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कविता

नींद
अरविंद कुमार खेड़े



अपनी बाँहों में
समेट लेने को आतुर
नींद
मुझे बुलाती रही रातभर
मैं नींद के लिए
ढूँढ़ता रहा कोई सपना।


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