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कविता

नहरें पास आईं तब
प्रतिभा गोटीवाले


 

धरती ने गर्भ धारण किया
और अपने फूले हुए पेट के साथ
धीरे धीरे आबाद होने लगी
लेकिन इक्कीसवी सदी की और जाते हुए
क्या इतनी आबादी ठीक थी ?
रात जब फसलें लहलहा रही थीं
किसान अपने घर में सो रहा था
अनाज की मीठी किलकारियों के सपने देखता हुआ
हमने धरती के मुँह पर रखे शिलापट्ट
और उसकी हरी-भरी कोख में
घोंप दिए सरिए
सुबह जब शिलान्यास ने फैलाई
प्रसव की खबर
दौड़ता-भागता आया किसान
हमने उसकी गोद में रख दी
चमचमाती हुई चट्टानें
कहते हुए कि यही जन्मा है
तुम्हारी धरती ने
किसान अवाक था अवाक ही रहेगा
बस हमें भीतर ही भीतर डर हैं
कही उसके हाथों में थमाई चट्टान
वासुदेव की तरह
हमारी भी मौत का कारण न बने
अब हम किसानों से मुँह छुपाए फिरते हैं।

( कहा जाता हैं की एक बार कृष्ण पुत्र सांब गर्भवती स्त्री का वेष धरकर अपने मित्रों के साथ द्वारका में कृष्ण से मिलने आए ऋषियों जिनमें दुर्वासा , विश्वामित्र , वशिष्ठ , नारद आदि थे , के पास उपहास करने के उद्देश्य से गए और उन्होंने तथा अन्य मित्रो ने ऋषियों से पूछा कि क्या वे होने वाले बालक का लिंग बता सकते हैं , ऋषि अपनी दिव्य दृष्टि से सच्चाई जान गए और उन्होंने क्रोधित होकर श्राप दिया की सांब के पेट से एक मूसल का जन्म होगा जो संपूर्ण यदुवंश के नाश का कारण बनेगा।
खबर राजा उग्रसेन तक पहुँची तो उसने मूसल को घिस कर पानी में बहा देने का आदेश दिया मूसल को घिसने से जो पावडर बना उससे अरक घास उत्पन्न हुई जिससे यदुवंशियो का नाश मौसल पर्व के दौरान आपस में लड़ने से हुआ। कुछ चूर्ण एक मछली के पेट में जमा होकर नुकीले पत्थर में बदल गया बाद में जब जरा नाम के एक बहेलिए ने इस मछली को काटा तब उसे ये नुकीला पत्थर मिला जिसे उसने अपने तीर के अग्र भाग पर लगाया और यही तीर कृष्ण की मृत्यु का कारण बना।)

 


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