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कविता

इंतजार
शैलजा पाठक


और फिर वो शमशान में जिंदा रहा

इंतजार में की भीड़ कम हो
लकड़ी आ जाए
विदेश से आ जाए उड़न खटोले में
उसका लाड़ला

उसका फूल जैसा कोमल पोता
जो पिछली गर्मी बाबा कर के
बार बार लिपट जाया करता

वो जिंदा है मन के अंदर की आँखें
टकटकी बांधे देख रही है
रास्ता
रात धधक रही है
चंद रिश्ते इधर उधर इंतजाम
में लगे हैं
वक्त निर्दय है बीत रहा है
शरीर जल के राख हो रहा

वो जिंदा है अब भी
एक बार बेटे को देखना है
उसकी आँखों में विछोह को
देना है तसल्ली

पोता पेट पर बैठा है
ए घोडा ...टिकटिक

आत्मा परमात्मा
आकाश गंगा एक हो रहे हैं
राख ठंडी

वो जिंदा है ...बेटा ...दूरी ...अकेला
मौत ...बरगद काँप गया
पिता सौंप रहा था
खाली घर को अपना प्यार दुलार
गंगा ने समेट ली सारी बेचैनी

दूर आसमान चीरता हवाई जहाज
उससे भी दूर एक जोड़ी आँखें गहरी भीगी उदास...
 


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