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कविता

एक घर था और एक सिनेमाघर
जितेंद्र श्रीवास्तव


एक कमरा था जो
महीनों
घर था मेरा

सिनेमाघर के पिछवाड़े
एक भरा-पूरा उजाड़ था वह
जब फिल्में दिखाई जाती थीं वहाँ
तो महज आवाज ही नहीं आती थी
महसूस होती थी दर्शकों की धड़कन भी

मध्यांतर में
पैरों की धमक और पेशाब की गमक से
भर जाता था वातावरण
लेकिन रात में
जब अंतिम शो के बाद
जा चुके होते थे दर्शक कर्मचारी सब
तब भी नहीं सो पता था सिनेमाघर

ज्यों ही झपकती थी उसकी आँख चिहुँककर बैठ जाता था वह
कभी-कभी उठती थीं सिसकने की आवाजें भी

जब न रहा गया मुझसे
तब कहा एक दिन मैंने अपने घर से
घर ने कहा वह भी चिंतित है
लेकिन क्या करे कैसे पूछे
फिर भी मेरे बार-बार कहने पर
पूछा एक दिन घर ने संकोच भरे स्वर में
हालचाल
उस भव्य दिव्या पर दुखी पड़ोसी का

उन नितांत शांत पलों में
जब नीरवता गहरी थी
तब पाकर किसी सहचर का कंधा
फफक पड़ा वह सिनेमाघर
कहने लगा अब बात नहीं रही पहले जैसी
अब कम आते हैं लोग यहाँ
अब बहुत-बहुत दिनों में
कभी-कभी भरता है पूरा घर
और कभी जब भर जाता है
तब भी लोग न जाने क्यों खोए-खोए से रहते हैं
कुछ हाल हमारा भी ठीक नहीं
कुछ पता नहीं है आने वाले कल का

कुछ समझा कुछ नहीं समझा
मेरे घर ने
मैंने भी
फिर चला गया उस शहर से

धीरे धीरे बीत गए कई साल
नहीं मिला कोई हालचाल
पर पिछले दिनों अचानक जाना हुआ उस शहर
तो हतप्रभ रह गया मैं
अब न वहाँ वह कमरा था
जो घर था कभी मेरा
और न था वह सिनेमाघर
जिसने कभी छाँटी थी थी उदासियाँ मेरी
और बताकर दुख अपना
चिंतित भी किया था मुझे

मैंने पूछा सामने के पानवाले मनोहर भाई से
क्यों क्या हुआ
क्यों गिरा दिया सिनेमाघर मालिकों ने
आपको तो मालूम होगा कुछ-कुछ?

मनोहर भाई चुप रहे थोड़ी देर
धीरे-धीरे एक पान लगाया मेरे लिए
बिलकुल वही पहले जैसा सादा
खुश हुआ कि मैं याद हूँ और मेरी आदतें भी उनको
मैंने मुँह में दबाते हुए पान
फिर देखा उनकी ओर

तब धीरे से बोले वे
कोई साल भर हुआ बंद हुए सिनेमाघर
मेरी रोजी भी मारी गई इसी के साथ
अब तो घर चलाना भी भारी हुआ जाता है

सुना है कुछ और खुलेगा यहाँ
जगमगाएगी इमारत
मुनाफा उगलेगी मालिकों की जेब में
लेकिन भाई साब, पता नहीं
आने वाले साहब लोग पान खाएँगे कि नहीं !

मुझे लगा जैसे लड़खड़ा रही है उनकी आवाज
और लगा जैसे उसमें
वही उदासी
वही कंपन, वही भय है
जो वर्षों पहले था
उस रात
सिनेमाघर की आवाज में


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