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कहानी

एक और कारगिल
संतोष श्रीवास्तव


उतरते अक्टूबर की गुलाबी शामें। मुंबई का मौसम सहता-सहता सा खुशगवार। दरवाजा खुला था। जूते बाहर ही उतारने पड़े। वे सोफे पर बैठी थीं और दरवाजे के पास ही बने ऊँचे से मंदिर में दीया जल रहा था। अगरबत्ती के धुएँ की सुगंध चारों ओर फैली थी।

'आओ बेटी... हमने पहचाना नहीं।' उन्होंने बूढ़ी आँखों पर चश्मा फिट किया।

'मैं उमा की सहेली हूँ। स्कूल से कॉलेज तक हम दोनों साथ-साथ पढ़े हैं। मैं तो आपको देखते ही पहचान गई। उमा के रिसेप्शन पर मिली थी न आपसे।'

'अब उतना कहाँ याद रहता है। हो भी तो गए पाँच साल।'

तब तक उमा के ससुर बाहर निकल आए। मुझे देख इशारा किया बैठने का। मेरे बैठते ही सामने के सोफे पर से गद्दियों के पीले सफेद रंग से मेल खाती दो बिल्लियाँ कूदीं। मैं चौंक पड़ी। वे मुस्कुरा दीं - 'बड़ी शैतान हैं दोनों।'

फिर दोनों को गोद में बैठाकर प्यार करने लगीं। कमरे के काँच के पार्टीशन के पार दूब का लचीला लॉन था छोटा सा और एक हरसिंगार का छतनारा पेड़ कोने में। दूब पर हरसिंगार के फूल बिखरे थे। उन्होंने काँच का दरवाजा जरा सा खोला और बिल्लियों को बाहर हकाल दिया। बिल्लियाँ दूब पर मटरगश्ती करने लगीं। उमा आ गई थी।

'घर ढूँढ़ने में परेशानी तो नहीं हुई?' कहते हुए उसने मुझे गले से लगा लिया।

'माँ जी से परिचय हुआ? माँ जी, बाबूजी ये मेरी बचपन की सहेली है शेफाली... अब ये भी मुंबई आ गई है। इसके पति कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर हैं। वहीं ये भी पढ़ाती है। कहाँ घर लिया है शेफाली?'

उमा एक साँस में कहती चली गई। उसकी वाचालता से मैं दंग थी लेकिन अच्छा भी लग रहा है। दिल में संशय का जो पहाड़ था कि कैसे उमा से सामना करूँगी जबकि उसके पति रजनीकांत को कारगिल युद्ध में शहीद हुए कुछ ही साल गुजरे हैं... कैसे झेल रही होगी वह मात्र आठ महीने के वैवाहिक जीवन के बाद वैधव्य... वह पहाड़ बर्फीला साबित हो अब पिघल रहा था। उमा खुश दिख रही थी। शायद उसने वक्त से समझौता कर लिया हो।

'मैं अभी फ्रेश होकर आती हूँ पाँच मिनिट में!' उमा के जाते ही बाबूजी भी अंदर चले गए। लौटे तो उनके हाथ में ट्रे थी... चाय, बिस्किट, नमकीन से भरी। मैंने उठकर ट्रे थाम ली - 'अरे बाबूजी, आपने क्यों तकलीफ की?'

'तकलीफ कैसी? उमा थकी आई है... तुम भी कलीना से आई हो यहाँ मीरा रोड तक। लंबा, थकान भरा रास्ता। उमा भी तो बांद्रा अपडाउन करती है... उधर कंप्यूटर इन्स्टीट्यूट में नौकरी के लिए जाती है।'

कहते हुए उन्होंने ट्रे में से एक प्याला उन्हें पकड़ा दिया। वे प्याला दोनों हाथों से पकड़ने लगीं।

'माँ जी को कुछ तकलीफ...।'

'अब जिंदगी ही तकलीफ जैसी बन गई है। बेटे के गम ने इनके हाथ-पाँवों की शक्ति निचोड़ ली है। चल नहीं पातीं ज्यादा। मैं सुबह जबरदस्ती इन्हें भक्ति वेदांत तक ले जाता हूँ। उतने में ही लस्थपस्थ हो जाती हैं।'

वे बीमारी में भी मुस्कुराती लगीं। मुझे उस वक्त उनका मुस्कुराना उनके दुख का सबसे बड़ा सबूत लगा। दुख उन्हें घुन की तरह भीटर ही भीटर खा रहा था।

'अरे रुको... बिस्किट, नमकीन मत खाओ। मैं गरमागरम समोसे, फाफड़े और जलेबियाँ लाई हूँ। शेफाली को बहुत पसंद हैं। याद है शेफाली फाफड़े खाने के लिए हम चौक तक स्पेशल जाते थे... क्या बढ़िया बनाता था वो... वैसे यहाँ नहीं मिलते।'

मैंने गौर किया उमा ने साड़ी बदलकर मैक्सी पहन ली थी। ऐसा लग रहा था वह इस घर की बहू नहीं बेटी है। समझ नहीं आ रहा था। स्थितियाँ कबूल किसने की हैं? रजनीकांत के माँ बाबूजी ने या उमा ने?

उमा ने बताया था रजनीकांत उनकी बुढ़ापे की औलाद थी। शादी के कई सालों बाद बहुत मन्नतें, व्रत, उपवास, गंडा-ताबीज, तीर्थस्थानों की यात्राओं के बाद पैदा हुआ था। माँ का नाम रजनी और बाबूजी का कांताप्रसाद... दोनों के नामों को मिलाकर खुशी से उफनी पड़ती बुआ ने नाम दिया रजनीकांत। लेकिन रजनीकांत के सिर पर मिलिट्री में जाने की धुन सवार थी। सुनते ही बाबूजी कुशासन बिछा सामने तांबे की लुटिया में जल भर कर आचमन करने बैठे गए थे... माँ जी थरथर काँप उठी थीं - 'हे प्रभो, यह कफन बाँधने चला है।'

बुआ ने समझाया - 'बेकार है भाभी, कुछ भी कह ना उससे। वह धुन का पक्का है। पर तुम क्यों दिल छोटा करती हो? सभी थोड़ी शहीद हो जाते हैं।'

लेकिन कहते-कहते बुआ सहम गई थीं। मन काँप उठा था। फिर भी वे माँ जी के सिर पर हाथ फेरती उन्हें तसल्ली देती रही थीं।

कुकु घड़ी से काठ की चिड़िया ने निकलकर नौ बार फूँका तो मैं चौंक पड़ी। उमा की निगाह भी घड़ी से होती हुई मेरे चेहरे तक आई।

'देर हो जाएगी न घर पहुँचने तक? चलो मैं बाइक से स्टेशन छोड़ देती हूँ तुम्हें।'

वह चेंज करने अंदर चली गई। मैंने उठकर माँ जी के घुटनों पर हाथ रखा - 'आंटी... मैं जल्दी ही आऊँगी दोबारा।'

वे जैसे इंतजार में ही थीं। मेरे हाथों को अपने हाथों में भर कर चूम लिया उन्होंने - 'सुबह से आ जाना... उमा तो आज आ गई जल्दी वरना दस बज जाते हैं इसे भी रात के... इतवार को भी चली जाती है। कहती है काम बहुत रहता है।'

बाबूजी का चेहरा उदासी की परत तोड़ मुस्कुराने की चेष्टा में बड़ा अजीब लग रहा ... मानो कहना चाह रहे हों... 'जिंदगी यूँ ही नहीं गुजर गई। बहुत कुछ सिखा भी गई, दिखा भी गई।'

मैंने बाहर निकलकर जूते पहनते हुए देखा... गेट के भीतर गुलाब की क्यारियाँ थीं...।

झिलमिल अँधेरे में सफेद गुलाबी फूल हँस रहे थे। उमा जींस-टी शर्ट पहने बाइक गेट के बाहर निकाल रही थी। मेरे जूतों के नीचे कुछ सूखे पत्ते चरमरा गए जिनकी आवाज बाइक की आवाज में समा गई। बाइक की पिछली सीट पर बैठते हुए मैंने देखा, बाबूजी गेट तक आए हैं... पीछे-पीछे माँजी भी उनके कंधे पर हाथ रखे। उदासी की जो परतें मेरे आने से पिघला गई थीं वे अब फिर जम रही होंगी मैंने सोचा।

'ट्रेन पंद्रह मिनट बाद है... आओ तब तक कॉफी पीते हैं।' उमा ने स्टॉल से कॉफी के कप लिए... 'यूज एंड थ्रो' वाले और बेंच पर बैठकर हम कॉफी सिप करने लगे।

'इतनी बिजी क्यों रहती हो उमा? जबकि वे दोनों घर पे अकेले रहते हैं।'

उमा मानो इस प्रश्न के लिए तैयार थी - 'मिल गया है कोई... मेरा वक्त बाँटने वाला।'

'हाँ शेफाली, हम दोनों एक ही ऑफिस में सर्विस करते हैं। रजनी की डेथ के बाद उसी ने मुझे सँभाला। मैं तो महीनों तक बिस्तर पर थी। डॉक्टर कहते थे कि इस अनहोनी के आघात ने सीधे मेरे दिल पर असर किया है। साथ ही मान लिया था कि अब मैं नहीं बचूँगी लेकिन जिंदगी के प्रति मोह जगाना, होनी की सच्चाई को स्वीकार करना उसी ने सिखाया... उसी की तीमारदारी से मैं फिर से जीने लायक बनी।' ट्रेन आ रही थी। ट्रेन की हेडलाइट से पटरियाँ चमक उठी थीं। वह मुझसे इतनी जोर से चिपटी कि मैं लड़खड़ा गई।

ट्रेन प्लेटफार्म पर आ चुकी थी। उसने मुझे ढकेलकर चढ़ाया... मैंने देखा उसकी आँखों में आँसू छलक आए थे। हम एक दूसरे के हाथ पकड़े थे - 'तुम्हारे मुंबई में आ जाने से मानो मुझे एक घर मिल गया। मेरा अकेलापन खत्म हो गया।' वह भरे गले से बोली।

'तुम अकेली हो कहाँ... वह जो साथ है... वह तुम्हारा।'

'कौन मयंक?'

और ट्रेन चल दी। और यह सब कुछ मैंने उन तीस सेकेंडों के दौरान सुना... वे तीस सेकेंड जो लोकल ट्रेनों के लिए हर स्टेशन पर रुकने के लिए निर्धारित किए गए हैं। मुझे पहली बार महसूस हुआ कि तीस सेकेंड भी बहुत होते हैं उस घटना को जानने के लिए जो हम जानना चाहते हैं।

उमा ने हफ्ते भर बाद फोन किया - 'आ रही हो?'

'क्यों? कुछ खास।'

'हाँ, मयंक से मिलवाऊँगी। फिर वह बेंगलोर चला जाएगा न दीपावली की छुट्टियों में। कल शनिवार है। सुबह से आ जाओ।'

उसकी आवाज में खुशी थी। वह भीतरी खुशी थी, मैं महसूस कर सकती हूँ। ऐसी खुशी अक्सर परिंदों की उड़ान में होती है या फिर ऊँचाई से गिरते पहाड़ी झरने में। आकाश से धरती का यह क्रम सदियों पुराना है।

जब मैं वहाँ पहुँची। उमा नहीं थी। माँ जी उसी सोफे पर उसी तरह बिल्लियों को गोद में लिए बैठी थीं, बाबूजी अंदर कुछ कर रहे थे, खटर-पटर की आवाजें आ रही थीं। हफ्ते भर में कहीं कुछ भी तो नहीं बदला था। काल जैसे ठिठक गया हो इस घर के लिए। जैसे जिंदगी आगे ही न बढ़ रही हो। मैं पास पहुँची तो वे खिल पड़ीं - 'आओ बेटी, उमे ने बताया था आ रही हो।'

'कहाँ है वह?'

'ऊपर... अपने कमरे में।'

उन्होंने हॉल से ऊपर जाती सीढ़ियों की ओर इशारा किया। मैंने देखा ऐसा करते उनकी आँखों में गहरी पीड़ा झलक आई थी। मैंने उनका हाथ पकड़ लिया जो काँप रहा था।

'थोड़ी देर आपके पास बैठूँगी। दिन भर हूँ न यहाँ।'

वे तसल्ली से भर उठीं। मन भीग गया उनका। कोशिश कर बोली - 'थे कभी हम भी महफिलों में बैठने लायक। रजनी ने विराम लगा दिया सब पर। बस साँस पर ही नहीं लगा अभी तक।'

मैंने उनकी आँखों में झाँका, 'ऐसा क्यों कहती हैं आप? हम सब हैं न आपके।'

'हाँ, सो तो है। रजनी भी यही कहता था। कहता... माई डार्लिंग मॉम... तुम एक शेर बेटे की माँ हो, तुम्हें कभी हार नहीं मानना है। लेकिन हम हार गए बेटा... हम हार गए।'

वे सुबकने लगीं। अंदर से जाने कब बाबूजी बाहर निकल आए। 'यह क्या?' अपनी आँखें रो-रो कर फोड़ने से क्या रजनी वापस आ जाएगा? समझाओ इन्हें शेफाली। लो... दूध बना लाया हूँ, पियो गरम-गरम। फिर रात भर तड़पती हो हड्डियों के दर्द से।'

मैंने उनके हाथ से मग ले लिया। सौंठ और गुड़ की खुशबू मेरे नथुनों में समा गई।

'लीजिए... मेरे हाथ से पी लीजिए। कितनी अच्छी खुशबू है।'

'तुम पियो न। एक मग और बना लाएँगे ये। बहुत अच्छा बनाते हैं। रजनी के जन्म के समय हरीरा ये ही बनाकर पिलाते थे मुझे।'

और वे हँसी, बाबूजी भी हँसे। स्थिर झील में जैसे किसी ने पत्थर फेंका हो। उन्होंने घूँट भरी।

'कितने बच्चे हैं तुम्हारे?'

मैं एकाएक हुए इस प्रश्न से चौंकी - 'एक भी नहीं।'

'क्यों... ये बुरी बात है। आजकल पैदा करते ही नहीं मॉडर्न मियाँ-बीवी... और करते भी हैं तो एक। अब अगर उसे कुछ हो जाए तो...'

कहते-कहते वे रुक गईं और बड़ी करुणा से बाबूजी की ओर देखने लगीं। वहाँ भी सूनापन था, उन आँखों में भी। बुढ़ापे की सीढ़ियाँ चढ़ता अँधेरे से भरा सूनापन। जब यह पता कि न कोई नामलेवा बचा है न मरने के बाद कर्मकांड निपटाने वाला। फिर भी साँस के चुकता होने तक जीना ही है। मुझे लगा रजनीकांत तो देश की सीमा पर शहीद हो गया लेकिन ये दोनों जिंदगी की सीमा पर कैसे कतरा-कतरा शहीद हो रहे हैं। शहीद के माता-पिता होने का आतंक भरा गौरव झेलते।

उमा ने सीढ़ियों से झाँका - 'अरे... आओ न ऊपर।'

मैंने माँजी का दूध का खाली मग हाथ में ले उठना चाहा, तो वे मेरी बाँह पर अपनी ऊँगलियों का स्पर्श देती बोलीं - 'खाना साथ में खाना। इन्होंने वेजिटेबिल बिरयानी बनाई है जो रजनी को बहुत पसंद थी।'

मैंने हाँ में सिर हिलाया और मग चौके में ले जाकर रख दिया। चौके की जालीदार खिड़की पर एक बिल्ली बैठी अपना पंजा चाट रही थी। जाली में से खिले हरसिंगार बड़े मोहक लग रहे थे। मैं सीढ़ियाँ चढ़ ऊपर पहुँची तो उमा मुझसे लिपट गई - 'आवाज सुन ली थी मैंने, पर फिर सोचा तुम माँ जी के पास भी थोड़ा बैठ लो। आओ मिलाती हूँ।'

और बाँह पकड़ कर कमरे में ले आई तो देखा पलंग पर तकिए पर टिका कोई बैठा है।

'मयंक... ये है मेरी इकलौती दोस्त शेफाली।'

मैं चौंक पड़ी। नीचे माँजी, बाबूजी और ऊपर ये दोनों... ये सब क्यों? कैसे? उमा के चेहरे पर अतीत की परछाईं तक नहीं... दोनों पूरे अधिकार से रजनीकांत और उमा के इस कमरे में? और वे दोनों नीचे सब कुछ झेलते...!!

रोशनदान से तेज हवा का झोंका आया टेबिल पर रखा अखबार खुलकर नीचे गिर पड़ा। मैं सहमते हुए कुर्सी पर बैठ गई।

'मयंक पंद्रह दिन के लिए बेंगलोर जा रहा है। कहता है मैं भी चलूँ, पर मैं कैसे जा सकती हूँ शेफाली यहाँ ये दोनों अकेले रह जाएँगे।

वह मयंक से चिपक कर बैठ गई और उसका हाथ अपनी गोद में लेकर सहलाने लगी। मैंने आँखें फेर लीं।

'तुम्हारी दोस्त मौनव्रत धारी है?' मयंक बेबाकी से मानो मेरा चेहरा टटोल रहा था।

'उमा, तुम दोनों के बीच मैं एकदम अजनबी सी हो गई हूँ। पहली मुलाकात है न! मैं नीचे जाकर बैठती हूँ।' मैंने उठना चाहा।

'बैठो ना! ये अभी चला जाएगा। थोड़ी देर इसके पास बैठते हैं, फिर नीचे चलते हैं। पता है शेफाली आज बाबूजी ने खुद अपने हाथों तुम्हारे लिए लंच तैयार किया है। सुबह से जोश में हैं। रजनी जब छुट्टियों में आते थे तब भी वे ही कुछ-न-कुछ बनाते थे। एकदम स्पेशल।'

'ओह माय गॉड... अंकल कुक हैं क्या?'

मयंक का लहजा मुझे पसंद नहीं आया... छिछोरापन सा लगा और जिस ढंग से यह उनकी आँखों से सामने उनकी बहू के साथ इस कमरे में बैठा है वह भी छिछोरापन ही है। कैसे सह लेते हैं वे दोनों यह सब? किस मजबूरी में?

उमा मयंक को छोड़ने गेट तक गई। जब वह हॉल से गुजर रहा था तो बाबूजी वहाँ नहीं थे और माँजी मंदिर में फूलों की माला कृष्णजी को पहना रही थीं। कृष्ण की बड़ी सी मूर्ति हाथ में मुरली लिए थी। मयंक ने उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहा या नजर बचाकर बिना अभिवादन किए ही चला गया मैं समझ नहीं पाई।

बाबूजी ने मेरी थाली खुद परोसी।

'ककड़ी का रायता है। चखकर देखो। इसमें राई और हरी मिर्च पीस कर डाली है। राई की खुशबू से स्वाद बढ़ जाता है।'

'रजनी तो कटोरी तक चाट कर जाता था ऐसे रायते की।'

माँ जी हँसते हुए बोलीं फिर देर तक हँसती रहीं।

'तुम थोड़ा ही खाओ... दही है न... नहीं तो फिर हड्डियों का दर्द परेशान करेगा।'

मानो पूरा कमरा मुखर हो उठा था। उमा ने टोक तक दिया - 'आज आप दोनों ऐसे खुश दिख रहे हैं... आई मीन अरसे बाद... उमा की टोक दोनों को खामोश करती उसके पहले ही मैं बोल पड़ी 'बहू और बेटी में यही तो फर्क है... मैं इनकी बेटी जो हूँ। और बाबूजी एक वादा करना होगा आपको... मुझे अपने मायके से वंचित मत कर देना। रोज फोन आप करेंगे... मुझे। और हर वीकएंड पर ऐसा ही लजीज खाना बनाएँगे अपनी बेटी के लिए। इस बार मैं प्रोफेसर को भी लाऊँगी।'

'लो... तुम कहती थीं बेटी चाहिए... मिल गई न।'

बाबूजी ने मेरी ओर देखकर कहा - 'पता है शेफाली, जब रजनी होने वाला था तब ये कहती थीं बेटी ही होगी। लेकिन मैंने शर्त बदी थी की नहीं... बेटा ही होगा। और ये शर्त हार गई थीं। पर आज तुमने इन्हें जिता दिया।'

'तुम भी न...' माँ जी ने पानी का घूँट भर वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया।

दोपहर के चार बज रहे थे। धूप का नामोनिशान न था। आसमान पर धुनी हुई रुई जैसे बादल तैर रहे थे। उमा ने बढ़िया कॉफी बनाकर पिलाई फिर बोली - 'चलो भक्तिवेदांत तक टहलकर आते हैं।'

हम आहिस्ता-आहिस्ता हॉल से बाहर हो गए। माँजी सोफे पर ही सो रही थीं और बाबूजी सामने कमरे में। बाहर निकलकर मैं देख रही थी बगीचे की कलात्मकता। गुलाब के पौधे, जूही, मोगरा, लिलि... उमा ने बताया था कि रजनीकांत को फूलों का बहुत शौक था। यह बगीचा उसी ने बड़े शौक से लगाया था... बगीचे और बंगले को घेरती दीवार पर नृत्य करते जोड़े... क्यारियों के बीच सफेद छोटे-छोटे पत्थरों की सजावट... कोने में बेंत का लैंप नुमा खिलौना... नन्हा सा फव्वारा... लेकिन इस बार उमा ने रजनीकांत का जिक्र तक नहीं किया। ठीक भी है जो गुजर गया उसे गुजरा ही समझ लेना चाहिए। जिंदगी पीछे मुड़कर देखे भी क्यों?

सड़क के दोनों ओर अमलतास के पेड़ कतार से लगे थे। नन्हे-नन्हे पीले फूलों ने शाखों से झरकर फुटपाथ पर गलीचा सा बिछा दिया था। सड़क को दो भागों में बाँटते डिवाइडर पर भी कनेर के पेड़ थे जिनमें पीले फूल खिले थे। प्रीत का पीला रंग। साँझ फूली सी लग रही थी।

'कैसा लगा मयंक तुम्हें?'

'तुम शादी क्यों नहीं कर लेतीं?' मेरा प्रश्न सपाट था। लेकिन उसके चेहरे पर कोई भाव न थे। बस थी तो हर पल को जी लेने की चाह।

'यह मुमकिन नहीं...'

'मगर क्यों... जबकि तुम दोनों एक दूसरे को चाहते हो और किसी का कोई विरोध नहीं है।'

पल भर रुकी वह... चप्पल के नीचे आए कंकर को उसने अगला कदम उठाकर दूर उछाल दिया।

'जानती हो... जब रजनीकांत का शव लाया गया था तिरंगे झंडे में लिपटा तो सैंकड़ों की भीड़ उमड़ आई थी...' कैप्टन रजनीकांत कारगिल युद्ध में दुश्मन का मुकाबला करते हुए शहीद हो गए, बस यही गूँज थी, चारों ओर... मीडिया प्रिंट मीडिया से घिर चुकी थी मैं। सैंकड़ों सवाल लेकिन बेचारगी किसी के स्वर में नहीं। एक शहीदाना गर्व... मैं शहीद की विधवा। शायद सारी उम्र बहुत कुछ करके भी उतना मान-सम्मान नहीं पाती मैं, जितना तब पाया।

मेरी मदद के लिए न जाने कितनी समाजसेवी संस्थाओं की बदौलत। तुम अंदाजा नहीं लगा सकतीं जब मैंने दिल्ली जाकर परमवीर चक्र राष्ट्रपति के हाथों से लिया था। स्टेज पर थरथराते मेरे कदम और शहीद की विधवा होने का गर्व... खो दूँ क्या मैं शादी करके ये शान? आज जहाँ भी जाती हूँ मान-सम्मान मेरे साथ होता है। क्या मिलेगा शादी करके - शारीरिक सुख। वो तो आज भी मिल रहा है मयंक से मुझे।'

'मैं अवाक्!' ...लड़खड़ा गए कदमों को सँभाला मैंने। उमा की ऐसी शख्सियत का अंदाजा नहीं था मुझे। भक्ति वेदांत अस्पताल से लौट चले हम दोनों। साँझ घिर आई थी। पेड़ों की शाखों पर चिड़ियों का शोर बढ़ता जा रहा था। सड़क पर घुमक्कड़ों की भीड़ बढ़ रही थी।

'मेरे मन को कोई नहीं समझ पाता शेफाली। मेरे गऊ जैसे सीधे-साधे सास-ससुर जिन्होंने मुझे रजनीकांत जैसा पति दिया उन्हें छोड़ पाना मेरे बस की बात नहीं। आज उन्हीं की बदौलत मैं इतना कुछ पा सकी हूँ। और फिर मैं जैसी हूँ उन्होंने भी मुझे उसी रूप में स्वीकार कर लिया है... मुझे भी, मयंक को भी।'

'और समाज? क्या मयंक का घर आना समाज ने भी स्वीकार कर लिया है?'

'नहीं... वह नहीं आता घर। वो तो तुमसे मिलाना था इसलिए ले आई उसे। अक्सर वीकएंड में हम लोनावला, खंडाला या महाबलेश्वर चले जाते हैं। महाबलेश्वर में कोठी है उसकी। माँजी, बाबूजी भी रह आए हैं वहाँ... तुम्हें भी ले चलूँगी।'

अँधेरा धीरे-धीरे कदम बढ़ा रहा था। वे गेट पर ही मिल गए। माँजी साथ में थीं।

'तुम रुको मैं बाइक लेकर आती हूँ।' उमा के अंदर जाते ही वे दोनों पास सिमट आए। माँ जी ने मेरा हाथ पकड़ लिया। मुझे लगा अब कहेंगी... आती रहना...

'देखो, तुम मयंक की चर्चा नहीं करोगी।' बाबूजी ने उन्हें प्यार से देखा।

'हाँ, नहीं करूँगी। पर यह दोस्त है उसकी, समझा सकती है उसे।'

'नहीं जिंदगी अब इसी तरह गुजारनी है यह तय है... छाती पर रखा यह बोझ सहना ही होगा... हम कुछ नहीं कर पाएँगे। न तुम... न मैं। शहीद बेटे के माँ-बाप से भी बढ़कर होती है शहीद की विधवा... दो निवाले को भी तरस जाएँगे हम...।'

मेरे अंदर छन्न से कुछ टूट गया। टूट कर किर्च-किर्च बिखर गया। महसूस हुआ जैसे वे सारी की सारी किर्चें उनके तलवों में धँस गई हैं और उनमें से वैसा ही लहू रिस रहा है जैसा कारगिल युद्ध में रजनीकांत के गोली लगे शरीर से रिसा होगा।


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