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आलोचना

मुर्दहिया : रेणु के गाँव में प्रेमचंद की रिहाइश
राहुल सिंह


दलित साहित्य न सिर्फ 'व्यवस्था' को प्रश्नांकित और उसकी पुनर्रचना पर बल देने वाला साहित्य है बल्कि प्रतिरोध और परिवर्तन की मानसिकता निर्मित करने का एक जरिया भी है। इस साहित्य के अंतर्गत आनेवाली आत्मकथाओं में पाए जाने वाले दो विशेषताओं को मिलाकर इसे एक किस्म की 'पर्सनल हिस्ट्री' भी कह सकते हैं, 'पर्सनल', आत्मकथाकार के 'जीवन की यातनाओं का शब्दबद्ध समुच्चय' होने के कारण और 'हिस्ट्री' उस यातना के एक सुनिचित देश-काल में घटित होने के कारण। ऐसे भी 'इतिहास जिनकी हत्या करता है, कला उनको जीवन देती है। इतिहास जिनकी आवाज सुनने से इनकार करता है, कला में उनकी आवाज सुनाई देती है', (मैक्सिकन उपन्यासकार कार्लोस फुएंते)। हिंदी दलित आत्मकथाओं की श्रृंखला में डॉ. तुलसी राम की 'मुर्दहिया' संभवतः अब तक कि सशक्ततम अभिव्यक्ति है। कारण, कि जो बातें अन्य दलित आत्मकथाओं में होती थी उन सबके अलावे भी इसमें अनेक नई और सार्थक बातें हैं। इन बिंदुओं को सिलसिलेवार ढंग से देखने की जरूरत है।

पहला, दलित आत्मकथाओं के शीर्षक जिस व्यवस्थाजन्य अमानवीयता या सामाजिक अस्वीकार्यता को इंगित करते हैं; अक्करमाशी, अछूत, उचक्का, तिरस्कृत, जूठन; मुर्दहिया उसी परंपरा का निर्वाह करती है। तुलसी राम मुर्दहिया की भूमिका में लिखते हैं कि 'हमारे गाँव की 'जिओ-पॉलिटिक्स' यानी 'भू-राजनीति' में दलितों के लिए मुर्दहिया एक सामरिक केंद्र जैसी थी। सबसे रोचक तथ्य यह है कि मुर्दहिया मानव और पशु में कोई फर्क नहीं करती थी। वह दोनों की मुक्तिदाता थी। विशेष रुप से मरे हुए पशुओं के मांसपिंड पर जूझते सैंकड़ों गिद्धों के साथ कुत्ते और सियार मुर्दहिया को एक कला स्थली के रूप में बदल देते थे।' इन तीन वाक्यों की सांकेतिकता व्याख्या की माँग करती है। पहले वाक्य में, एम.एन. श्रीनिवास की 'संस्कृतिकरण' की अवधारणा को समझे बिना सामरिक केंद्र के तौर पर मुर्दहिया की प्रस्तावना को समझा नहीं जा सकता है। सवर्णों द्वारा कुछ कर्मों, जैसे मरे हुए पशुओं के खाल उतारने आदि को निषिद्ध घोषित कर दिए जाने के कारण, उन पेशों पर निम्न जातियों का वर्चस्व हो गया और उस क्षेत्र में अन्य किसी प्रतिस्पर्धी के अभाव में वे लगातार साधनसंपन्न होते चले गए। आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होने पर सामाजिक सोपान में उच्चता की दावेदारी उन्होंने पेश की। इस तरह मुर्दहिया जैसी जगहें उनके लिए सामरिक शक्ति का केंद्र साबित हुईं। दूसरे वाक्य में, मुर्दहिया द्वारा मानव और पशु में भेद न किए जाने की महत्ता को भारतीय समाज की जाति व्यवस्था को जाने बिना नहीं समझा जा सकता है। भारतीय समाज की जिस जाति आधारित व्यवस्था ने मनुष्यों के पूरे समूह को सिर्फ जन्म के आधार पर अछूत मान कर समाज से बहिष्कृत कर रखा हो उन हाशिए के लोगों को बिना भेद के आत्मसात करने वाली मुर्दहिया, एक स्थल मात्र न रह कर हाशिए के लोकतंत्र का रूपक जान पड़ती है और तीसरे वाक्य में मुर्दहिया को कला स्थली के तौर पर देखा जाना दलित साहित्य के नए सौंदर्यशास्त्र की बानगी भर है, जो अभी निर्माण की प्रक्रिया में है। मुर्दहिया, जहाँ मनुष्य और मनुष्य में नहीं बल्कि मनुष्य और पशु में कोई भेद न हो, वैसे स्थल को दलित अगर कला स्थली के तौर पर देख रहा है तो उस पर अचरज नहीं होना चाहिए।

दूसरा, दलित आत्मकथाओं में उत्पीड़न की जिस पद्धति-प्रक्रिया व यातना के जिन सोपानों का वर्णन रहता है, वह मुर्दहिया में भी है। अंतर सिर्फ इतना है कि अन्य दलित आत्मकथाओं की तुलना में मुर्दहिया सामाजिक ढाँचे में अंतर्निहित हिंसा को सामने लाने का काम बिना किसी अतिरिक्त कड़ुवाहट और आक्रोश के करती है। दलितों के उत्पीड़न के मूल में जाति व्यवस्था जैसी सामाजिक संस्थाओं की अहम भूमिका रही है। इन सामाजिक संस्थाओं में आचार-विचार, रिवाज, प्रथा और परंपराएँ भी शामिल हैं। यह सब मिलकर हमारे 'सहज बोध' को गढ़ती हैं और सहज बोध जब संस्कार बन जाएँ तो परिवेश मात्र में निहित अमानवीयता और हिंसा को हम देख नहीं पाते हैं। गौर करें तो पाएँगे कि इनके योग से प्राप्त 'सहज बोध' ने समाज की खाई को गहरा किया है। आज भी भारत में परंपरा, प्रथा, रिवाजों से मिलकर बने 'कस्टम' संविधान से ज्यादा बलशाली हैं। आज भी भारत में 'कस्टमरी लॉ' ही सबसे ताकतवर है। अन्य दलित आत्मकथाओं की भाँति मुर्दहिया भी इन तथाकथित धरम, मरजाद और रूढ़ियों की आलोचना करती है बल्कि एक कदम आगे बढ़कर श्यौराज सिंह बेचैन और सूरजपाल चौहान की भाँति ही तुलसी राम भी अपनी जाति के अंतर्विरोधों की आलोचना करने से नहीं हिचकते हैं।

तीसरा, सामाजिक संस्थाओं से इतर दलितों के उत्पीड़न के मूल में शैक्षणिक संस्थाओं की भी अहम भूमिका रही है। स्कूल-कॉलेज में जातिगत आधार पर भेदभाव के विवरणों से दलित आत्मकथाएँ भरी पड़ी हैं, मुर्दहिया भी अपवाद नहीं है। अपवाद यह इस मामले में है कि जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों में मददगार की भूमिका में उपस्थित सवर्णों की सहायता का यथाप्रसंग उल्लेख करना तुलसी राम नहीं भूले हैं। संकठा सिंह, बलराम सिंह, परशुराम सिंह, चिंतामणि सिंह आदि ने कदम-कदम पर उनके जीवन की कठिनताओं को कम करने का काम किया। सबसे बढ़कर सुग्रीव सिंह, जो हिंदी पढ़ाते थे और तुलसी राम को खूब प्रोत्साहित करते थे। जो लड़के तुलसी राम से चिढ़ते, उनके बारे में वे कहते : 'इन लंठवन से मत डरिहा, इनकर ठकुराई ना चली।' उनके बिना तुलसी राम की जिंदगी किस करवट बैठती, इसे तुलसी राम ही बेहतर बता सकते हैं। 1964 के जमाने में जब मैट्रिक परीक्षा का शुल्क घर वालों ने देने से मना कर दिया था, तब तुलसी राम के बिना किसी आग्रह के सुग्रीव सिंह ने 30 रुपये फीस के रुप में जमा कर दिए थे और बाद में फिर घर से आगे की पढ़ाई के लिए कोई आर्थिक सहायता न मिलने पर 30 रुपये की मदद की थी। लेकिन ऐसा भी नहीं कि सारे शरीफ ठाकुर ही तुलसी राम की किस्मत में बदे थे। आजमगढ़ के कॉलेज में तुलसी राम जब फाकाकशी के दिन गुजार रहे थे। उन दिनों उनके मित्र हुआ करते थे देवराज सिंह। एक दिन जब यों ही रोज की भाँति गप्प लड़ाते चले जा रहे थे तो देवराज सिंह अचानक बोल पड़े : 'आप दोस्ती के लिए क्या-क्या कर सकते हैं? इस तरह के प्रन पर उन्हें अचंभा तो अवश्य हुआ किंतु कह दिया कि दोस्ती के लिए मैं जान भी दे सकता हूँ। इतना सुनते ही देवराज सिंह अचानक एक रामपुरी छुरी तुलसी राम के सीने पर लगाकर कहने लगे : आपके पॉकेट में कल के स्कॉलरशिप के मिले 162 रुपये मौजूद हैं, उसमें से 81 रुपये मुझे दे दीजिए और बाकी से अपना खर्च चलाइए अन्यथा दोस्ती के लिए अपना वचन पूरा करने के लिए तैयार हो जाइए।' (पृ. 178)। आलोचनात्मक दृष्टि से जीवनानुभवों और घटनाओं को 'शांतशिल्प' में व्यक्त करने का यह जो 'सर्जनात्मक संतुलन' है, वह संभवतः बौद्ध जीवन-दर्शन को विचार तक ही सीमित न रख कर आचरण में उतारने का परिणाम है।

चौथा, दलित आत्मकथाएँ उनके समाज और जीवन का प्रतिबिंब है। इसलिए दलित समाज की भाँति ही इन आत्मकथाओं में अशिक्षा, बेकारी और गरीबी की आभा पसरी हुई है। बहुत पहले 1883 में ज्योतिबा फुले ने अपने बहुचर्चित ग्रंथ 'शेतकर्याचा आसूड' में लिखा था कि 'विद्या बिना मति गई, मति बिना नीति गई, नीति बिना गति गई, गति बिना वित्त गया, वित्त बिना शूद्र गए, इतने अनर्थ एक अविद्या ने किए।' इस तरह अशिक्षा, बेकारी और गरीबी के परस्परावलंबन की व्याख्या की जरूरत नहीं रह जाती है। लगभग दलित आत्मकथाओं में अनुभवों के द्वारा इनके परस्परावलंबन को पुष्ट किया गया है। मुर्दहिया की पहली पंक्ति ही है 'मूर्खता मेरी जन्मजात विरासत थी।' मूर्खता को यदि अशिक्षा के अर्थ में ग्रहण करें तो तुलसी राम, पहली पंक्ति द्वारा ही दलित चिंतन की आधारभूमि विकसित करनेवालों के प्रति अपनी विचारधारात्मक प्रतिबद्धता प्रकट करते नजर आते हैं।

पाँचवाँ, 'लोक' की बहुरंगी छठा को सहेजने का जितना और जैसा उपक्रम दलित साहित्य विशेषकर दलित आत्मकथाओं में देखने को मिलता है, हाल के दिनों में विश्वनाथ त्रिपाठी के 'नंगातलाई के गाँव' को छोड़ दें तो मुख्यधारा के साहित्य में ऐसे क्षण दुर्लभ हैं। लेकिन इस लोकवादिता के मामले में मुर्दहिया पिछली दलित आत्मकथाओं से कोसों आगे है। तुलसी राम ने अपने गाँव और जनपद की भाषा-संस्कृति को जिस गरिमापूर्ण ढंग से रखा है, उसकी सानी नहीं है। भोजपुरी भाषा के शब्द, वाक्य, लोकगीत का सौंदर्य पूरी आत्मकथा में हरसिंगार के फूलों की तरह बिखरे पड़े हैं। 184 पृष्ठ के उपन्यास में किसानी और लोक जीवन से लुप्तप्राय हो चुके लगभग दो-ढाई सौ चमकते शब्द, लोकगीतों के सौंदर्य का समाजशास्त्रीय दृष्टि से मूल्यांकन और 'भाखा' के बहते रूप का जादू आद्यंत बिखरा पड़ा है। इस संदर्भ में दो उदाहरण रख रहा हूँ। 'पानी निकालती दलित मजदूरिनों का एक लोकगीत 'ऊँचे ऊँचे कुअना क नीची बा जगतिया रामा/ निहुर के पनिया भरै, हइ रे साँवर गोरिया/ पनिया भरत कै हिन कर झुमका हेरैले रामा/ रोवत घरवा आवै ले रे साँवर गोरिया/ पनिया भरत कै हिन कर टीकवा हेरैले रामा रोवत घरवा आवै ले रे साँवर गोरिया।' इस तर्ज पर औरत के सारे आभूषणों के कुएँ में गुम हो जाने का वर्णन हो जाता था। इस प्रकार श्रम के अनेक सौंदर्य गीत भुखमरी के शििकार दलितों के जीवन के अभिन्न अंग थे, जो किसी कालिदास या जयदेव के बस की बात नहीं थी।' (पृ. 67) किसनु भौजी की लिखाई गई चिट्ठी के बारे में तुलसी राम का मानना था कि उसके अंदर दुखड़ा सुनाने की अद्भुत वर्णनात्मक शैली का समावेश था। जब वह चिट्ठी लिखवाती थी तो लगता था कि दुखड़ा स्वयं अपना आत्मविवेचन कर रहा है। यदि वह पढ़ती तो दुखांत साहित्य में बहुत कुछ गढ़ती। अकाल में लिखवाई गयी एक चिट्ठी की बानगी देखिए। 'हे खेदन के बाबू! हम कवन कवन बतिया लिखाई? बबुनी बहुत बिलखइले। ऊ रोई-रोई के मरि जाले। हमरे छतिया में दूध ना होला। दूहै जाईला त बकनेवाँ लात मारै ले। बन्सुवा मजूरी में खाली सड़ल-सड़ल सावाँ दे ला। उप्पर से वोकर आँखि बड़ी शैतान हौ। सँझिया क रहरिया में गवुँवा क मेहरिया सब मैदान जा लीं त ऊ चोरबत्ती बारै ला। रकतपेवना हमहूँ के गिद्ध नाई तरेरैला। चोटवा से पेटवा हरदम खराब रहै ला। हम का खियाईं, का खाईं कुछ समझ में ना आवैला। बबुनी के दुधवा कहँवा से लिआईं? जब ऊ रोवैले, त कब्बो-कब्बो हम वोके लेइ के बहरवाँ जाइके बोली ला कि देखतोर बाबू आवत हउवैं, त ऊ थोरी देर चुप हो जाले। तूँ कइसे हउवा? सुनी ला कि कोइलरी आगि लगि जालें। ई काम छोड़ि दा। गवुँवैं मैं मजूरी कइ लेहल जाई। सतुवै से जिनगी चलि जाई। येहर बड़ी मुसकिल में बीतत हौ। अकेलवैं जियरा ना लागैला, उपरा से खइले क बड़ा टोटा हौ। हो सके त बीस रुपया भेजि दा। जब अइहा त तुलसी बाबू के एक जिस्ता कागद जरूर लेहले अइहा, इ है सब कर चिठिया लिखै ल। ई बड़ा तेज हउवैं। अउर का लिखाई हम? थोर लिखना, ढेर समझना।' (पृ. 90) ऐसे उदाहरणों से मुर्दहिया भरा पड़ा है। लेकिन इस लोकधर्मिता के बावजूद पूरी आत्मकथा में केवल तीन लोकोक्तियों का उपयोग थोड़ा अखरता है। दलित आत्मकथाओं में भूख की जो भंगिमाएँ हैं उसके चित्रण में शरणकुमार लिंबाले की अक्करमाशी की ऊँचाई तक संभवतः दूसरी आत्मकथा नहीं पहुँची है। मुर्दहिया भी उसे छू नहीं सकी है। भूख दलित आत्मकथाओं की प्रधान प्रवृत्तियों में से एक रहती आई है। दलितों के लिए भूख, पेट का नहीं अस्तित्व का मामला है। भूख से लड़ने के उनके तौर तरीके मनुष्यों की आदिम विरासत से चली आती अदम्य और उद्दाम जिजीविशा के अवशेष हैं। भूख उस भयावह रुप में मुर्दहिया में उपस्थित नहीं है।

भारतीय सामाजिक इतिहास के विकास के निचले पायदान पर दलितों के साथ स्त्रियाँ भी बराबर की साझेदार रहीं हैं। लेकिन दलित आत्मकथाओं में दलित स्त्रियों की संघर्षशीलता की वैसी बानगी नहीं दिखती, जैसी पुरुष पात्रों की देखने को मिलती है। दलित पुरुषों की तुलना में दलित स्त्रियों की आत्मकथा का कम प्रकाशन इस तथ्य की ओर भी संकेत करता है कि दलित सशक्तिकरण का लाभ भी लैंगिकता का शििकार हो रहा है और अगर इसे दूसरे तथ्य के आलोक में देखें तो संभवतः ज्यादातर दलित आत्मकथाएँ, जो प्रकाश में आई हैं, वह 1950-70 के बीच की पीढ़ी की है और संभव है कि उस समय दलित स्त्रियों में सामाजिक चेतना का वैसा विकास नहीं हुआ हो। इससे एक दूसरी महत्वपूर्ण बात निकलती है कि उस समय के चित्रित समाज के आधार पर आज के समाज का मूल्यांकन सही नहीं है। इसके लिए 1980 के आस-पास जन्मी पीढ़ी की दलित आत्मकथाओं के सामने आने की प्रतीक्षा करनी होगी तब शायद हमारे समय की एक ज्यादा बेहतर तस्वीर उभर कर सामने आ सकेगी।

अब कुछ बात स्वतंत्र रूप से मुर्दहिया के बारे में। मुर्दहिया तुलसीराम की, उनके जनपद की, उनके समुदाय की; जीवनानुभवों के साथ विकसित होती चेतना और शिक्षा के साथ जगनेवाले स्वाभिमान की कथा है। मुर्दहिया अविश्वसनीय पात्रों का पिटारा है। कम से कम सात अद्भुत पात्र इस आत्मकथा में हैं। एक हिंगुआरा अपने हींग बेचने की अनोखी अदा के कारण, जोगी बाबा कभी गद्य में बात न करने की अपनी विचित्र शैली के कारण, बंकिया डोम जैसा तूरमची रणघोष के स्थायी भाव के कारण (बंकिया के सिंघा की युद्धोन्मादी ध्वनि अक्सर सोए हुओं को जगा देती थी। लोग अविलंब समझ जाते कि बंकिया डोम को या तो किसी ने भूखा रखा है या किसी ने खूब खिलाया है।), टुंटवा अपनी नाच और राजनीतिक व्यंग्योक्तियों के कारण, मुसड़िया दादी अनसुलझी गुत्थियों की इनसाइक्लोपीडिया होने के कारण, नटिनिया अपनी अदाओं के कारण और स्वयं कथावाचक तुलसी राम।

बाल मनोविज्ञान की दृष्टि से भी यह रचना बेहद उर्वर है। तुलसी राम तीन साल की अवस्था में चेचक के शिकार हो गए थे जिसके परिणामस्वरूप उनको न सिर्फ दाईं आँख गँवानी पड़ी बल्कि 'आखानुमा' चेहरे (गाँव के लोहार अनाज से मिट्टी या कंकड़ निकालने के लिए लोहे की पतली चद्दर काटकर उसे बड़ी चलनी का रुप देते थे और उसकी पेंदी में पतली छेनी से सैंकड़ों छेद कर देते थे, जिसे आखा कहते थे। तुलसी राम का चेहरा इसी आखा के बाहरी हिस्से जैसा हो गया था।) के कारण बाकी जीवन के लिए अपने परिवार में ही अपशकुन के पर्याय मान लिए गए। इस अपशकुन की टीस, किसी टावर की बत्ती की तरह, पूरी आत्मकथा में जलती-बुझती रहती है। बाहर में चमरा, चमरवा जैसी संज्ञाओं और घर में कनवा जैसे विशेषण ने तुलसी राम के जीवन में संज्ञाशून्यता की स्थिति ला दी थी। लेकिन बचपन के इन 'असहाय यादों' के बीच घुंटू-मुंटू, अक्का-बक्का, चिल्हिया चिल्होर, लखनी अथवा ओल्हापाती खेलने के स्वर दुख के स्थायी भाव के बीच हर्ष और सुख के संचारी भावों की तरह अपनी आवाजाही लगाए रखते हैं। बालमन की आरंभिक स्मृतियों में समझदारी के क्षणों में मिली प्रशंसाएँ पुरस्कार में मिले तमगों की तरह झिलमिलाती हैं। इन सबके अलावा पूरी आत्मकथा में पचासों ऐसे प्रसंग है जो बेसाख्ता आपको हँसा जाएँगे या उतनी ही खामोशी से आपकी पलकों को सींच जाएँगे और वह भी, अन्य दलित आत्मकथाओं से अलग साहित्यिकता या सौंदर्यशास्त्रीय तत्वों में बिना किसी अतिरिक्त छूट की माँग के। मतलब यह कि दलित साहित्य के संदर्भ में एक बात लगातार कही जाती रही है कि सौंदर्यबोध के प्रचलित प्रतिमानों के आधार पर दलित साहित्य के साथ न्याय नहीं किया जा सकता है। इस संदर्भ में हमेशा साहित्यिक मूल्यांकन की जगह समाजशास्त्रीय मूल्यांकन की बात की जाती रही है। कारण, प्रचलित सौंदर्यशास्त्रीय तुला पर मुख्य धारा का साहित्य दलित साहित्य को कमतर मानता आया है, जिसकी क्षतिपूर्ति उसके समाजशास्त्रीय मूल्य के जरिए होती आई है। मुर्दहिया ऐसे किसी 'कनोसन' की माँग नहीं करता। इस लिहाज से दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्रीय मूल्यों के तौर पर प्रस्तावित किए जाने वाले अदम्य जिजीविशा और संघर्शशीलता के तत्वों की कोई कमी मुर्दहिया में नहीं है। रही बात साहित्यिकता की तो मुर्दहिया इस मामले में बहुत समृद्ध है। इससे गुजरकर इसे महसूस किया जा सकता है। मुर्दहिया की साहित्यिकता से जुड़े कुछ ज्यादा गंभीर विोशताओं की बात करें तो, फौरी तौर पर मुर्दहिया को पढ़ते हुए, हिंदी के दो महान कथाकार प्रेमचंद और फणीश्वरनाथ रेणु की याद लगातार बनी रहती है। मुर्दहिया वस्तुतः रेणु के गाँव में प्रेमचंद की रिहाइश है। भारतीय परिवार किस तरह सामंती चेतना के अवशेष के तौर पर मौजूद हैं, उसको पढ़ते हुए मुक्तिबोध याद आते हैं। तुलसी राम जब गाँव छोड़कर भाग रहे हैं उस क्षण में नटिनिया जब 'वल्चर्स आर सिटिंग ऑन पीपल ट्री' की जगह 'गिधवा पीपल पर बइठन हउवें' कहती है। उस अकेले क्षण में नटिनिया बाणभट्ट की निउनिया में बदल जाती है। वह अद्भुत दृश्य है। ऐसे दृश्यों की लड़ियाँ पिरो दी है तुलसी राम ने। मुर्दहिया एक 'ओपन टेक्स्ट' जैसी लगती है, जिसे कहीं से भी पढ़ा जा सकता है।

साहित्यिकता के मसले पर इन आधुनिक रचनाकारों की तुलना में तुलसी राम की संवेदना हिंदी साहित्य के भक्त कवियों के ज्यादा निकट है। भक्तिकाल के संदर्भ में मार्क्सवादी आलोचक मैनेजर पांडेय ने इस ऐतिहासिक तथ्य को रेखांकित किया था कि भक्ति काल से पहले हिंदी साहित्य में इतनी संख्या में दलित और स्त्रियों की भागीदारी नहीं देखने को मिली थी। वापस आज जब दलित और स्त्रियों की साहित्य में भागीदारी बढ़ी है तो उनके लेखन में भक्तिकाव्य की संवेदना को उनके विरासत के तौर पर देखे जाने की जरूरत है। यों तो हर दलित आत्मकथा कबीर के मानवाधिकारों के संदर्भ में उठाए गए सवालों को आगे बढ़ाने का काम करती है लेकिन मुर्दहिया में कबीर के साथ सूर, तुलसी, मीरा और जायसी की प्रगतिकामी और लोकधर्मी चेतना भी दिखती है। मुर्दहिया, समाज का वैसा ही रूपक जान पड़ती है जैसा सूर का वृंदावन, तुलसी का रामराज, जायसी का सिंहल द्वीप या कबीर का समानतामूलक समाज। मीरा ने जैसे अपने परिवार के खिलाफ सत्याग्रह किया था, तुलसी राम को भी करना पड़ा। लोकगीत-संगीत की सूरदास सरीखी परख। जायसी अपने कानेपन के कारण कभी-कभी या अक्सर लोगों के परिहास के शिकार भी होते थे। इस कारण से वे अपनी रचनाओं में अपने कानेपन से भरे हुए हैं। अभीष्ठ, ऊपरी तौर पर जायसी और तुलसी राम की साम्यता निरूपित करना नहीं है बल्कि उसकी भीतरी साम्यता को रेखांकित करना है। जायसी ने अपनी रंग-रूप का लगातार परिहास किए जाने के बरक्स अपनी रचनाशीलता को सामने रखते हुए लिखा था -

मुहमद कवि प्रेम का जा तन रकत ना माँसु।
     जेई मुख देखा तेई हँसा सुना तो आए आँसु।।

मुर्दहिया को भी पढ़कर आपको आँसू आएँगे। और जायसी की कही हुई एक बात जो जितनी जायसी की रचना के बारे में सच साबित हुई, वह मुर्दहिया के बारे में भी कही जा सकती है कि 'फूल मरे पर मरै न बासु।' मुर्दहिया दीर्घजीवी रचना है, इसे जरूर पढ़ें।


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