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कविता संग्रह

द्विजेश दर्शन
द्विजेश

अनुक्रम 3. गंगा-गरिमा पीछे     आगे

वंदना

धन्‍य तू प्रसिद्ध सब सिद्धिनि की सिद्धि, नबौ-
    निद्धिनि की निद्वि तातें तौ सनिद्ध थामी मैं।।
परम पवित्र इष्‍ट मित्र तू त्रिदेवन की,
     पेखि तेरो चित्र औ चरित्र चार धामी मैं।।
तोहिं जानि जाह्वी जननि जग-जीवन की,
    पीवन मैं ज्‍यों पियूष पेखि अभिरामी मैं।।
भो सों के कुपथ गामी कीनी तैं सुपथ गामी,
    तातेंहे विपथ गामी। करत नमामी मैं।।

अवतरण 

गेरी गिरापति की गिरी है जो गिरीस सीस,
    हल सों हिमंचल के हिय मैं हली गई।।
ह्वाँते चलि मचलि मचावति जु घोर सोर,
    तोरि फोरि ढोकनि को ढाँ‍कति ढली गई।।
पहुँची प्रयाग कै 'द्विजेश' कल-कौतुक यों,
    विंध्‍य-कासिका के प्रेम पथ यों पली गई।।
फेटति फवनि सीम मेटति सरस्‍वति को,
    भानुजा को भेंटति समेटति चली गई।।

गुण-गान

जेतेआदि बसत असाघ बसुधा मैं ब्‍याधि,
    होते ते सुसाध देती जो पराग मूठी तैं।।
जाख से जलोदर कराल कमलोदर पै,
    काठ से कठोदर पै कालिका सी रूठी तैं।।
अधम अधंगे मति भंगे जो अपंगे गंगे,
    होत चट चंगेयामैं सत्‍य है न झूठी तैं।।
पातक पितज्‍वर विपत्तिविपमज्‍वर की,
    काल से कफज्‍वर की औपधि अनूठी तैं।।

2

भक्ति पै भगीरथ के आई भगी रथ संग,
    धाम-नृप तीरथ के धाई धन्‍य धारती।।
विधि के कमंडल कीं हरि पौं प्रचंड ल की,
    ईस-सीस मंडल की सुषमा सँवारती।।
जोम जम जारती उजारती पुरीजम की,
     चित्रगुप्‍त पै 'द्विजेश' गजब गुजारती।।
आरति उतारती तु पापिनैं पखारती, न
    अम्‍बा जिन्‍हैं तारती तु गंगा तिन्‍हें तारती।।

3

आई भूमि भुपति भगीरथ की ल्‍यायी हुती,
     छाई हुती देखि तोहिं देबैं तरसत है।।
छीर-छबि देखि तौ छकित छीर सागर हू,
    छार लखि आपनो पछार परसत है।।
रोज तौ 'द्विजेश' रोजगार रंगरेजी देखि,
    राव रंक तातें लै सरोज सरसत है ।।
कैसहू कुरंगे अति पापन सों रंगे सोऊ,
    गंगे रंगे रावरे सुरंगे दरसत है।।

4

कोऊ अंध अधीन ह्वै अधोमति के,
   अध जल देत ही जु आधो सांस हुँचिगो।।
जम-गन जान्‍यो पै न जान्‍यो जाह्वी को उत,
   चट-जम जातन की चाहना उमुचिगो।।
ज्‍यों ही चल्‍यो त्‍यों ही उत गेरत ही गंग गरे,
   सिगरे सरीर सक्ति सक्ति मैं समुचिगो।।
जौलों जम-प्रेम पातकी लौं पहुँचन चाह्यो,
   तौलों वह पापी संभु पुर मैं पहुँचिगो।।

5

आचमन कीने आँच मन की समन होत,
    साँच मन तौ 'द्विजेश' जाँचमन कीने तें।।
कीनें तें सँकल्‍प करै गंग तू तो काया कल्‍प,
   जीवै अल्‍प जीवी सदा कलपन कीने तें।।
तेरे दरसन जम दरस न होत फेरि,
   परसि न पावै पाप परसन कीने तें।।
अरपन कीने दरपन सों दिखात ब्रह्म,
   नरपन जात तोमैं तरपन कीने तें।।

6

द्रुम मैं जु देखी कला कल्‍प कलपद्रुम की,
    सब सबके जी अनुमान ऐसो भरिगो।।
कोऊ कहै वासन विरंचि तें गिरयो है बुन्‍द,
   कोऊ यों कहै 'द्विजेश' जन्‍हु जंघा दरिगो।।
हरि-पद-पंकज को परिबो पराग कोऊ,
    कोऊ कहै यों जटा गिरीस जू को गरिगो।।
मेरे जान गंग तेरे तारे काहू पातकी को,
   भीनो चार पद को पसीनो कहूँ परिगो।।

7

होती जो न रंचिभरि तू विरंचि वासन मैं,
    तो वे जग सासन को आसनै क्‍यों परते।।
तैसोई तहाँतें जो न गिरती गिरीस सीस,
   वेऊ ईस मुक्ति वकसीस कैसे करते।।
लाल -काज द्रौपदी के कूल के दुकूल ही मैं,
   श्रुति द्रुति सों 'द्विजेश' सूल कैसे हरते।।
काज यों कुविंद को गोविंद करि पाते कहा,
   जो तौ बिंदु पग अरविंद मैं न धरते।।

8

आते ही जु प्रथमैं उदेसकेस मुंडन को,
   जो यों मरयो मानो पाप अंगी जौन अंगा मैं।।
तापै पुनि न्‍हाइबे कों पूजा विधि पाइबे कों,
    प्रोहितैं दिवाइबे को दान देन दंगा मैं।।
माह के महत्‍व ही तैं आपनो हू दै महत्‍व,
    जो 'द्विजेश' चारहू पदारथ प्रसंगा मैं।।
मकर-अमा के मिस पाप ताप लूटिवे कों,
     मानों इमि मकर भरयो है मातु गंगा मैं।।

9.

दीननि की संगी दीनता जो अरधंगी रूप,
    तैसो पतितान पतिताहू संग धरती।।
जाते जब तेरे तीर न्‍हाते तौ 'द्विजेश' नीर,
    तू तिन्‍हें सपतनीक प्रन सों पखारती।।
एकैं अति मोही एकैंअति निरमोही रूप,
    मातु-सासु धर्म यों दुहूँ पै निरधारती।।
जातें धन्‍य धिक दोऊ किन मातु गंगे तोंहि,
     पुत्रैं जो दुलारती पतोहुनि को मारती।।

10.

जैसी तू जननि जग जान्‍हबी ह्वै जात्रिन की,
    आरोहावरोह जग जाकी यही खेती है।।
जाको जीव जातरूप जायारूप जीवनी त्‍यों,
    सो तातें जनित धर्म कर्म सों सचेती है।।
पुत्र सों अधिक प्रिय होते जो पितामही के,
    सोई दृश्‍य गंग मातु चार फल देती है।।
होते जबै गोते पातकीन के जु पोते रूप,
    लैलैअंक ताको गंग चूमि चूमि लेती है।।

11

जाको आदि नाम गो सुपद ही तें धाम-ग्राम,
    जो 'द्विजेश' अति अमिरामी ह्वै अनिंद के।।
जो गोलोकनाथ गोकुलेस तिमि गोपीनाथ,
    त्‍यों गोपाल गोबरधनैं सों सुर-वृंद के।।
जद्यपि इतै गो वृंद ज्‍यों रविन्‍दैं अरविंद,
    तौहूँ हरि प्‍यासे गंग तेरे बारि-विंद के।।
यानें केवलै गोविंद इमि करि पाते कहा,
    होतो जो न तौ गो बिंदु पद मैं गोविंद के।।

12

जिन बसि तेरे तीस रेह कैसी लै सरीर,
    वीर-वीर सेना से 'द्विजेश' जो सजक से।।
घाट वो कुघाट जो बिलोकते बटोही बाट,
    जो विराट ठाट ठाटते ह्वै बेधरक से।।
देखते दुंखी जो दीन पेखते जु पापी पीन,
    मलि मलि धोइ मन होते स्‍वच्‍छ बक से।।
धन्‍य ऐसे तेरे रज रजत समूह से जो,
    तेरे राज तीरथ मैं राजते रजक से।।

13

ओममयी प्रकृति सुकृति सीमा सोममयी,
    जोम मयी जम पै तू होम की अँगारा है।।
तेरो चित्र जो विचित्र सो ताको चरित्र ऐसो,
   चित्र-चित्रगुप्‍त काटिबे को तौ किनारा है।।
चार पद देनी स्‍वर्ग वर्ग की निसेनी तुही,
    देनी जो 'द्विजेशी' ऐसी तेरो आरपारा है।।
एक धारा अघ पै दुधारा दोप दारिद पै,
    तैसो तिहूँ तापन पै त्रिविधि त्रिधाराहै।।

14

तू ही एक नद्द अनहद्द ऐसी आनंद की,
    जो ह्वै के सनद्व प्रनवद्ध विरमैया तैं।।
मातु धर्म धारन तें अधम उधारन तें,
    सब की सुधारन तें मरन समैया तैं।।
सो याको प्रतच्‍छ लच्‍छ सगर सपूतन लौं,
    कीनी तिन्‍हैं पूतन सों पुनि जनमैया तैं।।
धन्‍य वे भगीरथ कि जाके रथ संग भागी,
   भई धन्‍य-भाग भागी भागीरथी मैया तैं।।

15

जोग को जगावति भगावति विषय भोग,
   विष वगरावति भुजंग विपधर की।।
जोवति न सोवति भिजोवति जरनि ज्‍वाल,
   खोबति खराबी है 'द्विजेश' गर-गर की।।
काम को न आने देति क्रोधजी न जाने देति,
   देतिना सतानेलोभ मोह के लहर की।।
हर हरि विघ्‍न सबै हर-हर बैन बोलि,
   हर - हरजाम पाहरू है हरहर की।।

16

होती जो न विधि जल जंत्र मैं स्‍वतंत्र तो तू,
   नृप-तप तंत्र पै गिरीस सीस जाती ना।।
होते जो जरे न सूनु सिगरे सगर के तौ,
   सागर लौं जाय तिन्‍हैं बिगरै बनाती ना।।
जद्यपि भई यों जस भागी तू त्रिपथ भागी,
   पै 'द्विजेश' भगीरथी तबहूँ कहाती ना।।
प्रेमनि पगी पगी सु माता सी सगी सगी,
   भगी भगी भागीरथी के संग मैं जु आती ना।।

17

दार नृप सांतनु की चारो फल देन दार,
   नद सरदार देवदारन सी ज्‍वै गई।।
सोनभद्र सरजू व सालिग्राम नामी नदी,
   गोई सब तोमैं तैं न काहू संग ग्‍वै गई।।
जैसो तब तरल तरंग त्‍यों सरल ढंग,
   सत्रु सरनागती पै रंग निज ख्‍बै गई।।
काल की सहोदरी कलिंदी वह काली नदी,
   तोमैं मिलि गंगे सोऊ गंगा आज ह्वै गई।।

18

सान्‍तुन के अंगज न थे क्‍या चित्रअंगदवे,
   गंगज जो होते केहरी सों प्रान खोते ना।।
एक तेरे गर्भ मैं न होतो गुन-बर्व तो यों,
   सर्व-गर्व-हारी द्वै प्रभू की धाक धोते ना।।
हरि प्रन तोरि त्‍यों परसुरामैं मुख मोरि,
   मैन को मरोरिजोरि सेज-सर सोते ना।।
सांतनै-तनय होते होते कहा भीपम यों,
   मैया गंग तू तैं जनमें जो आज होते ना।।

19

धन्‍य तेरी महिमा मही मैं आज मातु गंग,
   जानते हैं देव वो 'द्विजेश' जन जेते हैं।।
धन्‍य तव पण्‍डे जो प्रचण्‍डे जम दूत हूँ लौं,
   झण्‍डे गाड़ि पापिनैं जु पुन्‍य पथ देते हैं।
धन्‍य तो हजाम जिन जूमि-जूमि आठो जाम,
   करिकै हजूम ऐसो इन्‍तजाम चेते हैं।।
कूढ़न को मूढ़न को जबा-बाल-बूढ़न को,
   मूढ़न को मूढि़ पाप हूँ को मूढि़ लेते हैं।।

20

जेते नाम नीर के जु नद-सर के सरीर,
   पै ना गुनी ते तिन्‍है जिन्‍हें यों आप ज्‍वै रही।।
आप नामैं आपदारि वारि सों उबारि दोष,
   पर्व जलसे को जस-जल से भिज्‍वै रही।।
पानी सों सुपानी पोस, त्‍यों 'द्विजेश' नीर हू यों,
   ज्‍यों तुनीर तीर जासों जम ख्‍याति ख्‍वै रही।।
जीवन तें जीवनैं पियूष पय पीवन सों,
   अम्‍बु नामैं अम्‍बा जगदम्‍बा रूप ह्वै रही।।

21

जिन मुख तें ना सपने हूँ केहूँ राम-नाम,
   पुन्‍य परिनाम हू न जाके नाम जद्दी को।।
केवलै जो अपकर्म ही को मानि पर्म धर्म,
   खोये जीवनी को सोये नींद अनहद्दी को।।
पै जिन्‍हैं न तेरो आप जानतो न पाप, जातें-
   जम चित्रगुप्‍त किया कै यों रूप रद्दी को।।
नीर बिनु ज्‍यों सर सरोज रोज रद्दी, तिमि-
   तैसी जमगद्दी रोजनामचा मुसद्दी को।।

22

अद्भुत अंग सों अनूप है जो तेरो रूप,
   तो ह्वै कृपा कूप विश्‍व भूपैं मनोहारी तैं।।
सारद सहेली मनमेली लक्ष लक्ष्‍मी की,
   खेली गिरिजा के संग प्रेम लेनहारी तैं।।
षटऋतु वारो मास रैन दिन के समास,
   जाचकैं से जाबिन को चैन देनवारी ते।।
पापहारी तापहारी जब को प्रतापहारी,
   बलि बलिहारी जु यों विश्‍व की बिहारी नैं।।

23

जो पै तब तीनै तीन विधि सों प्रसंग गंग,
   प्रथमैं त्रिदेवैं संग तीन गुन लेनी नैं।।
तीन जल तीन रंग तीनहूँ के तीन ढंग,
   उज्‍जवल वो कज्‍जल ऽरुनंजल की श्रेनी तैं।।
त्‍यों 'द्विजेशी' तीनों लोक तीन पथ सों बिलोकि,
   तीनों ताप तीनों पाप आप ही की देनी तैं।।
धन्‍य तेरो तीनै तीन विधि को तरंग गंग,
   जातें ह्वैं रही यों तीन रंग की त्रिवेनी तैं।।

24

जिमि पद वाचक प्रसिद्ध तेरी चार नाम,
   तिमि पद लक्षकैं दुलक्षणा विधानी सों।।
जाति नाम जान्‍हवी, जद्दच्‍छा-गंग त्‍यों 'द्विजेश',
  गुन सों त्रिवेनी क्रिया त्रिपथ प्रधानी सों।।
रूढ़ी केवलैं सों त्‍यों प्रयोजनी जो शुद्धा गौनि,
   उपादानि लक्षणी सारोप साध्‍यौऽसानी सों।।
धोतेपाप गोते, गंग वासी सुख सोते, तिमि-
   जम गन रोते जम होते बिना पानी सों।।

25

पीके आप भंग मति भंग किन होते आप,
   जारते अनंगै कहा आपै क्‍यों न जरते।।
विपधर कंठ मैं एकंठ करि ब्‍याल माल,
   कह त्रिपुरा को मारि आपै क्‍यों न मरतें।।
धन्‍य तेरो आप पाप-ताप हारी तौ प्रताप,
   सो जाको 'द्विजेश' कोऊ देव ना बिसरतै।
धीर किमि धरते उधरते अधम कहाँ,
   मंगधर तोहिं जो न सीस गंग धरनै।

 

मुंडन पर उक्ति

 
जनमति संगी अंग जाको मम अंग ही तैं,
   चल्‍यों गंग न्‍हान जातें संग यों विगारिगो।।
चलतहिं आदि ही तें अनमन होन लारयो,
   जान्‍यो ना 'द्विजेश' कौन्‍ ब्‍याधि कोप करिगो।।
कैकै किते जत्‍न सो प्रयाग लौं पहुँचि केहूँ,
   अन्‍त मों पैं मुंडन को यो असौंच परिगो।।
मेरो मित्र पाप जो परम प्रिय मोको हाय,
   पहुँच्‍यों न गंग पौर पंथ ही मैं मरिगो।।

 

यम के नाम

श्री जमराज जू। 'द्विजेश' को प्रनाम, हैं-
   अराम, आठो जाम तौ कुशल नेक चहियो।।
आज हौं अह्नाए गंग पाए विश्‍वनाथ पद,
   होत फल याको जो सो जानि जिय लहियो।।
जानते हो जैसो संभु, गंग की तरंग जैसी,
   तूहूँ चित्रगुप्‍त बैठे चुपैचाप रहियो।।
देत हूँ चेताई भाई बनि न परैगी मोसों,
   अब फेरि कोऊ मोहिं पातकी जु कहियो

यमदूत की विवशता

जम गन भाख्‍यो गति गंग जम सों 'द्विजेश',
   कहि जम कोपि ''गंग सों है तोहिं का प्रसंग।
कह्यों, ''स्‍वामि। गंग तें तो नित हम होते तंग,
   सोई गंग कै रही तिहारी प्रभुता को भंग।
पूँछयो पुनि ''कौन गंग? कैसी गंग?'' कह्यो, ''नाथ-
   जाके अंग मिली हैं तिहारी भगिनी हूँ-संग''
''गंगै कहा गुन-ढ़ंग'' कह्यो, ''पीन पापिन कों,
   गंग गंग कहे गंगधर सों मिलानी गंग''।

यमराज का उलाहना

1

आय जम शिवहिं जवाब दीनी चाकरी सों,
   ''या अनीति हौं तो अब कब लौं सहा करैं।।
पुन्‍य बारे स्‍वत ही सिधारैं सुरलोक सबै,
   जोगकारे चाहैं जितै तितही रहा करैं।।
ज्ञान-बारे गुनहिं न पाप पुन्‍य एकौ कछू,
   मग्‍न ह्वै 'द्विजेश' मुक्ति मार गचहा करैं।।
पतित कतारैं तिन्‍हें गंगैं देति तारे, हम-
   झूठे जम-द्वारे बीच बैठि कै कहा करैं।।

2

अज्ञा पै जो आपी के प्रतिज्ञा सों प्रबंध न्‍याय,
   कन्धि हम राखे पापी दंड के प्रसंगा मैं।।
जो न करि पातेअब हम जम ह्वै के तिन्‍हे,
   जो अन्‍हाते पाते स्‍वर्ग गंग के तरंगा मैं।।
यातें आप हैं बिधी तो कीजै द्वै विधी मैं एक,
   भेजे सन्निधी सों गंग जो मों मान भंगा मैं।।
या तो पुनि गंग ही को गोपिए कमंडल मैं,
   या मों न्‍याय मंडलै को गुप्‍त कीजै गंगा मैं।।

ब्रह्मा का पश्‍चाताप

जम को उराहनो सुनत बोले यों बिरंचि,
   ''तू तैं मोंहिं दूनो है 'द्विजेश' दुख दाहे को।।
हूँ जो दये गंग तो सगर सूनु के प्रसंग,
   नहिं कछु सारे पीन पातकी पनाहे को।।
भूलि परे नाहक भगीरथ की भूमिका मैं,
   आपनो न तौ प्रबंध चेते चित चाहे को।।
काह कहैं जो पै कहूँ ऐसो जानते तो भला,
   जीते जान जाह्नवी को जान देते काहे को''।।

कामना

1

अति दुख सों मैं दौरि गंग मैया तेरे पौर,
   आयों जानि हानि तातें मों यों बिनै बानी तैं।।
ह्वै के दीन अनाधीन अति पातकी जु पीन,
   जान्‍यों हौं 'द्विजेश' है प्रवीन दया दानी तैं।।
मानै जु तो मानै नहिं मानै तो सुनै मों यह,
   विनय 'द्विजेश' हठ सठ ज्ञान हानी तैं।।
प्रिय तौ जु करुना कसम करुनैं की सोई,
   करु ना जु मों पै अब करुनानिधानी तैं।।

2

आज अति वेदन सों मेरो है निवेदन यों,
   मेरो तेरो मातु पूत नात कबौं टूटे ना।।
मेरे पास चार विषै धन रूप ऐसो जाहि,
   जो अविद्या अपकर्म इन्‍हें आनि लूटै ना।।
छोन कैसो मेरो छोह मातु कैसो तेरो मोह,
   मेरो तेरो कोह केहूँ कबौं आनि कूटैं ना।।
यातें मातु मेरी बिनै बस अब एकै यही,
   तेरो नीर - तीर छीर मोसों कबौं छूटै ना।।

3

मों हित न ऐबो तोहिं पुनि विधि वासन सों,
   ना तो भगीरथ रथ संग की जवैया तैं।।
मों सँग न सगर सपूतनि सी मंडली हू,
   जो जरे मरे को करै पुनि जनमैया तैं।।
मों सुभाग सों जो आज कासी बीच तौ विराज,
   तो मों एकै काज करि होवै सुख दैया तैं।।
बस एक ऐसो जरा अंग पंगु पद पेखि,
   लै ले सरनागती मैं मोंको गंग मैया तैं।।


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