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कहानी

जहाँ जोगिया नचावै दुइ हरिना
विद्या विंदु सिंह


आज मनतोरा देवी क आँखै बरसत रहीं। उनकै मन अपने जनम से लै के आज तक के
     जिनगी क कटु यादन से व्याकुल रहा। नाम मनतोरा उनकै आजी रखे रहीं। पोते के जनम
     की आस लगाये रहीं, पोती आइ गय रही।
            महतारी त बेटी के सीने से लगाइ लिहे रही। मुला विधाता दूध पीती बच्ची से माँ के
छीनि लिहिन।

       मनतोरा दूध पीती बच्ची ज्यादा दिन नाहीं रही, जल्दी लरिकी बनि गयी। छोटे-छोटे
हाथ पिता के बीमार पड़तै सेवा करै सीखि लिहे। उ पुत्री से अधिक माँ बनति गई। जौनी
आजी क मन तोरे रही उनकी आँखिन की पुतली बनि गै, अपने व्योहार औ परिसरम से।
ससुरारि के लिए बिदा भई। एक बेटे क माँ बनी।
मायके ससुरारि दूनों क जिम्मेदारी सँभारति रहीं।
पति असमय चलि बसे। एकलौते पुत्र क बिछोह ससुर जी कँ चारपाई पकराइ दिहिस।
एक बिगड़ैल बैल सींगन पै उठाय कै सासू माँ के पटकि दिहिस। उनकै रीढ़ क हड्डी टूटि गय, लकवा मारिगै।
      सास-ससुर और दुइ साल क बेटवा के पालन पोसन म जवानी खपति गय। घर गृहस्थी, खेती-बारी सँभारै वाला और केहू नाहीं रहा। वै खेती-बारी अधिया पै नाहीं दिहीं कि कहीं अधियार लोग खेत अपने नाम करावै क कोई दाँव पेंच रचि लेइहैं त हमरे बेटवा क हक चला जाये

बेटवा क पढ़ाई-लिखाई म कौनिउ कमी नाहीं आवै दिहीं। जी तोड़ मेहनत करति रहीं औ बेटवा काँ सहर म भेजिकै पढ़ै-लिखै क खरचा भेजति रहीं।
       बेटवा बड़ा होइगै। पढि-लिखिकै नौकरी करै लाग तौ वकरे बियाहे के बरे भागि दौड़ि करै लागीं। बेटवा क बियाह अपनी पसंद कै लड़की से कै दिहीं। रूप आगरी, सुसील, सिक्षित, व्यवहारकुसल बहू पाइकै वै अपुना काँ भागमान मानै लागीं। जल्दीयै दुइ नन्हें मुन्ने बालकन से उनकै आँगन भरिगै।
       मनतोरौ कै सुख के दिन आइ गये। भगवान काँ लाख-लाख धन्यवाद देत मनतोरा सुख से भरि गईं।
        मुला जब वनकर नामै मनतोरा रहा तौ मन जुड़ा केतने दिन तक रहत। बहुरिया काँ साँप काटि खाइस।
        ऊ अपने दुइनौ पोतन काँ छाती से सटाये पालन पोसन करै लागीं।
        बेटवा क मन टूटि गै रहा। मुला केतने दिन अकेले रहत। मनतोरा वोकर घर फिर से
        बसावै क जतन करै लागीं। बेटवा के साथे साथे दुइनौ नन्हें मुन्हें बच्चन काँ एक महतारी कै जरूरत रही।
       दूर के रिस्तेदारी क एक लड़की दुइनौ बच्चन कै माई औ घर कै बहुरिया बनिकै आइगै।
मनतोरा बड़े प्यार औ विस्वास से उनकॉं आपन गृहस्थी सौंपि दिहीं। बेटवा क जिन्दगी फिर से रस्ता पै आय जाय, बच्चे बड़े होइ जायँ यहसे बढ़िकै और कौनौ सपना नाहीं रहिगै रहा।
       मुला दुइन-तीन महीनै म नई बहू आपन रंग दैखावै सुरू कइ दिहिस। ऊ सबेरे जगाये पै पहिले कुनमुनाय कै, फिर भुनभुनात कै उठै लागी, दुइ-तीन महीना बाद तौ वोका जगावत जगावत, बुलावत-बुलावत मनतोरा हारि गईं ऊ वनके बुलाये पै, जगाये पै उठब बन्द कइ दिहिस।

       मनतोरा के मन म बेर-बेर पहिली बहुरिया कै सालीनता, सेवाभाव औ कामकाजी सूरति घूमि जाय। मन अन्नासै पुराने औ नये म तुलना करै लागै लेकिन वै मन काँ झिटिक देंय। जौन नीक होत है ऊ रुकत कहाँ है, जे सुख देय वाला होत है, ऊ कहाँ टिकथै।
एक-एक कइकै वोनकर आपन लोगै वन्हैं अकेल छोड़ि दिहिन। वै अपने मन काँ समझावैं- अच्छा है कि ई तरह आदमी कै दीन दुख हिरदय झेलि लेय तौ भगवान कै दीन दुख झेलहिन का ना परै।
        मनतोरा दूनों बच्चों काँ जगाय कै हाथ मुंह धुलावैं, दूध-नास्ता दैके टिफिन तैयार करैं।
       बेटा नहाय धोय कै नास्ता कइके टिफिन लइकै चला जाय तब बहूरानी उठैं। तैयार रखी चाय उठाय कै बिना हाथ मुँह धोये ही पी लेयँ। फिर दुइ घण्टा म नहाब, धोउब तैयार होब औ पूरे दिन चैनल बदलि-बदलि कै टी.वी. सीरियल देखब, यहै उनकै दिनचर्या बनि गयी रही।
       सास जी के हाथ कै रसोई बहू काँ खूब पसंद रही मुला मनतोरा थकि कै चूर होइ जायँ।
महरी नौकर रखै क कई बार मन भवा पर बेटे कै आर्थिक स्थिति जानति रहीं। जी तोड़ मेहनत मसक्कत के बादौ भी वन्हैं यतना ही मिल पावत रहा कि कउनिउ तरह घर खर्च चलि जाय। कमर तोड़ मँहगाई सुरसा के मुँह की तरह बढतै जाति रही। सहर क रहन-सहन काफी खर्चीला उन्हें लागत रहा।
पहिले तो बेटे क वेतन मनतोरा काँ मिलत रहा औ घर खर्च कै पूरी जिम्मेदारियो भी। पै अब पहिली तारीख की साँझ काँ नई बहू पति कै पूरा वेतन अपनी अलमारी म रखि देति रहीं। सौरभौ काँ रोज क जेब खर्च बहुत किफायत के साथै वही देति रही।

       मनतोरा गृहस्थी चलावै क लिए बेटे काँ सामान कै पर्ची थमाय देयँ तो वै ऊ पर्ची पत्नी की ओर बढ़ाय देयँ। सकुन बहू लिस्ट म मनमानी कटौती कइके सामान लावैं औ डायरी म हिसाब ड्योढ़ा या कबौं-कबौं दुगुना कइके लिखि देयँ। महीने भर कै हिसाब म पूरा वेतन पायी-पायी खतम होय जाय। पर बच्चन काँ दूध की जगह चाय मिलै लागि। बड़े बच्चे के कपड़े छोटे के काम आवै लागे। बड़े के सरीर पै कपड़े नाममात्र कै रहि गये। मनतोरा केवल दुइ जोड़े कपड़े म धोते-सुखाते गुजर करै लागीं।
        मनतोरा क मन खीझि उठा। निरासा दुख औ पछतावा कै जानै कौन-कौन गलियन म भटकत उनकर मन केहू से कुछ कहिउ नाहीं पावत रहा। उनकर व्यथा-कथा ''मन ही राखो गोय'' रहीम की पंक्तियन म सिमटि जात रहा।
        सौरभ से वै कुछ कहि नाहीं सकति रहीं, यहि लिए कि अपुनै जबरन उनकी दूसरि सादी कराये रहीं। सकुन बहू पै कउनौ टिप्पणी नाहीं करि सकति रहीं काहें से कि उनकै चयन वनही किये रहीं।
दूनौं बच्चों की ओर देखैं तो छाती फाटै लागै। पै उन्हें छाती से लगाय कै अपनौ दुख औ उनकी तकलीफ भूलै भुलावै क कोसिस करि पावति रहीं। बच्चों के लिए उन्है जीयै क रहा हर हाल मा।
       पै रक्षाबन्धन के दुसरे दिन वै हैरान रहि गईं जब सकुन के भाई आइकै बहिन से राखी बँधवाय कै वापिस जात समय बोला कि हम दूनो बच्चों काँ अपने साथे लै जात हई। उहाँ यै पढ़ि-लिखि लेहैं। इनकी मामी इनकी देखभाल कै लेहैं। सकुन क अभी नई-नई सादी भई है। सकुन औ सौरभ कुछ दिन घूमि-फिरि आवैं।
मनतोरा अवाक होय गईं। उनसे सलाह लेय या पूछै क जरूरत भी नाहीं समझी गय रही। इै तौ मात्र सूचना देवै क घोसणा रही।
        मनतोरा विह्वल होयके कहै क कोसिस किहीं- ''ये दूनों घूमि फिरि आवैं न, हम बच्चन काँ सँभालि लेब।'' पर उनकै आवाज हवा म पसरि कै रहि गयी। उन्है लाग कि सायद उनकै आवाज बाहर निकली ही नाहीं।
       वै सौरभ के पास दौड़ि कै पहुँची। उन्हैं पकड़ि कै झकझोरत कै बोलीं- बेटा! हमरे बच्चन काँ हमसे दूरि न जाय देउ। हम उनके बिना जी नाहीं पाउब। बच्चों काँ हम सम्भालि लेब, चिन्ता मत करा। आपनि यहि सारी बातैं वै खूब जोर लगाय कै कहीं जैसे कि उन्हें विस्वासै ही न होय कि हमारि बाति सौरभ सुनत हये।
       सौरभ काठ की तरह सुन्न खड़ा रहे। ऐसन लाग कि जैसे वै सराप पावा पत्थर कै प्रतिमा होयँ, जउन कुछ बोलि नाहीं सकत।
        मनतोरा दूनौ बच्चन काँ पकड़ि कै बाहीं म समेटि लिही- ''हम न लै जाय देब इन्हें।''
       जैसे लगा कि अपनी पूरी सक्ति लगाय कै आखिरी प्रयास करति रही होंय। बच्चे हक्का-बक्का से खड़े रहिन। उनकी समझ म नाही आवत रहा कि मामा हमें घुमावै ले जात हैं तो दादी काहें मना करत हई, काहें रोवति हई। पर दादी क रोवति देखि कै बच्चे भी रोवै लागे।
        अब सकुन कै आवाज आयी- ''भाई! मैं कह रही थी न कि अम्मा जी नहीं राजी होंगी। आपने तो बच्चों का भाग्य सुधारने के लिए यह भार उठाना चाहा पर इनकी किस्मत ही खराब हैं तो क्या कर लेंगे आप? दादी के लाड़ दुलार में बिगड़ रहे हैं, न पढ़ेंगे न लिखेंगे। रहने दीजिए आप जाइये। लेकिन मेरी जिम्मेदारी खत्म। जैसे चाहें पालें, पोसें पढ़ायें अम्मा जी।''
   सकुन जब गुस्सा म होत रहीं त खड़ी हिन्दी म बोलति रहीं।
   मनतोरा कातर निगाह से बच्चों कँ निहारीं फिर सौरभ की ओर ताकीं, ऊ माँ से आँखें चुराय लिहे।
      मनतोरा समझ गयीं, अब बच्चों कँ पालै की जिम्मेदारी बहू न अपुना उठाये न पति कँ उठावै देये। मनतोरौ तो उनहीं के आसरा म रहीं, कहाँ से पलिहैं बच्चों का। उनकी बाँहिन क बन्धन ढीला पड़ि गवा।
   बच्चे उनकी ओर कातर निगाहन से देखत, सुबकत मामा जी के हाथन से खींचि लिहे गये औ उनके पीछे-पीछे चला गये।
     बच्चे वैसे भी बहुत सीधे रहे जहाँ बैठाय देउ बैठे रहत रहे, जो भी दै देव खाय लेत रहे। माँ के मरै के बाद जैसे ईसुर उन्हें हर हाल म समझौता करै क सहनसीलता दइ दिहे रहे। ऐसे बच्चों कँ पालै पोसै म काव कठिनाई होइ सकति रही? मनतोरा क मन हाहाकार कै उठा।
      सीढ़ी के नीचे बनी अपनी कोठरी म जाइकै जमीन पै पड़ि गयीं। लगा कि उनके सरीर म उठै क सक्ति नाही रहि गै रही।
      दोपहर काँ बहू क आवाज आई- ''लगता है कि बच्चे मर गये हैं और उनका शोक मनाया जा रहा है, आज सब लोग उपवास करेंगे।''
       तीर की तरह ई वाक्य उनके काने म पहुँचा औ वे तिलमिलाय कै उठि गईं। कहीं सकुन क अपसकुनी बातन कै हमरे बच्चन पै कोई असर न पड़ै, वै उठि कै खड़ी होइ गयीं औ रसोई म पहुँचि कै भोजन बनावै क तैयारी करै लागीं। आजु छुट्टी क दिन रहा। बच्चों क भेजै के बाद सब फिरि से सोय गये रहे। कोई चिन्ता औ दुख से, त कोई मुक्ति की राहत से।
       उनकर टूटा मन गृहस्थी के कामन से पूरी तरह उचटि गवा रहा। मन मारि कै काम करति रहीं पर सरीर सिथिल होत जात रहा।
       दिन पर दिन बहू क आवाज तेज होति गय, पति काँ सुनाय-सुनाय कै सास के आरामतलवी क दास्तान सुनाई जाय लागि। खाना सास बनावैं पै परोसै के लिए बहूरानी हाजिर। पति काँ जतावै क रहा कि 'मैं कितना खटती हूँ, कितना तुम्हारा ख्याल रखती हूँ।'
       पहिले मनतोरा काँ बेटे क परोसि कै खिलावै क सुख औ तृप्ति मिलति रही वहउ छिनि गै। बेटा भूखा प्यासा आय बा, ई जानतउ कै भी अब वै उन्है पानी क गिलास नाहीं थमाय सकतीं। एक बन्धन उनके चारों ओर घिरि गवा रहा।
        भोजन कै ज्यादा भाग परोसि कै बहू कमरे म लैके चली जाय औ बची हुई तलछट या खुरचन बरतन मँ खुली छोड़ि जाति रहीं।
       मनतोरा क मन खाय क न होय पै सरीर चलावै के लिए सरीर क धरम त निभवही क रहा।
       बचा-खुचा खाइकै पानी से पेट भरि कै जब वै बरतन मांजै बैठि जायँ त कमरे से जूठी थरिया, बरतन लायकै बहू नाली पै झमकि कै रखि जाय। वहमें बची जूठन क ढेर फेंकत क उनकर गँवई गांव क मन तड़पि उठत रहा। अपनी आजी औ माँ क वाक्य कानन म गूँजै लागै, अन्न देवता क नाली म मत फेंका सराप मिले। गाँव म त जानवर खाइ लेत रहे इहाँ त सड़क पै भी नाहीं डाला जाइ सकत कि कूकुरै बिलारि खाय लेंय। सड़क पै कूड़ा डालै वालन काँ जुर्माना भरै क पड़थै। सारा जूठन कचड़े की गाड़ी म डाला जाथै औ वही म पड़े-पड़े सरथै औ दुर्गन्ध फैलाव थै।
      मनतोरा समझि गयीं कि ई सब जानिबूझि कै कीन जात बा।
      एक दिन कचड़े की गाड़ी म कूड़ा डारिकै लौटत रहीं त ठेले पै फेरी लगाइ कै भीगा चना बेचै वाला सामने पड़ा औ ऊ आवाज लगाय दिहिसि- अरे काकी! आप यहीं रहथीं?
           मनतोरा ध्यान से देखीं। अरे! तूँ संजीव हया?''
       हाँ काकी!'' कहिकै ऊ मनतोरा क पाँव छुइ लिहिस।
मनतोरा पूछीं- तुम इहाँ कैसे? तुम तो पढ़त रहे?
       काकी! पढ़ाई-लिखाई पूरी कइके बेकार घूमत रहेन। अम्मा बाबू के मरै के बाद काका-काकी रोज अपमानित करै लागे कि घर में बैठे-बैठे खात हया। एक दिन बात गहरी लगि गय जब बड़की भौजी, अरे वही काका क बड़ी बहू ताना मारीं कि दस-दस रोटी अकेले खात हैं हम एक-एक परात रोटी बनावत-बनावत थकि जाइथै। त काकी वही दिन घर से भागि आये। कुछ दिन सहर की सड़कन पै भटकेन, ढाबन पै बर्तन मांजा लेकिन हर जगह वही जिल्लत क जिन्दगी देखाई परी।''
       अम्मा बीमारी म अपनी सोने क जंजीर हमरे गले में डारि दिहे रहीं, वही हमरे पास रही। वही बेंचिकै यहै ठेला लै लिया औ रोजी-रोटी क यही जुगाड़ करि लिया।''
       संजीव बोलत जात रहा-काकी! हमके मालूम रहा कि आप यही सहर म हैं। मन चाहत रहा कि चलें आपके पास। सौरभ भइया से कहें कि हमका भी छोटी-मोटी नौकरी दिलाय देंय। पै आपकै पता ही नाहीं मालूम रहा। अब देखा भगवान की लीला, कैसे आपकाँ मिलाय दिया।''
       अच्छा काकी! आपके घर म कोई बरामदा या कोठरी-ओठरी है? हमके एक चटाई डालै भर कै जगह मिलि जाति तो ---।''
       काकी! हमरी तरह ही और फेरी वाले भी सब फुटपाथ पै सोइ जात हैं। पै अब पुलिस बहुत तंग करति है। ससुरे मुफ्त म खात भी हैं, बँधवाय कै ले भी जात हैं औ ऊपर से डण्डा भी मारत हैं।''
          मनतोरा ओकरी ओर देखति रहीं। ओकर बाति सुनति रहीं। संजीव लगातार बोले जात रहा। जैसे कोई भूखा आदमी खाने पै टूटि पड़े औ लगातार खातै जाये वैसही यहि परदेस म अचानक मिली मनतोरा काकी से ऊ सब कुछ जल्दी-जल्दी बतावत रहा, आपन अभाव, कठिनाई औ बदले म चाहत रहा काकी क एक भरोसा।
          मनतोरा सोचति रहीं-सायद अपने नीक दिनन म ओकाँ पूरा भरोसा देत क कहि उठतीं- अरे बच्चा! यहमें भी कहै की कोई बात है? चलो हमरे साथै रहौ। हम सौरभ से तुहरे लिये कहब। अरे इतना पढ़ि-लिखि कै अपनी विरादरी क बिना माँ-बाप क बच्चा ऐसे दर-दर ठोकर खाये, फुटपाथ पर सोये ऐसन कैसे बर्दास होये। ''
    ''पै ये सारी बातें तो मन की हैं, मन में ही रहि गयीं। कैसे बतावैं मनतोरा कि बेटा! तुम हमसे ज्यादा
   संजीव उनकी ओर देखत रहा। उनकी आँखिन म उमड़े अँसुअन काँ देखिकै यही समझा कि हमरी दुख भरी कहानी सुनिकै काकी क मन भरि आय बा।
     ऊ काकी क आँसू अपने अँगौछे से पोछत कै बोला- ''मत रोआ काकी! हम जानित है, आपके मन म हमरे लिए केतनी ममता बा। हमहूँ आप कँ यादि कइके बहुत रोये हैं। तबै त भगवान हमैं मिलाय दिहे।''
          अच्छा काकी! आओ पेड़ की छाँह में आय जाव। देखा हमार चना खायकै बतावा कैसन बनाइत है।''
         मनतोरा कूड़े की पन्नी फेके के बाद हाथ नाहीं धोये रहीं, भूख भी लगी रही। घर पै वापस जाइकै खाने के लिए कुछ बचा भी नाहीं रहा। वै मना कै दिहीं। कहहू म भी संकोच लाग कि कूड़ा फेंकै आयी रहेन हाथ गन्दा बा।
         गाँव के लोग तो यही समझथैं कि सौरभ अच्छे पैसे कमात है, सपूत है माँ कँ अपने साथे रानी यस राखत है।
         संजीव ठेले पर रखी बाल्टी से पानी क गिलास लाइके खड़ा रहा ''काकी! हम जानिथै कि आप बिना हाथ धोये नाहीं खातीं। ल्या हाथ धोय ल्या।''

       मनतोरा सकुचातै हाथ धोयीं औ भीगे चने क दोना हाथे म थामि लिहीं। बोलीं- ''तुम कैसे बनावत खात हो बेटा! लो तुम भी खाओ न, दोना उनके आगे बढ़ाइ दिहीं।''

संजीव हँसि परा- ''अरे काकी! दिन भर इकरी महक सूँघत देखत हमार तो चने की ओर देखै क मन नाहीं करत, खाये की कौन कहे। लोगन के स्वाद लइके खाते देखित है त तृप्ति मिलत है। काकी! एक बात बताई? सहर के लोगन के गवईं गांव क चीज इतने चाव से खात देखिथै त लागत है कि अपने गाँव औ वहँ कै स्वाद कोई भी भूल नाहीं पावत, भले ही कितनौ बड़ा अफसर होइ जाय।''
   मनतोरा क मन अपने गाँव की ओर पहुँचि गय। लाग कि संजीव अपनी बातन से एक खिड़की खोल दिहिस जहाँ से पुरवा हवा क एक झोंका घुटती, सीलन की गंध भरी कोठरी म खुली सांस लेवै क राहत दै गय होय। वै संजीव कँ दिलासा देत कहीं- ''बेटा! हम सौरभ से पूछ लेब उनकी नई दुलहिनौ से भी पूछै क पड़े, तब बताउब। तुम तो जनतै हो नये जमाने क हवा कैसन बा।''
      संजीव जैसे नींद से जागा होय- ''काकी! समुझि गयन अब कुछ कहे क जरूरत नाहीं है। काकी! हम आपसे यहीं मिलत रहब रोज यही समय यहर से निकरिथै। आपकै आसीर्वादै हमरे लिए बहुत बाय। आप मोर चिन्ता न करिहैं।''
     मनतोरा क लाग जैसे संजीव उनके मन की सात परतन के भीतर छुपाइ के राखे उनके दर्द कँ देखि लिहे होय। भरी-भरी आँखिन से उन्हैं आसीर्वाद देते विदा लिहीं।
     घर पहुँची त सकुन सोवती मिली त राहत महसूस किहीं।
     दुसरे दिन दुइ बजे क प्रतीक्षा मा उनकै समय काटे नाहीं कटत रहा।
     आज वे दुइ मोटे पराठे नास्ते मा अधिक बनाइ के कागज में लपेटि कै पूजा की अलमारी में फोटो के पीछे रखि दिहीं। यह सबसे सुरक्षित जगह उन्हें लागि क्योंकि भगवान की अलमारी के पास आवै क न केहू के चाव रहा, न समय। यस चोरी के लिए भगवान हम्मैं क्षमा करिहैं। वै हाथ जोड़िकै मनै मा ही बुदबुदाय उठीं।
      संजीव क ठेला आवत देखिकै उनकर मन उत्साह से भरि उठा। बच्चन के जाये के बाद उनकर मन बीरान होय गय रहा। दिन भर मुँह सिये-सिये उन्हें लागत रहा कि कहीं हम बोलबै न भूलि जाई। घर मा पसरी चुप्पी घुन की नाय वन्हें खाति रही।
     पहले अड़ोस-पड़ोस क औरतै मनतोरा से मिलय आय जात रहीं, बच्चे आय जात रहे लरिकन के साथे खेलै। वनहूँ पोतन कँ लेके निकरि जात रहीं। अब कहूँ नाय जात रहीं। अब तो घर की इज्जत बनी रहे, सम्बन्धन क पोल न खुलि जाय, यही चिंता के साये म जीयति रहीं।
     संजीव काव मिला उन्हें जीयै क कुछ ललक मिलि गय।
     वै आंचर की छोर म बंधी कागज की पोटली काँ चारों ओर देखिके निकालीं औ संजीव के ठेले पै रखि के बोलीं- ''ई नमकीन पराठे खाइ लिहे
बेटवा!
     संजीव क आँखें सजल होइ आयीं। लाग कि माँ स्वर्ग से उतरि कै सहर की यहि सड़क पै आइ कै खड़ी हईं। वै पोटली खोलिन औ चटखारे लै-लै कै खाये लागे। काकी के चेहरे पै घिरे संतोख काँ देखि कै लाग कि हमरी स्वर्गीया माँ क आत्मा तृप्त होइ गय।
     बच्चों काँ घर से गये आठ दिन बीति गय। उन्हें कोई हाल-चाल नाहीं मिली। सौरभ से पूछीं- ''बच्चों क हाल-चाल मिली? कैसे हैं? रोवते तो नाहीं?
     ठीक हैं। उत्तर दइके सौरभ इधर-उधर देखै लाग जैसे कि टोह लेत होय। फिर बोला- ''हम लोग आज रात बाहर जाय रहे हैं हफ्ते बाद लौटेंगे उधर से बच्चों को देखते हुए आयेंगे।''
     सकुन क जासूसी आँखें औ कान उनकी बात देखत सुनत रहे। माँ-बेटा दूनों के आभास रहा औ दूनों के बीच फिर से चुप्पी पसरि चुकी रही।
     दूनों जाय लागे तौ मन भा कि पूछि लेई कि हम अकेलि रहब त गाँव कै लोगै इहाँ रहथैं, केहू क बोलाय लेई?
      ई बाति सौरभ से पूछे रहीं मुला उत्तर सकुन दिहीं- 'कोई जरूरत नहीं। क्या अकेले बिगवा लगेंगे?'
     आगे फिर कुछू पूछै औ कहै क गुंजाइसै नाय बची।
     सबेरे उठै क कौनौ जल्दी नाय रही। घर म सन्नाटा पसरा रहा। रस्ता खातिर मीठा पुआ बनाय कै मनतोरा रख दिहे रहीं। चार पुआ छोड़िकै बाकी सगरौ बहुरिया उठाय लै गै रही।
     नहाय धोयकै पुआ लैके खाय बैठीं त संजीव क चेहरा सामने घूमि गवा। एक पुआ खाइकै पानी पी लिहीं काहे से कि वहका तोड़ चुकी रहीं। बाकी उठाय कै झोली म डारि लिहीं।
     संजीव पुआ खाइकै आज फिर से तृप्‍त होइगा।
     काकी काँ चना खियायिस औ दूनों बैठि कै बतियाय लागे।
      आज मनतोरा अपने दूनों पोतन काँ घर से भेजि दिहे जाय वाली बाति औ आपन सगरौ दर्द संजीव के आगे खोलि के रखि दिहे रहीं।
      संजीव बोला-काकी! आप बचपन म हम्मैं एक ठू कहानी सुनाये रह्यू, हम कुछ भूलिगै हई, फिर से सुनाय द्या। जेहमाँ सौतेली महतारी एक जोगी काँ सौत कै दूनों बच्चे दै दिहे रहीं जेनकाँ जोगी जादू से हिरन बनाय दिहे रहा।''
     मनतोरा बोलीं-हाँ बेटा! पूरी याद बा।''
     यक रानी बीमार रहीं। वैं देखीं कि वनके घर के अँगना म चिरैया घोंसला लगाये रही। चिरैया घोंसला म दुइ अण्डा दिहे रही। चिड़िया चारा चुगै गय तौ यक सिकारी क तीर लागिगै। तीर लागे पै चिरैया कोनिउ मेर अपने घोंसला ले आय औ मरिगै। ऊ सायद आखिरी बेरियाँ अपने बच्चन काँ देखै आय रही। चिड़ा कुछ दिन ले उदास रहा फिर यक नई चिरैया लै आवा। नयी चिरैया दूनौं अण्डवा घोंसला से बहिरे फैंकि दिहिस जेहसे दूनौं बच्चै मरि गये।
     रानिउ के दुइ बेटवा रहे। तिसरी बेर वै फिर पेट से रहीं। यहि बार रानी के यक लड़की भै औ वोकाँ जनम देतै रानी मरि गयीं। मरै से पहिले रानी राजा से ऊ चिरैया औ वहके दूनौं बच्चन कै कहानी सुनाय क कहे रहीं कि हमरे मरे क बाद दूसर रानी न लाया नाहीं त हमरौ गेदहरन कै उहै हालि होये।
     राजा वन्हें वचन दिहिन रहा।
     नन्हें मुन्हे बच्चन काँ दादी संम्भाल लिहे रहीं। कुछ दिन बाद राजा क फिर बियाह करवाय दीन गै। नई रानी बिटियवा क त छोड़ि दिहीं कि ई त पराया धन होय, चली जाये औ दूनौं बेटवन काँ जोगी क हाथे बेंचि दिहीं।
     दूनौं बेटवन के न रहे से बेटी औ दादी बहुत दुखी रहै लागीं।
     दादी यही दुख म चलि बसीं।
     राजकुमारी क बियाह भा औ जब पहिली बेर माँ बनी त राजा वनसे पूछिन कि बेटवा क काव नाम रखी? रानी ई बाति पै चुप होइ जायँ वै एक ठू लटकत डोरी की तरफ इसारा कै दिहीं। राजा पूछिन- ''का 'डोरिमन' नाव रखा चहथौ?''
     रानी हामी म आपन सिर हिलाय दिहीं।
     यही प्रकार से दूसरे बेटवा के जनम पै तेल निकारै वाली परी क तरफ इसारा किहीं त वहकै नाम 'परिमन' रख दीन गै। जब तिसरी बार कन्या क जनम भै त रानी फूलन की ओर संकेत किहीं त वहकै नाम फुलमन रखा गवा। रानी अपने तीनौं बच्चन के रोये पै यक लोरी गीत गावैं-
जिन रोआ डोरिमन! जिन रोआ परिमन!
जिन रोआ फुलमन बेटी!
मोर मना वही बेल बना,
जहाँ जोगिया नचावै दुइ हरिना।
(हे डोरिमन! हे परिमन बेटवा! औ हे फुलमन बिटिया! जिनि रोआ। हमार मन वहि बेलि बन म भटकत बाय जहाँ जोगी दुइ हिरन नचावत बा)।
     यक दिन राजा ई लोरी सुनि लिहिन औ रानी से यहकै मतलब पूछिन त रानी सगरौ कहानी बताय दिहीं।
     राजा वहि जोगी के पकड़वाय कै बुलवाय लिहिन औ वहसे दूनौं हिरन काँ मनई बनावै कै आज्ञा दिहिन।
     दूनौं हिरन सुन्दर-सुन्दर नवजवान लरिका बनि गये।
     तीनों भाई-बहिन गले मिलिन।
     राजा अपनी सौतेली सास रानी क सगरौ करम अपने ससुर राजा से बताइन त वै बेटवन काँ राजगद्दी पै बैठाइन और वनके सौतेली महतारी क मूड़ मुड़वाय कै गदहा पै बैठाय कै नगर से बहिरे निकारि दिहिन।
     जैसे वनके दिन बहुरे वैसे सबकै बहुरैं।
कहानी सुनिकै संजीव बोलि उठा-काकी! सौरभ भइया काँ भी यही करै क चाही।''
     पर मनतोरा काकी बोलि उठीं-नाहीं बेटा! हम चाहित हन कि सकुन काँ अपनी गलती क अहसास होय औ बच्चन काँ वापस बुलाय कै माँ क प्यार देय।''
      आठ दिन बाद सकुन औ सौरभ लौटे तौ मनतोरा विह्वल होइकै बच्चन कै कुसल क्षेम पूछीं।
      सौरभ आँखि चुरावत धीरे से बोले-माई! हम उहाँ जाइ नाहीं सके।''
     मनतोरा अब दिन भै औ रात भय ई गीत गुनगुनात, रोवति रहीं
     मोर मना वही बेल बना,
      जहाँ जोगिया नचावै दुइ हरिना।
     वन्हें रोज आसा होति रही कि आज सौरभ पुछिहैं- ''माई! ई तूँ का गावति रहथिउ''? मुला सौरभ आज तक वनसे नाहीं पूछिन।


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हिंदी समय में विद्या विंदु सिंह की रचनाएँ