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कहानी

खिड़की
शशिभूषण द्विवेदी


बरसों पहले कथागुरु ने कथा कहने के लिए मुझे कुछ सूत्र दिए थे। तब से वे मेरे पास यों ही पड़े हुए हैं। मुझे नहीं मालूम कि मुझे उनका क्या करना है या उनके जरिए कोई कथा कही भी जा सकती है या नहीं। वैसे सूत्रों के जरिए कथा कहने की प्रक्रिया पुरानी है और दिलचस्प भी। चूँकि काफी दिनों से मैंने कोई कथा नहीं कही इसलिए बेचैन हूँ। डरता भी हूँ कि प्रयोग के चक्कर में कहीं अच्छी भली कथा का सत्यानाश न कर बैठूँ। लेकिन कथा है कहाँ? जब कोई कथ्य ही सामने नहीं तो कथा कैसी? लेकिन यह तय है कि मुझे आज एक कथा कहनी है और जब कथा कहनी ही है तो कुछ-न-कुछ तो करना ही पड़ेगा। क्यों न आज कथागुरु के सूत्रों को आजमा ही लिया जाए। शायद उसी से कुछ निकल आए। लेकिन उससे पहले मेरे सामने अतीत के महान कथागुरुओं की कुछ चेतावनियाँ भी हैं। एक चेतावनी कहती है कि सूत्रों के जरिए कथा वे कहते हैं जिनमें प्रतिभा नहीं होती और जिनमें प्रतिभा होती है उन्हें किसी सूत्र की कभी कोई जरूरत ही नहीं होती। यानी कथागुरु का फार्मूला लेने के लिए पहले मुझे खुद को प्रतिभाहीन मानना होगा। चलिए, यह भी सही... मान लेते हैं। वैसे भी प्रतिभा का चक्कर बड़ा गड़बड़ है। उसके बारे में ठीक-ठीक कोई नहीं जानता। जैसे मैं यह नहीं जानता कि मैं आपको कौन सी कथा सुनाने जा रहा हूँ। फिलवक्त तो मैं अपने छोटे से कमरे में बैठा कथागुरु के सूत्रों का वाचन कर रहा हूँ और कथागुरु कह रहे हैं कि हे वत्स! कथा कहने का पहला सूत्र यह है कि कोई भी बात कहीं से शुरू करो, कथा में इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता, न इस बात से कि आपकी कथा का विषय क्या है? कथा किसी विषय पर कही जा सकती है। बस, थोड़ा-सा गणित का अभ्यास, कल्पना की उड़ान और बातें बनानी आनी चाहिए। तुम चाहो तो गाय, भैंस, घोड़े, बिल्ली, मेज-कुर्सी, छुरी, चाकू किसी पर भी कालजयी कथा कह सकते हो। याद रखो, विषय महत्वपूर्ण नहीं होता। महत्वपूर्ण होती है दृष्टि। मैं गुरु की बातों को सिर-आँखों पर रखते अब सोच रहा हूँ - जब इतने सारे विषय सामने हैं तो कथा कहूँ किस पर? फिलहाल मैं जहाँ बैठा हूँ उसके ठीक सामने एक खिड़की है। खिड़की पर परदा पड़ा है। मैं सोचता हूँ कि जब गुरु कह रहे हैं तो क्यों न खिड़की पर ही कथा कहूँ। लेकिन इस खिड़की को देखते हुए न जाने क्यों मुझे पंद्रह साल पुरानी एक खिड़की याद आ रही है। यह उस छोटे से कस्बे में थी जहाँ मैंने अपनी जिंदगी के सबसे बुरे दिन काटे। इतने बुरे कि मैं उन्हें याद नहीं करना चाहता। लेकिन...

मुर्दा लोग, लहूलुहान शहर और वह खिड़की

 याद आ रहा है पंद्रह साल पुराना वह लहूलुहान शहर जिसकी चीत्कार तब किसी ने नहीं सुनी। मैंने भी नहीं। खिड़की से मैं उसे उसी तरह देखता था जैसे कोई धरती से चाँद को देखता है। बादलों के बीच लुका-छिपी करता चाँद कभी बहुत मोहक तो कभी बहुत उदास नजर आता है। उसकी उदासी, उसकी पीड़ा, उसका अकेलापन सब कई बार बादलों के पीछे छिप जाते हैं। शहर की उदासी बादलों के पीछे तो नहीं... हाँ, कई बार टीवी के एंटीनों के पीछे जरूर छिप जाती थी। खिड़की से मैं देखता दूर-दूर तक गगनचुंबी एंटीनों का विशाल झुंड... लगता जैसे शहर के शरीर में किसी ने हजारों लाखों बर्छियाँ धँसा दी हैं और वह तड़प रहा है। राकेश शर्मा को अंतरिक्ष में गए तब सात साल हो चुके थे और शहर आँखों में चाँद का ख्वाब लिए हाँफ रहा था। मैं इसे हाँफते-तड़पते चुपचाप खिड़की से देखता। जिस खिड़की से मैं इसे देखता वह सात बाई नौ फुट के एक छोटे से कमरे में थी। कमरे में दरवाजा था लेकिन खिड़की में कोई दरवाजा नहीं था। मुझसे पहले जो आदमी इस कमरे में रहता था उसने अखबार वगैरह चिपकाकर इसे ढक रखा था। ऐसा करने के बाद इस कमरे में खूब अँधेरा होता होगा। इतना कि दिन में भी बल्ब जलाने की जरूरत पड़े। जो आदमी मुझसे पहले इस कमरे में रहता था, शायद उसे अँधेरे से बहुत प्यार था। अँधेरे से प्यार का मतलब रोशनी से घृणा भी हो सकता है। रोशनी से घृणा करने वाला आदमी समाज से भी घृणा करेगा, ऐसा मुझे बचपन में सिखाया गया था। बचपन की सीख के आधार पर ही उस वक्त मैंने यह निष्कर्ष निकाला था कि मुझसे पहले जो आदमी इस कमरे में रहता था वह शत-प्रतिशत समाज विरोधी रहा होगा। मेरे लिए यह चिंता की बात थी क्योंकि मेरे बगल वाले कमरे में भी एक अराजक आदमी रहता था। उसके बगल में भी दो-चार लोग रहते थे जो समाज विरोधी तो नहीं थे लेकिन बहुत समाजिक भी नहीं थे। उनके कमरे के सामने से गुजरते हुए मुझे हमेशा एक अजीब सी दुर्गंध आती थी। मैं इस दुर्गंध से घृणा करता था। शायद यही कारण है कि मैंने उन लोगों से कभी बात नहीं की। न उन लोगों के कमरे में कभी घुसा। उन्होंने भी कभी मुझसे बात नहीं की। मुझे आश्चर्य होता है कि बिल्कुल सामने रहते हुए हमने कैसे बिना बात किए इतने दिन गुजारे।

मैंने जब यह कमरा लिया तो पहली बार तो उबकाई-सी आई थी। आश्चर्य हो रहा था कि लोग यहाँ कैसे रह लेते हैं। लेकिन धीरे-धीरे आदत पड़ गई। इसके सिवाय और कोई चारा भी तो नहीं था। उस वक्त मेरी यह हैसियत नहीं थी कि मैं शहर की पॉश कॉलोनियों में रह सकूँ। वैसे ये कॉलोनियाँ भी कहने को ही पॉश थीं। जैसे यह शहर कहने को शहर था।

तो इस शहर में जब मैं पहली बार आया तो काफी परेशान हुआ। कायदे का कोई होटल भी नहीं। किराए का कमरा भी मिला तो यहाँ बजबजाती नालियों के बीच। लगता था जैसे सारा शहर मुझे घूर रहा है मानो मैं चिड़ियाघर से छूटा कोई जानवर हूँ।

ऐसे ही किसी वक्त यह खिड़की मेरा आसरा बन गई थी। अपना अकेलापन काटने को मैं यहाँ से बाहर की उस दुनिया को देखने की कोशिश करता जो मेरी होते हुए भी मेरी नहीं थी।

मेरा कमरा दूसरी मंजिल पर था जिसकी खिड़की से पूरी गली का विस्तार साफ नजर आता था। सिर्फ यही नहीं, गली की बाईं तरफ वाली सड़क भी यहाँ से साफ दिखती थी जहाँ अक्सर शाम को कुछ कारें खड़ी दिखाई देती थीं। उस वक्त शहर में सिर्फ एक सिनेमाहाल था जो पहले लकड़ी के लट्ठों पर खड़ा था और जिसके चारों ओर काली पॉलीथीन लपेटकर अँधेरा किया गया था। बाद में यह सीमेंटेड हो गया। हाल के बाहर एक चाय की गुमटी थी। वहाँ शायद पकौड़े वगैरह भी बनते थे। उसी के बगल में कोतवाली थी जहाँ दो-चार पुलिसवाले हमेशा फुर्सत से सुर्ती फाँकते दिखाई देते। सिनेमाहाल के आसपास शहर का बाजार था। एक सीधी सी सड़क थी जिसके दोनों ओर दुकानें सजी रहती थीं। दुकान से ज्यादा सड़क पर ठेले और खोमचे थे। पान लगाने वाले या सिंदूर, टिकुली और काजल बेचने वाले। शहर के बीचोंबीच बालजीवन घुट्टी का एक विशाल होर्डिंग लगा था जिसमें एक हृष्ट-पुष्ट बच्चा ताली पीटते हुए शहर के तमाम बच्चों को चिढ़ा रहा था। स्त्रियाँ जब भी उधर से गुजरतीं एक नजर उसे जरूर देखतीं। उसे देखते हुए उनकी आँखों में पलभर को एक खास तरह की चमक आती। फिर वे अपने दुबले-पुतले, मुरझाए बच्चे को देखतीं और उन्हें छाती से लगा लेतीं। छाती से चिपका बच्चा जब दूध के लिए मचलता तो वे उसे अपने आँचल में छिपा लेतीं।

सिनेमाहाल के सामने साँडे का तेल बेचने वाले, अँगूठी और जादुई ताबीज बाँटने वाले और इस तरह के तमाम लोग बैठते थे। वहीं कानों में बड़े-बड़े कुंडल डाले एक ज्योतिषी भी बैठता था। उसके पास पिंजरे में बंद एक तोता था। वह लोगों का भविष्य बताता। उसके पास आने वाले ज्यादातर छात्र और मजदूर वर्ग के लोग थे। यहाँ कभी सँपेरे या बंदरों का खेल दिखाने वाले भी आते थे। आदिम सेल्समैन बिसातियों का तो यह अड्डा ही था। यहीं एक पगली बैठती थी जो दिनभर शहर में मारी-मारी फिरती और रात में यहाँ आकर सो जाती। सर्दी-गर्मी-बरसात का उस पर कोई असर नहीं होता। न कभी किसी ने उसे बीमार होते देखा। उसके बारे में कोई कुछ भी नहीं जानता था। न उसका कोई अतीत था, न भविष्य।

सिनेमाहाल के पीछे शहर का एकमात्र इंटरकॉलेज था। यह आश्चर्यजनक है कि इस कॉलेज में तब लड़के-लड़कियाँ साथ पढ़ा करते थे। उससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक यह कि इसमें एक अध्यापक महिला थी। ममता पांडे नाम था उनका। निहायत ही खूबसूरत और सलीकेदार। बाद में उन्होंने आत्महत्या कर ली। ठीक आठ बजे मैं रोज उन्हें खिड़की से कॉलेज की तरफ जाते हुए देखता। याद नहीं कभी इसमें कोई नागा हुआ हो या समय में कोई हेर-फेर। उनके बालों की हल्की सफेदी बताती थी कि उनकी उम्र यही कोई चालीस के आसपास रही होगी। कहते हैं कि उन्होंने शादी नहीं की। शहर में अकेली रहती थीं। शादी न करने के अलग-अलग कारण लोग बताते। उनमें एक कारण यह भी था कि उनके पिता बचपन में ही गुजर गए थे। भाई-बहनों की जिम्मेदारी उठाते-उठाते उन्हें अपना खयाल नहीं रहा। लेकिन उनकी आत्महत्या के बाद लोग ऐसा नहीं मानते। दरअसल, यह आत्महत्या नहीं, एक सुनियोजित हत्या थी। आज से पंद्रह साल पहले उस छोटे कस्बे में ऐसा हुआ - सोचकर ही मुझे आश्चर्य होता है। चालीस साल की उस अधेड़ औरत की चीखें अब भी कई बार मुझे बेचैन कर देती हैं।

जिस दिन उन्होंने आत्महत्या की, उसके दस दिन बाद तक मुझे उनके बारे में कोई सूचना नहीं मिली। उन दस दिनों तक मैं रोज खिड़की पर बैठकर उनका इंतजार करता रहा। दसवें दिन अचानक पान की दुकान पर किसी ने कहा कि 'वो मास्टरनी तो बड़ी रंडी निकली।' मैं चौंका। पूछने पर पता चला कि ममता पांडे ने सल्फास की गोलियाँ खाकर खुद को मार डाला। उस समय उसके पेट में बच्चा था। आगे सूचना यह थी कि ममता पांडे अपने ही कॉलेज के किसी छात्र से फँस गई थीं। लड़के के अभिभावकों को जब पता चला तो उन्होंने ममता पांडे को खूब खरी-खोटी सुनाई। वह सलीकेदार और सभ्य औरत यह सब बर्दाश्त नहीं कर सकी और एक संभावना को जन्म दिए बगैर ही इस दुनिया को रुखसत कर गई। उस रात मैं घर लौटकर खाना नहीं खा पाया। एक अधेड़ स्त्री का चालीस साल लंबा हाहाकार मुझे बेचैन किए हुए था।

दस-पंद्रह साल पहले इस घटना ने शहर को भीतर ही भीतर हिलाकर रख दिया था। मैं कभी उस छात्र से मिल नहीं पाया, न उसके परिजनों से, लेकिन उनके बारे में मुझे सज्जन मियाँ ने बताया था। इस मामले में सबसे प्रमाणिक सूचना उन्हीं के पास थी। वे इक्का चलाते थे। ममता पांडे का जिक्र आते ही उनके चेहरे के भाव बदल जाते। गहरी साँस लेकर आसमान की ओर उँगली उठाते हुए कहते, ''बेचारी...!''

सज्जन मियाँ मझोले कद के हँसमुख इनसान थे। खिचड़ी बाल और लंबोतरा चेहरा। दाढ़ी ऐसी जैसे पैदाइशी हो। मुँह में हमेशा पान दबाए रहते। उनके लिए सवारियाँ रिश्तेदारों की तरह थीं। किसे कहाँ जाना है, यह उन्हें मालूम रहता। कुरेद-कुरेदकर उसकी पूरी वंशावली जान लेते। बतानेवाला कितना ही ढीठ हो, सज्जन मियाँ के आगे उसकी एक न चलती। सज्जन मियाँ के इक्के की घोड़ी भी उन्हीं की तरह थी। दुबली-पतली, मरगिल्ली...। बच्चे उसे लेकर सज्जन मियाँ को खूब छेड़ते। ताली पीट-पीटकर कहते, ''मियाँ, घोड़ी है चंचल चाँदनी, क्या काबुल से आई...।'' और सज्जन मियाँ उन्हें सोंटा लेकर दौड़ाते हुए कहते, ''काबुल से न आई तो का तोरी अम्मा के मायका से आई... सरऊ हमरी घोड़ी का नजर लगावत हैं...।'' बच्चे ताली पीटते हुए भाग जाते। सज्जन मियाँ का एक लड़का था - नसीम। उम्र यही कोई सोलह-सत्रह साल रही होगी। स्कूल से आने के बाद वह वही सिनेमाहाल के सामने गुमटी पर बैठ जाता और इधर मेरी खिड़की की तरफ देखता रहता

प्यार तब भी एक खूबसूरत गुनाह था

 मेरी खिड़की से वहाँ की गतिविधियाँ साफ दिखाई देती थीं क्योंकि वे सड़क के उस तरफ होतीं। इस तरफ गली और उसके ऊपर छत का विस्तार ही मुझे दिख पाता था। बगल वाली छत पर मैं लगभग हर शाम एक लड़की को खड़ा पाता जो बड़ी खामोशी से सड़क के उस पार सिनेमाहाल की तरफ देख रही होती थी। उसके हाथ में कभी कोई किताब होती, कभी गुलाब की कोई टहनी। जब उसके हाथ में गुलाब की टहनी होती तो वह सिनेमाहाल की तरफ देखते हुए धीरे-धीरे उसे नोचती रहती। उसका चेहरा तो अब मुझे याद नहीं... हाँ, उसकी चुटिया याद है। बहुत करीने से वह दो चुटिया बनाती थी। बाद में मुझे पता चला कि सज्जन मियाँ का लड़का नसीम उसी के लिए नियत समय पर सिनेमाहाल की गुमटी पर बैठता था और लड़की भी उसी के लिए दो चुटिया बनाकर छत पर आती थी। दुनिया की नजर बचाकर वे घंटों एक-दूसरे को देखते रहते। उन्हें शायद नहीं मालूम था कि उनके सामने एक खिड़की भी है जो उन दोनों को देख रही होती थी।

उस छत पर लगभग हर शाम एक बूढ़ा गौरेयों को दाना डालने आता था। पुचकार-पुचकार कर वह गौरयों को अपने पास बुलाता और अपनी मुट्ठी से थोड़े-थोड़े दाने बिखेरने के बाद वह चुपचाप छत की मुँड़ेर पर जाकर खड़ा हो जाता। गौरया जब अपनी नन्हीं सी चोंच से दाना उठाती तो बूढ़े की खुशी देखते ही बनती थी। लड़की भी अपनी किताब या गुलाब की टहनी लेकर वहीं आ जाती।

इस मुहल्ले के पीछे की तरफ क्षेत्र की एकमात्र रबड़ फैक्ट्री थी। खिड़की से यह नहीं दिखती थी। लेकिन मुहल्ले के अधिकतर लोग इस फैक्ट्री में कामगार थे। सुबह वे सब एक साथ फैक्ट्री की तरफ जाते। शाम को वापस आते। जब वे वापस आते तो उनके कंधे झुके हुए होते। चेहरा थकान और पसीने की चिपचिपाहट से भरा होता। खिड़की के सामने जो मकान था, वह उधर ही सड़क की तरफ खुलता था। इस तरफ सिर्फ एक खिड़की थी। वैसी नहीं, जैसी मेरी खिड़की थी। यह दीवार को तोड़कर बनाई गई थी जहाँ से हवा या प्रकाश आ-जा सकता था। चाहे तो कोई आदमी भी। लेकिन आदमियों को उधर से जाते मैंने नहीं देखा।

मेरी खिड़की चूँकि दूसरी मंजिल पर थी इसलिए इस खिड़की के पार मैं बहुत कुछ देख सकता था, लेकिन उधर से मेरी तरफ देखने के लिए जरूरी था कि खिड़की से बाहर ऊपर की ओर देखा जाए। जाहिर है इतनी मशक्कत कोई नहीं करता, सो मैं निरापद था।

इस खिड़की पर अक्सर साबुन की टिकिया, सर्फ या शैंपू आदि रखे रहते थे। इसलिए मैंने अनुमान लगाया कि यह शायद बाथरूम की खिड़की होगी और यह सही भी था। अब झूठ क्या बोलूँ जिस दिन इस खिड़की पर मैंने साबुन की टिकिया देखी थी उस दिन से मेरे भीतर एक चोर बैठ गया था। यह चोर बार-बार इस खिड़की से उछलकर उस खिड़की पर जा बैठता और जबरन भीतर घुसने की कोशिश करता। ऐसा उस दिन से हुआ जब मैंने उसे वहाँ नहाते हुए देखा था।

नहाते हुए मुझे सिर्फ उसकी पीठ ही दिखती थी। चमचमाते इस्पात जैसी। जिसे वह हाथ पीछे ले जाकर बार-बार, इतनी बार मलती थी कि आश्चर्य होता था... कैसे जमती होगी किसी की पीठ पर इतनी मैल...।

मैं उसकी पीठ को देखता... पीठ पर फिसलते साबुन और पानी को भी। पानी से मुझे ईर्ष्या होती। दिन के उजाले में पूरा का पूरा मैंने उसे बस एक ही बार देखा था। यह सुबह का वक्त था जब वह पानी लेने नल पर खड़ी थी। नल पर तमाम औरतें लड़ रही थीं। उसके आते ही सब शांत हो गईं। उसने सिर झुकाकर नल से पानी भरा। झुकते समय सूरज की रोशनी में उसकी नाक की लौंग चमक उठी थी। हालाँकि यह फिजूल सी बात है लेकिन मैंने उसे बस इतना ही देखा था। उसने जरूर मुझे भर नजर निहारा और बाल्टी भरकर चली गई। खिड़की से जब भी मैं नहाते हुए उसकी पीठ देखता, मेरे सामने उसकी नाक की लौंग आ जाती और मुझे लगता खिड़की के उस पार भी वह उसी तरह चमक रही होगी जैसे पानी भरते समय नल पर चमक रही थी।

उस खिड़की से मैंने बच्चों की किलकारियाँ, मारपीट और रोना-पीटना भी सुना था और टीवी की तेज आवाज में कोई फूहड़ सा गाना भी। यानी पहली नजर में सब कुछ सामान्य था। सुबह-शाम उस घर में पूजा भी होती थी शायद... क्योंकि घंटियों की आवाज बताती थी कि यह किसी देवता के लिए बजाई जा रही है।

मेरे बगल वाले कमरे में शकील रहता था जिसके बारे में प्रसिद्ध था कि वह पेशेवर हत्यारा है और हमेशा शराब के नशे में धुत्त रहता है। मैं हर वक्त डरा-सहमा उससे बचने की कोशिश करता लेकिन शकील था कि मेरा पीछा ही नहीं छोड़ता। अक्सर वह मौका देखकर मेरे कमरे में आ जाता और दुनिया जहान की गप्पें हाँकता। अपराधियों की दुनिया की अंदरूनी जानकारियाँ मुझे उसी से मिली थी। हत्या के तमाम तरीके भी उसने मुझे बताए थे और बहुत संजीदगी से कहा था कि किसी को मारने का सबसे वीभत्स तरीका यही है कि उसे जिंदा छोड़ दिया जाए।

शकील की बातें हमेशा अजीबोगरीब और दार्शनिक सी हुआ करती थीं। वह कभी भी किसी बात पर टिककर बात नहीं कर सकता था। उसे हर खूबसूरत चीज से घृणा थी। बच्चे उसे नापसंद थे और सुंदर औरतों पर वह थूकता था।

वह जब हँसता तो बड़ा अश्लील लगता और संजीदगी उसे भाती नहीं थी। आप कोई बात करें, 'हत्या' उसका स्थायी भाव होता और वह घूम-फिरकर वहीं आ जाता। मैंने एक-दो बार उसे टोका भी लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ। ऐसे मौकों पर वह अक्सर मुझे सर्द निगाहों से घूरता और बीड़ी सुलगाते हुए अपने कमरे में चला जाता। मुझे उससे डर लगता था लेकिन मरता क्या न करता... उसे झेलना अब मेरी नियति बन चुकी थी।

कामुक प्रेतात्मा का वह भीशण अट्टहास

 शकील जब मेरे कमरे में नहीं होता, तो स्वाभाविक रूप से मैं खिड़की पर होता था जहाँ से उसकी भीगी हुई नंगी पीठ के अलावा भी बहुत कुछ दिखता था। चारों ओर बेतरतीब मकानों के बीहड़ और उनके बीच संकरी बदबूदार गलियाँ... कुछ लोग गलियों में आ रहे होते... कुछ जा रहे होते। कुछ पता नहीं चलता था कि वे सब कहाँ से आते हैं और गली के अंत में जाकर अचानक कहाँ गायब हो जाते हैं। सबके चेहरे एक जैसे सर्द और कठोर होते थे जैसे बेजान खिलौने हों और किसी ने उन्हें चाबी भरकर चला दिया हो।

गली की औरतों को देखकर मैं अक्सर सोचता कि ये रात को बिस्तर पर कैसे सोती होंगी या प्रेम के क्षणों में इन्हें चूमते हुए इनके पतियों को उबकाई क्यों न आती होगी। सब एक जैसी फूहड़ और मक्कार औरतें थीं जिनके शरीर और आत्मा को कोई कामुक प्रेतात्मा पके आम की तरह चूस रही थी। खिलती कली की तरह कोई मासूम-सी लड़की भी कब अचानक औरत बन जाती और कब उसे चूस लिया जाता, कुछ पता नहीं चलता था। स्थिति कुछ ऐसी थी कि उस कामुक प्रेतात्मा के बारे में मुझे न चाहते हुए भी विश्वास करना पड़ रहा था।

उसके बारे में तमाम सूचनाएँ जुटाकर मैं इस नतीजे पर पहुँचा था कि यह प्रेतात्मा बहुत शक्तिशाली है और उसकी ऐशगाह में तमाम ऐसी औरतों की करुण कराहें जज्ब हैं जिन्हें चूसकर फेंक दिया गया है। इस ऐशगाह में पुरुषों की स्थिति उन बधिया कर दिए गए नपुंसकों जैसी थी जो सुबह एक साथ उठते, खाते-पीते और मशीन की तरह काम पर चले जाते। उनके जीवन में कुछ भी अप्रत्याशित या जीवंत नहीं बचा था सिवाय अखबार या व्यभिचार के।

अखबारी सूचनाओं के हिसाब से शहर बहुत छोटा था और सबको सबके बारे में लगभग सब कुछ पता था। लेकिन शायद सतह के नीचे शहर की एक और दुनिया थी जिसके बारे में मुझे शकील ने बताया था। इस दुनिया के बारे में लोग जितना कम जानते थे उतनी ही ज्यादा उसके बारे में सूचनाएँ थीं और पता नहीं क्यों उसके सब सूत्र खिड़की से उस पार उस भीगी हुई नंगी पीठ से जुड़ रहे थे। दरअसल उस कामुक प्रेतात्मा का सच भी यहीं था और रात गहराने पर मद्धिम रोशनी में मोहल्ले में आती कारों का रहस्य भी।

शकील ने एक रात शराब के नशे में कहा, ''बुल्लन उस्ताद को जानते हो?''

मैंने जब मना किया तो वह उसी तरह झूमते हुए बोला, ''हाँ, उसे तुम कैसे जानोगे... उसे कोई नहीं जानता... लेकिन उसे सब जानते हैं... साला गिरगिट...!'' और इसी तरह वह काफी अंट-शंट बातें करने लगा। वह शराब के नशे में था। शराब के नशे में आदमी अक्सर खुद को केंद्र में रख लेता है। दूसरे की आवाज उसे बहुत दूर से आती हुई लगती है और अपनी किसी गहरे कुएँ से... कुएँ से आती आवाज में अनुनाद होता है। दीवारों से टकराकर वह वापस आपके पास आ जाती है और आपको लगता है कि यही सच है। शकील भी उसी सच को कह रहा था लेकिन मेरी समझ में नहीं आ रहा था। क्योंकि उसमें करोड़ों अणुओं का अनुनाद और शो शामिल था। वह हवा में काल्पनिक रिवाल्वर चलाता और किसी अनाम स्त्री को गालियाँ बकता। वह मुझे कुछ समझाना चाहता था। समझाते-समझाते अचानक वह जार-जार रोने लगा। मैंने जब उसे चुप कराने की कोशिश की तो वह उठ खड़ा हुआ। फिर अचानक खिड़की की ओर मुड़ा और थूक दिया। बाहर हल्का अँधेरा छाने लगा था। वह थोड़ी देर खड़ा रहा फिर धीरे-से बुदबुदाया, ''आदमी को अँधेरे से डरना चाहिए...।''

उसकी मुट्ठियाँ भिंच चुकी थीं और चेहरा लाल था। एक अजीब तरह की बेचैनी ने उसे घेर लिया था। थोड़ी देर इसी तरह भटकने के बाद वह आकर बिस्तर पर लेट गया और बड़बड़ाने लगा, ''हाँ, मैंने ही मारा उसे... मैं उसे जिंदा नहीं देख सकता था...।''

और इस तरह खिड़की के बाहर पसरे अँधेरे का रहस्य खुलता जा रहा था। कहीं रोशनी की कोई मद्धिम किरण थी जो अँधेरे को चीर रही थी। शकील बार-बार चिल्ला रहा था, ''आदमी को अँधेरे से डरना चाहिए दोस्त... आदमी को अँधेरे से डरना चाहिए।'' पता नहीं यह भ्रम था या हकीकत लेकिन शकील की चीख अँधेरे को और गहरा रही थी। उधर खिड़की बाहर और भीतर के अँधेरे के बीच लैंपपोस्ट बनकर खड़ी थी, जिसके नीचे कोई पगली सदियों से आदिम राग में कोई अबूझ सा गीत गा रही थी।

इस लैंपपोस्ट से गुजरने वाले सैकड़ों लोग थे जिन्होंने उसे सुना था लेकिन अब तक कोई भी उसे बूझ नहीं पाया था। इसी बीच उस अव्याख्येय क्षण को खींचकर किसी ने पूरे आकाश में तान दिया। बस्ती से गुजरने वाले हर व्यक्ति पर यह क्षण एक आतंक की तरह छाया था।

शकील ने कहा, ''यह डायन है जो रात अँधेरे में यहाँ से गुजरती है।''

मैं एक पल को काँप गया। खिड़की के बाहर झाँककर देखा तो स्टीरियो पर एक गीत बज रहा था। मैंने खुद को ढाँढ़स बँधाया... 'नहीं... कहीं कोई डायन नहीं... सब ठीक है...।'

अँधेरे और रोशनी की एक फूहड़ सत्यकथा

 शकील अब तक अपनी पूरी रौ में आ गया था। उसने बताया कि खिड़की के उस पार जहाँ वह रहती है... गोदामनुमा-सी जगह है, आठ-दस साल पहले चेतन के साथ वह यहाँ भागकर आई थी। तब उसके साथ दो छोट-छोटे बच्चे भी थे। शकील ने विस्तार से उसके सौंदर्य का बखान किया, फिर धीरे-से कहा, '' बहुत सुंदर थी तब यह... चेतन हमेशा उसे सात तालों में बंद रखता था। साल भर तक मुहल्ले में किसी ने उसका चेहरा तक नहीं देखा... हाँ, उसके दोनों बच्चे जरूर मुहल्ले के अन्य बच्चों के साथ खेलने बाहर आ जाते। उन्होंने ही मुहल्ले वालों को अपने मम्मी-पापा और नए पापा के बारे में बताया। शकील की उन बच्चों से दोस्ती हो गई थी। बच्चों की बातों से उसे लगा कि चेतन एक शैतान है जिसने एक खूबसूरत राजकुमारी को इस कैद में रखा है। राजकुमारी को इस कैद से निकालने के लिए बहुत सोच विचारकर उसने एक रणनीति बनाई और चेतन से दोस्ती कर ली।

अक्सर वह चेतन के साथ शराब पीने उसके घर जाने लगा। इन शराब पार्टियों में ही शायद तीनों के बीच यह भयानक खेल शुरू हुआ जिसने आखिरकार चेतन की जान ले ली।

शकील उन दिनों बुल्लन उस्ताद के गैंग में था। पैसों की आमद ठीक-ठाक थी। वह अक्सर राजकुमारी और उसके बच्चों के लिए कुछ-न-कुछ खरीद लाता। उसके लाए कपड़ों को राजकुमारी बड़े शौक से पहनती और चेतन कुढ़ता। चेतन की खीझ और कुढ़न कई बार विस्फोटक हो जाती और मारपीट तक आ जाती। राजकुमारी को भी यह सब बर्दाश्त नहीं होता था। बहुत आत्मीय क्षणों में वह अक्सर शकील को सब बता देती और शकील बौखला जाता। आखिर एक दिन उसने चेतन को रास्ते से हटाने की योजना बना ही डाली।

शकील ने बताया कि वह एक भयानक रात थी जब मैंने चेतन को मारा... शराब के बहाने पहले उसे जंगल में ले गया। वहाँ मेरे साथी पहले ही इंतजार कर रहे थे। हमने उसे शराब पिलाई, फिर पेड़ से बाँध दिया। पूरी पाँच गोलियाँ उसके सीने में उतारी थीं मैंने... बहुत खुश था उस दिन... मैंने उसे उस राक्षस की कैद से आजाद करा दिया था।''

''क्या राजकुमारी को पता था कि चेतन की हत्या तुमने की?''

''नहीं, लेकिन उसे शक था। उसकी शक भरी निगाहें अब मुझे डराने लगी थीं। फिर मैं उसके घर कभी नहीं गया। अँधेरों से डर लगता है लेकिन अब उससे दूर भी नहीं रह सकता... मर जाऊँगा मैं...।''

शकील अब खामोश हो गया था। हालाँकि शकील द्वारा सुनाई गई कहानी किसी अपराध पत्रिका में छपी फूहड़ सत्यकथा जैसी ही थी। लेकिन इसमें अँधेरे और रोशनी का एक ऐसा कोना भी था जो आदमी की हर साँस के साथ उसके भीतर उतरता है और गुम हो जाता है। इसमें हजारों-हजार छवियाँ एक साथ गुजरती हैं... किसी अनजान और अपरिचित दिशा की तरफ...।

तब शकील को मैंने बहुत झिंझोड़ा लेकिन वह कुछ भी बताने को राजी नहीं हुआ। उसकी खामोशी अँधेरे में अब मुझे डराने लगी थी। बाद में अलग-अलग सूत्रों से जो जानकारी मुझे मिली उसका कुल लब्बोलुवाब यही था कि एक दिन अचानक राजकुमारी बुल्लन की हो गई और शकील को उसने झाड़ू मार-मारकर घर से निकाल दिया। अब मुझे नहीं लगता कि इसके बहुत विस्तार में जाने की जरूरत है क्योंकि अविश्वसनीय सही, यह दुखद घटना शकील के साथ घट चुकी थी। इसका एकमात्र कारण जो शकील ने बताया वह यह था कि राजकुमारी को बुल्लन में अपनी मुक्ति का रास्ता दिखा था। शकील ने कहा, ''वह है ही ऐसी... जिसे प्यार करती है, बिच्छू की तरह उसे खा जाती है।''

(शकील की बातों पर विश्वास करते हुए भी मैं दुविधा में हूँ। समझ नहीं पा रहा हूँ कि आखिर राजकुमारी की चाहत के तर्क क्या थे?)

अब जो हो... सच या तो खुदा जाने या बुल्लन, लेकिन शकील की पिटाई के बाद मुहल्ले में उसकी धाक जम गई थी। सरेशाम कई-कई चमचमाती गाड़ियाँ इस चिथड़े मुहल्ले में खड़ी होने लगीं। गोदामनुमा-सी वह जगह जो कभी वीरान थी और जहाँ सात-सात तालों में राजकुमारी बंद रहा करती थी, अब रंगीन हो गई। शकील भी यहीं सामने कमरा लेकर रहने लगा। वह घंटों गोदामनुमा-सी जगह के सामने खड़े होकर राजकुमारी को घूरता। राजकुमारी उसे गालियाँ देती और वह हँसते हुए उसे टाल जाता। चूँकि वह पेशेवर हत्यारा था इसलिए अपने अनुभवों की जमापूँजी समेटकर उसने यह निष्कर्ष निकाला कि किसी की हत्या का सबसे वीभत्स तरीका यही है कि उसे जिंदा छोड़ दो। राजकुमारी को भी उसने जिंदा छोड़ दिया... उसके अपने भीशण भय के साथ...।

इस बीच शहर में कई और घटनाएँ भी घटीं। लोगों को की-रिंग से लेकर दर्पण तक में देवी दुर्गा के दर्शन हुए... गणेश ने दूध पिया... और शहर में बंदरों का आतंक बढ़ा। शहर की एकमात्र रबड़ फैक्ट्री बंद हो गई। हजार लोग एक साथ बेरोजगार हुए। मुहल्ला वीरान हो गया। सर्द चेहरों वाले उन हजार लोगों के जीवन में शायद पहली बार कुछ अप्रत्याशित घटा था। उन सबकी भवें एक साथ फड़कीं... माथे की सलवटों और चेहरे की झुर्रियों के बीच अरसे बाद कुछ पिघलना शुरू हुआ। धरना, प्रदर्शन, नारेबाजी... और फिर एक गहरी खामोशी... फैक्ट्री में तालाबंदी के खिलाफ लड़ रहे दो मजदूर नेताओं की हत्या हो गई और लोगों ने दबी जुबान से इस मामले में बुल्लन उस्ताद का नाम लिया। और हाँ, इसी बीच सज्जन मियाँ का लड़का नसीम और लगभग हर शाम छत पर खड़ी होने वाली वह लड़की शहर से गायब हो चुके थे। काफी खोजबीन की गई। लड़की के घरवालों ने इस मामले में सज्जन मियाँ के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज करवाई। पुलिस ने उन्हें पकड़कर मारा-पीटा भी, लेकिन कुछ पता नहीं चला।

यह सब हुआ... कामुक प्रेतात्मा की उस दहशत के बीच जिसका उस मुहल्ले के चप्पे-चप्पे पर राज था। बंदरों के उत्पात से शहर अलग से त्रस्त था। कई चेहरे घायल हुए... कई घर लुटे। (फैक्ट्री की तालाबंदी के बाद शहर में बंदरों का आतंक और लूटपाट अंत तक एक रहस्य रहा।)

उन दिनों भी शकील नशे में आकर एक ही बात कहा करता कि आदमी को चाहिए कि अँधेरों से डरकर रहे...! और सचमुच खिड़की के बाहर अँधेरा घना होता जाता... वहाँ से दिखती इस्तात जैसी उसकी भीगी नंगी पीठ किसी लैंपपोस्ट की तरह चमकती, कामुक प्रेतात्मा हँसती और तब तक हँसती जब तक कि सारा मुहल्ला थरथरा न उठता।

यह सब तब तक चला जब तक कि बुल्लन उस्ताद विधायकी का चुनाव जीतकर मंत्री नहीं हो गए और शकील एक गैंगवार में मार नहीं दिया गया।

हालाँकि उसके बाद भी अपनी खिड़की से सात तालों में बंद उस राजकुमारी को मैं देखता रहा जो उस गोदामनुमा-सी जगह में कैद थी और आधी-आधी रात को उठकर नहाने लगती थी। उसकी पीठ पर इतनी मैल थी कि छूटती ही नहीं थी। कभी-कभी वह जोर-जोर से चीखने लगती। मैं डर जाता। फिर कोई राजकुमार उसे छुड़ाने नहीं आया। उसके दोनों बच्चे भी उसे छोड़कर चले गए। एक ने बुल्लन उस्ताद की चाकरी कर ली। दूसरा एक ट्रक में हेल्पर हो गया। कुछ दिनों बाद नसीम के साथ भागी हुई लड़की भी घर वापस आ गई। उसकी गोद में एक बच्चा था। उसने रोते हुए बच्चा सज्जन मियाँ की गोद में डाल दिया। सज्जन मियाँ सूनी आँखों से उसे देखते रहे। पता चला कि नसीम और उस लड़की ने भागकर मुंबई सेंट्रल में शादी कर ली थी। कुछ दिन तो सब ठीक-ठाक चलता रहा लेकिन बाद में आर्थिक तंगी से तंग आकर नसीम रेल से कट मरा। मुंबई सेंट्रल पर उसकी लाश के टुकड़े मिले थे। कपड़ों और जेब से मिली लड़की की फोटो से उसकी पहचान हो सकी।

सज्जन अब भी शहर में अपने नाती के साथ हैं। लड़की का पता नहीं। घोड़ी मर चुकी है और वे रिक्शा खींचकर पेट पालते हैं। लेकिन बच्चे अब भी उन्हें यह कहकर छेड़ते हैं कि 'मियाँ, घोड़ी तो चंचल चाँदनी, क्या काबुल से आई?' मियाँ सोंटा लेकर अब उनके पीछे नहीं भागते। सूनी निगाहों से बस ताली पीटते बच्चों को देखते हैं और रिक्शा आगे बढ़ा लेते हैं। उनकी स्मृति भी कमजोर हो गई है। आँखों पर मोटा चश्मा लगाते हैं और सवारियों को कुरेद-कुरेदकर उनकी वंशावली के बारे में नहीं पूछते। जहाँ तक उस कामुक प्रेतात्मा का सवाल है तो उसकी दहशत तो अब भी है लेकिन उससे डरने वाले उस मुहल्ले में अब नहीं रहते। टीवी के एंटीनों के रूप में दस-पंद्रह साल पहले जो बर्छियाँ इस शहर के शरीर में धँसाई गई थीं, वे भी अचानक एक जादू की तरह गायब हो गईं। केबिल नेटवर्क के तारों का जाल गली-कूचों में धमनियों की तरह फैल चुका है। बाल जीवन घुट्टी का वह होर्डिंग भी जो कभी शहर की शान हुआ करता था, बहुत पीछे छूट गया है। वहाँ अब एक शॉपिंग कॉम्प्लैक्स है जिसकी छत पर बाल जीवन घुट्टी से चार गुना बड़ा इलेक्ट्रॉनिक होर्डिंग लगा है जिसमें रात-दिन सपनों की एक नई दुनिया खुलती है। शहर के लोग अब चौबीस घंटे एक बुखार में रहते हैं। नाइट क्लब, पब और ब्यूटी पार्लरों में कुछ खोजती हुई सी बेपहचान चेहरों की कतार लंबी हो रही है। शहर विस्तार पा गया है। चमत्कारों की भी एक पूरी श्रृंखला है यहाँ, जिन्हें खिड़की पर बैठकर बहुत तरतीब से समझना अब संभव नहीं। लोग उन्हें भकुए की तरह ताकते हैं। कई बार दिमाग सुन्न हो जाता है, लेकिन...

अंतहीन नहीं है सब

 मित्रो, कथा की शुरुआत चूँकि मैंने कथागुरु के सूत्र से की थी, इसलिए चाहता हूँ कि अंत भी उन्हीं के सूत्र से करूँ। हालाँकि इस कथागुरु के कई महत्वपूर्ण सूत्र मैंने छोड़ दिए हैं। खिड़की की खोज में व्यस्त था कि कुछ याद नहीं रहा। कथागुरु की चेतावनियाँ अब मुझ पर भारी पड़ रही हैं। उन्होंने कहा था कि किसी भी कथा का कभी कोई अंत नहीं होता। हर कथा अंतहीन है। अंतहीन है इसीलिए कथा है। ईश्वर, प्रकृति और प्रेम की तरह...

तो गुरु, क्या इस त्रासद कथा का भी कोई अंत नहीं होगा? मैं गुरु से पूछता हूँ। गुरु खामोश हैं क्योंकि वे जानते हैं कि यह कथा ईश्वर, प्रकृति और प्रेम की तरह तो नहीं ही है।

फिर कैसी है, भगवान जाने...।


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