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कविता

पानी
एस. जोसफ
संपादन - मिनीप्रिया आर.


पहले हमारे यहाँ कुएँ नहीं थे।
पानी के लिए यजमानों के घर जाना होता था।
वे अपने आँगन से बाल्टी में पानी लेते थे

हमें नीचे से खजूर के सूखे-पत्तों से पानी लेना था।
नहीं तो खेतों के बीच की नालियों में से।
एक घड़ा पानी के लिए जानेवाली अम्मा या नानी
आँगन से हमारी पुकार की नोक पर
बँधी हुई भी होती थी।
गाँव की बातों में उन्हें बीतते समय का अहसास नहीं होता था।
फिर काम के बाद
दारु-भरा घड़ा जैसा चाच्चन* आएँगे।
पानी गरम नहीं कहकर
अम्मा से झगड़ा करेंगे, पानी उड़ेल देंगे।
मार, पीट, लात
पड़ोसी भाग आएँगे।
तब मुझे साथ लेकर, मोमबत्ती जलाकर
चाच्चन का पानी के लिए रवाना संपन्न होता।
नाटक के समाप्त न होने से
पर्दे की डोरी पैर में बाँधकर रात
सो जाती थी।

आज हमारे यहाँ कुआँ है।
पानी नहीं।
कुआँ पलटकर हमने
चार घड़िया पानी निचोड़ लिया।

* पिताजी के लिए प्रयुक्त शब्द
 


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