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कविता

सितार हुआ बेतार
मोहन सगोरिया


थप-थप... थप-थप
थपकी दे रही थी माँ
गाए जा रही थी लोरी
चंदा मामा दूर के, पुए पकाए बूर के

शिशु उतर रहा था नींद में
धक-धक... धक-धक
धड़कनों को सुनता
माँ के सीने से लगा

यही धक-धक सुनी थी उसने
पूरे नौ माह कोख में रह
कि यही धड़कन की सरगम
बह रही थी लहू में
अवचेतन में चेतन का संगीत
रच बस गया था सम ताल पर
पता भी नहीं था, न होगा
कि माँ ही है पहली संगीतकार

नींद में उतरता जा रहा था
दिल की धड़कनों के संग

ऐन इसी वक्त गुजरा तेज गति से कोई वाहन
उठ बैठा सहसा चौक कर शिशु
टूट गया जैसे झन्न-से तार
कि लो, सितार हुआ बेतार।
 


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