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कविता

शेष है अंतिम आलिंगन
अरविंद कुमार खेड़े


प्रेम का बीज
मिट्टी में दबकर मिट्टी हो गया
अंकुरण की उम्मीदों के खत्म होते ही
तुम्हारी रूह के नाम
मैंने लिखा पहला और अंतिम खत
खत के अवितरित होने पर
खत को
तुम्हारी रूह पर चस्पा करना चाहा
कि ऐनवक्त पर मेरी रूह ने
सरेआम यह इल्जाम अपने सर
लेने से कर दिया इनकार
उसी दिन से मैंने अपनी रूह को
कर दिया है मुक्त
मृत्यु के साथ अब शेष है अंतिम आलिंगन
इस भरोसे के साथ कि
अब नहीं मिलेगी मुझे प्रेत-योनि
यदि मिल गई तो
लड़ पड़ूँगा खुदा से
पूछूँगा -
जीते हुए जो मैंने भोगा था
भोगते हुए मैंने जो जिया था
वह क्या था फिर।


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