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कविता

हवा का झोंका
मोहन सगोरिया


हवा का एक झोंका आया
खुल गए कपास के कपाट
उड़-उड़ गए बगुले दसों-दिशाओं में

हवा का एक ही झोंका आया था
और नींद भटक गई अपना रास्ता।


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