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कविता

एक ही
मोहन सगोरिया


एक ही नींद ने कितने स्वप्न बाँटे
कि नींद में भी दान नहीं किया हरिश्चंद्र ने राजपाठ

आखिर पहुँच ही गया श्रवण वृद्ध माँ-पिता तक जल लेकर
और दशरथ ने कभी नहीं दिया राम को वनवास

बुद्ध ने पाया ज्ञान नदी में फँसने के पूर्व
गांधी को नहीं फेंका गया रेल से

नहीं कुचला गया कोई बच्चा सड़क पर
शाम ढले सुरक्षित लौट आए पिता टहलकर

भरे-पूरे परिवार को देख लौट गए हमलावर
निर्धनों ने भी रात होते भर पेट खाना खाया

इस तरह एक ही नींद ने
कितने-कितने स्वप्न बाँटे असंख्य लोगों को।


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हिंदी समय में मोहन सगोरिया की रचनाएँ