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निबंध

निर्जन वन में रमता जोगी
श्रीराम परिहार


अमरकंटक में माई की बगिया में माँ नर्मदा का पूजन कर सोनमूड़ा होते हुए रेवाकुंड के दर्शन करने आ जाता हूँ। रेवाकुंड से परिक्रमावासियों को जंगल के रास्ते पैदल डिंडोरी मार्ग तक आना होता है। मैं भी नर्मदा की परकम्मा पर हूँ। डिंडोरी सड़क के दोनों ओर बहुत सुंदर और घना हराकच्च जंगल है। सड़क किनारे एक झोपड़ी है। आँगन में कुआँ है। थोड़ी-सी खुली साफ-सुथरी जगह है। झोपड़ी में साधु रहता है। हम परकम्मावासियों का भोजन वहीं सड़क पर होता है। दिन चढ़ आया है। भूख भी सिर चढ़कर बोल रही है। सब भोजन करते हैं। भोजन करने के बाद मैं अपने वाहन में बैठ गया हूँ। सड़क पर हमारे दल का भोजन वाहन खड़ा है। उसी वाहन की छाया में सड़क पर बैठकर हमारा भोजन बनाने वाले दल के लोग मन-मगन होकर भजन गा रहे हैं। निर्जन किंतु मोहक बन प्रांतर में दल के एक 'राजू' नामक युवक के कंठ से एक भजन स्वर-स्वर, अक्षर-अक्षर, शब्द-शब्द, अर्थ-अर्थ खुलता है - 'अरे हाँ रे! एक निर्जन वन में जोगी एक रमता था'।

भजन की एक-एक कड़ी खुलती जाती है। तन का सोटा, मन का लंगोटा सदा बगल में दबाए रहता था। वह जोगी 'निगुर्ण रोटी, सबसे मोटी, उसका भोग लगाता था'। भजन का अंतरा-अंतरा अखंड वन प्रदेश में दूर तक गूँजता चला जाता है। एक अद्भुत वैराग्यमय सम्मोहन-स्वर मेरे भीतर तक उतर जाता है। मैं बेसुध और बावरा-सा बच्चे की तरह सुन रहा हूँ। सुन रहा हूँ और रो रहा हूँ। रो रहा हूँ और सुन रहा हूँ। मुझे कुछ नहीं सूझ रहा है कि मुझे क्या हो रहा है। आँसू थम नहीं रहे हैं। आँखों में अनिर्वाच्य शीतलता पसर रही है। फिर आँखों का मन भी विरागी होकर एक महाविस्मृति में चला जाता है। अब मुझे मेरी ही सुध-बुध नहीं है। भजन के बादल से भक्ति का जल बरसा और सारी वनराई भीग गई। धरती भीग गई। पंछियों के पंख भीग गए। गायों के रोम भीग गए। परकम्मावासियों की हथेलियाँ भींग गईं। मैं ऐसा भीगा कि अभी तक सूख नहीं पाया। एक निर्जन वन है और उसमें मैं चला जा रहा हूँ। कोयल नहीं। पपीहा नहीं। मृग नहीं। बाघ नहीं। फूल नहीं। पाती नहीं। नदी नहीं। सरोवर नहीं। सूरज नहीं। चंद्रमा नहीं। जल नहीं। अगिन नहीं। केवल आकाश है।

गायक मगन होकर गा रहा है। वहाँ मंदिर नहीं। मूरत नहीं। आरती नहीं। पूजन नहीं। विधि-विधान नहीं। धरती है। धरती की हरी-नीली-सँवलाई मुलायम-खुरदरी सतरंगी बिछी है। शब्द, स्वर और लय का ऐसा सात्विक संयोग हो रहा है कि क्षण-क्षण में निर्गुन-सगुण दुरित-प्रकट हो रहे हैं। संगीत में जिस 'अवधान' स्थिति को पाने के लिए साधना करनी पड़ती है, वह स्थिति अनायास लब्ध हो गई है। असीम, अजेय और अपरिमित के प्रति श्रद्धा का प्रकटीकरण सहज हो रहा है। यह भक्ति है। केवल संगीत है। या मात्र मनोरंजन? यह नहीं जानता। ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान तीनों एक बिंदु पर मुझे दिखाई दे रहे हैं। गायक, गायन और गेय वस्तु का संपुट मेरे भीतर के अहं को निःशेष कर रहा है। देश, काल, जाति सब नाद में समाहित हो रहे हैं। सब नए-नए हो रहे हैं। सब अपने भेदक रंगों को छोड़कर अभेद की स्थिति का वरण कर रहे हैं। भजन-भक्ति सबको समान और स्वच्छ करती चलती है। 'गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिंगं न च वयः'। गुणियों के गुण देखे जाते हैं। उनकी उम्र क्या है? वे स्त्री हैं या पुरुष? यह विचारा नहीं जाता है। भजन ही यह अभेद और अद्वैत भाव पैदा करता है। निर्जन वन में जोगी रमता है। वह योग से समाधि तक जाता है। भक्ति संगीत के माध्यम से क्षण-क्षण की तन्मयता को समाधि में रूपांतरित कर देती है। चिदाकाश में व्याप्त सत्ता का ध्यान, स्मरण, ध्वनि स्फुरण गायक और श्रोता दोनों को अपनी चरम अवस्था में 'नाद योग' तक ले जाते हैं। भक्ति का एक रूप 'श्रवण' भी है। कानों से सुनाई देने वाली ध्वनि आहत नाद है। आहद नाद जब शब्द, स्वर, लय की निर्मल भाव-झारी में डूबकर निकलता है और वह हृदय के कानों को आहत करता हुआ अनाहत नाद तक पहुँचता है, तो भक्ति भी योग की उच्च स्थिति में गायक और श्रोता दोनों को पहुँचाती है। जहाँ सारी इंद्रियाँ सम पर आकर गीत के भाव में डूब-डूब जाती हैं, तब तो सहज में ही 'निर्विकल्प समाधि' लग जाती है। तब आनंद ही आनंद है। अखंड आनंद है। पूज्यपाद वल्लभाचार्य कहते हैं - जैसा सुख भक्तों को भगवान के गुणगान में होता है, वैसा सुख भगवान के स्वरूप-ज्ञान की मोक्ष अवस्था में भी नहीं होता -

गुणगाने सुखवाप्तिर्गोविंदस्य प्रजायते।

यथा तथा शुकादीनां नैवात्मनि कुतोन्यतः।।

अनंत कोटि योजन विस्तारित आकाश में आदि भक्त की छवि उभरती है। वह भक्त अनवरत, अकुंठ, अविराम भ्रमण करता-फिरता है। उसके एक हाथ में वीणा है। दूसरे हाथ में करताल है। मुख से 'श्रीमन्न नारायण, नारायण' वैखरी गा रही है। उसके पाँवों की गति नृत्यमय है। वह चलता भी है तो नृत्य करता हुआ। उसकी वीणा बजती है तो नादब्रह्म कंपित होकर जाग्रत हो जाता है। उसकी करताल की ताल से सृष्टि के सारे वाद्य ताल से ताल मिलाने में आदि से अब तक लगे हुए हैं। स्वर, ताल और लय (नृत्य) से कीर्तन हो रहा है। यह पहला भक्त और पहला कीर्तनकार सृष्टि में भक्ति संगीत के पादप को रोपकर उसकी आनंदछाया में भावविभोर हो उठता है। यह देविर्षि नारद है। परम भक्त। परम ज्ञानी। परम विरागी। परम संगीतज्ञ। परम यात्रावर। परम स्वर उच्चारक। परम अग्गम विचारक। परम पराक्रमी। परम परामर्शदाता। परम मार्गदर्शक। परम जनकल्याणक। परम आत्मीय। परम सर्वज्ञ। परम एकाकी। परम आनंदमार्गी। परम भगवदप्रिय। नारद की भक्ति जगविश्रुत और निष्काम है। उनके द्वारा ईश्वर का नाम-गायन भक्ति संगीत की अमरकंठी है। भगवान कह उठते हैं -

नाहं वसामि वैकुंठे योगिनां हृदये न च।

मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारदः।।

''हे नारद ! न तो मैं वैकुंठ में रहता हूँ और न योगियों के हृदय में। मेरे भक्त जहाँ गान करते हैं। मेरा भजन करते हैं। वहीं मैं निवास करता हूँ''।

मैंने बंगाल में देखा - घोटमोट सिर वाले, लंबी चोटीधारी, धवल वस्त्रधारी, हाथों में झाँझ-मंजीरे लिए, लंबा श्वेत तिलकधारी अनेक भक्त-दल, मृदंग बजाते, हरे रामा, हरे कृष्णा गाते-गाते भाव विभोर होकर मार्ग में, मंदिर प्रांगण में, धर्मसभा में नाचते-नाचते आत्मविस्मृति की स्थिति में पहुँच जाते हैं। गा रहे हैं। नाच रहे हैं। पूरी देह अभिनय हो गई है। आँखों से अश्रु टपक रहे हैं। भक्ति देह धारण कर कई-कई स्वरूपों में साकार हो उठी है। आनंदभाव की माला सबके गले में सहज फब जाती है। अवनि-अंबर एक हो जाते हैं। प्रकृति-पुरुष आत्मस्थ होकर अपनी ही रचना की उदात्तता पर गर्वित होते हैं। तुलसी-दल पूजा-कलश में तैरने लगता है। शंख, घड़ियाल, नगाड़े, झाँझ, मृदंग, घंटा, पखावज बज उठते हैं। सब एक स्वर में उच्चारते-उच्चारते 'संकीर्तन' करते हैं। ईश्वर कृपा-सागर सुख-निधान है। शाश्वत है। उनसे मिलकर प्राप्त होने वाला सुख भी शाश्वत है। उनके दर्शन का आनंद अनिर्वाच्य विश्राम देने वाला है। वह सदा एक रस है। स्थिर है। 'संकीर्तन' के माध्यम से बंगाल से वृंदावन तक और घर-घर से लेकर मंदिर-मंदिर तक उसी आनंदकंद की प्राप्ति के लिए चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी भक्त गा रहे हैं। मंजीरे और मृदंग बजा रहे हैं। नाच रहे हैं। 'नाद' की मुग्धावस्था को पाने की स्थिति की ओर स्वयं प्रवाह में बढ़ रहे हैं। ब्रज की गोपियाँ श्रीकृष्ण के नाम संकीर्तन से आनंद महाभाव को पाती हैं। यह सत्य है - नाद के समान परम श्रेष्ठ दूसरा मंत्र नहीं। आत्मदेव से बढ़कर कोई देवता नहीं। नादानुसंधान से बढ़कर दूसरी उत्तम पूजा नहीं। तृप्ति से बढ़कर कोई दूसरा सुख नहीं -

नास्ति नादात्परो मन्त्रः न देवः स्वात्मनः परः।

नानुसन्धेः परापूजा नहि तृप्तेः परं सुखम्।।

'नाद' आकाश का गुण है। पृथ्वी का गुण गंध है। आकाश का वैशिष्ट्य 'नाद' का कारण बनने में है। पृथ्वी का वैशिष्ट्य 'रसा' बनने में है। अन्न की गंध पृथ्वी जाया है। अन्न को खाकर शरीर धर्म की साधना में प्रवृत्त होने योग्य बनता है। अन्न का यहाँ व्यापक अर्थ पृथ्वी उत्पन्न खाद्य पदार्थों से है। जब शरीर साधना का धाम बनता है, तब ही मोक्ष का द्वार दिखाई देना संभव है। इस शरीर में स्थित आत्म तत्व की वाक् शक्ति ही गाती है। वाक् शक्ति 'नाद' में कंद पैदा करती है। ऊर्जा की असंख्य-अनंत-धूर्मण शक्तियाँ सक्रिय होती हैं - अनायास ताली बजती है। आनंदातिरेक में देह नृत्य करने की बेसुध बान धर लेती है। वाक्, ताली, नृत्य तीनों मिलकर भक्ति में रमते जोगी को, भक्त को भक्ति की पुण्य भूमि में ले आते हैं। जहाँ आत्म-ज्योति से उद्भासित परम आह्लाद है। परम तृप्ति है। माधुर्य और सत्य का वैभव-विलास है। ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय की त्रिपुटी एक हो जाती है। वाक् से स्वर, ताली से वाद्ययंत्र और आनंदाभिनय से नृत्य निपजते हैं और संगीत नर्मदा की अमर धारा-सा बह निकलता है। उसी धारा से आर्द्र निर्जन वन है। उसमें एक रमता जोगी है।

वाक् के अनादि स्वरूप 'नाद' की व्यापकता निस्सीम है। यह सृष्टि कार्य-कारण पर आधारित है। आकाश कारण है। नाद कार्य है। अवनि-अंबर के बीच का शून्य बहुत-बहुत विराट है। अवनि के चारों ओर भी उसका आवरण-वलय अपरिमित रूप से शांत धड़कता हुआ अवस्थित है। 'आकाश' जितना व्यापक और विभु है, 'नाद' भी उतना ही व्यापक और शाश्वत है। सत्य है। 'नाद' आकाश के ओर-छोर में व्याप्त है। 'नाद' सब जगह, सब समय, सब कहीं गूँजता रहता है। आकाश नित्य है। नाद भी नित्य है। आकाश और नाद सूर्य और रश्मि की तरह अभिन्न-अविच्छेद्य है। कारण और कार्य में विलगाव नहीं होता है। गुण और गुणी में पार्थक्य नहीं किया जा सकता है। इसीलिए आकाश में तैरते हुए शब्दों को, उनकी तरंगों को नाना वैज्ञानिक उपकरणों से पकड़ा जा सकता है। भविष्य में हो सकता है हम वैदिक ऋषियों की वाणी, नारद का कीर्तन, चैतन्य महाप्रभु का संकीर्तन और गोपियों के महारास की संगीत लहरियों और शब्द-ध्वनियों को सुन सकेंगे। ईश्वर का गुण भी व्यापकता है। वह भी नित्य है। सर्वत्र है। सत्य है। नाद भी नित्य है। सर्वत्र है। सत्य है। अतः 'नाद' 'ब्रह्म' है। जब नाद और ईश्वर का एकात्म हो जाता है, तब आनंद का स्रोत हुल्ल से फूट पड़ता है। अंतर-बाहर सब रस में; 'आनंद रस' में भींग जाता है। भक्ति अपनी गांधर्व वीणा बजाती कण-कण पर उतर आती है। आँखों से आँसू ढुलक पड़ते हैं। तैत्तिरीय उपनिषद् में एक कथा है - भृगु ऋषि वरुण के पुत्र थे। एक बार भृगु ने अपने पिता वरुण से कहा - 'हे तात ! मैं ब्रह्म को जानना चाहता हूँ'। पिता वरुण ने पुत्र भृगु से कहा - 'जाओ तपस्या करो'। भृगु ने घोर तपस्या की और पाया कि अन्न ही ब्रह्म है। वरुण को संतोष नहीं हुआ। उन्होंने भृगु को पुनः तपस्या करने को कहा। भृगु ने कठिन तपस्या की। इस बार उन्होंने पाया कि प्राण ही ब्रह्म है। वरुण ने और तपस्या करने का आदेश दिया। भृगु ने कठोर तपस्या की। अब की पाया कि मन ही ब्रह्म है। वरुण ने निर्मोही भाव से पुनः तपस्या करने की आज्ञा दी। भृगु ने इस बार घनघोर तपस्या की। पाया कि विज्ञान ही ब्रह्म है। वरुण इस पर भी संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने अविचलित होकर भृगु को परम तपस्या करने को प्रेरित किया। भृगु ने अनंत काल तक अविचल तपस्या की और अनुभव किया - आनंद ही ब्रह्म है।

अखंड आनंद न सही; परंतु पल, क्षण, घड़ी भर का आनंद तो भजन अवश्य देता है। भजन-भक्ति अखंड आनंद की प्राप्ति का साधन भी है। भजन गाने वाला कलाकार कितना आत्मस्थ होकर भाव समुद्र में नहाता है, यह तो कलाकार ही जाने; पर भजन सुनकर जो आत्मविस्मृति से होते हुए आत्मचेता स्थिति को प्राप्त कर लेते हैं, आनंद का अतुल मोदक उन्हें ही मिल पाता है। यह 'आनंद रस' में भींजने की दशा जितनी देर भी रहे, वह आत्मा को निर्जन वन में योगी-सा रमने की अनुकूलता रचती है। भजन के शब्द-शब्द पाँखुरी-से झरते हैं। जोगी सौरभ-सौरभ छक लेता है। पाँखुरी-पाँखुरी धूल में झर जाती है। टूक-टूक होती पाँखुरी के अस्तित्व और महत्व का भी भान है जोगी को। जोगी आत्मा से देखता है। मित्र भाव से देखता है। मित्र नाम सूर्य का है। सूर्य का प्रकाश सबको समान रूप से प्रकाशित कर सुख पहुँचाता है। सुख-दुख, राग-द्वेष, आसक्ति-विरक्ति, जन्म-मरण के परे जाकर जो सोचता है, विचार करता है, देखता है, करता है और स्वयं में मगन रहता है, वह ही निर्जन वन में रमता है। जीवन की झील में वृत्त पर वृत्त बनते जाते हैं। प्रत्येक वृत्त में अलग-अलग चित्र उभरते हैं। तट तक आते-आते वृत्त टूट-टूटकर विलीन हो जाते हैं। चित्र डूब जाते हैं। केवल झील रह जाती है। निर्मल जल से भरी हुई झील।

भजन गायक का स्वर, ढोलक पर पड़ती थापें और भक्तिरस पगे स्वर पूरे आकाश में फैल गए हैं। भक्त नाच रहे हैं। मेरी बगल में बैठे हुए मित्र 'दीप' की देह विगलित हो चली है। तट के वृक्ष गा रहे हैं। पंछी गा रहे हैं। चाँद-सूरज गा रहे हैं। गायें-बछुए गा रहे हैं। पत्थर-कंकड़ गा रहे हैं। वसुंधरा गाने लगी है। नभ गाते-गाते स्वयं आकाश हो गया है। क्षण भर के लिए ही सही 'नादब्रह्म' अमरकंठ के झाड़-झंखाड़ों में बिरम रहा है। अवनि-अंबर में विस्फोट होता है - 'अलख निरंजन'। क्षण-भर की चुप्पी और युग-युग की प्रतीक्षित प्रकाश-प्रभा का अवतरण। उसी प्रकाश-प्रभा के वलय में निर्जन वन में एक जोगी अनादि-अनंत से रम रहा है।


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