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कविता

तुम तुम्हारी
शैलजा पाठक


तुम बोल रहे हो
मैं चुप हूँ
तुम्हारी लानतें शिकायतें
तुम्हारे हक
तुम्हारे काम
तुम्हारे बच्चे
तुम्हारा घर तुम्हारा परिवार
तुम्हारे नियम कानून
गजब तो ये
तुम्हारी पत्नी
तुम्हारी ब्याहता
तुम्हारी जीवन संगिनी
तुम्हारी हाँ तुम्हारी
सब तुम्हारा
मेरी चुप में सदियों के सवाल की
गुमशुदा लाशें जंजीरों से जकड़ी मेरी आत्मा
तुम आवाज भर
मेरी चुप में युगों की
चीखें हैं...
 


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