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कहानी

कहानी रचै क कहानी
विद्या विंदु सिंह


जबसे सबकै सुख-दुख जानै-समुझै लागेन मन बेचैन रहै लाग। यक दिन हमरी माई क गुरू जी आये। वनकाँ सबही वेदांती बाबा कहत रहे। नाव काउ रहा हम नाय जानित।

वै माई से बोलिन - 'ई तोर बिटिया का सोचत-विचारत रहत है? जान परत है कि एका कउनौ दुख बा।'

माई बोलीं - 'का बताई गुरु बाबा! ई बड़ी पागल बिटिया है। सबके लिए परेसान रहत है। केहू क दुख देखत है तौ परेसान होय जात है औ हमरेव सबसे जिद कइके ओकरी मदद के लिए दौराये रहत है। जैसन बाप वैसन बिटिया। दिन भै हेरि-हेरि कै किताब पढ़त है औ गाँव भर के बेमरिहन के घरे दौरी रहत है। बाप अउर बढ़ावा देत रहथैं। लेकिन घर कै और बड़े हम्मै आँखि देखावत हैं कि काहें एकाँ सबके घरे जाय देति हौ, काहें ना रोकतिउ।

बाबा! हमतो बड़े असमंजस म रहित है। रोकी तौ अपुना नराज होत हैं न रोकी तौ घर के बड़े नराज। ई न ऊँच-नीच जाति देखै, न अमीर गरीब, सबसे मेल-जोल किहे रहथै। हमहूँ क डरि लागथै। बिटिया क जाति, ई बौरहिया काँ केउ धोखा न दइ देय।

गुरु बाबा हमैं बोलाय क बोले - 'बच्ची! तू काउ सोचत विचारत रहथिउ? तोर माई परेसान है, तोहरी चिंता मा। तोर सबकी सेवा के लिए घरे-घरे दउरब तोहरे घरे वालेन काँ नाय पसंद बा।'

हम बाबा काँ उत्तर दिहेन - बाबा! हम का करी? हमसे केहू क तकलीफ नाय देखी जात। हमार बाबू भी चाहत हैं कि सबकै मदद करी। आप माई काँ समझाय देंय कि ऊ न डेरायँ। हमार केहू नुकसान न करे। बाबा! आपौ त बतावत हैं कि सब एक परमात्मा क संतान होय। तौ ई ऊँच-नीच जाति हमरी समुझ म नाय आवत। हमैं मियाइन काकी ओतनय मानथीं जेतना तिवराइन अइया औ ठकुराइन आजी। धोबइन काकी, गोबरकढ़िन अइया, भुजइन भउजी सबै त हम्मैं मानत हैं। त उनके घरे जाय म कउन बुराई बा?'

बाबा! हमरी माई क ओर देखि कै हँसि कै बोलिन - बच्चा! तोहार ई बिटिया तौ लेखक बनी, देखि लिहिउ ई कहानी, कविता लिखे औ अपनी कलम से सबकै दुख-सुख लिखिकै दुनिया क बताये।

बाबा कै बात सुनिकै हमरे मन मा ललक जागि गै। का सचमुच हम लिखि सकित है? औ वही दिन एक कहानी लिखेन। पिता जी काँ देखायन औ वनसे कहेन कि केहू से बताया जिन। हम्मै लाग कि सब सुनिकै हँसे।

हम अपने बाबूजी कै बड़ी लाड़ली रहेन। बाबूजी हमार कहानी देखि कै कुछ सुधार किहिन औ समझाइन कि ई अच्छी बात है, लिखै खातिर लजाये क कउनौ जरूरत नाहीं।

हमरे लिखै क रहस्य छिपा नाय रहिगै। हमरे एक बड़के भइया श्री हरिमंगल सिंह का यक दिन हमार कविता क कापी मिलि गै ऊ लइ गइन औ आदरणीय सत्यनारायण द्विवेदी 'श्रीश' जी काँ देखाइन। श्रीश जी फैजाबाद जिला कै सन्नाम कवि रहे। वै बहुत खुस होइकै खूब आसीर्वाद लिखि कै कापी लउटाइन।

अब ले गाँव भरे कै साथी हम्मै डॉक्टर कहिकै चिढ़ावत रहे, अब कवि जी कहिकै चिढ़ावै लागे। फिर जब कहानी लिखै क बात मालूम भइ तौ सब खत्री जी कहै लागे। खत्री जी क मतलब रहा देवकी नंदन खत्री।

गाँव म एक पँचई पास भौजाई रहीं। उनके लगे 'चंद्रकांता' औ 'चंद्रकांता संतति' कै फटी पुरानी किताबै रहीं। वही काँ पढ़इ की लालिच मा गाँव भरे कै लरिकै-लरिकियै उनके घर जुटा रहैं। काँहे से कि भउजी केहू काँ किताब लै न जाय देति रही।

ई देखि कै गाँव भरे म लोग चर्चा करै लागे कि ई दुलहिन बहुरिया कै ठीक लच्छन नाय होय कि सबके बीच बैठिकै हँसी ठट्ठा करैं। गाँव भरे क ननद देवर लोगै भउजी के लिए मुसीबत बनिगै।

हमरौ सबकाँ वनके घरे जाय क मनाही होइगै कि केहू के मुँह मा लगाम नाय बा कि केकरे लिए काउ कब कहि देय। यही लिए उहाँ न जावा करा।

हम अबहीं ले चंद्रकांता पूरी नाय पढ़ि पाये रहेन। खाली सुरू किहे रहेन तब ले हमरी काकी (बड़की माई) पहुँचि कै बोलीं तोहार बड़का बाबू बोलावत हइन।

हमार बड़का बाबू बोलाये रहिन कि नाय, वनसे पूछै क हिम्मत नाय रही। मुला हमार मन चंद्रकांता म अटका रहा।

एक दिन भउजी केहू के घरे बियाहे म मिलि गईं त हम वनसे बतायन कि हम तोहरे घरे आय के नाय पढ़ि सकित। भउजी भइया के हाथे लुकवाय के चंद्रकांता किताब भेजि दिहीं कि एक दिन मा पढ़ि कै लउटाय दिहिउ, फाटइ न पावै। हम चंद्रकांता काँ लइकै एक ठू कोठरी म घुसि गयेन औ पढ़इ लागेन। न खाय-पियै कि सुधि रही न कहूँ जाय-आवइ क।

माई हेरत-हेरत आईं औ डाँटि कै बोलीं कि हम कबसे गाँव भरे म हेरवावत हई औ तू इहाँ लुकानि बइठी हइउ। आजु आवइ द्या तोहरे बाबू काँ तौ बताउब।

बाबू सुनिन तौ हँसइ लागे - ''अरे ई किताबै ऐसन बा कि सुरू कै द्या तौ सारी दीन-दुनिया कै सुधि नाय रहत।''

वही दिन हम्मै लाग कि कहानी ऐसन होय क चाही कि दीन दुनिया क सुधि भुलवाय देय।

'चंद्रकांता' के प्रभाव से हम एक जासूसी बाल उपन्यास लिखेन, जउन हमार एक सखी पढ़िस औ प्रमाणित किहिसि कि हम पढ़त कै दीन-दुनिया भुलाय गै रहेन।

ऊ उपन्यास कै कापी एक अनपढ़ भउजाई चूल्हा जलावइ क खातिर उपयोग कइ लिहीं। यहि दुर्घटना पै जब हम रोय परेन अपनी रचना की दुर्दसा औ विछोह मा, तब ऊ भउजी बड़ी मासूमियत से बोलीं - ''अरे बच्ची! हम नाय जानत रहेन कि एतनी कीमती चीज बाय। लेकिन अब हमहूँ तुहूँ मुड़वउ पटकि देब तबौ ऊ न लउटे। त ऐसन करा कि तू फिरि से लिखि डारा।

अब वन्हैं कइसे बताई कि जउन एक बार लिखि गै रहा तउन दोबारा नाय लिखि जाय सकत। हमरे ई कहे पै वै पूछीं - 'काहें भला? हम रोज बरतन माजित है, रसोई बनाइत है त का वोकर ढंग भूल जाइत है? कउनौ दिन रसोई म कूकुर घुसि कै जुठारि देय या बरतन केहू फिरि गंदा कइ देय त हम ई कही कि हम दोबारा ई काम नाहीं करि सकित है?'

अब हम वन्हैं कइसे बताई कि यतना आसान नाय है फिर उहै चीज लिखब। लेकिन भौजी की बात से हमैं ई सबक मिला कि रसोई पकाउब भी एक रचना है औ वोकै महत्व कम नाय होत। औ इहउ समुझ म आय गै कि कउनौ नारी जब कलम हाथ म लेत है तौ वोकाँ आपन सारा कर्तव्य निभावइ के साथै साथ कलम कै साधना करै क परत है।

औ फिरि लिखै क क्रम चलि परा। अवधी हमारि मातृ-पितृ भाषा रही तुलसी, जायसी, कुतुबन, मुल्ला दाउद कै भाषा रही। बचपनै से लोककथा सुनै-गुनै म मन लागत रहा।

हमरे घरै के बगल एक अइया रहीं जेका हम आई कहत रहेन। वनकै पतोह एक काकी रहीं। वनके घरे पैरा बिछाय के वहि पै कथरी औ चदरा डारि कै बड़ा क बिछौना जमीन पै बिछा रहै। हमरे सब रोज जाइकै काकी से कहानी सुनी। एक दिन काकी कहीं कि हमरे जेतनी कहानी आवत रही ऊ तोहरे सब काँ सुनाय दिहेन। अब तोहरे सब सुनावा। हमसे कहीं कि पहिले तू सुनावा। लेकिन सुनवइयन कै सर्त रही कि जउन-जउन कहानी काकी से सुनि लिहे हई, ऊ न सुनावा।

त वही दिने से कहानी गढ़ै क नींव परी औ हम बनइ-बनइ के कहानी सुनावै लागेन। नायक-नायिका लोककथा के राजा रानी की जगह पर अपने गाँव कै देखा सुना लोगै बनै लागे।

पुरदुल बाबा हमरे घरे कोयर (चारा) काटै आवत रहे। वनके उप्पर सबसे पहिले कहानी लिखेन। ऊ कहानी कहूँ गुम होयगै रही। आज सोचित है कि जउन-जउन कहानी गढ़ि-गढ़ि कै सुनायन ऊ हवा म उड़िगै। न हम्मैं याद रहिगै न सुनवइन काँ। न ऊ लोककथा म आय, न लिखित मा। आज ऊ लिखी गई होत या रिकार्ड भइ होत तब सुरक्षित रही होत। ऊ कहानी सुनै वाले श्रोता सीमित रहे - झिनका फूवा, लखना फूवा, बिल्ला दीदी, मन्ना सखी, मांधाता दीदी (सुशीला), विधाता दीदी (उषा) सब सुनिकै समीक्षौ करैं, सवालौ करैं, यस काहें भै? काहें नाय भै? यस होय कै चाहत रहा। औ ऊ ''यस होय कै चाहत रहा'' हमरी कलम माजै के लिए एक कसौटी बनि गै औ हम लिखै लागेन। लिखि-लिखि कै कापी भरै लागि, हेराय लागि।

हाईस्कूल प्राइवेट पास कइके पिता जी के पास प्रतापगढ़ आइ गयन। हमैं पढ़ावै के लिए बाबूजी परिवार साथ लै आये। माई औ छोट भाई बहिन स्याम, मंजू साथे आये। बड़े भाई अरविंद देव बाहर पढ़ाई करत रहे। सबसे छोटी बहिन अनु क जनम प्रतापगढ़ म भै।

वही बीच हमार कापी, डायरी सब यहर वहर होइगै। इंटर पास कइके बी.ए. म पढ़त रहे तबै बियाह तय भै। बाबूजी रिटायर भये, हमार बियाह तय होतै घर मा बँटवारा भै। घर कै सामान बहुत कम बाबूजी काँ मिला। प्रतापगढ़ कै गृहस्थी से काम चलावा जाय लाग।

घरे पहुँचि कै बहुत हेरि खोजि किहेन तौ खाली एक कापी औ एक डायरी कविता कै मिली। बियाह भै तौ कापी, डायरी छोड़ि कै ससुरारि आय गयन। एक जगह सँभालि कै धइ आय रहेन कि लौटि कै आउब तब लै जाब। लौटि के आयन तौ उहौ नाय मिली। मन मसोसि कै रहि गयन। लेकिन बड़की भौजी (श्रीमती स्वाती देवी) क बाति याद आइगै कि 'फिर से लिखि डारा।'

औ हम फिरि से लिखै बैठन त दूसर-दूसर कुछ लिखा जाय लाग।

ज्यादा रचना खड़ी हिंदी म लिखै लागेन। फिर कबौं-कबौ अवधी म लिखेन। अपने पीएचडी कै शोध करत कै लोकगीत और लोककथा एकट्ठा करत करत बहुत सारी कविता लोक धनु मा गावै लागेन। लोककथा सुनिकै लाग कि इनकर जौन मंगल भाव बा ओकाँ समाज मा फैलावै क जरूरत बा यहि लिए पहिले लोककथा औ लोकगीतन कै संग्रह छपवाउब जरूरी बा। फिर अपने गुरुजनन औ मित्रन के प्रेरणा से अवधी म लिखै लागेन। अवधी क विद्वानैं कहैं लागिन कि कविता ढेर लिखी जात बा अवधी म कहानी कम लिखी जात हईं जबकि अवधी म अभिव्यक्तिी कै यतनी ताकत बा कि ओकर प्रभाव जन जन पै बहुतै सहज रूप म पड़ि सकथै।

हम आपन लिखी अवधी कहानियन म से जेतनी मिल सकीं ओकाँ बटोरेन। वही सबकै संग्रह कइकै प्रस्तुत करत हई।

''अलख निरंजन की कस्तूरी'' कहानी म एक ऐसन बुजुर्ग कै बिथा-कथा बाय जौन मेहरारू के बिछोह के बाद यकलौती बिटिया की मदद के लिए सहर जायके रहइ लाग, मुला बिटिया के बदले व्यवहार से दुखी होइकै वापस गाँव लौटि आवथै। गाँव म पत्नी क याद औ गाँव क भाईचारा के बीच वन्है ज्यादा संतोष मिलै।

''भैरो क माई'' एक ऐसन बेवा क कहानी होय जेकाँ अपने परिवार से कउनौ मदद नाय मिलत। ऊ अपने नन्हें बच्चे कै भविष्य सँवारै के लिए सहर जायके मृतक आश्रित कर्मचारी के रूप मा रेलवे विभाग म नौकरी पावइ के लिए संघर्ष करथै। ओकरे पति कै मित्र सहायता करत है औ बालक बच्चा अपनी माई क साथे खड़ा होइ जाथै। ई कहानी संबंधन के खोखलेपन काँ उजागिर करत है।

''लड्डू गोपाल'' क माई दुइ मर्दन के छल कै सिकार भये क बादौ अपनी ममता के कारन जियै क कोसिस करत है औ दूनौ काँ अँगूठा देखाय के मोहिनी नारी रूप पै महतारी रूप कै विजय साबित करथै।

''जहाँ जोगिया नचावै दुइ हरिना'' एक वृद्धा माई कै कहानी होय जे अपने यकलौते बेटवा क बिन महतारी के दुइ बेटवन काँ पालि पोसि कै बड़ा करथै। लेकिन सौतेली महतारी लरिकन काँ घर से बाहर भेजि देथैं। वन्हैं बचपन कै सुनी लोककथा याद आवत है औ वै आपन दुख गाँव से सहर आये एक जवान लड़के से ऊ कथा सुनाय कै बाँटथीं।

''मुर्दाखानी'' म एक लोककथा कै रूपांतर आज की औरत के जीवन मा दोहरायी गै देखाई गय बा। नायिका औरत कै सामर्थ्य औ साहस कै कहानी कहथै औ पति के परिवार कै संरक्षक बनिकै पति का सबक देथै।

''माई से आंटी'' एक ऐसन कुँवारी औरत कै कहानी होय जौन अपने भाई के बेटवा कै जिन्नगी सँवारै खातिर अपने सुख काँ होम कै देथै। वही बेटवा कै नयी-नवेली दुलहिन वन्है माई के बजाय आंटी संबोधन से आहत कइ देथै। नायिका अपने जीवन भर की ममता औ तपस्या की हार पै हतप्रभ होइ जाथै, मुला अपनी उदात्त भावना के साथ अपने प्रेमी के जीवन सँवारै के लिए फिर से अपने भौतिक सुख काँ तिलांजलि दै देथै।

यहि कहानियन मा बहुत कुछ यथार्थ बाय जउन हमरे सबके आस पास रोज देखाई परथै।

यह माँ हमार कुछ नाय बा। सब कुछ हमरे गाँव के संगी साथिन कै बिथा कथा म हमारि बिथा कथा जुड़ि गै बा और कुछ नाहीं।

येकरे प्रकाशन खातिर शिवांक प्रकाशन के भाई श्री दुर्गा प्रसाद मिश्र जी सहर्ष तैयार होइ गये औ किताब छपै के लिए भेजि दीन गै।

ई कहानियाँ सबकाँ पसंद आये औ सबकाँ अपने गाँव कै सुधि आये, उहाँ कै अपने बिछुरे लोगन के दुख-सुख से मन भीजि आये त हमार लिखब सुफल होइ जाये। इहै आसा बाय।


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