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कविता

ग़ज़ल
दाग़ देहलवी


ग़ज़ल
अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता
कभी जान सदक़े होती कभी दिल निसार होता


न मज़ा है दुश्मनी में न है लुत्फ़ दोस्ती में
कोई ग़ैर ग़ैर होता कोई यार यार होता


ये मज़ा था दिल्लगी का कि बराबर आग लगती
न तुम्हें क़रार होता न हमें क़रार होता


तेरे वादे पर सितमगर अभी और सब्र करते
अगर अपनी जिन्दगी का हमें ऐतबार होता

ग़ज़ल
आरजू है वफ़ा करे कोई
जी न चाहे तो क्या करे कोई

गर मर्ज़ हो दवा करे कोई
मरने वाले का क्या करे कोई

कोसते हैं जले हुए क्या क्या
अपने हक़ में दुआ करे कोई

उन से सब अपनी अपनी कहते हैं
मेरा मतलब अदा करे कोई

तुम सरापा हो सूरत-ए-तस्वीर
तुम से फिर बात क्या करे कोई

जिस में लाखों बरस की हूरें हों
ऐसी जन्नत को क्या करे कोई

ग़ज़ल

इस अदा से वो वफ़ा करते हैं
कोई जाने कि वफ़ा करते हैं

हमको छोड़ोगे तो पछताओगे
हँसने वालों से हँसा करते हैं

ये बताता नहीं कोई मुझको
दिल जो आ जाए तो क्या करते हैं

हुस्न का हक़ नहीं रहता बाक़ी
हर अदा में वो अदा करते हैं

किस क़दर हैं तेरी आँखे बेबाक
इन से फ़ित्ने भी हया करते हैं

इस लिए दिल को लगा रक्खा है
इस में दिल को लगा रक्खा है

'दाग़' तू देख तो क्या होता है
जब्र पर जब्र किया करते हैं

ग़ज़ल

क्या लुत्फ़-ए-सितम यूँ उन्हें हासिल नहीं होता
ग़ुँचे को वो मलते हैं अगर दिल नहीं होता

कुछ ताज़ा मज़ा शौक़ का हासिल नहीं होता
हर रोज़ नई आँख, नया दिल नहीं होता

जिस आइने को देख लिया, क़हर से उसने
उस आइने से कोई मुक़ाबिल नहीम होता

ग़म्ज़ा भी हो शफ़्फ़ाक़, निगाहें भी हों ख़ूँरेज़
तलवार के बाँधे से तो क़ातिल नहीं होता

इन्कार तो करते हो मगर यह भी समझ लो
बेवजह किसी से कोई साइल नहीं होता

मंज़िल पे जो पहुँचे तो बोले क़ैस को लैला
नाके से जुदा क्या कभी महमिल नहीं होता

मरने ही पे जब आए तो क्या डूब के मरिये
क्या ख़ाक में मिल जाने को साहिल नहीं होता

यह दाद मिली उनसे मुझे काविश-ए-दिल की
जिस काम की आदत हो मुश्किल नहीं होता

ऐ ‘दाग़’ किस आफ़त में हूँ, कुछ बन नहीं आती
वो छीनते हैं मुझसे जुदा दिल नहीं होता



ग़ज़ल
आफत की शोख़ियां है तुम्हारी निगाह में...
मेहशर के फितने खेलते हैं जल्वा-गाह में..

आती है बात बात मुझे याद बार बार..
कहता हूं दौड़ - दौड़ के कासिद से राह में..

मुश्ताक इस अदा के बहुत दर्दमंद थे..
ऐ-दाग़ तुम तो बैठ गये ऐक आह में....


ग़ज़ल
कहाँ थे रात को हमसे ज़रा निगाह मिले
तलाश में हो कि झूठा कोई गवाह मिले


तेरा गुरूर समाया है इस क़दर दिल में
निगाह भी न मिलाऊं तो बादशाह मिले


मसल-सल ये है कि मिलने से कौन मिलता है
मिलो तो आँख मिले, मिले तो निगाह मिले

ग़ज़ल

काबे की है हवस कभी कू-ए-बुतां की है
मुझ को ख़बर नहीं मेरी मिट्टी कहाँ की है

कुछ ताज़गी हो लज्जत-ए-आज़ार के लिए
हर दम मुझे तलाश नए आसमां की है

हसरत बरस रही है मेरे मज़ार से
कहते है सब ये कब्र किसी नौजवां की है

क़ासिद की गुफ्तगू से तस्ल्ली हो किस तरह
छिपती नहीं वो जो तेरी ज़बां की है

सुन कर मेरा फ़साना-ए-ग़म उस ने ये कहा
हो जाए झूठ सच, यही ख़ूबी बयां की है

क्यूं कर न आए ख़ुल्द से आदम ज़मीन पर
मौजूं वहीं वो ख़ूब है, जो शय जहाँ की है

उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं 'दाग़'
हिन्दुस्तां में धूम हमारी ज़बां की है

ग़ज़ल

उनके एक जां-निसार हम भी हैं
हैं जहाँ सौ-हज़ार हम भी हैं

तुम भी बेचैन हम भी हैं बेचैन
तुम भी हो बेक़रार हम भी हैं

ऐ फ़लक कह तो क्या इरादा है
ऐश के ख्वास्तगार हम भी है

शहर खाली किए दुकां कैसी
एक ही वादा-ख्वार हम भी हैं

शर्म समझे तेरे तग़ाफ़ुल को
वाह! क्या होशियार हम भी हैं

तुम अगर अपनी ख़ू के हो माशूक़
अपने मतलब के यार हम भी हैं

जिस ने चाहा फंसा लिया हमको
दिल-बरों के शिकार हम भी हैं

कौन सा दिल है जिस में 'दाग़' नहीं
इश्क़ की यादगार हम भी हैं

ग़ज़ल

क्या कहिये किस तरह से जवानी गुज़र गयी
बदनाम करने आई थी बदनाम कर गयी।


क्या क्या रही सहर को शब-ए-वस्ल की तलाश
कहता रहा अभी तो यहीं थी किधर गयी।


रहती है कब बहार-ए-जवानी तमाम उम्र
मानिन्दे-बू-ए-गुल इधर आयी उधर गयी।


नैरंग-ए-रोज़गार से बदला न रंग-ए-इश्क़
अपनी हमेशा एक तरह पर गुज़र गयी।


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