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आलोचना

हिंदी की इक्कीसवीं सदी की साहित्यिक सक्रियता : कुछ परिवर्तन, कुछ प्रस्थान
माधव हाड़ा


साहित्य के बनने और बदलने की पहचान और समझ का काम अब पहले की तुलना में बहुत मुश्किल हो गया है। यह माना जाता था कि साहित्य में बदलाव की प्रक्रिया बहुत धीमी होती है और इसमें किसी परिवर्तन को सतह पर आने में समय लगता है, लेकिन अब हालात बदल गए हैं। तकनीकी विकास और संचार क्रांति के कारण परिवर्तन की गति अब पहले से बहुत तेज हो गई है इसलिए साहित्य में बदलाव बहुत जल्दी-जल्दी हो रहे हैं। पहले साहित्य में परिवर्तन धीरे-धीरे होते थे, इनमें विविधता भी कम होती थी इसलिए इनकी समरूपताओं को आधार बनाकर सामान्यीकरण करना आसान था। अक्सर यही सामान्यीकरण शास्त्र का प्रस्थान और बुनियाद बनते थे और इनकी लकीर सदियों तक पीटी जाती थी। अब साहित्य में होने वाले परिवर्तन इतने तीव्र गति, विविध और व्यक्तिवाची हैं कि इनका प्रवृत्यात्मक वर्गीकरण और पहचान संभव नहीं रही। हिंदी की इक्कीसवीं सदी की आरंभिक साहित्यिक सक्रियता इसी तरह की है। गत सदी के उत्तरार्द्ध की आर्थिक उदारीकरण, ग्लोबलाइजेशन, संचार क्रांति, मीडिया विस्फोट आदि परिघटनाओं ने इसको दूर तक प्रभावित किया है। यह गत सदी के पूर्वार्द्ध की साहित्यिक सक्रियता से एकदम अलग और खास है। एक तो इसकी नागरिकता का दायरा पहले से बहुत बड़ा हो गया है और दूसरे, हाशिए और दूरदराज के गाँव-कस्बों के नए रचनाकारों के प्रवेश के कारण इसमें सरोकार, भाषा और शैली में पर्याप्त विविधता आई है। इसमें फिलहाल कई रंग और कई संज्ञाएँ एक साथ सक्रिय हैं, जिनकी न तो एकरूप पहचान बन सकती है और न जिनको एक साथ, एक जगह समेटना संभव है। यहाँ इस टिप्पणी में इन परिवर्तनों का केवल जायजा लेने की कोशिश की गई है।

हिंदी की इक्कीसवीं सदी के इस आरंभिक समय को निस्संकोच गद्य का समय कहा जा सकता है। गद्य इसमें अब खुल और खिल रहा है। इसका रचनात्मक उपयोग जैसा अब हो रहा है वैसा पहले कभी नहीं हुआ। हिंदी में गद्य का यह विस्फोट अकारण नहीं है। दरअसल स्वतंत्रता के अनुभव और तर्क को गद्य में सुविधा होती है और स्वतंत्रता का हमारा अनुभव अब सही मायने में अब प्रौढ़ और व्यापक हुआ है। गत सदी के उतरार्द्ध में हमारे यहाँ लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का विस्तार हुआ और इनमें जनसाधारण की भागीदारी बढ़ी, जिससे धीरे-धीरे स्वतंत्रता का हमारा अनुभव भी व्यापक हुआ और यह कुछ हद तक अब हमारी आदत में भी आ गई है। स्वतंत्रता के हमारे इस नए अनुभव को गद्य अपने अनुकूल और सहज लग रहा है। गद्य इस कारण अब कुलाँचे भर रहा है और खुलकर खेल रहा है। हिंदी गद्य में भी अब कथेतर गद्य का बोलबाला है। दरअसल इधर हिंदी समाज के नजरिए में कुछ आधारभूत तब्दीलियाँ हुई हैं। उसके जीवन में युक्ति और तर्क की जगह निरंतर बढ रही है और कल्पना और लोकोत्तर पर उसकी निर्भरता अब पहले जैसी एकतरफा नहीं है। यही कारण है कि हिंदी में कल्पना की बुनियाद पर खड़ी कथा रचनाओं की जगह संस्मरण, जीवनी, आत्मकथा, यात्रावृत्तांत आदि कथेतर रचनाओं का आग्रह और स्वीकार्यता निरंतर बढ़ रही है। कभी हिंदी में इन कथेतर अनुशासनों में गिनती के लोग और गिनती की किताबें थीं, साहित्य का इतिहास लिखने वाले इनका नाम गिनाने में बगलें झाँकते थे, लेकिन अब हालात बदल गए हैं। हिंदी के स्थापित कवि-कथाकार और आलोचक अब कथेतर गद्य में हाथ आजमा रहे हैं। काशीनाथ सिंह, रवींद्र कालिया, विश्वनाथ त्रिपाठी, राजेंद्र यादव, अखिलेश आदि कई लोगों की कथेतर रचनाओं ने उनकी कथा-कविता की तुलना में पाठकों का ज्यादा ध्यान खींचा है। कभी हिंदी में यात्रावृत्तांतों का अकाल था, लेकिन गत केवल दो-तीन वर्षों के दौरान जिन रचनाओं को हिंदी में शीर्षस्थानीय माना गया, उनमें तीन यात्रा वृत्तांत - अनिल यादव का 'वह भी कोई देश है महाराज', पुरुषोत्तम अग्रवाल का 'हिंदी सराय : अस्त्राखान वाया येरेवान' और ओम थानवी का 'मुअनजोदड़ो' भी शामिल हैं। विश्वनाथ त्रिपाठी की 'व्योमकेश दरवेश' और 'नंगातलाई का गाँव' और रवींद्र कालिया की 'गालिब छुटी शराब' जैसी कथेतर संस्मरणात्मक गद्यर चनाओं की भी हिंदी में खूब सराहना और चर्चा हुई है।

हिंदी में गद्य का प्रसार और स्वीकार्यता ही नहीं बढ़ी है, उनमें नवाचार के कारण वैविध्य भी बढ़ा है। हिंदी के गद्य रूपों की सरहदें फिलहाल बेचैन और अशांत हैं और ये अपने देहरी-चौखटे लाँघकर इधर-उधर ताक झाँक ही नहीं कर रही, अब एक-दूसरे में घुसपैठ पर आमादा हैं। संस्मरण अपनी चार दीवारी लाँघकर कहानी के दायरे में जा घुसे हैं और कहानी अपनी देहरी से बाहर आकर संस्मरण लग रही हैं। आत्मकथा अब संस्मरण की तरह लिखी जा रही है और जीवनी में उपन्यास का छौंक लगा हुआ है। इधर ऐसी कई रचनाएँ आई हैं, जिनकी पहचान और परख पारंपरिक और रूढ़ विधायी चौखटों में संभव नहीं है। काशीनाथ सिंह की रचना काशी का अस्सी संस्मरण, कहानी और उपन्यास से अलग, इनका मिला-जुला रूप है। कुछ लोगों ने इसको 'गल्पेतर गल्प' का नाम दिया है। राजेश जोशी ने खुद अपनी रचना 'किस्सा कोताह' को मुक्त आख्यान की संज्ञा दी है। विधायी चौखटों में रचनाओं को देखने-परखने की आदत वाले लोग परेशान हैं कि इन्हें क्या नाम दिया जाए। कथाकार स्वयंप्रकाश के शब्दों में 'यह वैसा ही जैसे भद्रलोक की सभा में कोई अजनबी घुस आया हो, जो सबको अच्छा तो बहुत लग रहा हो, लेकिन जिसे लेकर यह निर्णय नहीं लिया जा पा रहा हो कि इसे बैठाया कहाँ जाए।' अभी से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, लेकिन यह संकेत तो इस उठापटक और लेन-देन में है कि कदाचित हम यूरोपीय गद्य रूपों की जगह अपनी जरूरतों के हिसाब से अब अपने नए गद्य रूप गढ़ रहे हैं।

हिंदी में कथेतर गद्य के आग्रह और स्वीकार्यता के साथ कहानी उपन्यास के इलाके में भी पहले की तुलना में अधिक सक्रियता और उत्साह है। हाथ उठाकर अपनी मौजूदगी की ओर ध्यान खींचने का जो उत्साह गत सदी के आठवें-नवें दशक में कवियों में था वैसा ही कुछ इस सदी के आरंभ में कथाकारों की नई पीढ़ी में देखा जा रहा है। नए हुनर और अलग भाषा के साथ कथाकारों की एक नई पीढ़ी सामने आ गई है। इस पीढ़ी के लोगों के संबंध में खास बात यह है कि यह किसी के पीछे और किसी के साथ नहीं है - इन सबके अलग सरोकार और अलग भाषा है। मनीषा कुलश्रेष्ठ का 'शिगाफ', रणेंद्र का 'ग्लोबल गाँव के देवता', भगवानदास मोरवाल का 'बाबल तेरा देश में', नीलेश रघुवंशी का एक कस्बे के नोट्स, प्रदीप सौरभ का 'मुन्नी मोबाइल' आदि इस नई पीढ़ी की कुछ अच्छी औपन्यासिक रचनाएँ हैं। इस पीढ़ी ने कुछ अच्छी कहानियाँ भी दी हैं, जिनमें मनोज रूपड़ा के 'टॉवर ऑफ साइलेंस' चंदन पांडेय के भूलना, नीलाक्षी सिंह के 'परिंदे का इंतजार सा', कैलास बनवासी के 'बाजार में रामधन', अल्पना मिश्र के 'कब्र भी, कैद औ जंजीरें भी' आदि संकलनों का उल्लेख किया जा सकता है। कथा-कहानी के हिंदी के इस इलाके के संबंध में खास बात यह है कि इसमें गत सदी के उत्तरार्द्ध में पहचान बनाने वाले कथाकारों की रचनात्मक ऊर्जा भी बरकरार है और वे अच्छी रचनाएँ दे रहे हैं। दूधनाथ सिंह की 'आखिरी कलाम', स्वयं प्रकाश की 'ईंधन', उदय प्रकाश की 'मोहनदास', मैत्रेयी पुष्पा की 'अल्मा कबूतरी', काशीनाथ सिंह की 'महुआ चरित' और संजीव की 'रह गई दिशाएँ इसी पार' जैसी महत्वपूर्ण कथा रचनाएँ इसी दौर में लिखी गई हैं। इक्कीसवीं सदी के इस आरंभिक कथा साहित्य के सरोकारों का दायरा पहले से बड़ा हुआ है। गत सदी के कहानी-उपन्यासों पर यह तो तोहमत आम थी कि उनकी दौड़ मध्यवर्ग तक सीमित है, लेकिन अब ऐसा नहीं है। कथाकार अब जीवन के सभी रंग-रूपों के साथ हैं और उनकी रचनाओं में कोनों-अँतरों का जीवन और हाशिए के लोग भी जगह पा रहे हैं। हिंदी में एक दौर ऐसा था जिसमें राजनीतिक आग्रह और विचार की जुगाली को रचना का सर्वोपरि कसौटी की हैसियत मिल गई थी, लेकिन अब कुछ हद तक ऐसा नहीं है। एक नए कथाकार के शब्दों में 'इन पर कोई नकेल नहीं है, इनकी पीठ पर कुछ लदा हुआ नहीं है, न कोई नारा, न कोई बैनर, न कोई वाद, न कोई आंदोलन, न कोई अवधारणा।' आग्रह और विचार जहाँ है, वहाँ यह जीवन में रच-बस कर कहानी उपन्यास में आ रहा है। नए कथा साहित्य में एक सकारात्मक बदलाव और हुआ है। इनमें आर्ट या हुनर पहले की तुलना में ज्यादा है। कभी टॉमस मान ने कहा था कि कहानी आर्ट है और अभी कुछ समय पहले कमोबेश यही बात नामवर सिंह ने भी दोहराई कि कहानी केवल अनुभव नहीं, हुनर है। नए कथाकारों में यह सजगता निरंतर है। एक ओर महत्वपूर्ण ध्यानाकर्षक परिवर्तन यह हुआ है कि इधर के रचनाकार अब कहानी के पारंपरिक यथार्थवादी ढाँचे से बाहर आ रहे हैं। नए और पुराने दोनों प्रकार के रचनाकारों ने अयथार्थवादी भारतीय पारंपरिक कथाशिल्प के कई रूपों का अपनी रचनाओं में इस्तेमाल किया है। स्वयं प्रकाश के एक नए संकलन मेरी प्रिय कथाएँ मे कहानियाँ की जगह कथाएँ शब्द का प्रयोग इसी परिवर्तन की ओर संकेत है।

हिंदी की आलोचना अपने रूढ़िग्रस्त होने के लिए बदनाम रही है। उसका आरंभिक अधिकांश अकादमिक था। गत सदी के आठवें-नवें दशक में हिंदी आलोचना को लेकर रचनाकारों में असंतोष भी बहुत था, इसलिए लगभग मुहिम चलाकर उन्होंने खुद आलोचना लिखी और उसे कुछ हद तक अलग पहचान भी मिली। इधर हिंदी की अकादमिक आलोचना के बरक्स अलग और नई आलोचना के विकास के संकेत दिखाई पड़ रहे हैं। अपूर्वानंद की 'सुंदर का स्वप्न' और पंकज चर्तुवेदी की 'निराशा में भी सामर्थ्य' कुछ ऐसी ही अलग ढंग की आलोचनात्मक पुस्तकें हैं। अपनी परंपरा और विरासत को नए ढंग से समझने का आग्रह भी हिंदी आलोचना में बढ़ा है। पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक 'अकथ कहानी प्रेम की' और वीरभारत तलवार की 'रस्साकशी' इस लिहाज से नए प्रस्थान कहे जा सकते हैं। इधर हिंदी में आलोचना कविता केंद्रित रही है लेकिन कथा के इलाके में आई सक्रियता और उत्साह के कारण युवा पीढ़ी में कथा आलोचना का रुझान भी बढ़ा है। पल्लव की 'कहानी का लोकतंत्र' और प्रियम अंकित 'की पूर्वाग्रहों के विरुद्ध' आलोचना की कथा केंद्रित किताबें हैं।

हिंदी में कविता की सक्रियता के संबंध में इस दौरान कई बातें कही गई हैं। यह कि उसकी लोकप्रियता कम हो गई है, यह कि लोगों का उसकी ताकत में विश्वास कम हुआ है और यह कि यह समय उसका नहीं है। बावजूद इसके यह सच्चाई है कि कविता निरंतर और खूब लिखी जा रही है। 'गद्य का विस्फोट' और 'गद्य का समय' जैसी धारणाओं के बावजूद इस सदी के आरंभिक वर्षों में प्रकाशित कविता संकलनों की संख्या गद्य रचनाओं की तुलना में ज्यादा ही है। हिंदी में अभी कविता का दृश्य भी भरा-पूरा है और इसमें एक साथ दो-तीन पीढ़ियाँ सक्रिय हैं। इस दृश्य पर केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण, अशोक वाजपेयी, नरेश सक्सेना, अरुण कमल, लीलाधर जगूड़ी, चंद्रकांत देवताले, मंगलेश डबराल, नंदकिशोर आचार्य, कुमार अंबुज आदि के साथ पवन करण, बोधिसत्व, देवीप्रसाद मिश्र, अनामिका, गीत चतुर्वेदी, पीयूष दईया आदि की नई पीढ़ी ने भी अपनी पहचान बना ली है। कविता का भूगोल भी पहले से बड़ा हुआ है। युवा कवियों से कई ऐसे हैं, जो बहुत दूर-दराज के हाशिए के क्षेत्रों से आए है। हिंदी में कविता अब कुछ हद 'गुपचुप' हो गई है। पहले की तरह उठापटक, हड़बड़ी, आंदोलन और घोषणाएँ अब इसमें नहीं है। अज्ञेय ने कभी कहा था कि कविता परती तोड़ती है लेकिन हिंदी की बहुत सारी कविता इस सजगता के बिना लिखी गई है। उनके संबंध में अक्सर यह कहा जाता था कि यह कुछ दूर चलकर रूढ़ि में तब्दील हो जाती है, लेकिन अब कवियों को अपने मुहावरे को बदलने और माँजते रहने की आदत हो गई है। यह सचमुच ध्यान देने की बात है कि हिंदी कविता में अब रूढ़ियाँ नहीं बन रही हैं। गत सदी के आठवें-नवें दशक में अपनी पहचान बनाने वाले कवि भी अब अपने हर नए संकलन में अपने को पीछे छोड़ कर नए लगते हैं और युवा कवि भी बने-बनाए रास्तों पर चलने के बजाय नए रास्ते ढूँढ़ रहे हैं। लीलाधर जगूड़ी के नए संकलन 'जितने लोग उतने प्रेम' और नंदकिशोर आचार्य के नए संकलन 'छीलते हुए अपने को' के ये नाम अकारण नहीं रखे गए हैं। यह हिंदी कविता के निरंतर परिवर्तनशील, बहुवचन और अनेकार्थी होते जाने की और संकेत है। अभी गत सदी में प्रतिरोध हिंदी कविता के अधिकांश का मुख्य स्वर था और यह अभी भी कई कवियों के यहाँ है। कुछ के यहाँ यह इस बीच सांप्रदायिकता के विरोध की रूढ़ि में भी तब्दील हुआ, लेकिन अब अधिकांश में यह उनके सरोकारों में उग-पक रहा है। अक्सर इस सदी की हिंदी कविता से यह शिकायत की जाती है कि इसमें नॉस्टेल्जिया बहुत है। यह कुछ हद तक सही भी है। यह रास्ता पलायन का जरूर है, लेकिन इसमें कविता संपन्न भी हुई है। नॉस्टेल्जिया के कारण हिंदी कविता में छूट और मिट गई चीजों और रंगों का भंडार तैयार हो गया है।

इक्कीसवीं सदी के हिंदी साहित्य में स्त्री और दलित अस्मिताओं का उभार भी एक बड़ी परिघटना है। इस परिघटना से साहित्य में अनुभव और भाषा की दुनिया बड़ी हुई है। आरंभ में इस उभार में हड़बड़ी और आग्रह बहुत ज्यादा था, जिसके चलते ऐसी रचनाओं की बाढ़ आ गई थीं, जिसमें पहचान का दावा केवल अनुभव के आधार पर किया गया था। यह खरपतवार एक-दो दशकों की उठापटक के बाद अब कम होने लगी है। स्त्री आग्रह के साथ रचनात्मक उर्जावाली कई अच्छी रचनाएँ इस दौरान सामने आई है, जिनमें अनामिका की 'दूब-धान' और कात्यायनी की 'सात भाइयों के बीच चंपा' का उल्लेख किया जा सकता है। इसी तरह दलित आग्रह वाली कुछ आत्मकथात्मक रचनाएँ, तुलसीराम की 'मुर्दहिया' और धर्मवीर की 'मैं मेरी पत्नी और भेड़िया' की भी इधर खूब चर्चा है।

इस तरह इक्कीसवीं सदी के इन वर्षों में हिंदी में साहित्यिक सक्रियता का विस्तार हुआ है और इसकी नागरिकता पहले की तुलना में बहुत ज्यादा है। यह सक्रियता इतनी व्यापक और बहुवचन है कि इसको संज्ञाओं और प्रवृतियों में समेटना संभव नहीं है। हाँ, कुछ परिवर्तन और प्रस्थान इसमें साफ-साफ दिखाई पड़ रहे है, जिनकी ओर केवल संकेत किया जा सकता है।


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