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कविता

प्रेम और प्रतिज्ञा
पुरुषोत्तम व्यास


भरत-वंश
देवधर के वृक्ष
अधरों पर
ममता भरी मुस्कान
नयनों में आँसू
स्मरण प्रेयसी का
देखता रहता
अपने ओजस्वी सुपुत्र को
नाम के अनुरूप उसका चरित्र
हस्तिनापुर का युवराज
गंगापुत्र देवव्रत पिता शांतनु को
अति प्यारा
उनसे भी अतिगुणवान।

[ राजा शांतनु को निषाद कन्या सत्यवती से प्रेम हो गया था, परंतु सत्यवती के पिता ने उनसे यह शर्त रखी कि सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर पर शासन करेगा... तभी यह विवाह संभव होगा।]

राजा शांतनु
बडी दुविधा में पड़ गए|

प्रेम -

सही या गलत
या अटपट सा
या आतुर सा
या बोझल सा
या तड़प सा
या एक प्रश्न जिसका कोई हल नहीं।
प्रेम -
क्या अपने ही बारे में
सोचता
मनुष्य को कितना बेबस कर देता
देखता रहता अंबर को
कविता नव सी हो या
पुरानी
प्रेम कविता में ही होता
क्या सोचूँ
क्या करूँ
विचारों में नहीं ठहराव
कभी अपने बारे में सोचता
तो कभी
अपने ओजस्वी सुपुत्र के बारे में
चंद्रमा क्यों चमका करता
मनुष्य क्यों प्रेम किया करता
क्या प्रेम में मनुष्य का
निजी स्वार्थ भी होता
अपने भविष्य के लिए।

निषाद कन्या सत्यवती
कितनी सौंदर्यपूर्ण
कितनी सादगी सी
कितनी महकती हुई
इससे बढकर
मेरा उसे देखते ही
ऐसा लगा
बिना खुशबू वाले
कुसुमों में खुशबू भर आई हो
जीवन जीवन सा लगने लगा
बार बार उसका मुख
सम्मुख आ जाता।

शर्तों पर प्रेम

प्रेम नही रह जाता
वह तो स्वार्थ होता
प्रेम तो
हर परिस्थिति में
घुलमिल कर रहने के लिए होता
सत्यवती के अंदर
क्या सम्मोहन हैं
मन बार बार
उसी सरिता के किनारे जाता
पल भर के लिए प्रेम ने
आतुरता भरी कविता लिख दी।

सत्यवती अपने पिता से
कह देती
मुझे भी राजा शांतनु से प्रीति है
बस प्रीति है
और कुछ नहीं
पर वह भी मौन रही...।

जोड़ने पर भी प्रेम
घटाने पर भी प्रेम
प्रेम का समीकरण भी कुछ अजीब सा होता है।

एक महान भारतवंशी
राजा कितना बेबस
पर पहले एक मनुष्य
जो अनुराग देख ढूलता
प्यार देख कविता लिखता
वचन -
सत्यवती के पुत्र को शासन देना

भाग्य में
वचनों के आधार पर ही
प्रेम मिलना लिखा है।

भावनाओं में पल पल
बदलाव
कब किससे जुड़ जाए
त्याग इस शब्द की गहराई
और देवव्रत
शांतनु।
मौन
उसी के बारे में सोचना
उसी के लिए जीना
रंग भी उड़ जाता जीवन का।

अपने पुत्र को
कैसे कहूँ
क्या इतना स्वार्थी हो गया
अपने प्रेम के लिए
उसे त्याग करने को कहूँ
क्या उचित
क्या अनुचित
सोच ने भी काम करना छोड़ दिया
बस सत्यवती और सत्यवती
प्रेम में डूबता जा रहा हूँ
मनुष्य सच्चाई से
ज्यादा कल्पनाओं में जीता
कितने तारे
कितने किनारे
स्वप्न भी टूट टूट के
बिखर जाते।

[शांतनु पूर्णरूप से सत्यवती के प्रेम में डूब चुके थे हृदय की आह से निकल पड़ी कविता।]

पीड़ा वह भी प्रेम की

दर्द भी बढ़ता जाता
कभी किस ओर से
स्मरण उसका चला आता...

कभी - आशा
कभी - निराशा
मन सँभल नही पाता
थी छोटी सी मुलाकात
रुख बदला जीवन का
सरिता के किनारे पर
जीवन नौका डूब गई
पीड़ा वह भी प्रेम की...

लगता मुझको
किसी बहाने मिल जाएँ
हृदय वेदना को थोड़ा सा
कम कर जाएँ
पीड़ा वह भी प्रेम की...
मिठास जीवन की
प्यारी होती
निशा के स्वप्नों में
कुछ न कुछ सच्चाई होती
पीड़ा वह भी प्रेम की...।

[ देवव्रत ने पिता को व्याकुल सा पाया दुखों के पहाड़ों के बीच में अकेला पाया।]

व्याकुल सा देख पिता को
देवव्रत गहरी-सी सोच में डूब गया
क्या गहरा-सा दुख
जो उनको सता रहा
टूटे घोंसले को देख-जैसे
पक्षी फड़फड़ा रहा
माता के पश्चात

वही मेरे पिता और माता बन
हर गुणों से संपन्न बनाया
धरा में चलना
नभ में उड़ना सिखाया
लगता उनको
माता का स्मरण सताता हो
कैसे उनको पूछे
क्यो वे इतने व्याकुल से रहते...।
मनुष्य मनुष्य का दुख न समझे
तो मनुष्य मनुष्य कहलाने लायक नहीं।

पिता को व्याकुल सा देख
देवव्रत भी व्याकुल हो गया
हम किसी के हृदय में क्या हो रहा
यह जान भी नहीं पाते
फिर भी संग संग रहते।

[एक पुत्र अपने पिता के दुख का कारण पूछे... बड़ी दुविधा की बात होगी। ऊपर से देवव्रत जैसा होनहार पुत्र...।]

सुख के बारे में
हर कोई पूछ सकता
दुख के बारे में
कोई कोशिश ही नही करता...।

एक पुत्र
पिता से उसका दुख पूछे
कितनी दुविधा वाली बात होगी
परंतु -
देवव्रत को मंत्रियों से पिता की व्यथा ज्ञात हुई
तत्काल मंत्रियों को लेकर
सत्यवती के घर की तरफ प्रस्थान किया।

देवव्रत को पिता शांतनु
की व्यथा समझ आई
सावन मास में जैसे
कोई प्यासा पक्षी भटक रहा
ज्वाला प्रेम की
कितने-कितने गीत रचाएँ।

प्यार उस कुसुम की तरह
जो एक अकेला बाग में
खिलता रहता
खुशबू फैलाता रहता
देवव्रत भी

जो प्रेम की गहराई समझता हो
उसमें मनुष्य कैसे
तिल-तिल कर जलता है...।

परीक्षा की घड़ी में हर कोई आगे पीछे होता
परम-योद्धा ही बस चलता रहता...।

कैसे लिखे कोई कवि
उस प्रतिज्ञा को जो भीषण थी
यौवन काल में ग्रहण बन छाई हो।

हस्तिनापुर का युवराज
संग-मंत्रिगण पहुचे निषादराज के घर
पहले उनको प्रणाम किया
पुत्र ने -
सत्यवती का कर अपने पिता के लिए माँगा
और कहा - सहर्ष -
अपनी पुत्री का विवाह मेरे पिता संग कर दीजिए
आपकी पुत्री के गर्भ से जो पुत्र होगा
वही हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी होगा...।

आने वाले पल में क्या होने वाला है
किसे पता था
देवव्रत और उस पल मे
जैसे कोई समझौता हुआ हो
उन-दोनों को ही मालूम
दामिनी जितनी तेज न चमकती हो
उतनी एक पुत्र की प्रतिज्ञा
पिता के लिए युगों तक चमकेगी
इतनी सुंदर त्याग की कविता
किसी ने भी नहीं लिखी होगी...।

देख प्रेयसी को शांतनु भी फूले न समाए
पीली देह-में चमक-सी आ गई।

पर जब पिता को पुत्र की प्रतिज्ञा ज्ञात हुई
जैसे वह धरा पर चिपक गए
न कुछ बोल पाए
न कुछ कर पाए
फिर थोड़ा सँभलकर
कहा -
पुत्र यह तुमने क्या किया
यौवन - खिलने के लिए होता
यौवन - प्रणय के लिए होता
उसमें तुमने भीषण प्रतिज्ञा
ले डाली
संसार में तेरे जैसा पुत्र
कोई नही हो सकता
जो पिता के अनुराग के लिए
अपनी इच्छाओं को त्याग दे...।

आँसू बहाते हुए
पिता शांतनु ने पुत्र देवव्रत को
इच्छा मृत्यु का वरदान किया

और कहा आज से संसार तुम्हें
भीष्म के नाम से जानेगा...।

अपनी इच्छाओं को दबाकर
इच्छा-मृत्यु का वरदान मिला
अब क्या जीवन
अब क्या मृत्यु...।


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