' 48

हिंदी लेखन में हिंदू मुस्लिम एकता की जरूरत के बारे में एक सामाजिक राजनीतिक चेतना की झलक तो मिलती है लेकिन प्राचीन और मध्यकाल दोनों के बारे में इतिहास का हिंदूवादी विमर्श इतना स्वीकृत हो गया था कि यह चेतना हिंदुओं व मुसलमानों के साझे व सुव्यवस्थित प्रतीक निर्मित करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ सकी। भारतेंदु ने 1884 ई. में 'पंच पवित्रात्मा' शीर्षक से लिखित पुस्तक में महात्मा मुहम्मद, आदरणीय अली, उनकी बीवी फातिमा, इमाम हसन और इमाम हुसैन की जीवनियाँ लिख अपने ज्ञान और उदारता का परिचय तो दिया पर हिंदुओं मुसलमानों के साझे इतिहास और ऐतिहासिक रिश्ते पर कुछ विशेष नहीं लिखा।

इस संबंध में 19वीं सदी के रचनाकारों की मध्यकालीन मुगल शासक अकबर के बारे में सोच समझ का अध्ययन भी काफी रोचक हो सकता है। अकबर को सभी धर्मों के बीच एकता स्थापित करने और हिंदुओं के प्रति उदार व सहिष्णुतावादी नीतियों को अपनाने वाले मुगल शासक के रूप में याद किया जाता है। 19वीं सदी में कई स्तरों पर मध्यकाल के बारे में नकारात्मक स्मृतियाँ गढ़ने का काम चल रहा था और अकबर का चरित्र इस काम में खासी उलझन पैदा करता था। इस वजह से इस दौर के साहित्य में कई बार आवेश में आकर लेखकों ने अकबर की धार्मिक दृष्टि से सहिष्णु और उदार शासक की छवि तोड़ने की भरपूर कोशिश की। खुद भारतेंदु का लेखन इस बारे मे भयंकर अंतर्विरोधों से भरा हुआ है। अपनी बालबोधिनी पत्रिका में 1876 ई. में प्रकाशित कविता श्री राजकुमार शुभागमन वर्णन में भारतेंदु ने विक्रम, कालिदास, भोज, व्यास और युधिष्ठिर की श्रेणी में ही अकबर को याद किया था और लिखा : 'जदपि विक्रम अकबरहू कालिदास हूँ नाहिं, जदपि न सो विद्यादि गुन भारतवासी माहिं।'

पर आगे चल कर 1884 में लिखी रचना 'बादशाह दर्पण' में उन्होंने अकबर को मुहम्मद, महमूद, अलाउद्दीन और औरंगजेब की कतार में रख कर उसे 'हिंदू मुसलमान में खाना पीना, ब्याह शादी चलाने की कोशिश करने वाला 'बुद्धिमान' शत्रु कहा। वे लिखते हैं :

' प्यारे भोले भाले हिंदू भाइयो! अकबर का नाम सुन कर आप चौंकिए मत। यह ऐसा बुद्धिमान शत्रु था उसकी बुद्धिबल से आज तक आप लोग उसको मित्र समझते थे। किंतु ऐसा नहीं है। उसकी नीति अंग्रेजों की भाँति गूढ़ थी। मूर्ख औरंगजेब उसको समझा नहीं, नहीं तो आज दिन हिंदुस्तान मुसलमान होता। हिंदू मुसलमानों में खाना पीना, शादी कभी चल गई होती। अंग्रेजों को भी जो बात नहीं सूझी, वह इसको सूझी।' 49

यानी अकबर की उदारता और सहिष्णुता को भी विवादास्पद बनाने के लिए भारतेंदु ने भरपूर कोशिश की और औरंगजेब व अंग्रेजी शासन की तुलना में उसे हिंदुओं का ज्यादा खतरनाक शत्रु साबित कर दिया। भारतेंदु ने ऐतिहासिक कथाओं और घटनाओं के आधार पर नाटक, कविताएँ और कुछ निबंध लिखने के साथ ही पुरातात्विक महत्व की चीजों और सामग्रियों का संकलन भी किया। अपने पुरावृत संग्रह में उन्होंने अकबर और औरंगजेब को लिखे पत्रों का भी संकलन किया है। 'बादशाह दर्पण'में भारतेंदु ने अकबर की उदारता के पीछे काम कर रही हिंदू विरोधी राजनीति का खुले तौर पर उल्लेख किया था, पर इससे लगभग दस साल पहले भारतेंदु प्रमाणों के साथ यह बताने की चेष्टा कर रहे थे कि अकबर और औरंगजेब के चरित्र में जमीन आसमान का अंतर है। उन्होंने जिस राजा रामदास कछवाहे की बनाई टीका के कुछ अंशों का 1874 ई. में उद्धरण दिया था उसके मुताबिक अकबर ऐसा व्यक्ति था : 'जिसने वेद गऊ द्विज और धर्म की रक्षा को सगुण शरीर धारण किया है।'50

भारतेंदु ने भी अपनी ओर से अकबर की तारीफ इस तरह से की है :

' उसने गोवध बंद कर दिया यह कवि परंपरा द्वारा जो श्रुत था अब प्रमाण भी मिल गया। हिंदू शास्त्रों को वह सुना करता था... विशेष बात यह जानी गई कि वह गंगाजल छोड़ कर और पानी नहीं पीता था। ...इसी से उसको परमेश्वर का अवतार कहने में हिंदुओं ने संकोच नहीं किया।' 51

लेकिन अगले दस वर्षों में, बादशाहदर्पण लिखने के समय तक, भारतेंदु का अपने ही इस सपाट निष्कर्ष पर विश्वास और गहरा होता चला गया कि मध्यकाल सभी मुसलमानों के लिए स्वर्णकाल और सभी हिंदुओं के लिए संकटकाल था और अकबर हिंदुओं का नुकसान करने वाला धूर्त शासक था।

भारतेंदु के फुफेरे भाई राधाकृष्णदास ने तो अपने नाटक महाराणा प्रतापसिंह नाटक में अकबर को भारत को 'हिंदुओं का मुल्क' मानने वाले और 'गुलबदनों की चाह में पागल' रहने वाले कायर और दगाबाज मुस्लिम शासक के रूप में पेश कर अकबर के बारे में भारतेंदु के दृष्टिकोण को ही आगे बढ़ाया। नाटक की विशेषता कहें या रचनाकार की दृष्टि की विडंबना कि इसमें अकबर जैसे चरित्रों को भी हिंदू स्त्रियों पर बुरी निगाह रखने वाले सत्तालोलुप व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया। एक स्थान पर अकबर को इस प्रकार स्वगत चिंतन करते दिखाया जाता है :

' इन गुलबदन की चाह ने तो मुझे पागल ही बना दिया। कितनी देर से कितने कामों का हर्ज करके बावला सा यहाँ घूम रहा हूँ मगर अब तक सिवाय हसरत के कुछ हाथ न आया।' 52

नाटक में अकबर को एक कामुक चरित्र का व्यक्ति और अपने पृथ्वीराज नामक दरबारी सरदार की रानी के साथ जोर जबरदस्ती करते भी दिखाया गया। हिंदुओं के मन में मध्यकाल के प्रति विरक्ति और कटु स्मृतियाँ पैदा करने के प्रयास इस सीमा तक आगे बढ़ गए थे कि मुस्लिम सहिष्णुता व उदारता का एक भी प्रतीक अब राधाकृष्णदास जैसे हिंदी नवजागरण के लेखकों को स्वीकार नहीं हो सकता था।

इसी प्रकार प्रेमघन ने प्रयाग से निकलने वाले पत्र 'इंडियन प्यूपल'के द्वारा अकबर का वार्षिकोत्सव मनाने के प्रस्ताव का जिस जोरशोर से विरोध किया उससे पता चलता है कि ऐतिहासिक प्रतीकों के चयन में उन प्रतीकों की ऐतिहासिक भूमिकाओं की जगह उनकी धार्मिक निष्ठाएं कितनी महत्वपूर्ण बन जाती थीं।

इंडियन प्यूपल ने मुगल सम्राट अकबर का वार्षिकोत्सव ठीक उसी तर्ज पर मनाने की वकालत की थी जैसे शिवाजी का महाराष्ट्र में मनाया जाता था। लेकिन भारतमित्र और बंबई से प्रकाशित 'वेंकटेश्वर समाचार पत्र' जैसे पत्रों ने अकबर का वार्षिकोत्सव मनाए जाने के किसी भी प्रस्ताव को हिंदू द्वेष और घृणा में जोड़ दिया। प्रेमघन, जो स्वयं इस प्रस्ताव के निंदकों में अग्रणी थे, यह सुझाव दिया कि अकबर के स्थान पर महाराणा प्रताप का वार्षिकोत्सव मनाया जाना चाहिए। उन्होंने लिखा :

' हम अपने इन दोनों सहयोगियों से (भारत मित्र और वेंकटेश्वर समाचार) इस अंश में सहमत हैं कि भावदार्य्य कुल कमल दिवाकर हिंदू पति बादशाह महाराणा उदय पुराधीश वीरवर प्रताप सिंह के वार्षिकोत्सव रूप में वीरपूजा की जाए और उनकी अति उज्वल कीर्ति का आर्य संतानों को स्मरण कराने का शुभ अवसर दिया जाए।' 53

यह जातीय गौरव हिंदू धर्म के ऐतिहासिक गौरव की पुनर्स्थापना के लक्ष्य से जोड़ दिया गया और अन्य धार्मिक मतों के समानांतर हिंदू धार्मिक विश्वासों को इस तरह पेश किया गया जैसे भारत के सारे हिंदू अपनी बाकी दुख तकलीफें भूल कर धार्मिक अधिकारों को पाने के लिए छटपटा रहे हैं। मुसलमान शासकों को कामी और औरतबाज के रूप में पेश करना उस समय आम बात थी और शिवप्रसाद ने भी ठीक इसी आधार पर अकबर का भी खलनायकीकरण किया। इतिहास तिमिरनाशक के पहले खंड में उन्होंने अकबर के राजनीतिक जीवन के बारे में दस पृष्ठों (49-58) और तीसरे खंड में उसकी शासन व्यवस्था का सात पृष्ठों में (108-114) वर्णन किया है। उन्होंने सुंदर स्त्रियों को अपने हरम में डालने की अकबर की आदत का मध्यकालीन इतिहासकार अब्दुल कादिर बदांयुनी के हवाले से लिखा :

' अकबर सरीखे बादशाह को देखो कि अब्दुल वासिअ से उसकी मनकूहा स्त्री छीन कर अपने हरम में डाल ली। जब अकबर की नजर पड़ी उसके शौहर अब्दुल वासिअ से कहला भेजा कि तुम अपनी मनकूहा को तिलाक देकर फौरन छोड़ दो। बेचारे ने अपनी स्त्री को तिलाक देकर फौरन छोड़ दिया।' 54

पर अपवादस्वरूप इस घटना का उल्लेख करने के बावजूद शिवप्रसाद द्वारा अकबर के शासनकाल की सराहना ही की गई। शिवप्रसाद ने मध्यकाल को हिंदुओं को लौंडी गुलाम बनाए जाने, मंदिर मूर्तियों को तोड़ने और उन्हें जबरन मुसलमान बनाए जाने के काल के रूप में याद किया लेकिन अकबर का जिक्र आने पर उसकी अनेक विशेषताओं को सामने रखने में संकोच नहीं किया। अकबर के दयालु और नेक स्वभाव के बारे में बताने के लिए अनेक कहानियों के उदाहरण दिए हैं और लिखा है :

' जिजया का महसूल उसने एककलम मौकूफ कर दिया क्योंकि हिंदू और मुसलमान उसके नजदीक बराबर थे। यात्रियों से महसूल लेना भी बिलकुल बंद कर दिया। ...लड़ाई के कैदियों को लौंडी गुलाम बनाने का दस्तूर बिलकुल उठा दिया।' 55

शिवप्रसाद ने अकबर के राजकाज की प्रशंसा इस आधार पर की है क्योंकि उसके समय में हिंदुओं को ऊँचे ओहदे और इज्जत मिलती थी। टोडरमल को जब दीवान बनाया गया तब उस समय की घटना के बारे में शिवप्रसाद ने लिखा :

' मुसलमानों ने ऐसा उजर किया है कि हिंदू को ऐसा उहदा न देना चाहिए अकबर ने पूछा तुम्हारी जमीदारियों का इंतिजाम कौन करता है जवाब दिया, हिंदू। अकबर ने कहा बस मुझे भी अपनी जमीन का इंतिजाम अपने तौर पर करने दो थोड़े ही अर्से में बिलकुल दफ्तर और मुंशीखाना हिंदुओं के हाथ में आ गया।' 56

लेकिन यह भी उल्लेखनीय है कि मध्यकाल का वर्णन करते समय अकबर की प्रशंसा से इतिहास को हिंदू हितों और हिंदू संघर्ष के रूप में देखने का दृष्टिकोण और मजबूत होता था। अकबर के चरित्र को सामने रख कर ही शेष मध्यकाल में सपाट ढंग से हिंदू विरोधी घटनाओं का हवाला देना और आसान हो जाता था। अकबर जैसे सहिष्णु और उदार शासक की प्रशंसा से समन्वयवादी दृष्टि नहीं बल्कि इतिहास की सांप्रदायिक दृष्टि ही और मजबूत होती है।

प्रतापनारायण मिश्र ने जरूर वाजिद अली शाह की मृत्यु पर उनकी प्रशंसा में लिखा :

' तुमने अपनी प्रभुता के समय हिंदू मुसलमान दोनों को अपनी प्यारी प्रजा समझा है। यह तुम्हारा एक गुण है कि तुममें सचमुच के सहस्र दोष होते तो भस्म कर देता।' 57

पर वाजिद अली शाह हिंदी नवजागरण के लेखकों के इतने समकालीन थे कि यह कयास भी नहीं लगाया जा सकता कि उनकी प्रशंसा उन्हें किसी साझे ऐतिहासिक प्रतीक के रूप में देखने की योजना का हिस्सा थी। प्रतापनारायण मिश्र समेत सभी रचनाकारों की अन्य रचनाओं में भारतीयता को हिंदू धार्मिक पहचान से जोड़ कर देखने वाली इतिहास दृष्टि इतनी स्पष्ट है कि हिंदू मुसलमानों के साझे ऐतिहासिक प्रतीक के प्रयास को गंभीरता से लेने की संभावनाएँ वहाँ दूर दूर तक नदारद हैं।

प्रतीकों के माध्यम से राष्ट्र के आख्यान के निर्माण व संघर्ष की साफ झलक शिवप्रसाद सितारेहिंद की किताब इतिहास तिमिरनाशक में प्रस्तुत मुस्लिमों व 1857 ई. के गदर संबंधी दृष्टिकोण के विरोध के रूप में दिख जाती हैं। इस विरोध को नेतृत्व प्रदान किया पश्चिमोत्तर प्रांत में उन्हीं के प्रतिद्वंद्वी सर सैय्यद अहमद खाँ ने। इस पूरे प्रकरण की जानकारी एवरिल ए पावेल के लेख 'हिस्ट्री टेक्स्ट बुक एंड द ट्रान्समिशन ऑफ द प्रीकोलोनियल पास्ट इन नार्थ वेस्टर्न इंडिया इन द 1860 एंड 1870'से मिलती है। एवरिल पावेल लिखते हैं :

' जहाँ हिंदी पुस्तक के पहले खंड पर कोई टिप्पणी नहीं हुई वहीं इसके शिवप्रसाद कृत उर्दू अनुवाद और मैथ्यू कैंपसन द्वारा कृत अंग्रेजी अनुवादों ने सैय्यद अहमद खान के नेतृत्व में मुस्लिम प्रवक्ताओं को भड़का दिया। उनकी आपत्तियाँ उसी समय स्थापित होने वाले अलीगढ़ इन्स्टीट्यूट गैजेट में व्यक्त हुईं। इस पत्रिका के मालिक और संपादक दोनों ही सैय्यद अहमद थे।' 58

गौरतलब है कि मैथ्यू कैंपसन 1856 ईसवी में पश्चिमोत्तर प्रांत में शिक्षा विभाग के डायरेक्टर (डीपीआई) नियुक्त हुए थे और उन्होंने इतिहास तिमिरनाशक के पहले हिस्से का अंग्रेजी अनुवाद करने के अलावा इस किताब की काफी बड़ाई की थी। सैय्यद अहमद खान के द्वारा इतिहास तिमिरनाशक पर यह आक्षेप लगाया गया कि यह किताब हिंदू दृष्टिकोण से लिखी गई है और मुसलमानों को आहत करना इसका पहला मकसद है। पुस्तक के पहले खंड के अंग्रेजी अनुवाद के बाद इतिहास तिमिरनाशक की आलोचना करते हुए एक लेख अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गैजेट में छपा। इस लेख के लेखक का नाम नहीं छपा और इसमें लिखा गया था :

' इसके साथ समस्या यह है कि यह हिंदू के द्वारा लिखी गई किताब है जो न केवल हिंदू रुझान को दर्शाती है बल्कि इसमें अनेक ऐसे विवरण हैं जिनसे मुसलमानों की भावनाएँ आहत होती हैं। लेकिन इसके लेखक का इरादा कुछ भी रहा हो किताब के बुनियादी स्वर में इस्लाम के प्रति एक तल्खी की भावना हर जगह मिलती है।' 59

यह लेख 1867 ई. में प्रकाशित हुआ और 1872-73 ई. तक इस किताब पर अनेक तरह की आपत्तियाँ उठाई जाती रहीं। यह आपत्तियाँ मुख्यतः तीन विषयों पर केंद्रित थीं। पहली, 1857 ई. के गदर को केवल मुसलमानों द्वारा अंजाम दिया जाना बताना। दूसरी, मुसलमानों के सिखों के साथ संघर्ष के वर्णन में मुसलमानों द्वारा ढाए अत्याचारों को बढ़ाचढ़ा कर दिखाना। तीसरी, सुलतान मुबारक शाह और मुहम्मद शाह जैसे कुछ शासकों को बेहद अय्याश और विलासी दिखाना।

इन आपत्तियों के असर से ही इतिहास तिमिरनाशक में कई तरह के बदलाव किए जाते रहे। जैसे कि 1869 ईसवी के इतिहास तिमिरनाशक के अंग्रेजी अनुवाद के संस्करण से वे वाक्य हटा दिए गए जो केवल मुसलमानों को गदर का जिम्मेदार बताते थे। पर इससे भी विवाद शांत नहीं हुआ और पश्चिमोत्तर प्रांत के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर विलियम म्युअर से होता हुआ वायसराय की काउन्सिल तक जा पहुँचा। अगस्त 1872 ईसवी में एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की गई जिसमें इतिहास तिमिरनाशक के बारे में सर सैय्यद अहमद के मन में जो शिकायतें थी सभी का उल्लेख किया गया। किताब में मुस्लिम राजाओं को सिख विरोधी अत्याचारों में लिप्त दिखाने और उन्हें बेहद अय्याश और कामुक बना कर पेश करने पर सैय्यद अहमद को मुख्य रूप से ऐतराज था और उन्होंने इस शिकायत का विशेष तौर पर उल्लेख किया। इन सारी शिकायतों से मैथ्यू कैंपसन सहमत नहीं थे और उन्होंने शिक्षा विभाग के डायरेक्टर के नाते विभाग के लिए तैयार मेमोरेंडम में लिखा :

' नए तथ्यों के प्रकाशन पर नाराजगी जाहिर करना बचकानापन नहीं तो और क्या है। इन घटनाओं के बारे में तो मिस्टर एल्फिनस्टोन और सर एच इलियट ने भी अपने मुस्लिम संग्रहों में विस्तार से लिखा है।' 60

अब यह देखा जाए कि सिख नेता बंग के ऊपर फर्रुखसियार के अत्याचारों का विवरण किस प्रकार दिया गया था जिसने सैय्यद अहमद को नाराज कर दिया। शिवप्रसाद ने इतिहास तिमिरनाशक के पहले खंड में 1713 ईसवी में दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाले मुगल शासक फर्रुखसियार द्वारा सिखों के साथ वहशियाना सुलूक के बारे में बताय :

' सिखों ने फिर सिर उठाया, लेकिन बादशाही फौजों ने उन्हें फिर जा दबोचा। बंदे गुरू को 740 आदमियों के साथ पकड़ कर दिल्ली भेज दिया गया। बंदे को ताश का जामा पहना कर लोहे के पिंजरे में बंद कर दिया गया। उसके गिर्द भालों पर उसके साथियों के सिर थे। एक बिल्ली उसने पाली थी उसे भी मारकर एक भाले से लटका दिया गया। जल्लाद नंगी तलवार लेकर सामने खड़ा था। उसने बालक लड़के को देकर कहा कि तू ही अपने हाथ से मार डाल और जब उसने इनकार किया तो जल्लाद ने उसी के सामने उस बेचारे बेगुनाह बच्चे को जिबह कर उसका कलेजा उसके बाप के ऊपर फेंका और फिर गर्म चिमटों से नोच नोचकर उसे भी टुकड़ा टुकड़ा कर डाला।' 61

सिखों के खिलाफ मुस्लिम राजा के इस बर्बरतापूर्ण कृत्य के वर्णन पर सैय्यद अहमद ने ऐतराज जताते हुए कहा कि इसमें इस्लाम के प्रति नफरत की भावना का परिचय मिलता है। 1872 ईसवी में दर्ज कराए गए ऐतराज में उन्होंने चौदहवीं सदी के मुस्लिम शासक मुबारक शाह और 18 वीं सदी के शासक मुहम्मद शाह की अय्याशियों की अतिरंजित तस्वीरों को भी हिंदू इतिहासकार का पूर्वग्रह माना था। मुहम्मद शाह के बारे में शिवप्रसाद ने इतिहास तिमिरनाशक के पहले खंड में कहा था :

' हमारे पास उस वक्त के एक मेले की तस्वीर मौजूद है उसी को देखना मुहम्मदशाह का सारा जमाना देख लेना है। वह उस मेले की तस्वीर है जो मुहम्मद शाह ने महादेव का किया था। वाजिद अलीशाह के जोगी जोगन वाले उस मेले का भला उसके साम्हने क्या रुतबा था। उसमें नंगे मर्द और नंगी औरतें इस तरह बनाई हैं कि हर्गिज नहीं बयान कर सकते शर्म दामनगीर है।' 62

इसी प्रकार 1317 ईसवी में शासक बनने वाले अलाउद्दीन के लड़के मुबारकशाह की विलासिता के बारे में शिवप्रसाद ने लिखा था :

' जब मुलक में दबदबा जमा बादशाह बिलकुल ऐश में डूब गया। रात दिन नशे में चूर रहता। जनानी पोशाक पहन कर अमीरो के घर नाचने को जाता। जिन ऐबो को आदमी छिपाता है वह उनको खूब जाहिर करने की कोशिश करता। कसबियो को बुलवा कर दरबार में अपने बड़े बड़े अमीरो की बराबर बिठलाता कभी कभी नंगा मादरजाद बाहर निकल जाता।' 63

मुस्लिम राजाओं को इस तरह से पेश करने से नाराज सैय्यद अहमद की आपत्तियों के क्या नतीजे निकले इसका पता भी एवरिल पावेल के लेख से चलता हैं पश्चिमोत्तर प्रांत के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गर्वनर जनरल विलियम म्यूअर ने शिवप्रसाद और उनकी किताब के अंग्रेजी में अनुवादक कैंपसन का खुल कर पक्ष लिया। पावेल ने लिखा है :

' हालाँकि ' म्यूअर कुछेक भाषिक सांस्कृतिक मुद्दों पर शिवप्रसाद से असहमत थे लेकिन इस अवसर पर शिवप्रसाद और कैंपसन के पक्ष में थे। वे शिवप्रसाद का पक्ष लेने के बावजूद सैय्यद अहमद को नाराज न करने की कोशिशों को भी सही ठहराते थे।' 64

वायसराय की काउन्सिल ने भी सैय्यद अहमद की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया और इतिहास तिमिरनाशक में केवल हल्के-फुल्के सुधार की सलाह देकर इस पूरे मामले से अपना पल्ला झाड़ लिया। सर सैय्यद को भी लगा कि इतिहास तिमिरनाशक को वह पूरी तरह से प्रतिबंधित भले न करा सके हों लेकिन इसके कुछ हिस्सों में सुधार की सरकारी सिफारिश ने उनके ही पक्ष को सही ठहराया है। इस वजह से उन्होंने बाद में स्वयं भी इस विवाद से अपने को अलग कर लिया।

इस प्रकार 19वीं सदी के अंतिम चार दशकों में लिखी गई हिंदी रचनाओं में इतिहास को प्रमुख विषय के रूप में स्थापित किया गया। उपनिवेशवाद द्वारा खड़ी की जा रही चुनौती का सामना करने के लिए इतिहास की व्याख्याओं का सहारा लिया गया। इतिहास लेखन के क्षेत्र में अपने प्रयासों और प्राच्यविद्या की प्रेरणा से गढ़े गए दर्पण में अपना आत्मगौरव से भरा चेहरा देखने की कोशिश की गई। व्यापक भारतीयता की एक धारणा भी इस समय पनपती दिखी लेकिन इसे कमजोर कर देने वाली इतिहास दृष्टि भी बंगाल से लेकर हिंदी क्षेत्र तक बड़े पैमाने पर विकसित हुई। एक ओर सभी धर्म मजहब के और जातिगत भेदभाव को भुला कर एकजुट होने की जरूरत पर बल दिया गया तो दूसरी ओर जानबूझ कर इतिहास के नाम पर उन मुद्दों को उछाला गया जिनसे कटुताएँ ही पैदा हो सकती थीं।

संदर्भ

1. ओम प्रकाश केजरीवाल की किताब 'द एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल, एंड द डिस्कवरी ऑफ इंडियास पास्ट,' प्रकाशक - ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली - 1988 में उद्धृत... पृ. 6

2. वही; पृ. 4

3. रोमिला थापर : सेलेक्टेड राइटिंग्स ऑन कम्यूलिज्म, प्रकाशक - पी.पी.एच., दिल्ली... पृ. 3

4. जे.एस.ग्रेवाल की किताब, 'मुस्लिम रूल इन इंडिया : द एसेसमेंट ऑफ ब्रिटिश हिस्टोरियन्स', ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली-197. में उद्धृत... पृ. 78

5. वही; पृ. 85

6. 'द एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल' में उद्धृत, पृ. 224

7. सुधीर चंद्रा : द अप्रेसिव प्रेजेंट, लिटरेचर एंड सोशल कानशियसनेस इन कोलोनियल इंडिया, प्रकाशक ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली - 1992 पृ. 158

8. वही; पृ. 156

9. बालकृष्ण भट्ट के श्रेष्ठ निबंध, (संपादक) : सत्य प्रकाश मिश्र, प्रकाशक - लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद - 1998, पृ. 89

10. वही; पृ. 91

11. वही; पृ. 91

12. वही; पृ. 91

13. वही; पृ. 90

14. वही; पृ. 89

15. विमल प्रसाद - द फाउंडेशन ऑफ मुस्लिम नेशनलिज्म, पृ. 74

16. वही; पृ. 167

17. वही; पृ. 159

18. विपिन चंद्रा - भारत का स्वतंत्रता संघर्ष, प्रकाशक - हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली - 1996, पृ. 327

19. पॉल ब्रास : लैंग्वेज रिलिजन एंड पॉलिटिक्स इन नार्थ इंडिया, प्रकाशक - कैंब्रेज यूनिवर्सिटी प्रेस लंदन - 1974, पृ. 141

20. वही; पृ. 150

21. वही; पृ. 165

22. रोमिला थापर : अयोध्या कुछ सवाल, संपादक - मालिनी भट्टाचार्य, सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली - 1994, पृ. 23

23. वसुधा डालमिया - नेशनलाइजेशन ऑफ हिंदू ट्रैडिशन, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली - 1999, पृ. 409

24. भारतेंदु हरिश्चंद्र : भारतेंदु समग्र, संपादक : हेमंत शर्मा, हिंदी प्रचारक संस्थान, वाराणसी - 1989, पृ. 477

25. कार्ल मार्क्स : भारत संबंधी लेख, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली -1983, पृ. 15

26. प्रताप नारायण ग्रंथावली : संपादक विजशंकर मल्ल, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी - 1992, पृ. 95

27. सोहन प्रसाद, ( रस्साकशी में उद्धृत : लेखक : वीरभारत तलवार), पृ. 363

28. वही; पृ. 363

29. बालमुकुंद गुप्त : बालमुकुंद ग्रंथावली, संपादक - डॉ. नाथन सिंह, हरियाणा साहित्य अकादमी, चंडीगढ़ - 1993, पृ. 7

30. वही; पृ. 7

31. शिव प्रसाद सितारेहिंद : इतिहास तिमिरनाशक खंड - 3, मेडिकल हॉल प्रेस, बनारस, पृ. 25

32. वही; पृ. 27

33. वही; पृ. 8

34. अंबिकादत्त व्यास, रस्साकशी में उद्धृत, पृ. 346

35. भारतेंदु हरिश्चंद्र, वही; पृ. 343

36. प्रताप नारायण मिश्र, वही; पृ. 431

37. वही; पृ. 431

38. वही; पृ. 404

39. राधाकृष्ण दास : महारानी पद्मावती, पृ. 1

40. विपिन चंद्रा : आधुनिक भारत में सांप्रदायिकता, हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली - 1998, पृ. 170

41. ए.आर. देसाई : सोशल बैकग्राउंड ऑफ इंडियन नेशनलिज्म, पॉपुलर प्रकाशन, बांबे, 1976, पृ. 2

42. प्रताप नारायण मिश्र, ( ग्रंथावली) पृ. 148

43. बालकृष्ण भट्ट : श्रेष्ठ निबंध, पृ. 47

44. असगर अली इंजीनियर : सेलेक्टेड राइटिंग्स ऑन कम्यूनलिज्म, पृ. 7

45. जेम्स टाड - राजस्थान का इतिहास (अनुवाद श्रीकेशव ठाकुर) आर्य हिंदी पुस्तक, दिल्ली - 1987, पृ. 625

46. भारतेंदु हरिश्चंद्र : भारतेंदु समग्र, पृ. 1013

47. प्रताप नारायण मिश्र : ग्रंथावली, पृ. 127

48. बाल मुकुंद गुप्त : ग्रंथावली, पृ. 266

49. भारतेंदु हरिश्चंद्र : समग्र, पृ. 731

50. वही; पृ. 639

51. वही; पृ. 640

52. राधाकृष्णदास : महाराणा प्रताप सिंह, पृ. 1-2, नागरी प्रचारिणी सभा काशी, सम्वत्‌ - 1993

53. बदरी नारायण चौधरी प्रेमघन : प्रेमघन सर्वस्व, संपादक : प्रभाकर रूढ़ प्रसाद और दिनेश नारायण उपाध्याय, प्रथम भाग - 1940, द्वितीय भाग - 1995, हिंदी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद, पृ. 225

54. शिव प्रसाद, इतिहास तिमिरनाशक, खंड-3, पृ. 109

55. वही; पृ. 112

56. वही; पृ. 113

57. प्रताप नारायण मिश्र : ग्रंथावली, पृ. 433

58. एवरिल पावेल : इनवोकिंग द पास्ट, संपादक : दाउद अली, द यूज ऑफ हिस्ट्री इन साउथ एशिया, आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली, 1999, पृ. 114

59. वही; पृ. 117

60. वही; पृ. 120

61. शिव प्रसाद : इतिहास तिमिरनाशक ( खंड - 1), पृ. 22

62. वही; पृ. 85

63. वही; पृ. 29

64. एवरिल पावेल, वही; पृ. 127


End Text   End Text    End Text