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कविता

छोटी बहनें
शैलजा पाठक


छोटी बहनें घर के सारे भागने वाले काम करती हैं
जल्दी से खोल आती हैं दरवाजा
बुझा आती हैं चूल्हा
उठा लाती है छत से सूखे कपड़े
भाग के पानी लाती हैं गिलास भर
बहोत जल्दी जल्दी खा लेती है अपना खाना
कि देना है भाई को थाली लगाकर
जल्दी से खोज लाती है चप्पल अम्मा जब बाहर जा रही होती है
रात जल्दी से ऊँघती हुई सो जाती है कहीं भी
सुबह से फिर बन जाती हैं चकरघिन्नी

छोटी बहनें बड़ी बहन के बाद बड़ी होती हैं
सहमी सी सीखती हैं पाँच दिनों की बातें
दाग लगे कपड़ों को छुपाती हैं
देर रात तक बड़ी बहन बताती है
बेदाग जिंदगी बिताने के गुर
उसके लंबे बालों को प्यार से सहलाती हैं
अपनी पास चिपका कर सुलाती हैं
अब छोटी बहन कुछ बड़ी बन जाती है

छोटी बहनें सुन आती हैं घर के अंदर होने वाली बातें
अपनी बहन का दूल्हा कैसा दिखता है क्या करता है
धीरे से चुरा लाती हैं लड़के की फोटो रात जरा सी रोशनी में
दिखाती हैं अपनी बड़ी बहन को ...गुदगुदाती हैं
दोनों हँस हँस के दुहरी हो जाती हैं

छोटी बहनें कई बार बड़ी बातें छुपा ले जाती हैं
अपनी बड़ी बहन का पहला प्यार
अपने भाई का गणित में फेल होना
भीड़ में अनजाने हाथों मसली गई अपनी छाती
जीजा के भाई की सनसनाती बातें
अचानक से दुपट्टा पहनने की वजह
अपनी बहन की विदाई के बाद पैसों की किल्लत ...सब कुछ

छोटी बहनें बड़ी हो जाती हैं
वो जानती है पहले बच्चे का खराब हो जाना
दूसरे के पैदा होते ही छोटी बहनें बन जाती है
लगभग पूरी माँ ...जो जागती है रात भर
फूल सी बच्ची में देखती हैं अपने बहन की खुशी
सहलाती हैं अपनी बड़ी बहन का माथा पोंछती है पसीना
दूध से भरी छाती का दर्द जानने लगती हैं
अब छोटी बहनें कुछ और बड़ी हो जाती हैं

छोटी बहनों के औसत सपनों को भी पंख होता है कोई नहीं देखता
सपनों में आता है वो सुंदर राजकुमार कोई नहीं जानता
छोटी बहन डोर और पतंग से अलग एक पंछी सी जीना चाहती है अपनी जिंदगी
किसी को परवाह नहीं...

अब छोटी के छोटे सपने बड़ी बड़ी आवाजों के साथ टूटते हैं
पैसों का ठीकठाक जुगाड़ होने पर छोटी के भी हाथ पीले हो जाते हैं
बड़ी बहन भर हींक रोती है वो जानती है
...अब छोटी कही जाने वाली उसकी बहन कुछ ज्यादा बड़ी हो जाएगी

ससुराल से सावन में मायके आई दोनों बहनें एक साथ बड़ी बड़ी बातें करती हैं
बड़े बड़े दर्द सहती हैं पहली रात की बात पर मुस्कराती हैं ...सूनी छत को ताकती हैं
झूले की सबसे ऊँची पेंग पर आसमान छूती ये बहनें जमीन में गहरे धँस जाती हैं
ये पौधा पेड़ लतर हवा और खुशबू बन जाती हैं ...और समझ जाती हैं ये लड़कियाँ कभी नहीं थीं छोटी बड़ी
ये हमेशा से एक औरत थीं ये आवाजाही वाली पुल भर थीं रिश्तों के बीच पसरी और फिर
घर की लक्ष्मी... मंदिर के फ्रेम में मढ़ी हुईं...

और छोटी बहनों की छोटी से आँख में मर जाती है एक दुनिया...
ये छोटी छोटी गाँठों के दर्द से रिसती रहती है...
 


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