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कविता

फागुन
प्रभुनारायण पटेल


किसलिए आए इस साल फागुन
चल रही जब टेढ़ी चाल, फागुन !
कट गई महुआ की डाल फागुन
आया था प्याले में उछाल फागुन!
मुंडेरों पर रोशनी महकती थी
उठ गई ऊँची दीवाल फागुन !
ढोलक मंजीरा मृदंग गूँजती थी
सो गए सब सुर-ताल फागुन !
कोयलिया कुहूकुहू कूकती थी
अब सेमसंग मकड़जाल फागुन !


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