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कविता

खुद पर रीझना हमारा शगल
मोहन सगोरिया


हम नींद से उठते हैं और अपना मुँह आईने में देखते हैं
दरअसल आईना एक ऐसा जरिया है जहाँ से
हम पर उनकी कड़ी नजर है
और हमारी एक-एक गतिविधि की उनको खबर है
जबकि हम उनको नहीं देख पा रहे
चौकसी पर वे हमारी हर हरकत को रेखांकित करते|
हमारे इरादों को बहुत पहले भाँप जाते हैं
लेकिन इस पार उनकी कोई खबर नहीं
सो कैसे कहें कि प्रतिरोध पर वे काँप जाते हैं

हम आईने के इस पार हैं और नींद से उठे हैं
जबकि हमारा मस्तिष्क अब भी सो रहा है
और मन अलसा रहा है रह-रह
हमें साफ-शफ्फाक लग रहा है आईना
जिसमें अपना प्रतिबिंब देख हम रीझ-रीझ जाते हैं
यूँ नींद में खुद पर रीझना हमारा शगल बनते जा रहा।


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