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कहानी

प्रायश्चित
स्वाति तिवारी


टीवी पर स्त्री-मुक्तिवादियों के आंदोलन की रिपोर्ट का प्रसारण हो रहा है। मैं थोड़ी आवाज बढ़ाकर सुनती हूँ। बड़ा इंट्रेस्टिंग विषय है। नारी-मुक्तिवादी स्त्रियों की रिश्तों से जुड़ी भूमिकाओं को 'स्टीरिओटाइप' की संज्ञा देते हैं और ऐसी विचारधारा वाली स्त्रियाँ इनसे मुक्त होना चाहती हैं। वे अपने 'स्व' को, अपने अस्तित्व को सिर्फ 'स्त्री' ही रखना चाहती हैं। रिपोर्ट खत्म हुई, तो उठकर किचन समेटने लगी, पर भाषण का असर दिमाग पर हावी था और मन जाने कितने रिश्तों का विश्लेषण कर रहा था। सोचती हूँ, ये सभी रिश्ते सात्विक भावनाओं को उभारते हैं। पर यदि रिश्ते अपनी सात्विकता खो दें तो? हाँ यही तो हुआ था मृदुला के साथ।

मैं और मृदुला पास-पास के घरों में ही रहते थे, यानी हम पड़ोसी हुए। दो घरों में ब्याह कर आई हुई दो बहुएँ। मेरा ब्याह साल-भर पहले हुआ था। हमारी दोपहर अक्सर साथ गुजरती - कभी स्वेटर, बुनते, तो कभी धागे काढ़ते। उसके ब्याह के छह माह बाद मैं गर्भवती हुई और प्रसव के लिए मायके चली गई थी। चार माह का बेटा लेकर जब ससुराल लौटी, तो सबसे पहले मृदुला से ही मिलने का मन था। पर सुबह से शाम तक वह नहीं आई। शाम को बाहर किसी गाड़ी के रुकने की आवाज आई और कुछ देर बार मृदुला चहकती हुई आई। मुझे लगा था, वह आते ही गले लग जाएगी, पर वह बड़े प्यार से मेरे बच्चे को दुलारती रही। मुझे वह बदली-बदली सी लगी।

'कहाँ थीं तुम? सारा दिन इंतजार करवाया।' मैंने उलाहना दिया।

'जरूरी काम था, दीदी, इसलिए बाहर गई थी, वरना इस छुटके से मिलने तत्काल आती।' वह नजरें चुराते हुए बोली।

'ऐसा भी क्या काम था? राजन भैया भी आए थे क्या?' उसके पति मेरे पड़ोसी के नाते देवर जैसे ही थे। सो मैंने छेड़ा। सोचा वह शर्म से लाल हो उठेगी, पर उसके चेहरे का रंग उड़ गया। उसने बात बदल दी। बोली, 'चलो दीदी, चाय बनाते हैं। आपके साथ पूरे चार माह पाँच दिन बाद चाय पी रही हूँ।'

'अरे... तू तो रोज दिन गिन रही थी, लगता है। ऐसा था, तो आ जाती कानपुर। अरे, देवर जी से कहती, तो वे ही ले आते तुम्हें।'

हाँ दीदी, आना तो चाहिए था, पर तीन माह से ये जो मुंबई गए हैं ट्रेनिंग पर तो आज तक एक बार भी नहीं आए।'

'चिट्ठी वगैरह...?

'हाँ चिट्ठी आती है। काम की व्यस्तताओं के कारण नहीं आ पाए, दीपावली पर ही आएँगे। लिखा है ट्रेनिंग के बाद कंपनी मुंबई में ही जॉब देगी।'

'तो तुम क्यों नहीं चली गई साथ में।'

मेरे प्रश्न पर उसके चेहरे पर रंग बदल गया। अबकी बार क्रोध का भाव उभरा था। कसैले स्वाद की तरह उसने थूक निगला, फिर कहने लगी, 'चली जाती तो डोकरी को कौन देखता?'

'अरे हाँ। कैसी तबीयत है तेरी सास की?

'मुझे तो इस अधमरी माँ की तीमारदारी के लिए ही लाए हैं। जैसे मेरा अपना कुछ वजूद नहीं, पसंद नहीं। सुबह उठो तो वही माँ जी की कराह। बैठो तो वही, तंग आ गई। मैं यही करते-करते।' वह रुआँसी हो गई।

'कोई बात नहीं मृदु, थोड़े समय की है काकी, कर ले सेवा।'

'कहना सरल है दीदी, पर करने वाला ही जानता है, कितना कठिन है अकेले सँभालना, कभी बिस्तर गंदा करती है, तो कभी कपड़े। क्या नई-नवेली पत्नी यह सब करने के लिए लाए थे, पर छोड़ो भी।' वह खुद का संयत करते हुए मेरे बेटे को दुलारने लगी।

वह चली गई सास की दवाई लेने। मुझे भी तरस हो आया था बेचारी पर। अभी तो वह बच्ची सी है। साल-सवा साल ही हुआ ब्याह को। अभी तो उसकी भी तमाम इच्छाएँ हैं। चाहते हैं। पति का साथ हो तो सब करना अच्छा लगता है। पर बेचारे राजन भैया भी क्या करें। नोकरी के लिए जाना तो पड़ेगा ही, हुआ तो छह महीने में इधर बदली करवा ही लेंगे। माँ ले जाने की हालत में होती, तो नई-नवेली को कौन छोड़ता? उन्हें भी तो मृदुला की याद आती ही होगी। सुंदर-सलोनी पत्नी को यूँ छोड़ना उन्हें कहाँ अच्छा लग रहा होगा, पर माँ को अनदेखा तो नहीं कर सकते न।

दीपावली भी आ गई। पर राजन को छुट्टी नहीं मिली और मृदुला राजन का इंतजार करते या कहें माँजी की तीमारदारी करते ऊब गई। साल-भर भी ढंग से साथ नहीं रहे थे।

शुरुआत में वह भी एक सुखी परिवार था। प्रेम और स्नेह से सराबोर, पर जैसे अचानक नजरा गया। मिट्टी का कच्चा घरौंदा ही तो था उनका नया-नया दांपत्य। अभी उस पर समय के थपेड़े या अकेलेपन की मार झेलने जैसी मजबूती नहीं आ पाई थी। हल्के से तूफान में ही भरभराकर ढह गया। जब सहेजने की जरूरत थी, तब दोनों ही ने संयम और विश्वास को तोड़ा था। पर विश्वास की डोर राजन ने नहीं, मृदुला ने ही तोड़ी थी।

उन दिनों माँजी (मृदुला की सास) गंभीर रूप से बीमार थीं। मृदुला ने उन्हें हॉस्पिटलाइज करवा दिया था। दो-तीन दिन मैं भी अस्पताल गई, मृदुला का खाना लेकर। घर-अस्पताल करते मृदुला तंग आ गई थी, पर अब उसके चेहरे पर एक अजीब तृप्ति थी, वह घर से भी राजन के दोस्त राजीव के साथ ही जाती थी और शाम को लौटती भी उसी की गाड़ी से। माँजी की छुट्टी होने के बाद राजीव रात में भी दो-दो बजे तक मृदुला के ही घर में रुका रहता था। खाना-पीना, हाट-बाजार साथ ही करते थे राजीव-मृदुला। कई बार धिक्कारा था मैंने उसे...

पर मेरी बात पिछड़ेपन का प्रतीक थी, क्योंकि उसमें पति से मिली उपेक्षा का विद्रोह था। कहने लगी, 'दीदी, यदि मेरे पिता छह माह बीमार होते, तो क्या राजन मुझे वहाँ रखते? नहीं न? तब मुझे पति के प्रति दायित्व समझाए जाते।' वह शायद बदला लेना चाहती थी - राजन से या फिर हो सकता है देह की आवश्यकताएँ उसे भस्म किए जा रही हों?

मेरा समझाना उसे उपदेश लगता। धीरे-धीरे मुझसे बात करना बंद कर दिया था। एक दिन राजन भैया का हमारे यहाँ फोन आया। तब फोन हमारे ही पास था। दोपहर के दो बजे होंगे। मैं मृदुला को बुलाने भागती हुई गई, पर पैर ठिठककर रुक गए थे। पोर्च में राजीव की गाड़ी खड़ी थी। दरवाजा हल्के से लुढ़का हुआ था और महरी के काम करने की आवाज आ रही थी। मैं मृदुला को आवाज लगाती हुई अंदर तक चली गयी थी। पर दरवाजे के बाहर उतरे हुए राजीव के जूते और पोर्च में खड़ी गाड़ी ने अंदर चल रहे प्रेम-प्रसंग की कथा कह डाली थी।

उस वक्त इतनी नफरत हो गई थी उस बेआबरू स्त्री से कि उसका गला दबाने को मेरा मन हो आया था। क्रोध में मैं भूल गई थी कि मेरा, उसका कोई रिश्ता नहीं। फिर वह रिश्तों की मर्यादा तोड़ चुकी थी। सहेली के हक का खयाल मुझे था, उसे नहीं।

'क्या हुआ?' उसने प्रश्नवाचक नजरें डालीं।

'क्या चल रहा है यह'? मैं क्रोध में थी।

मेरे प्रश्न ने उसे तिलमिला दिया, 'आप जासूसी करने आई हैं?

तभी महरी मंद-मंद मुस्कराती हुई चली गई। मैं इतना विचलित हो गई थी उस बात से कि बताना ही भूल गई कि राजन का फोन है। उल्टे पैर घर लौट आई तो होल्ड किए फोन ने दुविधा में डाल दिया। 'क्या कहूँ?' सहज होते हुए मैंने राजन को यही कहा कि वह घर पर नहीं है। वह शायद बेचैन था। पूछ बैठा, 'कहाँ गई होगी?'

मैं क्रोध में भरी हुई तो थी ही, बोल पड़ी, 'राजीव के घर होगी। आजकल वहीं फोन किया करो।' मैंने फोन बंद कर दिया था, पर बार-बार घंटी बजती रही - शायद राजन की।

चार दिन बाद पता चला राजन आ गए थे और माँजी मरणासन्न हैं। उनकी माँजी की मृत्यु पर मैं भी गई थी, शोक प्रकट करने। वहाँ लगा कि पूरा घर ही मर गया है। राजन ने ऐसी चुप्पी साधी कि बस। और मृदुला सिरदर्द के नाम पर कमरे में ही पडी रहती। आने-जाने वाले मोहल्ले के दो चार लोग रोज ही राजीव की प्रशंसा व्यंग्यात्मक लहजे मे करते। 'भई राजन। तुम्हारे दोस्त ने तो गजब का साथ दिया। अकेली मृदुला क्या करती? रात दिन राजीव ने यहीं माँजी की सेवा में काटे।' इस तरह से कटाक्ष चलते रहते। तेरह दिनों से राजीव मुझे एक बार भी वहाँ नहीं दिखा। मेहमानों के जाने के बाद एक दिन शाम को राजन आ गया हमारे घर पर। इन्होंने समझाया, 'राजन जरा अपनी हालत ठीक करो। सँभालो स्वयं को। माँजी को कष्टों से मुक्ति मिली, उनका इतना गम नहीं करना चाहिए।'

चाय का प्याला लेते हुए कहा, 'परसों मुझे वापस जाना है, भाभी।'

'और मृदुला?' मैंने प्रश्न किया।

'वही समस्या है। ले जाना चाहता हूँ, पर वह चलना नहीं चाहती।'

'क्या?'

'हाँ, भाभी जाते वक्त कितने अरमान थे दिल में, एक अच्छी नौकरी परिवार के लिए ही तो चाहता है आदमी।'

'सो तो है, भैया।'

'आज अब लौटा हूँ, तो एकदम खाली हो गया हूँ। न माँ रही, न पत्नी पत्नी रही।'

मैने सांत्वना के शब्द बटोरते हुए कहा - 'ऐसा कुछ, नहीं हुआ है भैया, माँ को जाना ही था... रहा सवाल मृदुला का? वह तो अभी नासमझ है। समझा-बुझाकर प्यार से अपने साथ ले जाओ। घर किराए पर चढ़ा दो।'

'वही सोच रहा हूँ।'

'मृदुला ने भी तुम्हारी तरह, तुम्हारे बगैर लंबा वक्त काटा है। साथ जाएगी, तो मन भी लग जाएगा। अब दोनों साथ ही रहो।'

मुझे लगा, राजन कुछ कहना चाहता है, पर वह चला गया। अगले दिन फिर आया, 'भाभी, मैं कल जा रहा हूँ।' थोड़ी देर बाद मृदुला भी आई थी। 'मैं नहीं जाऊँगी।' यह कहने।

हम दोनों पति-पत्नी उन्हें समझाने लगे। राजन सरल स्वभाव का व्यक्ति था, पर राजन की तरह मृदुला गंभीर नहीं थी। मुझे लगा, रिश्तों में जब स्वार्थ, अहं तथा कड़वाहट व्याप्त हो जाती है, तो सर्वनाश होता है। एक दिन मैंने मृदुला से बात की। 'मृदुला, हमारी संस्कृति ऋचाओं की गढ़ी हुई संस्कृति है। इस संस्कृति ने मर्यादा भरे आचरण जीवन-क्रम में गूँध रखे हैं। पति जीवन की परिधि न सही, पर गृहस्थ जीवन का केंद्र बिंदु तो है। पति का साथ, उसके सुख-दुख तुम्हारी हैं। तुम पति के कहने पर ही माँ की सेवा के लिए राजन के साथ नहीं गई थीं न। क्यों?'

'क्योंकि तब वह मेरा नैतिक धर्म था।'

'अब तुम्हारा क्या दायित्व है?'

'आज सब कुछ बदल गया है। मेरी विचारधारा बदल गई है। मैं राजीव को तन-मन से पसंद करने लगी हूँ।'

'ऐसी बातें फिल्मों में होती हैं मृदुला, असल जीवन में नहीं?'

'क्यों नहीं हो सकतीं असल जीवन में? पति जब चाहे पत्नी को अकेली छोड़कर जा सकता है? पत्नी क्यों नहीं? जो पुरुष कर सकता है, वह करने का स्त्रियों को भी अधिकार चाहिए। मैं स्त्री-मुक्ति की बात कर रही हूँ।'

मैं एक पारिवारिक गृहस्थ स्त्री के अपने स्तर पर उसे समझाती रही।

'तुम्हारी बात सही हो सकती है मृदुला, पर हमारा मन आज भी पुरातन है, तुम्हें बाद में पश्चाताप ही होगा।'

बात अधूरी रह गई थी, राजीव की गाड़ी का हार्न सुनते ही वह उठकर उसके साथ चली गई थी। राजन हारे हुए सिपाही की तरह चुपचाप बैठा रहा। मैने खाता लगाया, तो खाने की टेबल पर भी कुछ नहीं बोला, चुपचाप निगलता रहा।

मुझे लगा, जब आस्था टूटती है, तो वह आदमी को गूँगा बना देती है और जब बेशर्मी जीवन में पसर जाती है, तो शेष बचता ही क्या है, सिवाय सर्वनाश के।

मृदुला उसी तरफ बढ़ रही थी। पर राजन की स्थिति एकदम अलग थी। वह बेचारा बेवजह लुटा और टूटा था और फिर हमारे सामने, मोहल्ले वालों के सामने, समाज के सामने भी तो शर्मिदा हो रहा था, कब तक सहज बना रहता। अगले दिन महरी ने बताया, रात में ही राजन भैया को जाते देखा उसने।

मृदुला फिर उसी तरह रहने लगी, कभी नौकरी, कभी राजीव, कभी होटल, कभी पार्टी। एक माह बाद मुंबई से एक टेलीग्राफ आया था - रेल एक्सीडेंट में राजन भैया की मृत्यु का। रेलवे पुलिस मुंबई से पता चला, वह आत्महत्या थी। कब तक संघर्ष करता वह अपनी ही अपमानित आत्मा से। मैने मृदुला से बोलना एकदम बंद कर दिया था। मृदुला ने भी तब मेरी परवाह नहीं की। मृदुला राजीव के साथ किसी फर्म में काम करने लगी थी। सारा समय घर से बाहर ही बिताकर आती।

सात साल यूँ तो कोई मायने नहीं रखते, पर सात साल में मृदुला की मांसलता कंकाल में बदल गई। महरी ने एक दिन बताया - राजीव अपने गाँव चला गया है। बताते हैं, वहाँ उसकी पत्नी और बच्चे हैं। चार महीने हो गए, अब वह मृदुला के पास नहीं आता।

'अच्छा।'

'हाँ, और करे भी क्या? मृदुला भाभी को डॉक्टर ने कैंसर बताया है। अब तो उन्होंने कहीं भी जना-आना छोड़ दिया है। नौकरी भी छोड़ दी। कल वकील को बुलाया था, घर-मकान सब ननद के बच्चों के नाम करवा नहीं थीं।'

'इतना कुछ हो गया, मुझे तो पता ही नहीं चला।'

'भाभी। बहुत बुरी हालत है उसकी। राजन भैया की तस्वीर देखती रहती हैं और पत्र भी डलवाती हैं, पर आज तक भैया की तरफ से कुछ नहीं आया। एक दिन एक चिट्ठी आई थी, यहाँ कोई राजन नहीं रहते?'

'क्या? अब तक उसे नहीं मालूम, क्या?'

'क्या हुआ, भाभी?' महरी ने पूछा।

'कुछ नहीं तू जा।' कहकर मैं मृदुला के घर चल पड़ी।

देखा तो नरकंकाल-सी देह लिए वह पड़ी थी। मैंने प्यार से सिर पर हाथ फेरा था। यह उसके प्रति केवल मेरी मानवीय संवेदना ही थी।

'नहीं, दीदी। आप पर मेरा क्या अधिकार है...'

'क्यों हम पड़ोसी तो हैं।'

'नहीं दीदी, अब कुछ रहा ही कहाँ? सब खत्म हो गया। बस आस आज भी बँधी है। वे मेरे मरने की खबर पर जरूर आएँगे। बहुत प्यार करते थे मुझसे। कितना आग्रह और विनती-भरा था उनका स्वर जब यहाँ से गए थे - 'मृदुला तुम चलो, मैं तुम्हारे बगैर नहीं जी पाऊँगा।' पर झूठ बोलते थे। सात सालों में एक बार भी लौटकर नहीं आए। प्यार करते तो खोज-खबर तो लेते।'

मैं आश्चर्यचकित थी और दुविधा में थी और दुविधा में थी कि मरती हुई इस औरत को बनाऊँ या नहीं कि राजन सात साल पहले ही मर गया है... सचमुच वह तुम्हें प्यार करता था, तेरे बगैर जी नहीं पाया...

वह चाय का आग्रह करने लगी, तो मैंने खुद ही गैस पर चाय चढ़ा दी। मन में एक सवाल था राजीव को लेकर, पूछ ही लिया 'आजकल राजीव नहीं आता क्या?'

उसने भी दो टूक जवाब दिया था, 'नहीं।'

'क्यों?'

'पत्नी और बच्चों के पास लौट गया है, फिर यहाँ अब रखा भी क्या है?' उसकी उन तरल बुझती आँखों में प्रायश्चित का पानी था। उसमें क्षमा-याचना तैर रही थी।

अब हर रोज ही मैं जाकर एक बार उसे देख आती। हल्का दलिया या खिचड़ी बनाकर भिजवा देती मैं। एक रोज साँझ ढले महरी आ गई। 'जल्दी चलो भाभी, डॉक्टर को बुलाना पड़ेगा।'

मैं दौड़कर उसके घर गई। वह कराह रही थी। शायद उसे भयानक दर्द था। डाक्टर ने आकर बताया, 'इनकी साँसों का सिलसिला समाप्त होता जा रहा है।'

मैं चुप थी। डाक्टर ने बताया, 'ये किसी का इंतजार कर रही हैं।'

मैने डाक्टर को बताया, 'वह तो इसके इंतजार में ही चला गया। अब कहाँ से आएगा।'

उसकी ननद को खबर कर दी थी। रातभर मैं वहीं बैठी रही। वह छटपटाती रही। शायद बीता हुआ एक-एक लम्हा उसकी यादों में तैर रहा था।


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