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कविता

मैं
मोहन सगोरिया


मैं जल-तल पर सोया शब्द युगों से
मैं उठती हुई नाद आकांक्षा की
मैं घास पर ठहरी ओस की बूँद निःशब्द
मैं भोर की उजास, मुर्गे की कुकुड़-कूँ तिरती
मैं गाँव को शहर से जोड़ती सड़क एकाकी
मैं कच्चे घरों का खपरैल क्षीण होता तिल-तिल
मैं बावड़ियों का मीठा पानी शांत-निस्तब्ध
मैं कलेवा पोटली में बँधी बाजरे की रोटी
मैं नमक का स्वाद, धनिया-मिर्च की सुगंध
मैं दोपहर का खाली समय, अन्यमनस्क अंतराल
मैं चूल्हे में पड़ी ठंडी राख उड़ने को आतुर
मैं दिठौना, आँख का कजरा, जूड़े का गजरा
मैं अभी-अभी कांधे से उतारा गया हल
मैं गोधूलि का गुबार, संजा का दीप-प्रदीप्त
मैं तृप्तिदायक अन्न, प्रेम का अनहद-आनंद
मैं सो रहे विश्व में जागता-विचरता रत्नाकर
मैं अंधकार में चमकता जुगनू, आशाओं भरा कल
मैं अपनी टेक न छोड़ूँ, ध्रुवतारा अटल

रे ईश्वर, अगर तू कहीं है तो मैं तेरी सत्ता के बरक्स।

 


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