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कविता

बच्चा चाचा
शैलजा पाठक


बच्चा चाचा निर्गुण गाते थे
इतना कमाल कि लोग सुनते रह जाते
कई बार गाँव की चौपाल पर
लोग उनसे निहोरा करते
और वो वहीं चौकी पर बैठ
आँखें बंद किए गाते
खो जाते और गाना खतम होते
ही तेज कदमों से
अपने घर की तरफ
चले जाते

कई बार हमारे घर के
बैठक में चाचा लोग उन्हें
गाने के लिए घेर लेते
वो गाना शुरू करते
तो घर की औरतें दीवारों से सट
कर बैठ जाती
अक्सर आँसू पोछती

पर मेरी आँखों ने जो
देखा वो सिर्फ गाना नही था
जब भी बच्चा चाचा गाते
उनकी आँखों में एक सूना रास्ता
उभरता ...उनकी मुट्ठियों
में अतीत पिस रहा होता
गमछे से बार बार अपने
सूखे गालों को पोछते

गाना खत्म होते ही
कातर हो जाते
अपना दर्द छुपाते अपनी
मड़ई में जाकर पुराना
बैंजो निकाल कर एक तेज
धुन छेडते तो कभी
पुआल में आग लगा
उठने वाले गुबार को देखते
कड़वाहट घोंट जाते

कुदाल फावड़ा उठा
खेत के पथरीले हिस्से
पर कोड़ते एक खाली गड्ढा
रोपते एक मुरझाया पौधा

और खुले आसमान के नीचे
बिखेर देते एक निर्गुण

चार कहार मिलि डोलिया उठावें...


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