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कविता

दीवार पारदर्शी
मोहन सगोरिया


 
ये कैसी निश्चेतना है मन-मस्तिष्क पर
क्यों सो रहा भीतर अधिक कोई मुझसा
और बाहर हमशक्ल फिरे जागता

यकीनन मुझे कोई बीमारी नहीं और तुममें कमी
फिर यह दीवार क्यों नहीं दीख रही
सारे डॉक्टर, वैद्य, हकीम, जर्राह, रोग-विशेषज्ञ आदि
हार मान रहे इससे
कि आखिर क्यों नजर नहीं आ रही यह

क्षीण होती जा रही श्रवण-शक्ति
हो रही फंगस कान में या चोट लगी पर्दे पर
कितनी शफ्फाक होती जा रही कि दूर से देखने पर
लगता ही नहीं दीवार है यहाँ कोई
पारदर्शी... रहस्य यह
एक निश्चित दूरी से ही
देखा जा सकता है, सही कोण से

बंधु, यह विस्मयकारी लगता है तथा हास्यास्पद
कि एक ओर से आया जा सकता है पार
और पार नहीं पा सकते जन-गण

ऐसी सुविधा या कहें अधिकार
शासन के लिए ही क्यों सहज
समाज के लिए लाँघना मुश्किल बहुत, सोचना तक प्रतिबंधित
अव्वल तो दीखती नहीं यह
और दीख भी गई तो कैसे साबित करेगा कोई
कि दीखना उसका महसूस करना है

इसी महसूसने में शामिल होना चाहता मैं
सोचना चाहता सारे विकल्पों पर
हजार-हा वर्षों से देख रहा मैं
यूँ ही खड़ी हुई उसे तटस्थ स्थितप्रज्ञ-सी

सिर पटक-पटक मर गए कितने ही मजलूम
बार-बार साफ किए गए खून के धब्बे
आश्चर्य कि हर बार चमकदार हुई दीवार
कितना आसान है इस ओर आना उनका
संवेदना, राहत, आश्वासन, प्रलोभन दे
लौट जाना शीशमहल में यकसाँ
इस ओर से जाना लगभग नामुमकिन
पीछा भी नहीं किया जा सकता
न थामा जा सकता पल्लू आगंतुक का

अब इस विवशता और निश्चेतना का क्या करूँ
जो रोके है दोराहे पर

चिकित्सक का बयान कौंधता है बारहा
कि गोलियों की आवाज
ज्यादा चिपचिपाहट पैदा करती है कान में
भय तिरता है ज्यों-ज्यों गहरा।


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