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कविता

जिनका दिमाग घुटने में नहीं होता
मोहन सगोरिया


वे जाग गए हैं और चल पड़े हैं
इसलिए दौड़ने और भागने में फर्क नहीं कर रहे

ऐसे विश्लेषण व्यर्थ के कार्य हैं उनके शब्दकोश मे
वे मंद-मंद मुस्काना और कहर ढाना जानते हैं
कभी छींकते-पादते नहीं वे मौसम के विपरीत
कि विज्ञापित होने के बावजूद ब्रांड-लेबल नहीं लगाते
वे जानते हैं कि कब सिर उठाया और कब घुटने टेके जाते हैं

जो जानते हैं सिर उठाने और घुटने टेकने का मतलब
उनका दिमाग घुटने में नहीं होता
जिनका दिमाग घुटने में नहीं होता वे दूसरों की नींद हराम करते हैं
ऐसे लोगों को पता नहीं लगता कि नींद कब उनकी दुश्मन हो गई।

 


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