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कविता

पहचान पत्र
एस. जोसफ
संपादन - मिनीप्रिया आर.


पढ़ाई के दिनों में
एक लड़की हँसती हुई आई

उसके भात और चूरा* मछली-व्यंजन पर
हमारे हाथ मिलते रहे
हमने एक बेंच पर
हिंदू-क्रिश्चियन परिवार बसाए।

मैं नेरुदा की कविताएँ पढ़ता रहा
उसी बीच मेरा पहचान पत्र खो गया

मैंने देखा। पहचान पत्र देकर उसने कहा -
लाल स्याही में लिख रखा है इसमें
तेरे स्टाईपेंड लेने का हिसाब।

अब आमने-सामने बैठते-भूलते लड़का-लड़की को
मैं देखता ही नहीं।
कुछ समय बाद वे बिछुड़ जाएँगे
फिर उनके मिलने पर भी गनीमत नहीं -
उनके पहचान पत्रों पर लाल स्याही में लिखे गए
हिसाब नहीं होंगे।


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