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कविता

ललमुनिया की दुनिया
दिनेश कुमार शुक्ल


1. विचार
2. धरती माँ का दूध
3. घटा के रंग
4. चंद्रोदय
5. मन-मुकुर
6. क्रियापद
7. एक तिनका दूब
8. अच्छी ख़बर
9. बिटिया का झूला
10. चंद्रकूट वर्षा
11. पहाड़ की रेल
 
12. सिरहाने
13. एक कँगूरा
14. परावर्तन
15. अनदेखा
16. देसी आम
17. वे हैं
18. नींद
19. वर्षा-विगत
20. पुनरोदय
21. अंगराग
22. रक्त का संगीत
23. बैलेरिना
24. झाला
25. पुनः उन्मीलन्
26. प्रेम की वैतरणी
27. पलक
28. त्रिपदी
29. निर्मल
30. प्रेमपुर
31. षट्पद
32. मर्मांतिका
33. पान-फूल
34. दिल्ली के छोर पर एक गाँव
35. आज सूरज
36. वर्तमान
37. नया पुराना
38. स्वाती की रात
39. एक जगह
40. पान-मसाला
41. ज़रा सी जगह
42. कैबिन-मैन का गीत
43. सुख की सेज
44. दर्पण में दर्प
45. हृदय का अन्तरिक्ष
46. प्रतिध्वनि

1. विचार

लेकिन कैसे
निकलता है पत्थर से जल
और काँटों से फूल

और
सौ करोड़ लोगों के मौन से
कैसे पैदा होती है भाषा

शब्दों के
ढाई घर वाले गाँव में ही
बार-बार क्यों हुआ कविता का जन्म

सोचो ...
अगर संभव हो अब भी सोच पाना

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2. धरती माँ का दूध

केवल लय ही नहीं
बहुत कुछ आने वाला है कविता में

कविता में ही नहीं थकी हारी दुनिया के चप्पे-चप्पे में
चट्टानें फोड़-फोड़ कर
कोदों, साँवाँ, तीसी जैसे भूले बिसरे
और उपेक्षित जीवन के
अगणित अंकुर जगने वाले हैं

रेगिस्तानी बालू में
ये लहरें जो सुगबुगा रही हैं
रेत की नहीं
खालिस पानी की लहरें हैं

फिर से दूध उतर आया है
धरती की बूढ़ी छाती में

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3. घटा के रंग

नीले पीले लाल सुनहरे
गहरे-गहरे रंग
घटा में उभर रहे हैं

शायद कोई पृथ्वी
नभ के अन्तरतम में
जन्म ले रही

हो सकता है
बादल के परदों के पीछे
रंगमंच हो
किसी दूसरी ही दुनिया का

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4. चंद्रोदय

उड़ो हंस !

इस सोती हुई नीलिमा में
कुछ
लहरें पैदा करो

तुम्हारे उड़ने से
चन्द्रमा उदय होकर
मुँडेर तक आ जायेगा

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5. मन-मुकुर

बहुत दिनों के बाद, एक दिन चलते-चलते
पड़ी उचटती नज़र अचानक मन के जल पर
उस दर्पण में दिखे पिता --
मुस्कुरा रहे थे,
बहुत दिनों के बाद इस तरफ़ आ पाया था
बहुत दिनों के बाद पिता मुस्कुरा रहे थे
वहाँ अतल में !
बहुत दिनों के बाद मन-मुकुर इतना निर्मल
काँप रहा था झलमल-झलमल !

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6. क्रियापद

देखना भी एक तरह का
हस्तक्षेप है
जब धूप में हम निकल आते हैं
तो कुछ न कुछ
बदलाव आ जाता है सूर्य में
हमारे चिल्लाने से
हिमालय की बर्फ के कुछ अणु ही सही
पिघलते हैं
जब हम पार करते हैं छोटी-सी नदी
तो कुछ न कुछ
जरूर पहुँचता है समुद्र तक

हो सकता है
कभी एक छोटा-सा विचार उठे
और
निर्मूल कर दे दुनिया का सारा दुख

कभी-कभी धरती भी रुककर
कान दे कर सुनती है कुछ लोगों की पदचाप
और
फर्क आ जाता है रात और दिन की
छोटाई-बड़ाई में ।

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7. एक तिनका दूब

इस उजाड़ खण्ड में
बेशक बहुत से लोग चल रहे हैं साथ-साथ
किन्तु सभी अकेले हैं
ख़ुद में गिरफ़्तार
नहीं तो यह जगह इतनी उजाड़ न होती
अगर लोग होते
उन बीजों की तरह
जो सूखी मिट्टी में पड़े रहते हैं बरसों
अपने भीतर अंकुरों को बचाये हुए
तो भी वीरान नहीं लगती ये जगह
इस कदर,
इतनी आशंका नहीं होती
भविष्य को लेकर
अगर अपने-अपने वर्तमान से
दो-चार क्षण दे सकते लोग दूसरों के लिए,
इतना विस्तृत रेगिस्तान नहीं होता यहाँ
अगर जलाशय
भाप बन कर ऊपर उड़ जाने के बजाय
धीरे-धीरे भूमिगत हो गए होते,
इस तरह क्षयग्रस्त होते-होते
धरती नहीं घुल रही होती चिन्ता में
अगर बचा लिया गया होता
एक तिनका दूब का
या विजेताओं ने
एक युळ कम जीता होता...

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8. अच्छी ख़बर

कभी-कभी अच्छी ख़बरें भी आ जाती हैं
जैसे अब भी
कभी-कभी तुम आ जाती हो
अपनी छत पर

गली गैर की दूर मुहल्ला
नहीं पतंगों का ये मौसम
अपने संग पढ़ने वाले अब
हिन्दू हैं या मुसलमान हैं

लेकिन इतना तो है अब भी
कभी-कभी तुम आ जाती हो
अपनी छत पर

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9. बिटिया का झूला

अम्बर-अम्बर धरती डोले
सागर डोले पानी
नीम की डाल हिंडोला डोले
झूले बिटिया रानी

निसिदिन समय समुन्दर गरजे
मात-पिता की चिन्ता
चिन्ता-अगिन बुझाती बिटिया
हँसती कल-कल पानी

झूले बिटिया रानी
झूल रही है बानी
'यहु तत् बदइ गियानी'

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10. चंद्रकूट वर्षा

जब दृष्टि स्वयम् घुल गई दृश्य के साथ-साथ
तब जो भी था सब भर आया
भर आईं आँखें
कण्ठ
हृदय
सातों समुद्र
सब भर आये

आँसू बरसे
अमृत बरसा
बरसे तरकश के तीर
क्षीर-अमृत-हालाहल-कालकूट
गिरि चंद्रकूट की तरह
चमकते थे बादल

उन झड़ियों की झकझोर
यहाँ तक आती थी उन दिनों
यहाँ तक...

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11. पहाड़ की रेल

कू-कू छिक्-छिक्

भीग रहा है लोहा पानी बरस रहा है
कू-कू छिक्-छिक्

जिस पहाड़ पर ये गाड़ी चढ़ने वाली है
उसके भीतर एक गुफा है
जिसमें किस्से भरे हुए हैं
कू-कू छिक्-छिक्

वो पहाड़ खुद बादल बन कर तैर रहा है
बचपन की आँखों के निर्मल आस्मान में
उड़ते कोयले के टुकड़ों से आँख बचाना
कू-कू छिक्-छिक्...

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12. सिरहाने

क्या धरा है नींद के उष्णीश पर

एक पुस्तक अधपढ़ी
अधखुला-सा एक हाथ
एक चिन्ता
दो खुली आँखें
और
अनगिन निष्पलक पल

और किंचित्
तुम्हारा आभास...

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13. एक कँगूरा

सब कुछ बिखरा हुआ पड़ा है
ध्वस्त पड़ी है सारी निर्मिति
किन्तु बचा है एक कँगूरा
साबुत सीधा सधा हुआ जो
ताक रहा है आसमान को

अपनी आँखों की ताकत पर
साधे हैं दुनिया जहान को
आस्मान को
एक कँगूरा......
जाने किस माटी से निर्मित
जाने किन हाथों की रचना

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14 . परावर्तन

भूलभुलैया में थक कर
मैं बैठ गया हूँ

सिर्फ तुम्हारी यादों का प्रतिबिम्ब
रौशनी के धब्बे-सा
काँप रहा है दीवारों पर

मन की पेंदी में शायद थोड़ा-सा पानी
काँप रहा है

थोड़ा-सा ही सही
अभी कुछ बचा हुआ है

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15. अनदेखा

आँखे तो देख ही लेती हैं
औपचारिकता में छुपी हिंसा को
बेरूखी का हल्का से हल्का रंग
पकड़ लेती है आँख
फिर भी बैठे रहना पड़ता है
खिसियानी मुस्की लिए
छल कपट इर्ष्या भी
कहाँ छुप पाते हैं
आँखों से
सात पर्दों के भीतर से भी
आँख में लग ही जाता है धुआँ

कठिनाई ये है
कि अपनी ही आँखों का देखा
बहुत थोड़ा पहुँच पाता है हम तक
खुद हम ही रोक देते हैं उसे बीच में
अनदेखा करते जाना
जैसे जीने की शर्त हो

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16. देसी आम

देसी आम का हर पेड़
अद्वितीय होता है
हर पेड़ के फल का
अपना अलग रंग
अनोखा स्वाद
और अनोखी सुगंध
कभी-कभी तो
एक ही पेड़ की
इस डाल और उस डाल के फलों में भी होता है फ़र्क
जो निर्भर करता है इस पर
कि किस दिशा की ओर फूटी थी कौन-सी डाल

विविधता के साथ-साथ
देसी-आम और मनुष्यों में
और भी कई समानताएँ हैं
अब बहुत कम बचे हैं
देसी आम भी
लगभग लुप्तप्राय...

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17. वे हैं

जिन्हें हम जा चुका समझते हैं
वे रहते हैं हमारे आस-पास किसी-न-किसी रूप में
वर्तमान में रिक्त की तरह
संवेदना में स्मृति की तरह
सत्य में पवित्र भ्रम की तरह,
अपनी अनुपस्थिति में भी उपस्थिति हैं वे
रोज अधकही रह जाने वाले अकथ-कथा की तरह

अब अस्तित्व का पहाड़
पीस नहीं पाता उन्हें अपने वज़न से
उसे भी फाँद कर आते हैं वे
जिन्हें हम जा चुका समझते हैं,
पुनर्जीवन की तरह दुर्निवार
वे लाते हैं अपना अनन्त विस्तार
असार संसार का सार अपनी आँखों में भरे

अन्तर्मन में डूबी आवाजों की तरह
संरचना के सूक्ष्म-सूक्ष्मतर तंतु
और ताने-बाने को
वे झंकृत करते रहते हैं
हल्के-हल्के अपनी उपस्थिति के निनाद से

(शीर्ष पर वापस)

18. नींद

आज रात भर
अपने रंग मे
मुझे रँगा है गन्धर्वों ने

जनम-अवधि का जागा हूँ मैं
मुझे नींद की चादर जैसी
गहन
गभीर
विलम्बित लय दो

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19. वर्षा-विगत

विदा की बेला
अकेला
और अन्तिम
फूल फूला
चटक पीला...

आ गये खंजन
तरोई की लता
अब जा रही है

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20. पुनरोदय

डूबते सूर्य के पुनरोदय का भ्रूण लिये
यह रात गहन घिर आई है

शोकाकुल लय के समतल में
अब चाहो
तो तुम सो जाओ

(शीर्ष पर वापस)

21. अंगराग

वो हवा है
उसे तुमसे क्या मिलेगा

बस ज़रा-सा अंगराग

राग का यह अंग कब किसने सुना है

धूल का यह राग
धूल की यह देह

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22. रक्त का संगीत

अगर तुमने छू लिया खुद को
कभी एकान्त में
तो हज़ारों साल बाद
भी हमारे रक्त का संगीत आयेगा
उमड़ता ढूँढ़ लेगा तुम्हें
और ले जायेगा

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23. बैलेरिना

अब तुम्हारी ही नहीं है
ये तुम्हारी देह की लय
नदी-सा बहता हुआ आकाश है
और इसमें चन्द्रमा का वास है

(शीर्ष पर वापस)

24. झाला

बन रहे हैं, फूटते हैं, बुलबुले
झर रहा आषाढ़ का झाला
एक चिड़िया चुग रही है बुलबुले
बह गया है जाल ...

उत्ताल जल की ताल
झाला बज रहा है

(शीर्ष पर वापस)

25. पुनः उन्मीलन्

बहू-बेटे, बेटियों के सामने
जब बहुत बरसों बाद
माँ फिर दिनों से हो जाय
लाज-सील-सनेह-सहज-सुभाय
किसे क्या बतलाय

डिम्बिडम्बित कायकृश, कुलकेलिकलरवक्लान्त
कातर कुमुदिनी का पुनर्उन्मीलन...

(शीर्ष पर वापस)

26. प्रेम की वैतरणी

जहाँ है आदि-अन्त
वहीं है आवागमन
जैसे कि जीवन में

अनन्त में होता है केवल प्रवेश
होता ही नहीं कोई निकास
पार पाया नहीं जा सकता
जैसे प्रेम में

प्रेम की भी
एक वैतरणी होती है
जिसका दूसरा तट नहीं होता

(शीर्ष पर वापस)

27. पलक

न तर्क न प्रमाण
तुम्हारी आभा में
तो जो है, सभी कुछ
टिका है, प्रतीक्षा के अधर में ...

जब टूटता है मौन तनी प्रत्यंचा-सा
हनाहन बाण लगते हैं हृदय पर

शब्द चुप हैं, अभी तो
बहुत गहरी नींद से तुम जागने को हो

तुम्हारी पलक काँपी है अभी तो.....

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28. त्रिपदी

चंद्र है चकोर वही
वृळ है किशोर वही
वही वीतराग
वही भाव में विभोर है

नित्य है अनित्य वही
स्वप्न वही, सत्य वही
वही पद्मपाणि
वही भैरव अघोर है

अथाह है अछोर
घटा घोर घनघोर
और चोंच में दबाये
कालसर्प मन-मोर है

(शीर्ष पर वापस)

29. निर्मल

मैं पलाश की अग्नि
मुझे तुम मत छू लेना

रंग
लाल-नीला-पीला कैसा भी हो
रंगों की हिंसा
नहीं झेल पायेगा निर्मल रूप तुम्हारा

तुम तो आत्मा की सुगंध हो

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30. प्रेमपुर

तिवारीपुर नहीं
प्रेमपुर नाम था तब उस गाँव का
गंगा नहाने जाने के रास्ते पर
पहले आती एक अमराई
फिर पथिक जी की कुटी
और तब आती बगिया अमरूदों की

अमरूदों पर
लाल-बुंदकियाँ छिटककर छिंगुनी से
अमरूदों की मिठास में घुलकर विलीन हो जाती थीं
वे
जो धीरे-धीरे गुनगुनाना सीख जाती थीं
या वे
जो पहली बार देखती थीं चंद्रग्रहण
या वे,
जो सूर्य के दर्पण में देख लेती थीं अपना प्रतिबिंब
वे बाँस की पत्तियों सी धीरे-धीरे पीली पड़ती जाती थीं
और जिस रात ऐसा होता
उस रात की सुबह का सूर्य
उदय होते ही उसी जगह द्रवीभूत पृथ्वी में डूब जाता था

अमरूदों की बगिया को पार करते ही
आता था प्रेमपुर गाँव
वह गाँव, हममें से किसी ने कभी नहीं देखा

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31. षट्पद

गोह के गेह में
पेड़ की खोह में
जाने किस टोह में
नर्वल का चन्द्रमा ।

आंगन की नींद में
तारों की भीड़ में
पंछी के नीड़ में
नर्वल का चन्द्रमा ।

गंगा की रेत में
सरसों के खेत में
मिला सेतमेत में
नर्वल का चन्द्रमा ।

गांव में जवार में
जूड़ी बुखार में
भादों में क्वार में
नर्वल का चन्द्रमा ।

नदी के बहाव में
पत्थर की नाव में
डूबा किस भाव में
नर्वल का चन्द्रमा ।

हरीभरी घास में
छेका अनुप्रास में
और ज़रा पास में
नर्वल का चन्द्रमा ।

(शीर्ष पर वापस)

32. मर्मांतिका

पंखुरी-दर-पंखुरी दिन खुल रहा है
समय की गति मन्द करता हुआ
जैसे पक रहा हो डाल पर फल,
घुमड़ता हो राग
कोई कण्ठ बस अब फूटने को हो

अपनपौ पा के जैसे खोलता हो कोई अपना मन
पराये देस में आहिस्ता-आहिस्ता
हिचकिचाती फूटती पहली किरन
ज्यों रात की रानी
रुपहली चाँदनी के सरोवर में अभी उतरी हो
कि मुर्गा बाँग दे दे,
सहस-रजनी-चरित का कोई कथानक
मंच पर आये कि पर्दा ही गिरा दे सूत्रधार,

धीरे-धीरे दिन चढ़ेगा
कभी पल छिन की तरह ये बीत जायेगा
कभी काटे कटेगा ही नहीं,
हर हाल में लेकिन थका-हारा
किसी दीवार से टकरायेगा और
बिखर जाएगा,
पीछे-पीछे दबे पाँव एक छाया आ रही होगी
जो झुक कर बीन लेगी काँच के टुकड़े
एक नई मर्मान्तिका
सहस-रजनी-चरित में जुड़ जायगी ।

(शीर्ष पर वापस)

33. पान फूल

पान-फूल काया में
पानी की माया में
हरी-भरी छाया में
थोड़ी गरबीली-सी
थोड़ी शरमीली-सी
लता पान की !

छप्पर पर घनी-घनी
छाई है बनी-ठनी
परवल के साथ-साथ
हँसती है पात-गात
लता शीतलता की
लता पान की !

खुलती कोंपल-कोंपल
चढ़ती जाती प्रतिपल
अपने ही रंग रची
बसती अपनी सुवास
रसती रसना के रस
पान-वल्लरी !

प्राणों से हींच-हींच
आँखों को सींच-सींच
पनवारी के दरपन में
खुद को निरख रही
चोरी-चोरी गोरी
प्राण-वल्लरी !

(शीर्ष पर वापस)

34. दिल्ली के छोर पर एक गाँव

घन घटा घेरते हैं गाते हैं
मोर अब भी छतों पे आते हैं
याने कि सृष्टि का सरगम
कम-से-कम इस जगह तो जारी है

लगेगी अगली कयामत में
यहीं नूह की नाव
इस जगह अब भी कज़ा पर हयात भारी है

(शीर्ष पर वापस)

35. आज सूरज

फिर न कहना हमने तुमको
ये बताया ही नहीं
बच के रहना आज सूरज
सुबह से आया नहीं

(शीर्ष पर वापस)

36. वर्तमान

चले जाने के निशानों के सिवा
और कुछ भी नहीं था वहाँ,
वहाँ इतना अधिक वर्तमान था
कि और किसी दूसरी चीज़ की न तो
अब ज़रूरत थी और न जगह

सब कुछ जा चुका था वहाँ से
था केवल प्रस्थान-प्रस्थान
प्रस्थान.....
और दूर तक फैला था समुद्र-सा
अपार वर्तमान !

(शीर्ष पर वापस)

37 . नया पुराना

चलते-चलते मिला अपरिचय
उसका चलना
जाने कैसे उलझ गया मेरे चलने से
रास्ते अपने आप रास्ता लगे बदलने

दीवारों पर लिखे पुराने धुँधले नारों
से टकराई नई नज़र तो
और-और अर्थों से भर कर वही लिखावट
लगी चमकने जगमग-जगमग

(शीर्ष पर वापस)

38. स्वाती की रात

रिमझिम-रिमझिम
अंधकार की छत पर
तारे बरस रहे थे

एक चाँदनी-की-मछली
सिवार में फँस कर
बूँद-बूँद मोती पीती थी,
स्वाती की थी रात
कि जिसमें खुल कर रक्त-कमल खिलते हैं

चन्द्रोदय का जल था
सीपी खुली हुई थी
झड़ी बाँध कर तारे
रिमझिम बरस रहे थे

पाटल पर मोती के सीकर
झलमल-झलमल काँप रहे थे
वह स्वाती की रात
शरद की प्रथम रात थी

(शीर्ष पर वापस)

39. एक जगह

वहाँ तक जाने में
कुंजर-पगडंडी भी डरती है

नाग और नागिन
जहाँ गुँथे हुए
सप्तावरण तक उठ-उठ जाते हैं

प्रेम नृत्य की हिंसा में
भस्म हो रहा है काल

अपनी अमरता में अभिशप्त
काली तलवारों का नाच
जहाँ जाने में
टुकड़े-टुकड़े हवा भी कट जायगी

हवा डरती है
वहाँ तक जाने में

(शीर्ष पर वापस)

40. पान-मसाला

घना सन्नाटा, गरजता दैन्य
लाखों मक्खियों की
भिनभिनाती हुई दुपहर,
पिघलता डामर
पकड़ता तला जूते का.....

बन्द चालिस साल से है गेट
ऐल्गिन-मील का
बन्द सब कल-कारखाने कानपुर के
जहाँ देखो तहाँ
लटका बड़ा सा ताला......

प्रगति की लम्बी छलाँगे मारता
वो गया भारत

कहीं कोई तो नहीं अब
टोकने वाला
सभी के मुँह पड़ा ताला
मसाला पान का
हाय रे कैसा कसाला
कहो बेगम ! कहो लाल !

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41. ज़रा सी जगह

बाढ़ से घिरी
डेढ़ हाथ सूखी धरती पर
आ जुटती है पूरी दुनिया

दो अंगुल भर कागज पर ही
दस हज़ार बरसों की कविता
लिखी हुई है

(शीर्ष पर वापस)

42. कैबिन-मैन का गीत

फिर बुझ गया लैम्प सिगनल का
हाथी साँप अँधेरा जंगल
बुला रहे हैं दिया जलाओ
मत बैठो यों मौन धरे
दिन होगा तब फिर सोचेंगे
हवा की दवा कौन करे

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43. सुख की सेज

धरती सुख की सेज
गगन में पवन हिंडोला
ढरकी अनहद बूँद
सहसदल भवजल डोला

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44 . दर्पण में दर्

छप्पर-छानी सजी हुई है
परवल, पान, रतालू की बारी में भीगी
वर्षा ऋतु की गमक अभी तब बसी हुई है

चैत गया, बैसाख आ गया
महुआ चूने लगा
लपट लू की झुलसाने लगी
तवे-सी तपती धरती लेकिन फिर भी
पनवारी की बारी में
हरियारी की ऐसी रंगत है ऐसी धज है

जैसे कोई नया-नवेला
बप्पा से आँखें बरका कर
पान दबा कर, चोरी-चोरी
पनवारी के दर्पन में
अपनी मुखशोभा देख रहा हो
और भीगती हुई रेख का दर्प
दीप्त कर दे दर्पन को !

हरियाली के भीतर-भीतर, उठती-गिरती
एक लहर उससे भी गहरी हरियाली की !

(शीर्ष पर वापस)

45. हृदय का अन्तरिक्ष

फटी बिवाँई
थके हुए पग
यात्राओं में पगे हुए पग
भूली-बिसरी राहों को
फिर मुखरित करते
चले आ रहे पदचापों के साथ

यह अलाव यह रात शिशिर की
टिम-टिम करते काँप रहे हैं
अब भी कुछ नक्षत्र
दृष्टि के अन्तराल में
आँख जमा कर खुद गहरा कर
यदि देखोगे
उन तारों के पीछे तुमको
धुँधला-सा ही सही, दिखेगा
जन्म ले रहा धुमड़-धुमड़ कर आशाओं का ज्वार

वहाँ दिखेंगे तुम्हें धूल में नभमण्डल के
कुछ जीवित पदचिह्न अभी भी तेजगाम
कुछ लक्ष्योन्मुख, कुछ लक्ष्यभ्रष्ट.....

अरे! आज भी तुम्हें मिलेंगे
लोग तुम्हारे-अपने जैसे
अगर कर सको तुम अवगाहन
अपने आभ्यन्तर के विस्तृत अन्तरिक्ष का

(शीर्ष पर वापस)

46. प्रतिध्वनि

बहुत गहरा है
तुम्हारा अन्तःकरण
तभी तो
वर्षों बाद ही
लौट पाती है वहाँ से
प्रतिध्वनि मेरे मौन की

किन्तु जब आती है
तो देर तक
निनादित होता रहता है त्रिलोक
 

(शीर्ष पर वापस)



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हिंदी समय में दिनेश कुमार शुक्ल की रचनाएँ